सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमसाध्यसमकालातीता हेत्वाभासाः। १.२.४
सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम, साध्यसम, कालातीत (यह पाँच प्रकार के) हेत्वाभास (जो हेतु जैसा आभास-प्रतीत हो रहा हो पर हेतु न हो) है।
इस सूत्र में हेत्वाभास के पाँच विभाग बताए गए है जिनके लक्षण आगे बताए जाएंगे और हेत्वाभास का मूल लक्षण शब्द के निर्वचन से ही पता चलता है। जो हेतु जैसा प्रतीत तो हो रहा हो पर हेतु के लक्षण से (साध्य को सिद्ध करने की साधकता-शक्ति से) रहित हो।
अनैकान्तिकः सव्यभिचारः। १.२.५
जो हेतु एक पक्ष में स्थिर न हो कर अनेक पक्षों की तरफ जाता है (अनेक अंत वाला होता है) उसे सव्यभिचार (व्यभिचार सहित) कहते है।
व्यभिचार = वि (विरुद्ध रूप से) अभी (चारों और से) चार (चर् धातु से, गति अर्थात् स्थिति का अभाव)। एक स्थिति, व्यवस्था में न टिक कर अव्यवस्थित रूप से यहां वहां गति व्यभिचार है। जिस हेतु में दर्शाया गया साधक धर्म मात्र साध्य धर्म के साथ ही नहीं परंतु (साध्य से विपरीत) अन्य धर्मों के साथ भी पाया जाता है वह हेतु जैसा लगता हुआ भी हेतु नहीं है क्योंकि वहां साधक धर्म मिलने पर यह नहीं कहा जा सकता की साध्य धर्म भी होगा ही (हो सकता है विरुद्ध धर्म भी हो)। यदि कोई पक्ष ऐसा हेतु प्रस्तुत करता है तब वह सव्यभिचार हेत्वाभास है।
जैसे कोई कहे की जहां आग है वहां आग होने से धुआँ भी है तो यह सव्यभिचार हेत्वाभास होगा क्योंकि जहां आग होती है वहां धुआँ हो भी सकता है अथवा नहीं भी हो सकता। उससे विपरीत जहां धुआँ होगा वहां आग भी होगी यह कहना दोष रहित हेतु होगा।
ऐसे ही हमारे शब्द अनित्य है वाले उदाहरण में यदि कोई हेतु दें की "स्पर्श से रहित होने से" और उदाहरण दे "जैसे सुख दुख।" तो यह दुष्ट हेतु होगा क्योंकि भले ही,
१) शब्द अनित्य है,
२) सुख दुख भी अनित्य है,
३) शब्द और सुख दुख दोनों ही स्पर्श से रहित है,
यहां साधन साध्य धर्म के बीच की व्याप्ति त्रुटिपूर्ण है। स्पर्श गुण का अभाव अनित्य और नित्य दोनों प्रकार की वस्तु में देखा जा सकता है अर्थात् यहां दर्शाया गया साधन धर्म एकांतिक न होकर अनैकान्तिक, सव्यभिचार है। प्रतिपक्ष इस का खंडन विरुद्ध अंत वाले उदाहरण से कर सकता है जैसे आत्मा भी स्पर्श से रहित है पर वह नित्य है। प्रथम पक्ष को स्वयं के दिए गए हेतु के अनुसार अब शब्द को नित्य मानना पडेगा।
हेतु के लक्षण में कहा गया था की हेतु उदाहरण के साधर्म्य से साधन धर्म से साध्य धर्म की सिद्धि करने वाला होता है। यहां उदाहरण का अर्थ मात्र वह एक उदाहरण ही नहीं है जो पंचावयव में दिया जाता है। भले ही वहां मात्र एक उदाहरण दिया गया हो पर वह हेतु सारे शक्य उदाहरणों पर खरा उतरना चाहिए (अर्थात् महत्व व्याप्ति का है, एक उदाहरण का नहीं)। यदि एक भी अपवाद मिल गया तो हेतु दुष्ट कोटि में अर्थात् हेत्वाभास कोटि में आ जाएगा।
प्रश्न हो सकता है की तब फिर एक उदाहरण देने न देने से क्या अंतर आ जाएगा? तो वह आवश्यकता इस लिए बनाई है की कोई एकदम ही कल्पित हेतु न देने लगे (बेधडक गप हाँकने वाले हमेशा से प्रचुर मात्रा में मिलते होंगे) कम से कम एक उदाहरण तो हो। (और फिर उदाहरण से व्याप्ति को समझने में अधिक सुविधा भी रहती होगी कहीं कहीं।)
एक से अधिक उदाहरण क्यों नहीं? क्योंकि दो अथवा दस उदाहरण से भी फिर हेतु का वजन नहीं बढेगा क्योंकि उसे खंडित करने के लिए एक ही विरुद्ध उदाहरण पर्याप्त होगा।