सम्भवतोऽर्थस्यातिसामान्ययोगादसम्भूतार्थकल्पना सामान्यच्छलम्। १.२.१३
(सम्भवतः) संभव हो सकने वाले (अर्थस्य) अर्थ का (अतिसामान्ययोगात्) अति सामान्य के साथ संबंध जोडकर (असम्भूतार्थकल्पना) असंभव अर्थ की कल्पना कर लेना (सामान्यच्छलम्) सामान्य छल है।
किसी के ऐसे वक्तव्य को जिसमें संभावना मात्र कही गई है उसको निश्चितता जताकर (संभावना को शत प्रतिशत के स्तर पर कल्पित कर कर) वक्ता खंडन करना यह सामान्य छल है।
जैसे किसी ने कहा की यह नवयुवक अत्यंत कार्यकुशल और प्रतिभावान है। तो दूसरे ने समर्थन में प्रशंसा के भाव से कहा की वह युवक ऐसा हो सकता है आईआईटी से जो पढा हुआ है। अब यदि कोई इस बात का खंडन यह कह कर करें की आईआईटी से पढकर निकालने वाला प्रत्येक नवयुवक ऐसा ही कार्यकुशल और प्रतिभावान होता है ऐसा आपका मन्तव्य प्रत्यक्ष से विरुद्ध होने से आप की बात जूठी है तब यह सामान्य छल का प्रयोग है। वक्ता ने आईआईटी से पढे और प्रतिभावान होने के बीच में साधन साध्य का संबंध नहीं कहा था मात्र उन दोनों धर्मों की सहचारिता की संभावना प्रशंसा के भाव से व्यक्त की थी।
दूसरा उदाहरण : किसी ने एक खेत को देखकर कहा की यहां अच्छा धान हो सकता है। अब यदि कोई इसका अर्थ यह निकालने लगे की वक्ता के अनुसार इस खेत में बिना बीज डाले ही धान उगेगा तो वह सामान्य छल का प्रयोग है।
एक विशिष्ट अर्थ में कही गई बात को जिस विशिष्ट वस्तु/व्यक्ति/संदर्भ में वह कही गई है उससे अलग कर अति सामान्य प्रत्येक वस्तु/व्यक्ति/संदर्भ के साथ जोड देना (जान बुझ कर असंभव अर्थ की कल्पना कर लेना) और फिर कहना की बात गलत है यह सामान्य छल है।
धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम्। १.२.१४
(धर्मविकल्पनिर्देशे) किसी एक अर्थ में कहे गए शब्द का (अर्थसद्भावप्रतिषेध) उससे विरुद्ध अर्थ को मानकर अर्थ की सत्ता का ही प्रतिषेध करना (उपचारच्छलम्) उपचार छल है।
शब्द कई बार उनके यथार्थ शब्दार्थ के उपरांत के अर्थ को कहने के लिए भी प्रयुक्त होते है। ऐसे भिन्न भिन्न उपयोग उस शब्द के धर्म विकल्प कहलायेंगे। अब वक्ता ने शब्द को कोई एक धर्म विकल्प में प्रयोग किया परंतु उन वैकल्पिक प्रयोग को अमान्य कर अर्थ की सत्ता हो ही नकार देना उपचार छल है।
जैसे कोई गाडी में जा रहे व्यक्ति ने कहा की दिल्ली आ गया है। और दूसरा कहे की आप की बात असत्य है। दिल्ली थोडा अपना स्थान बदलकर आता जाता है, हमारी गाडी दिल्ली या गई है। तो यह उपचार छल का प्रयोग है।
यह सत्य होते हुए भी की दिल्ली आता जाता नहीं है, क्योंकि व्यवहार में दिल्ली आ गया है कहा ही जाता है ऐसा कहने का शब्द के यथार्थ अर्थ का हवाला देते हुए खंडन करना उपचार छल बनेगा।
ऐसे ही किसी शब्द का आलंकारिक प्रयोग हुआ हो और निर्दिष्ट आलंकारिक अर्थ की सत्ता को शब्द के मूल अर्थ को लेकर अस्वीकार कर देना भी उपचार छल की कोटि में आएगा।
मुख्य बात यह है की वक्ता के तात्पर्य को अनदेखा कर शब्दों की चतुराई से खंडन पर उतर आना छल है।
छल का उपयोग दोषपूर्ण तथा निंदनीय माना जाता है। ऐसे में हमें स्वयं ऐसे प्रयोगों से बचना चाहिए और यदि प्रतिपक्ष छल प्रयोग कर रहा है तो हमें हमारे तात्पर्य की स्पष्टता को सामने रखना चाहिए जिससे उसकी छल प्रवृत्ति सामने आ जाए।
छल परीक्षा
न्यायदर्शन में प्रत्येक पदार्थ का पहले उद्देश किया गया है उसके पश्चात लक्षण तथा अंत में परीक्षा। पदार्थ के जो लक्षण किए है वह पूर्ण तथा त्रुटि रहित है अथवा नहीं इस की गहराई से जांच करना परीक्षा है। अब तक हम मात्र लक्षण को देखते आए है परीक्षा बाद में आएगी। परंतु छल के विषय में परीक्षा प्रकरण अत्यंत अल्प होने से सूत्रकार ने उसे छल के लक्षण के उपरांत ही ले लिया है। अगले तीन सूत्र छल परीक्षा के है।
सूत्रकार ने छल के तीन प्रकार बताए है उस पर शिष्य जिज्ञासा करता है (अगला सूत्र)।
वाक्छलमेवोपचारच्छलं तदविशेषात्। १.२.१५
वाक्छल ही उपचार छल है दोनों सामान होने के कारण।
शिष्य का कहना है की वाक्छल और उपचार छल दोनों सामान ही है। दोनों में वक्ता शब्द का प्रयोग गौण अर्थ में करता है और प्रतिपक्षी उसका खंडन शब्द के अन्य अर्थ को ले कर करता है। तो उसे भिन्न प्रकार क्यों मना जाए? इन दोनों को एक ही मानना चाहिए।
सूत्रकार उत्तर देते है।
न तदर्थान्तरभावात्। १.२.१६
नहीं, उन दोनों में भेद होने के कारण।
दोनों छल में भिन्नता है। जहां वाक्छल में भिन्न अर्थ की कल्पना की जाती है, उपचार छल में अर्थ की सत्ता को ही नकार दिया जाता है।
आगे सूत्रकार कहते है,
अविशेषे वा किञ्चित्साधर्म्यादेकच्छलप्रसङ्गः। १.२.१७
भेद को न मानने पर तो थोडी सी समानता से एक ही छल को मानने का प्रसंग प्राप्त हो जाएगा।
यदि दो प्रकार में कुछ समानता होने से उनको एक मान लिया जाए तब तीनों में थोडी समानता होने से छल के दो भी प्रकार नहीं बनेंगे और मात्र एक प्रकार में ही सारे छल समाविष्ट हो जाएंगे।
विषय को ठीक समझने के लिए सूत्रकार ने तीन प्रकार उपयुक्त समझे है सो निर्दिष्ट किए है और उन सब में थोडी भिन्नता है तो उसे उसी तरह से समझना उपयोगी होगा।