शनिवार, 18 जून 2022

प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः। १.१.३२, १.१.३३-३५

अब हम क्रम प्राप्त अवयव के लक्षण देखेंगे।
 
प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः। १.१.३२

प्रतिज्ञा हेतु उदाहरण उपनय तथा निगमन यह पाँच अवयव है।

इन को अवयव कहा गया है क्योंकि वह एक विशेष वाक्यसमूह जो इन पांचों को मिलकर बनता है उनके अवयव है। वह वाक्यसमूह इन का अवयवी कहा जाएगा।

जैसे की हम जानते है न्यायदर्शन का मुख्य विषय प्रमाणों का उपयोग करना है और प्रमाणों में मुख्य (सर्वोच्च नहीं) अनुमान प्रमाण है। यह पाँच अवयव इसी अनुमान प्रमाण के लिए है।

अनुमान प्रमाण का उपयोग दो प्रकार से होता है।

एक तो जब हम स्वयं किसी निर्णय पर पहुँचने के लिए उसका प्रयोग करते है। जिसको स्वार्थानुमान (स्वार्थ में अनुमान) कहा जाता है उस समय हम विधिवत इन पांचों अवयवों का उपयोग नहीं करते। वहां हमारे मन में मुख्यतः हेतु तक पहुंचने की प्रक्रिया ही होती है। (इस लिए हेतु अवयव को ही अनुमान भी कहते है)।

परंतु जब इस प्रमाण का उपयोग प्रतिपक्ष के साथ चर्चा करने के लिए किया जाता है जहां हम इस का उपयोग जिस निर्णय पर हम पहुँच चुके है उसको एक सुव्यवस्थित रूप से प्रतिपक्ष और अन्यों को समझाने के लिए करते है अथवा किसी अर्थ तक पहुँचने के लिए अन्य से चर्चा कर रहे है और हमारा वर्तमान निर्णय और उसका आधार अन्य के सामने रखते है, जिसको परार्थानुमान कहते है, तब स्वयं के पक्ष को इन पाँच अवयवों द्वारा प्रस्तुत करना अनिवार्य है।

अनेक मतों के भिन्न भिन्न विचार के अनुसार कई इन पाँच में से कुछ अवयव को निरर्थक बताते है तो कई इन पाँच के उपरांत अन्य अवयव भी होने चाहिए यह मानते है। इन मतों की चर्चा भाष्यकार ने की है पर हमारे लिए इस समय वह महत्वपूर्ण न होने से हम सीधे सीधे इन पाँच अवयव के लक्षण ही देखते है।


साध्यनिर्देशः प्रतिज्ञा। १.१.३३

साध्य (सिद्ध करने योग्य) का निर्देश (कथन) प्रतिज्ञा है।

जिस विषय के निर्णय के लिए चर्चा (वाद/जल्प) हो रही है उसमें पक्ष तथा प्रतिपक्ष अपने अपने सिद्धांत का कथन करेंगे। यह दोनों सिद्धांत अभी साध्य (जिसको सिद्ध करना है) कोटि में है। इन को उनकी प्रतिज्ञा कहेंगे। निर्णय होने पर प्रमाणित प्रतिज्ञा सिद्ध हो जाएगी और दूसरी खंडित हो जाएगी। 

जैसे एक पक्ष मानता है की शब्द अनित्य है पर सामने वाला मानने को तैयार नहीं वह उसे नित्य मानता है। अब चर्चा के प्रारंभ में वादी अपनी प्रतिज्ञा का कथन करेगा। "शब्द अनित्य है" कहकर।

यहां अनित्यत्व साध्य धर्म है और उस धर्म का अधिकरण(आधार/धर्मी) शब्द है। साध्य धर्म के अधिकरण को 'पक्ष' (पक्ष यहां पारिभाषिक शब्द है) कहा गया है।

जो पदार्थ निश्चित रूप से अनित्य है (जिसकी अनित्यता पहले से ज्ञात है और सर्वमान्य है) वह शब्द के सपक्ष (पक्ष के समान) कहें जाएंगे। इनको सधर्मा (समान धर्म वाले) भी कहा जा सकता है। जैसे घडा, स्थाली(बर्तन) इत्यादि।

जो पदार्थ निश्चित रूप से नित्य है (जिसकी नित्यता पहले से ज्ञात है और सर्वमान्य है) वह शब्द के विपक्ष कहें जाएंगे। इन को विधर्मा भी कहा जा सकता है। जैसे आत्मा।

संक्षेप में, (उदाहरण : शब्द के अनित्यत्व को सिद्ध करने की चर्चा में)
- सिद्धांत(जो अभी साध्य है) के कथन को प्रतिज्ञा कहेंगे। (शब्द अनित्य है।)
- जिस पर संशय बना हुआ है (जिस को सिद्ध करने के लिए चर्चा हो रही है) उस धर्म को साध्य धर्म कहेंगे। (अनित्यता)
- साध्य धर्म के अधिकरण को पक्ष कहेंगे। (शब्द)
- पदार्थ जिसमें साध्य धर्म पहले से निश्चित है उसे सपक्ष अथवा सधर्मा कहेंगे। (घडा, स्थाली)
- पदार्थ जिसमें साध्य धर्म का अभाव पहले से निश्चित है उसे विपक्ष अथवा विधर्मा कहेंगे। (आत्मा)

प्रश्न :- आप गोपाल के घर गए हो। गोपाल के पास कई गायें है। आप को गायों के बारे में कुछ ज्ञान नहीं है। गोपाल आपको सामने खडे गौरांग और गायत्री को दिखाकर कहता है की यह देसी गाय की प्रजाति है। उतने में एक और गाय गौरी वहां आती है। आप पूछते हो की क्या गौरी भी देसी गाय है?

अब क्योंकि गोपाल गायों के बारे में ठीक ठीक जनता है और आप को ठीक ठीक ही बताएगा उसके हाँ अथवा ना जवाब को आप शब्द प्रमाण मान ही सकते हो। पर फिर भी क्योंकि गोपाल को पता है की कोई वस्तु शब्द प्रमाण से जानने पर भी उसको स्वयं समझ सके ऐसे जानने की इच्छा रहती ही है इस लिए वह आप को जवाब में मात्र हाँ न कहकर अनुमान प्रमाण से भी जनाने के लिए पंचावयव का प्रयोग करता है।

उसकी प्रतिज्ञा क्या होगी?
और यहां साध्य धर्म, पक्ष, सपक्ष/सधर्मा, विपक्ष/विधर्मा क्या है?


उदाहरणसाधर्म्यात्साध्यसाधनं हेतुः। १.१.३४
तथा वैधर्म्यात्। १.१.३५


उदाहरण के साधर्म्य से साध्य का जो साधन है वह हेतु है।
ऐसे ही [उदाहरण के] वैधर्म्य से [साध्य का जो साधन है वह हेतु है]।

हेतु अनुमान प्रमाण के पंचावयव का मुख्य अवयव है जो साध्य को सिद्ध करने का मुख्य साधन है। इसी को अनुमान भी कहा जाता है। (इस मुख्य अवयव के नाम से ही प्रमाण का नाम अनुमान प्रमाण बना।)

हेतु में सपक्ष अथवा विपक्ष पदार्थ जिसका भी उदाहरण हम देना चाहते है उसमें विद्यमान/अविद्यमान साध्य धर्म और उनमें विद्यमान/अविद्यमान साधक धर्म (जो पक्ष में भी विद्यमान/अविद्यमान है) उनका संबंध दिखाते है।

जैसे शब्द अनित्य है इस प्रतिज्ञा का साधर्म्य हेतु अनित्यता को सपक्ष स्थाली के उत्पत्ति धर्म वाले होने से जोडकर बनेगा।

(शब्द अनित्य है)
उत्पत्ति धर्म वाला होने से। क्योंकि जो जो उत्पन्न होता है वह वह अनित्य होता है।

यहां उत्पत्ति धर्म (जो स्थाली और शब्द दोनों में है) का संबंध साध्य धर्म अनित्यत्व (जो स्थाली में सिद्ध है और शब्द में सिद्ध करना है) से जोडा गया है। इस संबंध को व्याप्ति कहते है।

ऐसे ही यदि वैधर्म्य हेतु बनाना है तो विपक्ष आत्मा के नित्यत्व (अनित्यत्व के न होने) को उस में उत्पत्ति धर्म के न होने से जोडेंगे।

(शब्द अनित्य है)
वैधर्म्य हेतु :- उत्पत्ति धर्म वाला होने से। क्योंकि जो जो उत्पन्न नहीं होता वह वह अनित्य नहीं होता।

साधर्म्य से दिखाई गई व्याप्ति (जहां जहां यह होता है वहां वहां वह होता है) को अन्वय कहते है।

वैधर्म्य से दिखाई गई व्याप्ति (जहां जहां यह नहीं होता वहां वहां वह नहीं होता) को व्यतिरेक कहते है।

यदि हम कोई भी व्याप्ति को विपरीत दिशा से देखें, अर्थात साध्य को साधक और साधक को साध्य बनाकर देखें, यदि वह व्याप्ति तब भी सत्य रहती है तब उसको समव्याप्ति कहेंगे।

जैसे उत्पत्ति धर्म और अनित्यत्व की व्याप्ति जो हमनें अभी हेतु में दिखाई वह यह थी,
जो जो उत्पत्ति धर्म वाला (साधक धर्म वाला) होता है  वह वह अनित्य (साध्य धर्म वाला) होता है।

अब यदि इसको उलटा कर दे तब भी वह ठीक है।
जो जो अनित्य (साधक धर्म वाला) होता है वह वह उत्पत्ति धर्म वाला (साध्य धर्म वाला) होता है।

हम उत्पत्ति धर्म से अनित्यत्व तथा अनित्यत्व से उत्पत्ति धर्म दोनों ही सिद्ध कर सकते है। इसको समव्याप्ति कहेंगे।

परंतु यदि हम जो उदाहरण हम पहले अनेक बार प्रयोग कर चुके है (पर्वत अग्नि वाला है) उसके हेतु की व्याप्ति को देखें, "जहां जहां धुआँ होता है वहां वहां अग्नि होता है।" अब यदि इस के साध्य साधक धर्म को उलटा करेंगे और कहें,
जहां जहां अग्नि होता है वहां वहां धुआँ होता है। तो यह व्याप्ति सही नहीं होगी।
ऐसी व्याप्ति को विषम व्याप्ति कहेंगे।

विषम व्याप्ति में जिस साधक धर्म से हमने अन्वय व्याप्ति बनाई थी उसी से व्यतिरेक व्याप्ति नहीं बना सकते। अर्थात् हम ऐसा नहीं कह सकते की जहां जहां धुआं नहीं होता वहां वहां अग्नि नहीं होता।
 
(व्याप्ति, समव्याप्ति, विषमव्याप्ति, अन्वय, व्यतिरेक इन शब्दों का हम प्रचुर उपयोग करेंगे आगे जा कर।)


प्रश्न :-

गोपाल हमें गौरी देसी गाय है यह निर्णय पर पहुँचाने के लिए यह प्रतिज्ञा तथा हेतु देता है।
प्रतिज्ञा : गौरी देसी गाय है।
हेतु : कूबडधारी होने से। क्योंकि जो जो गाय प्रजाति कूबडधारी होती है वह वह गाय प्रजाति देसी होती है।

गोपाल ने जो व्याप्ति दी है वह अन्वय है अथवा व्यतिरेक?
क्या उसको अन्वय से व्यतिरेक (अथवा व्यतिरेक से अन्वय) कर सकते है? यदि कर सकते है तो व्याप्ति क्या होगी? यदि नहीं कर सकते तो क्यों नहीं कर सकते?
गोपाल ने दी है वह व्याप्ति सम है अथवा विषम?   


(अति सरल उदाहरणों से निराश न हो। अभी मूलभूत सिद्धांतों और शब्दावली को ठीक ठीक समझना हमारा उद्देश्य है। विस्तार तथा गहराई में जाने के अवसर बाद में आ सकते है।)