बुधवार, 29 जून 2022

विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः। १.१.४१

विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः। १.१.४१

(विमृश्य) संशय द्वारा (पक्षप्रतिपक्षाभ्याम्) पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों से (अर्थावधारणं) अर्थ का निश्चय करना (निर्णयः) निर्णय है।

एक साथ सत्य न हो सके ऐसे दो अर्थों की प्राप्ति होती देखकर जब संशय होता है तब वह परस्पर विरुद्ध अर्थ में से कौन सा सच है यह जानने के लिए दोनों अर्थों के हेतु ढूँढने के लिए तर्क का प्रयोग होता है और पक्ष और प्रतिपक्ष बनते है। उन दोनों पक्षों पर प्रमाणों तथा तर्क सहित विचार करने पर कोई एक पक्ष खंडित हो जाता है (हट जाता है) और दूसरा पक्ष सिद्ध हो जाता है (बच जाता है)। इस एक पक्ष के सिद्ध होने से अर्थ का निर्धारण होता है जिसको निर्णय कहते है।

यह निर्णयरूपी तत्वज्ञान ही प्रमाणों का फल है। 

शंका :- निर्णय तो जो पक्ष बच गया उसी से होता है। फिर पक्ष प्रतिपक्ष दोनों से होता है क्यों कहा? जो पक्ष खंडित हो गया उसका निर्णय में क्या योगदान?

उत्तर :- जब पक्ष प्रतिपक्ष में से एक खंडित हो जाए और एक सिद्ध हो जाए तभी निर्णय होता है। यदि दोनों खंडित हो जाए अथवा दोनों सिद्ध हो जाए अथवा (जहां एक का सिद्ध/खंडित होना स्वतः ही दूसरे को खंडित/सिद्ध नहीं करता), एक खंडित हो पर दूसरा सिद्ध न हो पाए अथवा एक सिद्ध हो जाए पर दूसरा खंडित न हो पाए तब संशय की निवृत्ति नहीं होती। इस लिए एक का सिद्ध होना और दूसरे का खंडित होना दोनों मिलकर संशय की निवृत्ति और तत्वज्ञान की प्राप्ति कराते है।

भाष्यकार आगे यह स्पष्ट करते है की जहां हेतु से यह सिद्ध होता हो की एक धर्मी परस्पर विरुद्ध धर्मों का आश्रय हो सकता है तब वहां उन सभी परस्पर विरुद्ध धर्मों का होना मान लेना चाहिए (उसको पक्ष प्रतिपक्ष बनाकर निरर्थक विवाद नहीं करना चाहिए)। जैसे गाय का काला, सफेद, लाल रंग की होना परस्पर विरुद्ध धर्म है, तब भी यह कहना की गाय काली, सफेद, लाल होती है ठीक है। क्योंकि यहां गाय का अर्थ गाय जाति है गाय व्यक्ति नहीं। एक व्यक्ति में तो वह एक साथ न रह पाने वाले विरुद्ध धर्म बनेंगे पर जाति में भिन्न भिन्न व्यक्ति में भिन्न भिन्न रंग मिलता है।

ऐसे ही एक ही वस्तु में भी परस्पर विरोधी धर्म भिन्न भिन्न समय पर मिल सकते है। जैसे यान कभी गतिमान होता है और कभी स्थिर। अथवा एक समय में विरुद्ध धर्म भिन्न अधिकरण के लिए हो सकते है जैसे आत्मा में इच्छा और अनिच्छा दोनों भिन्न भिन्न वस्तु के प्रति एक ही समय में हो सकती है।

तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए सदा संशय और पक्ष प्रतिपक्ष का होना अनिवार्य नहीं है। जैसे प्रत्यक्ष और शब्द प्रमाण से इनके बिना भी तत्वज्ञान की प्राप्ति होती है। 

(हाँ, जिज्ञासा अवश्य होनी चाहिए। यदि जानने की इच्छा ही न हो तो कितने ही प्रत्यक्ष और शब्द प्रमाण हमारे सामने से निकल जाएंगे और हमारा चित्त एक को भी ग्रहण नहीं करेगा। यह मेरा अनुभव है, पाठ का भाग नहीं। अर्थात् मैंने यह प्रत्यक्ष पूर्वक जाना है शब्द प्रमाण से नहीं।)

इस के साथ प्रथम अध्याय का प्रथम आह्निक समाप्त होता है।