आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना।
यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः॥ - मनुस्मृति १२-१०६
यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः॥ - मनुस्मृति १२-१०६
जो वेद और ऋषिविहित धर्मोपदेश अर्थात धर्मशास्त्र का वेदशास्त्र के अनुकूल तर्क के द्वारा अनुसंधान करता है वही धर्म के तत्व को समझ पाता है अन्य नहीं।
आगे हम प्रथम सूत्र में कहे गए सोलह पदार्थ में आठवें पदार्थ तर्क का लक्षण देखेंगे।
अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः। १.१.४०
जिस विषय का वास्तविक स्वरूप ज्ञात नहीं है उसके वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए प्रमाणों की संगति से किया जाता विचार तर्क है।
किसी वस्तु का सामान्य ज्ञान होने पर (परंतु उसका विशेष न ज्ञान होने पर) उसका वास्तविक स्वरूप जानने की इच्छा होती है वह जिज्ञासा है। जिज्ञासा से प्रेरित मनुष्य सोचता है की इस का कारण यह है अथवा दूसरा? ऐसे उसके मन में विरोधी कारणों की प्राप्ति होती है। अब जब वह स्वयं ने सोचे विरुद्ध कारणों/पक्षों में से कौन सा सत्य है यह जानने के लिए दोनों पक्ष के प्रत्येक गुण पर विचार करता है और ऐसा विचार करने पर वह एक पक्ष के सत्य होने अथवा न होने की प्रबल संभावना देखता है, उस संभावना तक पहुँचने के विचार की प्रक्रिया को तर्क कहते है।
उदाहरण
किसी को यह जानने की जिज्ञासा हुई की आत्मा उत्पन्न होता है अथवा नित्य है? और इस को ले कर उसके मन में उह चली।
किसी को यह जानने की जिज्ञासा हुई की आत्मा उत्पन्न होता है अथवा नित्य है? और इस को ले कर उसके मन में उह चली।
यदि आत्मा उत्पन्न होता हो तो? जन्म के साथ शरीर, मन के साथ साथ आत्मा को भी उत्पन्न हुआ मान लो तो? जब आत्मा जन्म के साथ ही उत्पन्न हो रहा है तब उसके कोई संचित कर्म तो हो नहीं सकते क्योंकि वह पहले था ही नहीं। फिर किस आधार पर सब को शरीर, भिन्न भिन्न योनि, भिन्न भिन्न बुद्धि, संस्कार तथा उन के आधार से सुख दुख मिलेंगे? यदि इन सब के लिए पूर्वजन्म का कर्माशय काम नहीं करता तो यही मानना पडेगा की बिना कारण से ऐसे ही कार्य हो जाते है। और जब आत्मा शरीर के साथ नष्ट भी हो जाएगा तो वह सारे कर्म जिसका फल उसको अभी नहीं मिला है वह व्यर्थ हो जाएंगे। यदि कर्मफल सिद्धांत की हानि अथवा बिना कारण कार्य उत्पन्न नहीं होता इस सिद्धांत की हानि उसको स्वीकार्य नहीं तो वह आत्मा के उत्पन्न होने को भी स्वीकार नहीं करेगा।
स्वयं को सत्य से समीप पहुंचता हुआ देख जिज्ञासु के मन में प्रसन्नता* का भाव भी उत्पन्न होता है। (फिर भले ही वह सत्य कितना ही कडवा भी क्यों न हो। कोई भी स्वयं अंधेरे में रहने की इच्छा नहीं करता। दुनिया का सब से बडा असत्य भाषण करने वाला भी स्वयं तो वस्तुओं को ठीक ठीक ही जानना चाहेगा।)
*प्रसन्न शब्द सन्न से बनता है। सन्न का उपयोग गति के पूर्ण अभाव को दर्शाने के लिए हम करते है। जैसे वह ये सुनकर सन्न रह गया। प्रसन्न = प्र (प्रकृष्ट रूप से) सन्न। मन की स्थिरता प्रसन्नता है और चंचलता अथवा कोई निश्चय पर न पहुँच पाना अप्रसन्नता। क्योंकि सत्य स्थिरता देता है सत्य का ज्ञान प्रसन्नता का कारण बनता है।
न्यायदर्शन में तर्क को स्वयं में प्रमाण नहीं माना गया है। हाँ तर्क जिस पक्ष को बल देता है उस पक्ष को जिज्ञासु आगे प्रमाणों के आधार पर अधिक सरलता से सिद्ध कर सकता है और तर्क की प्रक्रिया उसे प्रमाणों तक पहुँचने में भी सहायक होती है इस लिए उसे प्रमाणों का अनुग्राहक बताया गया है।