जब अनुमान प्रमाण से किसी वस्तु के निर्णय पर पहुंचने के हेतु से चर्चा होती है उसे कथा (कथ वाक्यप्रबंधे) कहते है। यह कथा तीन प्रकार की होती है।
१। वाद जिसमें चर्चा का उद्देश्य सत्य तक पहुंचना है।
२। जल्प जिसमें हेतु चर्चा में स्वपक्ष के लिए विजय पाना मात्र है फिर चाहे वह सत्य तक पहुँचाए अथवा असत्य तक।
३। वितंडा जिसमें हेतु मात्र प्रतिपक्ष का खंडन है और स्वपक्ष की स्थापना भी नहीं करता वैतंडिक।
सूत्रकार वाद का लक्षण इस प्रकार करते है।
प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः। १.२.१
(प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः) प्रमाण तथा तर्क से जिसमें स्वपक्ष का समर्थन और प्रतिपक्ष का प्रतिषेध (उपालंभ) है, (सिद्धान्ताविरुद्धः) जिसमें स्व सिद्धांत के विरुद्ध बात नहीं कही जाती, (पञ्चावयवोपपन्नः) जो पंचावयव से युक्त है, (पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो) जिसमें परस्पर विरुद्ध सिद्धांतों को मानने वाले पक्ष तथा प्रतिपक्ष का ग्रहण किया गया है, (वादः) वह वाद नामक कथा है।
यहां परस्पर विरुद्ध सिद्धांतों को मानने वाले पक्ष प्रतिपक्ष है और दोनों ही स्वयं के पक्ष को स्थापित और प्रतिपक्ष को खंडित करने का प्रयास भी करते है पर यह प्रवृत्ति इस लिए है की दोनों ही स्वयं का पक्ष प्रामाणिक है ऐसा दृढता से मानते है और दोनों ही जो भी पक्ष प्रामाणिक हो वही सिद्ध होना चाहिए ऐसा मानते है। अर्थात् वाद की प्रक्रिया में उनमें से किसी को स्वयं के पक्ष में त्रुटियाँ ज्ञात हो जाए तो वे उन्हें सुधारने के लिए और प्रतिपक्ष की बात सत्य लगी तो उसे भी स्वीकार करने को तत्पर रहेंगे। स्वयं की त्रुटियों को छुपाने और प्रतिपक्ष के पराजय के प्रयास कुतर्क, असत्य, छल पूर्वक नहीं करेंगे।
दोनों पक्ष स्वयं के पक्ष की सिद्धि एवं प्रतिपक्ष का खंडन करने के लिए प्रमाणों तथा तर्क का प्रयोग करेंगे। पूर्व निर्धारित नियमों के अनुसार चर्चा चलती है और दोनों पक्ष पंचावयव का उपयोग करेंगे। (जब वाद औपचारिक व्यवस्था के अंतर्गत सार्वजनिक रूप से / सभा में न चल रहा हो अपितु दो व्यक्ति जैसे गुरु शिष्य, पिता पुत्र, दो मित्र वगैरह आपस में चर्चा कर रहे हो तो पंचावयव का पालन करना अनिवार्य नहीं है।)
दोनों पक्ष सत्य की इच्छा रखते हुए भी क्योंकि परस्पर विरुद्ध सिद्धांत को लिए हुए है, कम से कम एक पक्ष तो अवश्य ही (यह भी हो सकता है दोनों ही पक्ष) असत्य मान्यता को सत्य माने हुए है। जब जिसका सिद्धांत असत्य है वह अपना पक्ष रखेगा अथवा सत्य सिद्धांत का खंडन करेगा तो स्वाभाविक है की उसके हेतु, उदाहरण, तर्कों, प्रमाणों की प्रस्तुति में त्रुटियाँ होगी। ऐसी त्रुटियाँ करना (जल्प वितंडा में) हार का कारण बनती है परंतु क्योंकि यहां वाद चल रहा है, कोई लडाई नहीं, तो ऐसी त्रुटियाँ होने पर भी उसे हारा हुआ घोषित न करके उसे उसकी त्रुटियाँ समझाई जाती है और सुधारने के अवसर दिए जाते है।
अब यहां क्योंकि जो पक्ष गलत भी है और त्रुटियाँ कर भी रहा है पर वह जान बुझ कर, छल पूर्वक ऐसा नहीं कर रहा है। ऐसे में एक गलती वाद में नहीं होती। वह है स्वयं के ही सिद्धांत के विरुद्ध की बात कहना। इस लिए सूत्र में सिद्धांत अविरुद्ध विशेषण दिया गया है।
[मेरे मत में यह त्रुटि इस लिए नहीं होती क्योंकि जिसके लिए सत्य ही सर्वोपरि हो वह जान बुझ कर तो स्वयं के सिद्धांत के विरुद्ध की बात नहीं ही करेगा (स्वयं का बचाव अथवा प्रतिपक्ष पर आक्रमण के लिए) पर वह अनजाने में भी ऐसा नहीं करेगा। क्योंकि दो विरोधी बात एक दूसरे को काटती है यह तो प्रत्यक्ष ही दिखता है और किसी को भूल से भी वह न दिखे उसका अर्थ तो यही है की उसकी आंखें सत्य को देखने के लिए खुली हुई ही नहीं है। अथवा उसका मन सत्य दिखने वाली आँखों से नहीं पर स्वपक्ष की सिद्धि के लोभ मोह से जुडा हुआ है भले ही वह स्वयं उसे (अपने लोभ मोह को) जान पाया हो अथवा नहीं।]
अर्थात् स्व सिद्धांत के विरोध में यदि कोई पक्ष बोलता है तो चर्चा फिर जल्प की श्रेणी में चली जाएगी जहां सिद्धांत विरुद्ध बात का प्रतिपक्ष द्वारा पकडा जाना उसके लिए हार का कारण बनेगा।
आगे जल्प और वितंडा के लक्षण देखेंगे।