गुरुवार, 23 जून 2022

उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः। १.१.३८, हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्। १.१.३९

अनुमान प्रमाण के चतुर्थ अवयव उपनय के लक्षण।

उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः। १.१.३८

उदाहरण की अपेक्षा से यह ऐसा ही है अथवा यह ऐसा नहीं है ऐसा कथन करके उपसंहार करना उपनय है। 

हेतु और साध्य का संबंध उदाहरण के द्वारा देने के बाद उसको प्रतिज्ञा की सिद्धि की तरफ खींचना (उपसंहार करना) उपनय है। जैसे शब्द उत्पत्ति धर्म वाला है (हेतु) और जो जो उत्पत्ति धर्म वाला होता है वह वह अनित्य होता है जैसे स्थाली (उदाहरण) देने के बाद यह कथन करना की "स्थाली के समान शब्द भी उत्पत्ति धर्म वाला है" उपनय कहलाता है। 

हेतु और उपनय एक समान दिख सकते है परंतु हेतु साध्य में साधन धर्म है यह मात्र बताता है जब की उपनय उदाहरण में बतायी गई व्याप्ति के बल पर वह हेतु में दिखाया गया धर्म वास्तव में साधन धर्म है इस बात का कथन है।
  
हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्। १.१.३९

हेतु के उपदेश से प्रतिज्ञा का पुनः कथन करना निगमन है।

जब तक प्रतिज्ञा साध्य कोटि में है तब तक वह प्रतिज्ञा कहलाएगी परंतु जब हेतु उदाहरण उपनय द्वारा उसकी सिद्धि हो जाती है तब वह साध्य कोटि में न रहकर सिद्ध कोटि में आ जाती है। सिद्धांत (प्रतिज्ञा) की सिद्धि के उपरांत पुनः कथन करना निगमन है। जैसे "उत्पत्ति धर्म वाला होने से शब्द अनित्य है" हमारे पंचावयव का निगमन होगा। निगमन = निश्चित/पूर्ण रूप से प्राप्ति/जानकारी।

पूरे पंचावयव इस प्रकार रहेंगे।
प्रतिज्ञा : शब्द अनित्य है।
हेतु : उत्पत्ति धर्म वाला होने से।
(व्याप्ति सहित) उदाहरण : जो जो उत्पत्ति धर्म वाला होता है वह वह अनित्य होता है जैसे स्थाली। अथवा जो जो उत्पत्ति धर्म वाला नहीं होता वह वह नित्य होता है जैसे आत्मा।
उपनय : स्थाली के समान शब्द भी उत्पत्ति धर्म वाला है। अथवा आत्मा से विरुद्ध शब्द उत्पत्ति धर्म वाला है।
निगमन : उत्पत्ति धर्म वाला होने से शब्द अनित्य है

प्रतिज्ञा आदि पाँच अवयवों का परस्पर संबंध।

आगे भाष्यकार समझाते है की कैसे अनुमान प्रमाण में इन पांचों अवयवों का अपना महत्व है और इनका परस्पर अटूट संबंध है। इन में से एक भी के नहीं होने से काम नहीं चलेगा।

पहला वाक्य प्रतिज्ञा है। यदि वह न हो तो बाकी चार के लिए आधार ही नहीं रहेगा। किस को सिद्ध करने के लिए बाकी चार कहें जाएंगे? और यदि वक्ता बाकी वाक्यों का कथन करने लगता है तो सुनने वालों को समझ नहीं आएगा की वह क्या बोल रहा है और क्यों बोल रहा है।

यदि हेतु को निकाल दिया जाए तो साध्य के लिए साधन धर्म ही नहीं होगा। बिना साधन धर्म के सिद्धि कैसे होगी?

उदाहरण के न होने पर साधन धर्म से साध्य धर्म का निश्चय हो सकता है यह प्रतिपादित नहीं होगा। और न ही उपनय बनेगा।

हेतु में जिस धर्म की उपस्थिति साध्य में दिखाई गयी है उसको उपनय उदाहरण में दिखाई गई व्याप्ति से जोडकर उसका साधन धर्म होना सिद्ध करता है और ऐसे ही प्रतिज्ञा में साध्य विषय का कथन मात्र है जब की निगमन उस विषय की सिद्धि हो जाने का कथन है । इस तरह से शब्दों की समानता होते हुए भी हेतु-उपनय और प्रतिज्ञा-निगमन का अर्थ भिन्न भिन्न है और उनका स्वतंत्र महत्व है।
 
उपनय और निगमन आगे आए हुए वाक्यों के अर्थों को जोडकर उनका समर्थन करते है और पूरी चर्चा में गांठ लगाकर उसके निष्कर्ष को व्यवस्थित रूप से रखते है। उनके अभाव में चर्चा बिखर जाएगी। और वक्ता यह भी जनाता है की वो जो सिद्ध करने चला था वह (और वही) उसने सिद्ध कर दिया है। चर्चा में भटक कर कहीं और ही नहीं पहुँच गया।

इन पांचों के उपयोग से अर्थसिद्धि में किसी प्रकार का संशय अथवा आशंका शेष नहीं रहते।

आगे हम क्रमप्राप्त पदार्थ तर्क का लक्षण देखेंगे।