यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः। १.२.२
(यथोक्तोपपन्नः) जैसा (वाद के लिए) कहा गया है उससे युक्त तथा (छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भः) जिसमें छल जाति निग्रहस्थान से स्व पक्ष का साधन तथा प्रतिपक्ष का प्रतिषेध होता है (जल्पः) वह जल्प है।
वाद के लिए कही गई बातें जल्प में भी है। यहां भी पक्ष प्रतिपक्ष पंचावयव से तथा तर्क तथा प्रमाणों के उपयोग से स्व पक्ष की सिद्धि और प्रतिपक्ष का खंडन करते है परंतु जल्प में वे छल जाति तथा निग्रहस्थान (जिनके लक्षण हम आगे देखेंगे) का भी प्रयोग करते है जो वाद में नहीं होता। ऐसा इस लिए की जल्प में उद्देश्य हार जित का है सत्य तक पहुंचना नहीं। यहां न तो सामने वाले की त्रुटियाँ समझाई जाती है और न उसे वे त्रुटियाँ सुधारने का अवसर प्रदान किया जाता है। यदि उसकी त्रुटि पकडी गई तो उसे हारा हुआ घोषित कर दिया जाता है।
स प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा। १.२.३
(सः) वह जल्प (प्रतिपक्षस्थापनाहीनः) जब प्रतिपक्ष की स्थापना से रहित होता है तब (वितण्डा) वितण्डा कहा जाता है।
जल्प में प्रवृत्त एक पक्ष यदि स्वयं के पक्ष की स्थापना किए बिना ही दूसरे पक्ष का खंडन किए जा रहा है तब उस कथा को वितण्डा कहेंगे। स्वयं के पक्ष की स्थापना (प्रतिज्ञा हेतु उदाहरण पूर्वक) न करने से वह उसके खंडन के लिए होने वाले आक्रमणों से स्वयं को बचाने का प्रयत्न करता है और स्वयं प्रतिपक्ष पर आक्रमण (छल आदि साधनों सहित) करने के लिए स्वतंत्र रहता है।
उसका स्वयं की पक्ष की स्थापना न करने का अर्थ यह नहीं है की उसका कोई पक्ष (सिद्धांत, प्रयोजन) नहीं है। प्रयोजन हीन तो कोई प्रवृत्ति होती नहीं। वह मात्र उसे सामने नहीं रखता जिससे स्वयं के सिद्धांत के खंडित होने से होने वाली हार से बचा जा सके। इस कारण से सूत्र में यह नहीं कहा की वितण्डा प्रतिपक्ष से रहित है परंतु यह कहा की वितण्डा प्रतिपक्ष की स्थापना से रहित है।
जल्प वितण्डा (और उसमें उपयोग में लिए जाने वाले छल आदि साधन) प्रयोग करने योग्य वस्तु नहीं है पर फिर भी इन का ज्ञान तत्वज्ञान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले और उसकी रक्षा करने वाले को होना आवश्यक है। एक तो, इनको जानकर यदि प्रतिपक्ष जल्प वितण्डा कर रहा है तो उसे समझकर उसके प्रहारों से सत्य और स्व पक्ष की रक्षा हो सकती है (तथा स्वयं प्रतिपक्ष के असत्य को सत्य मानने की भूल से बच सकते है) और यदि तत्वरक्षा करने का और कोई मार्ग न हो तो प्रतिपक्ष को उसके ही साधनों का उपयोग करते हुए परास्त किया जा सकता है।
[मेरे मत में यदि परिस्थिति उस हद तक खराब हुई मिले भी जहां सत्य की रक्षा के लिए सत्य पक्ष को जल्प वितण्डा का उपयोग करना पडे तो भी जीत के उपरांत प्रथम अवसर पर उसे वाद अनुकूल तर्कों और प्रमाणों से भी उसी सत्य को पुनः स्थापित (तथा प्रतिपक्ष को पुनः खंडित) करना चाहिए। जल्प वितण्डा से मिली विजय युद्ध के क्षण में तो कदाचित पराजय को रोक सकती है पर यदि उसे वाद अनुकूल तर्कों तथा प्रमाणों से सुदृढ नहीं किया गया तो वह क्षणिक जीत दीर्घकालीन हार में परिवर्तित हो जाएगी क्योंकि योग्य प्रमाणों के अभाव को (और जीते हुए पक्ष की जल्प प्रवृत्ति को) बाद में देख पाना सरल होगा और वह जीत और जीतने वाले के सिद्धांत पर से विश्वास को डिगाने वाला सिद्ध होगा। उस अविश्वास के बीच असत्य पक्ष के लिए पलटवार करना सरल होगा तथा सत्य प्रिय मनुष्य जो अभी स्वयं सत्य तक पूरा नहीं पहुँच पाए है उनके लिए सिद्ध पक्ष को अप्रामाणिक मानना स्वाभाविक होगा जिससे सत्य पक्ष की ही हानि होगी।]