हेत्वाभास के लक्षण देखने के पश्चात हम क्रम प्राप्त पदार्थ छल के लक्षण देखेंगे।
वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या छलम्। १.२.१०
(वचनविघातः) अन्य की बात का विघात करना (काटना) (अर्थविकल्पोपपत्त्या) उसके तात्पर्य से विरुद्ध अर्थ में उसे ले कर (छलम्) छल है।
जब कोई शब्द के वक्ता द्वारा निहित अर्थ को छोडकर अन्य ही कोई अर्थ का निरूपण उसके शब्दों में कर के फिर उस बात का खंडन करता है तब वह छल है।
चर्चा में जब कोई वाद छोडकर जीतने की इच्छा से ग्रसित हो जाता है और स्वपक्ष की रक्षा अथवा प्रतिपक्ष के खंडन का कोई सत्य मार्ग नहीं दिखता तब वह छल का आश्रय भी ले लेता है। यदि उसका छल पकडा नहीं जाता है तब वो चर्चा में बना रह सकता है परंतु छल के पकडे जाने पर वह निग्रहस्थान में आ जाएगा अर्थात् हार जाएगा।
अधिकतर छल का उपयोग प्रतिपक्ष के खंडन के लिए होता है पर उसे प्रतिपक्ष द्वारा किए गए स्वपक्ष के खंडन को काटने और स्वपक्ष की रक्षा के उपयोग में भी लाया जाता है।
छल के विभाग तथा उन विभागों के लक्षण के सूत्र आगे है तो उनको उदाहरण सहित उन सूत्रों के अंतर्गत देखेंगे।
तत्त्रिविधं वाक्छलं सामान्यच्छलमुपचारच्छलं च। १.२.११
(तत्) वह छल (त्रिविधं) तीन प्रकार का है (वाक्छलम्) वाक् छल (सामान्यच्छलम्) सामान्य छल (च) तथा (उपचारच्छलम्) उपचार छल।
वाक् छल का लक्षण अगले सूत्र में।
अविशेषाभिहितेऽर्थे वक्तुरभिप्रायादर्थान्तरकल्पना वाक्छलम्। १.२.१२
(अविशेषाभिहिते) सामान्य रूप से कहे गए (अर्थे) अर्थ में (वक्तुः) वक्ता के (अभिप्रायात्) अभिप्राय से (अर्थान्तरकल्पना) भिन्न अर्थ की कल्पना (वाक्छलम्) वाक् छल है।
वाक्य में कई बार कई शब्द ऐसे होते है जिनके एक से अधिक अर्थ होते है। ऐसे किसी शब्द का वह अर्थ करना जो वक्ता का अभिप्राय नहीं था (जो प्रसंग से पता चल जाता है) और फिर वह भिन्न अर्थ जो प्रसंग से मेल नहीं खाता उसे लेकर वक्ता का खंडन करना वाक् छल है।
जैसे की किसी ने कहा की यह बालक नवकम्बल वाला है (नवकम्बलोऽयं माणकः)। वक्ता का तात्पर्य है की इस बालक के पास नया कंबल है। अब कोई यह कह कर खंडन करे की आप गलत कह रहे हो इस बालक के पास तो एक ही कंबल है नव (नौ-९) कंबल कहाँ है? तब यह वाक् छल का प्रयोग है।