प्रथम अध्याय में हमने न्यायदर्शन के सोलह पदार्थों में से चौदह पदार्थों के विभाग सहित लक्षण देखे। पांचवें अध्याय में अब हम बाकी की दो पदार्थ जाति और निग्रहस्थान के लक्षण देखेंगे।
जाति का सामान्य लक्षण हमने प्रथम अध्याय में इस प्रकार देखा था।
"साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः। १.२.१८
(व्याप्ति के अभाव में भी) केवल कुछ साधर्म्य अथवा वैधर्म्य को लेकर जो प्रत्यवस्थान (दोष निरूपण) किया जाता है वह जाति है।"
और यह की उसके २४ भेद हो सकते है।
प्रथम सूत्र में इन २४ भेदों का उद्देश किया गया है।
साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविकल्पसाध्यप्राप्त्यप्राप्तिप्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तानुत्पत्तिसंशयप्रकरणहेत्वर्थापत्त्यविशेषोपपत्त्युपलब्ध्यनुपलब्धिनित्यानित्यकार्यसमाः। ५.१.१
साधर्म्यसमा वैधर्म्यसमा उत्कर्षसमा अपकर्षसमा वर्ण्यसमा अवर्ण्यसमा विकल्पसमा साध्यसमा प्राप्तिसमा अप्राप्तिसमा प्रसङ्गसमा प्रतिदृष्टान्तसमा अनुत्पत्तिसमा संशयसमा प्रकरणसमा हेतुसमा अर्थापत्तिसमा अविशेषसमा उपपत्तिसमा उपलब्धिसमा अनुपलब्धिसमा नित्यसमा अनित्यसमा कार्यसमा ये २४ जाति के भेद है।
जाति स्त्रीलिंग शब्द होने से इन भेदों के नाम के साथ जाति जोडने पर इन्हें 'समा' कहा जाएगा पर यदि हम जाति के स्थान पर प्रतिषेध शब्द उपयोग में लाते है तब 'सम' जोडेंगे। साधर्म्यसम प्रतिषेध, वैधर्म्यसम प्रतिषेध ऐसे।
दूसरे सूत्र में प्रथम दो भेद साधर्म्यसमा तथा वैधर्म्यसमा के लक्षण दिए है।
साधर्म्यवैधर्म्याभ्यामुपसंहारे तद्धर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्यवैधर्म्यसमौ। ५.१.२
साधर्म्य वैधर्म्य से वादी द्वारा उपसंहार करने पर साध्य धर्म से विरुद्ध धर्म के साधर्म्य वैधर्म्य मात्र से (व्याप्ति न होते हुए भी) साध्य का अभाव दिखाने का प्रयत्न साधर्म्यसमा तथा वैधर्म्यसमा जाति है।
इस को देखने से पहले हम प्रकरणसम हेत्वाभास (जिसे सत्प्रतिपक्ष भी कहा जाता है) को एक बार याद करते है।
वहां जिस प्रकरण के कारण अनिर्णय की स्थिति बनी हुई थी उसी को हेतु बनाकर प्रस्तुत करने का प्रयत्न था। जैसे यदि एक भी पक्ष को सिद्ध करने का प्रमाण न होने से संशय उत्पन्न हुआ हो और यह हेतु देना की प्रतिपक्ष असिद्ध है। ऐसे ही यह भी हो सकता है की दोनों पक्ष से कुछ कुछ (व्याप्ति रहित) साधर्म्य वैधर्म्य हो और संशय का कारण दोनों पक्ष के धर्म का दिखना हो। तब ऐसे धर्म को साधन धर्म नहीं बना सकते।
हमने पहले एक बार चमगादड़ का उदाहरण लिया था। उसमें पंख होने से नभचरों के साथ साधर्म्य था पर स्तनधारी होने से वैधर्म्य। अब इन्हीं धर्मों को उसके नभचर होने अथवा न होने के हेतु बनाने से निर्णय नहीं होगा। वह इस लिए की यदि एक को हेतु माने तब विरोधी धर्म को भी हेतु मानना पड़ेगा क्योंकि उसमें भी समान बल है। जिससे उसे सत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास भी कहा था।
अब यदि यही गलती स्थापना समय पर नहीं अपितु उत्तर देने समय की जाती है तब उसे साधर्म्यसमा अथवा वैधर्म्यसमा जाति कहेंगे।
जैसे वादी ने कहा शब्द अनित्य है। उत्पत्ति धर्म वाला होने से। स्थाली के समान। अब यदि प्रतिवादी कहे की स्थाली में स्पर्श गुण है और वह अनित्य है तो शब्द स्पर्श गुण से रहित होने पर नित्य होना चाहिए। यहां उसका तात्पर्य है की कोई एक गुण के वैधर्म्य मात्र से निर्णय हो सकता है। पर उसकी ही बात के अनुसार फिर कोई अन्य गुण के साधर्म्य से भी निर्णय हो सकता है। प्रतिवादी के खंडन में कोई विशेष हेतु नहीं है।
यहां उदाहरण में वादी के स्थापना में जो हेतु प्रस्तुत किया है वह व्याप्ति सहित था। परंतु यदि वह हेतु अशुद्ध भी होता अर्थात् हेत्वाभास भी होता तब भी यदि प्रतिवादी उस हेत्वाभास को दिखाने के बदले खंडन में अपनी यही दलील प्रस्तुत करता तब वह जाति ही कहलाती। क्योंकि यदि वादी ने कोई गलत बात की है तो उसका खंडन उसकी गलती दिखाकर करना चाहिए ना कि स्वयं वही गलती दोहरा कर।
एक और उदाहरण लेते हैं। यद्यपि वह शास्त्रीय उदाहरण नहीं है परंतु हम इससे जाति को समझने का प्रयत्न कर सकते हैं।
मान लो कोई स्कूल की प्रबंधन सभा में इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि श्याम को प्रवेश मिलना चाहिए अथवा नहीं। अब एक सदस्य यह कहता है कि श्याम को प्रवेश मिलना चाहिए क्योंकि वह उसके मित्र का बेटा है, जैसे राम, जिसको प्रवेश मिला है और उसके पिता भी प्रथम सदस्य के मित्र है। तब दूसरा सदस्य यह कहकर प्रतिषेध करता है कि राम उसकी पत्नी द्वारा संचालित प्रशिक्षण वर्ग में जाता है और उसको प्रवेश मिला है पर श्याम उन वर्गों में नहीं जाता है तो उसको प्रवेश नहीं मिलना चाहिए। (अथवा तो ऐसा ही कोई अन्य कारण जैसे राम के पिता से तो उसकी मित्रता है पर श्याम के पिता से अनबन)
अब यहां यदि प्रतिवादी प्रथम सदस्य की बात को यह कह कर खंडित करता की बच्चे के पिता का सदस्य का मित्र होना कोई हेतु नहीं है तब तो प्रथम सदस्य की पराजय हो सकती थी। परंतु जब प्रतिवादी स्वयं बच्चे के पत्नी के classes में जाने को अथवा उसके पिता से अपने संबंध को बच्चे के प्रवेश के निर्णय का आधार बनाकर प्रस्तुत करता है तब वह प्रथम सदस्य की बात का भी एक प्रकार से अनुमोदन ही करता है (अर्थात् उसके प्रतिषेध में वादी के हेतु से भिन्न कोई विशेष हेतु नहीं है।) इसलिए अब उसका यह उत्तर जाति में आएगा।
ध्यान रहे कि दूसरे सदस्य का उत्तर जाति कहलायेगा या नहीं इसका आधार प्रथम सदस्य ने क्या कहा है उस पर नहीं है न ही इस बात पर की दूसरे सदस्य का साध्य वास्तव में सही है अथवा नहीं।
मान लो प्रथम सदस्य ने सद हेतु दिया होता जैसे कि बच्चे को प्रवेश मिलना चाहिए क्योंकि वह प्रवेश योग्यता के मापदंडों पर पूरा उतरता है उसके उत्तर में भी यदि प्रतिवादी ने प्रतिषेध में वह दलील दी होती जो उसने दी हैं तब भी वह उत्तर जाति कहलाता।
और मान लो श्याम प्रवेश योग्यता के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता है अर्थात् उसको प्रवेश नहीं मिलना चाहिए। तब भी यदि प्रतिवादी की दलील योग्यता को छोडकर राम के अन्य कोई धर्म के वैधर्म्य पर आधारित है तो वह वैधर्म्यसमा जाति ही कहलाएगी।
ऐसे व्याप्ति रहित असत् प्रतिषेध जब उदाहरण के कोई धर्म के साधर्म्य से किया जाता है तब वह साधर्म्यसमा जाति और जब उदाहरण के कोई धर्म के वैधर्म्य से किया जाता है तब वह वैधर्म्यसमा जाति कहा जाता है।
साधर्म्यसमा वैधर्म्यसमा जाति का प्रतिवादी द्वारा उपयोग होने पर उसको दिखाने के लिए दिया जाने योग्य उत्तर तीसरे सूत्र में है।
गोत्वाद्गोसिद्धिवत्तत्सिद्धिः। ५.१.३
(गोत्वादत्) गोत्वहेतुसे (गोसिद्धिवत्) गो की सिद्धि के समान (तत्सिद्धिः) साध्य की सिद्धि होती है। (अर्थात् केवल सद्हेतु से साध्य की सिद्धि होती है)
यह गौ है उसका निश्चय गौ प्राणी के गोत्व से होता है उसके सींग, सास्ना, कुबड आदि व्यभिचारी लक्षणों से नहीं। केवल कोई एक धर्म के समान होने से अन्य सारे धर्म समान नहीं हो जाते न ही एक धर्म के विपरीत होने से सारे विपरीत।
हमारे चमगादड वाले उदाहरण में भी उसके नभचर होने न होने का निश्चय उसकी नभचारिता (आशा रखती हूँ की यह शब्द है) / वह उडता है अथवा नहीं उस पर ही निर्भर है। या तो उसे प्रत्यक्ष उडता देखें, किसी ने देखा हो उससे जाने अथवा उसके ऐसे स्थानांतरण जो बिना उडे करना संभव न हो को देखकर अनुमान प्रमाण से जाने। मात्र उसके पंख अथवा उसके स्तनधारी होने से निश्चय नहीं होगा।
ऐसे ही शब्द का उत्पत्ति धर्म उसके अनित्यत्व को सिद्ध करेगा पर उसका स्पर्श रहित होना अथवा ऐसे ही कोई धर्म से साधर्म्य वैधर्म्य से नहीं जिसकी नित्यत्व अनित्यत्व के साथ व्याप्ति न बनती हो।