शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

साध्याविशिष्टः साध्यत्वात्साध्यसमः। १.२.८, कालात्ययापदिष्टः कालातीतः। १.२.९

साध्याविशिष्टः साध्यत्वात्साध्यसमः। १.२.८

(साध्याविशिष्टः) जो साध्य से अविशिष्ट हो-साध्य के सामान हो ऐसा हेतु स्वयं (साध्यत्वात्) साध्य कोटि में होने से (साध्यसमः) साध्यसम नाम का हेत्वाभास है।

हेतु में साधन धर्म की साध्य धर्म के साथ व्याप्ति दिखा कर साध्य धर्म सिद्ध करना होता है। यहां साधन धर्म स्वयं पहले से सिद्ध होना चाहिए (दोनों पक्ष उसे सिद्ध मानते हो ऐसा होना चाहिए)। यदि ऐसा हेतु दे दिया जिसका आश्रय अथवा स्वयं (साधन) अथवा व्याप्ति जिसे आधार रूप में प्रस्तुत किया गया है वही अभी साध्य कोटि में है तब ऐसे हेतु से साध्य धर्म को सिद्ध करना तो दूर, पहले तो उस हेतु को ही सिद्ध करना पडेगा। इस लिए जो स्वयं असिद्ध हो ऐसा हेतु शुद्ध नहीं रहता। ऐसे हेतु को साध्यसम हेतु कहते है। नव्य में इसे असिद्ध हेत्वाभास नाम से जाना जाता है।

यह साध्यसम (असिद्ध) हेत्वाभास तीन प्रकार का है। 

आश्रयासिद्ध : जिसका आश्रय ही असिद्ध हो। अर्थात् साध्यधर्म की सिद्धि जिसमें करनी है वह साध्य (पक्ष) ही सिद्ध न हो। जैसे किसी ने कहा आकाशकमल में सुगंध होती है (प्रतिज्ञा), कमल होने से (हेतु), भूमि के कमल के समान (उदाहरण)। अब यहां सिद्ध करने चले है आकाशकमल में सुगंध परंतु पहले आकाशकमल तो सिद्ध हो। जब आकाशकमल का ही ठिकाना नहीं तो सुगंध किसमें सिद्ध करेंगे।

स्वरूपासिद्धि : जो हेतु स्वरूप से असिद्ध है ऐसा हेतु देना। जैसे यह कहना की सरोवर में आग लगी है, धुआँ होने से। और धुआँ ही नहीं दिखाई दे रहा है। 

अथवा कोई कहे की छाया द्रव्य है, उसमें गति होने से। तब छाया जो प्रकाश का अभाव मात्र है जो प्रकाश को आवृत्त करने वाले द्रव्य की गति के कारण भिन्न भिन्न स्थान पर होता है उसमें गति होना ही असिद्ध है। और जब छाया में गति होना ही असिद्ध है तब वह छाया को द्रव्य सिद्ध करने का साधन कैसे बनेगी?
  
व्याप्तत्वासिद्ध : यह वह हेत्वाभास है जहां व्याप्ति जिससे साधन धर्म द्वारा साध्य धर्म को सिद्ध किया जाता है वही असिद्ध है। अर्थात् दोनों पक्ष इसी बात पर सहमत नहीं है की व्याप्ति है (अव्याप्ति नहीं है) और वह अव्यभिचारी है (अनैकांतिक नहीं है)।

जैसे कोई कहे की पर्वत पर धुआँ है, वहां अग्नि होने से। तो जहां जहां अग्नि होती है वहां वहां धुआँ होता है यह व्याप्ति अग्नि का धुएं के साथ ऐकांतिक संबंध न होने से व्यभिचारी है। जब व्याप्ति ही असिद्ध है तो वह हेतु भी सद् हेतु न होकर दुष्ट हेतु बनेगा।

(नव्य में व्याप्तत्वासिद्ध का लक्षण ऐसी व्याप्ति कहा है जिसको पूरा करने के लिए उपाधि (जो साधन में वर्णित भी नहीं है) की आवश्यकता है - जैसे जहां जहां अग्नि और आर्द्र ईंधन का संयोग होता है वहां वहां धुआँ होता है। यहां "आर्द्र ईंधन का संयोग" उपाधि है जिसके बिना व्याप्ति व्यभिचारी होगी।)

जिस भी व्याप्ति का विरुद्ध उदाहरण मिले वह अनैकांतिक है। (जिस व्याप्ति का एक भी उदाहरण न मिले वह अव्याप्ति है पर क्योंकि उदाहरण पंचावयव में अनिवार्य है यदि ऐसी व्याप्ति हुई तो पंचावयव पूर्ण नहीं हो पाएगा।)

कालात्ययापदिष्टः कालातीतः। १.२.९

समय के बीत जाने पर कहा गया हेतु/समय ने जिस हेतु को नष्ट कर दिया है, वह कालातीत हेत्वाभास है।

जैसे किसी ने कहा की अग्नि शीतल होती है, द्रव्य होने से, मिट्टी के समान। तो प्रतिपक्षी ने वहीं के वहीं अग्नि उत्पन्न कर उसको दिखाया की देखो क्या अग्नि शीतल है अथवा उष्ण। अब यदि प्रथम पक्ष फिर भी अपने उस हेतु को जो सीधा सीधा प्रत्यक्ष के विपरीत जा रहा है पकड रखें तब वह कालातीत हेत्वाभास है।

एक और उदाहरण लेते है। किसी बच्चे ने ऐसा कार्य किया जिससे किसी की हानि होती है। अब इस समय यह संशय हो सकता है की बच्चे ने ऐसा काम गलती से बिना सोचे समझे/उसकी बुद्धि वह हानि को देख पाने जितनी नहीं थी इस लिए किया अथवा उसने जान बुझ के वह हानि पहुंचाई। इस समय यदि एक पक्ष (अथवा बच्चा स्वयं) यह कहे की उसने हानि को देख नहीं पाने से उस कार्य को किया है तो वह आगे विचारणीय विषय होगा परंतु मानो उस हानि को देखने के उपरांत भी यदि बच्चा उसी कार्य को पुनः पुनः करता ही जाता है और वही हेतु देता रहता है तब वह हेतु हेत्वाभास मात्र ही है। क्योंकि उस काल के उस खंड ने जब हानि प्रत्यक्ष थी उस हेतु को अमान्य बना दिया है।

नव्य में इस हेत्वाभास को बाधित कहा गया है। (दिए गए हेतु का प्रत्यक्ष आदि अन्य बलवान प्रमाणों से साध्यकाल में बाधित हो जाना।)