सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः। १.२.६
(सिद्धान्तम्) स्वयं के सिद्धांत को (अभ्युपेत्य) मानकर (तद्विरोधी) उसीका विरोध करने वाला हेतु (विरुद्धः) विरुद्ध नाम का हेत्वाभास है।
जब कोई ऐसा हेतु देता है जो स्वयं के ही पूर्व मान्य सिद्धांत को खंडित करता हो और वह हेतु देने वाले के पक्ष का वास्तव में समर्थन नहीं पर प्रतिषेध करता हो उसे विरुद्ध हेतु कहते है।
जैसे कोई सामने खडे पशु को गधा सिद्ध करना चाहता है। और हेतु देता है की "उसके सींग है इस लिए" तो यह विरुद्ध हेत्वाभास है।
विरुद्ध हेत्वाभास का एक उदाहरण मेरी तरफ से ..
मान लीजिए की चौकीदार रखने से चोरी होने की संभावना निर्मूल हो जाती है यह किसी का एक पूर्व मान्य सिद्धांत है। उसने अथवा उसके आस पास में परंतु अब तक किसी ने चौकीदार रखा नहीं था न ही वहां चोरी होती थी। अब उसने एक बडी कीमत वाला चौकीदार रख लिया। चौकीदार रखने के बाद उसके वहां और आस पास में धड़ाधड़ चोरियाँ होने लगी।
मान लीजिए की चौकीदार रखने से चोरी होने की संभावना निर्मूल हो जाती है यह किसी का एक पूर्व मान्य सिद्धांत है। उसने अथवा उसके आस पास में परंतु अब तक किसी ने चौकीदार रखा नहीं था न ही वहां चोरी होती थी। अब उसने एक बडी कीमत वाला चौकीदार रख लिया। चौकीदार रखने के बाद उसके वहां और आस पास में धड़ाधड़ चोरियाँ होने लगी।
अब यदि वह कहे की चौकीदार अच्छे से काम कर रहा है (प्रतिज्ञा), और हेतु दे की "इतनी चोरियाँ हुई की उसके घर में अब मात्र भारी सामान जैसे sofa, bed, table इत्यादि ही बचा हुआ है इस लिए।" तो यह विरुद्ध हेत्वाभास होगा।
(इस हेतु से उसका पक्ष सिद्ध भले ही ना हो पर उसे देखकर हम यह अनुमान कर सकते है की आगे वो ४-५ मुस्टंडे से और भी चौकीदार रखेगा बचे हुए भारी सामान की रक्षा के लिए।)
(इस हेतु से उसका पक्ष सिद्ध भले ही ना हो पर उसे देखकर हम यह अनुमान कर सकते है की आगे वो ४-५ मुस्टंडे से और भी चौकीदार रखेगा बचे हुए भारी सामान की रक्षा के लिए।)
यस्मात्प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमपदिष्टः प्रकरणसमः। १.२.७
(यस्मात्) जिस से-जिस संशय के कारण से (प्रकरणचिन्ता) प्रकरण पर चिंतन चल रहा है (सः) उसीको (निर्णयार्थम्) निर्णय के लिए हेतु रूप में (अपदिष्टः) प्रस्तुत कर देना (प्रकरणसमः) प्रकरणसम हेत्वाभास है।
जिस विषय से संशय उत्पन्न हुआ है और चिंतन चल रहा है वही विषय को हेतु के रूप में प्रस्तुत कर देना प्रकरणसम हेत्वाभास है। जैसे शब्द में नित्यता अथवा अनित्यता का निश्चय न हो पाने से चिंतन चल रहा हो और उसमें एक पक्ष कहे की वह नित्य है और हेतु दें की "उसमें अनित्य धर्म के न होने से" तो यह कोई हेतु नहीं बनेगा क्योंकि उसमें नित्यत्व है अथवा अनित्यत्व यही तो संशय है (दोनों में से एक भी धर्म की प्राप्ति न देख पाने से)। नहीं तो यहां प्रतिपक्ष सामने उसी तरह का हेतु दे कर अपना पक्ष भी सिद्ध कर सकता है की शब्द अनित्य है, हेतु "उसमें नित्य धर्म के न होने से"।
एक उदाहरण मेरी तरफ से..
किसी ने सुना की शतावरी मातृत्वकांक्षिणी स्त्री के लिए और स्तनपान करा रही माता के लिए आरोग्य वर्धक औषध है। परंतु इस विषय में अधिक ज्ञान नहीं होने से उसने यह निश्चित जानना चाहा की क्या शतावरी लाभप्रद होगी अथवा हानिकारक। इस प्रकरण पर एक पक्ष जो एक ऐसी पत्रिका चलाता है जिसमें उनके सहचरों द्वारा अनुमोदित प्रमाण* प्रस्तुत होते है, उसने कहा की "शतावरी हानिकारक है", हेतु "शतावरी हानिकारक नहीं है ऐसा कोई प्रमाण (हमारी पत्रिका में) नहीं होने से।
किसी ने सुना की शतावरी मातृत्वकांक्षिणी स्त्री के लिए और स्तनपान करा रही माता के लिए आरोग्य वर्धक औषध है। परंतु इस विषय में अधिक ज्ञान नहीं होने से उसने यह निश्चित जानना चाहा की क्या शतावरी लाभप्रद होगी अथवा हानिकारक। इस प्रकरण पर एक पक्ष जो एक ऐसी पत्रिका चलाता है जिसमें उनके सहचरों द्वारा अनुमोदित प्रमाण* प्रस्तुत होते है, उसने कहा की "शतावरी हानिकारक है", हेतु "शतावरी हानिकारक नहीं है ऐसा कोई प्रमाण (हमारी पत्रिका में) नहीं होने से।
यह प्रकरणसम हेत्वाभास होगा क्योंकि जिस विषय (प्रकरण) के लिए प्रमाण की खोज हो रही है उसी के प्रमाण के अभाव को हेतु बनाया गया है। यहां प्रतिपक्ष उसी प्रमाण के अभाव को इस तरह प्रस्तुत कर सकता है की शतावरी लाभप्रद है/हानिकारक नहीं है, हेतु "उसके लाभप्रद न होने का / हानिकारक होने का कोई प्रमाण न होने से"
*यहां इस उदाहरण में जिज्ञासु उस पत्रिका को आप्त वचन मान रहा है ऐसा जानना चाहिए।
प्रकरणसम हेत्वाभास में इस तरह से प्रमाण के अभाव को हेतु बनाने से प्रमाण का अभाव प्रतिपक्ष को भी सिद्ध करता है इस लिए उसे नव्य न्याय में (न्यायदर्शन में से निकली न्याय की शाखाओं में से एक, जो बहुत प्राचीन नहीं है) इसे सत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास नाम से कहा जाता है।
एक और उदाहरण जो पूर्व के समान ही है।
संशय है की factory में बनी कोई एक महेंगी वस्तु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है अथवा नहीं। यहां पत्रिका पक्ष कहता है की वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है, हेतु "वह वस्तु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ऐसा कोई प्रमाण न होने से"
(क्या आप देख सकते है की fact checkers सूत्रकार गौतम के समय से पूर्व भी अस्तित्व में थे।)