यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम्। १.१.२४
जिस अर्थ को उद्येशकर (जिस उद्देश्य से) प्राणियों की प्रवृत्ति होती है वह प्रयोजन है।
जिस अर्थ को प्राप्त करने योग्य अथवा छोडने योग्य निश्चय से मानकर प्राणी उसको प्राप्त करने अथवा छोडने की प्रवृत्ति करता है वह प्रयोजन है। इस में सुख प्राप्ति/दुख त्याग को मुख्य प्रयोजन तथा उनके साधन को प्राप्त करने/छोडने को गौण प्रयोजन कह सकते है।
लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः। १.१.२५
लोक व्यवहार को जानने वाले (लौकिक) और शास्त्र को जानने वाले (परीक्षक) दोनों की बुद्धि जिस विषय को ले कर समान हो वह दृष्टांत बन सकता है।
दृष्टांत शब्द में से भी यही अर्थ निकलता है। दृष्ट = ज्ञात, अंत = पूर्णता तक। पूर्ण रूप से ज्ञात विषय।
स्वार्थ तथा परार्थ दोनों में अनुमान प्रमाण का प्रयोग करते समय दृष्टांत के बिना संशय निवृत्ति अर्थात् निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता। दृष्टांत इस लिए न्याय का अंग भी है। विरोधी के दृष्टांत में (उसी के पक्ष से) विरोध दिखने से प्रतिपक्ष का खंडन और स्वयं के दृष्टांत की योग्यता स्थापित करके स्वयं के पक्ष की सिद्धि हो सकती है।
तन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः। १.१.२६
तंत्र (शास्त्र), अधिकरण (अधिकार) तथा अभ्युपगम (थोडी देर परीक्षण करने के लिए स्वीकृत) इन तीनों के माने हुए विषयों की संस्थिति (व्यवस्था) मानना सिद्धांत है।
"यह ऐसा ही है" ऐसा कहकर जिस अर्थ समूह को स्वीकार किया जाता है उसको सिद्ध कहते है। ऐसे सिद्ध विषय की अच्छी प्रकार की व्यवस्था को सिद्धांत कहते है।
सिद्धांत = सिद्ध + अंत = पूर्णतया सिद्ध। संस्थिति = सम् + स्थिति = जो अच्छी प्रकार से ठहर गया है (निश्चित हो गया है)।
इस सूत्र में सिद्धांत का लक्षण संस्थिति है। ऐसा निश्चय से स्वीकारा गया अर्थसमूह शास्त्र (तंत्र) का हो सकता है, अधिकरण का हो सकता है अथवा किसी अर्थ समूह को परीक्षा करने के लिए थोडी देर के लिए स्वीकारा गया हो सकता है।
तंत्र सिद्धांत दो प्रकार का हो सकता है सर्वतन्त्र और प्रतितंत्र जिससे सिद्धांत के चार विभाग बनेंगे। इन के बारे में आगे के सूत्र स्वयं बताएंगे।
स चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थान्तरभावात्। १.१.२७
परस्पर भिन्न होने से वह सिद्धांत चार प्रकार का होता है। सर्वतन्त्र सिद्धांत, प्रतितंत्र सिद्धांत, अधिकरण सिद्धांत तथा अभ्युपगम सिद्धांत।
सर्वतन्त्राविरुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः। १.१.२८
सभी शस्त्रों में समान रूप से स्वीकृत (अविरुद्ध) तथा किसी शास्त्र में अधिकृत (विशेष रूप से वर्णित) अर्थ (विषय) सर्वतन्त्र सिद्धांत है।
कोई विषय किसी शास्त्र का मुख्य विषय होने से उसमें विस्तार से वर्णित है और दूसरे शास्त्रों में उस शास्त्र में वर्णित सिद्धांत से कोई विरोध नहीं है तब वह विषय सर्व शास्त्र (तंत्र) को समान रूप से मान्य होने से उसे सर्वतन्त्र सिद्धांत कहा जाता है।
जैसे घ्राण रसना चक्षु त्वक् श्रोत्र ये इंद्रियाँ है और पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश पंचमहाभूत है, किसी विषय का ज्ञान प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से किया जाता है यह न्याय वैशेषिक में विशेष रूप से वर्णित है और अन्य शास्त्रों में उसे उसी रूप में स्वीकारा गया है। ऐसे सिद्धांतों को सर्वतन्त्र सिद्धांत कहेंगे।