साध्यसाधर्म्यात्तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम्। १.१.३६
तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम्। १.१.३७
तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम्। १.१.३७
साध्य के समान धर्म से युक्त दृष्टांत से साध्य की समता दिखाना उदाहरण है।
साध्य के विपरीत धर्म से युक्त दृष्टांत से साध्य का विपर्यय (विपरीतता) दिखाना उदाहरण है।
उदाहरण में साध्य धर्म तथा साधक धर्म प्रवर्तमान हो अर्थात् अन्वयव्याप्ति को दिखाता हुआ उदाहरण हो तो उसे साधर्म्य उदाहरण कहेंगे और जब दोनों धर्म से रहित हो तो उसे वैधर्म्य उदाहरण कहेंगे। जैसे "शब्द अनित्य है" प्रतिज्ञा और "उत्पत्तिधर्म वाला होने से" हेतु के उदाहरण यह बन सकते है।
जो जो उत्पन्न होता है वह वह अनित्य होता है जैसे स्थाली। - अन्वय व्याप्ति सहित साधर्म्य उदाहरण।
जो जो उत्पन्न नहीं होता है वह वह नित्य होता है जैसे आत्मा। - व्यतिरेक व्याप्ति सहित वैधर्म्य उदाहरण।
हेतु की चर्चा करते समय वहां व्याप्ति समझने के लिए हेतु के साथ दिखाई थी पर पंचावयव में व्याप्ति उदाहरण के साथ कही जाएगी।
यद्यपि अन्वय तथा व्यतिरेक कोई भी व्याप्ति का उपयोग किया जाता है, यदि दोनों उपलब्ध हो तो साधारणतः अन्वय व्याप्ति तथा साधर्म्य उदाहरण उपयोग में लाए जाते है। पर कहीं कहीं दो में से एक ही व्याप्ति का उदाहरण मिलना संभव होता है वहां जिसका उदाहरण प्राप्त हो वह व्याप्ति और संबंधित उदाहरण से काम लिया जाता है।
जब हम साध्य धर्म को सिद्ध करने के लिए हेतु और उदाहरण देते है तब हमारे साध्य और उदाहरण दोनों में साधक धर्म और साध्य धर्म दोनों रहेंगे (अथवा वैधर्म्य उदाहरण में नहीं रहेंगे) परंतु उदाहरण में वह दोनों धर्मों का होना (अथवा न होना) पहले से सिद्ध होना चाहिए ऐसे ही साध्य में साधक धर्म का होना भी पहले से सिद्ध होना पडेगा तभी हेतु + व्याप्ति सहित उदाहरण साध्य धर्म को सिद्ध कर पाएगा।
अन्य महत्वपूर्ण बात यह है की हेतु और उदाहरण में जिस धर्म को हम साधक धर्म (आगे साधन धर्म शब्द प्रयोग हुआ है) बताएंगे उसकी साध्य धर्म के साथ व्याप्ति प्रमाणित होनी चाहिए। हेतु का मुख्य आधार तो व्याप्ति की प्रामाणिकता ही है उदाहरण तो उस व्याप्ति को समझने के लिए एक दृष्टांत मात्र ही है।
ऐसी कोई भी वस्तु जिसमें साध्य धर्म हो/न हो और अन्य कोई धर्म साध्य के समान/विपरीत हो उसको उठाकर उदाहरण, और अन्य धर्म को साधन धर्म नहीं बना सकते (यदि उन दो धर्मों के बीच की व्याप्ति सिद्ध न हो तो)। ऐसा करने वाला हार जाएगा जो हम आगे देखेंगे।
जैसे आत्मा के साथ (अथवा अन्य कोई वस्तु के साथ भी) ऐसे हेतु और उदाहरण नहीं बना सकते जिसकी व्याप्ति ही न बनती हो।
शब्द अनित्य है।
गुण होने से।
जो जो गुण नहीं होता वह वह नित्य होता है जैसे आत्मा। (आत्मा गुण नहीं है और नित्य है भी पर ये कोई व्याप्ति नहीं है। )