समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रासिद्धः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः। १.१.२९
जो समान शास्त्रों में एक समान स्वीकार्य हो और उसी रूप में अन्य शास्त्रों में स्वीकृत न हो वह प्रतितंत्र सिद्धांत है।
जैसे एक शास्त्र में कोई विषय अधिकृत है और शास्त्र के उद्देश्य के अनुरूप उस विषय की व्याख्या की गई है। यह व्याख्या उस शास्त्र के समान शास्त्रों* में तो उसी रूप में स्वीकार की गई है पर अन्य शास्त्र जब उसी विषय के बारे में स्वयं को अधिकृत करके उसकी व्याख्या करते है तो वह व्याख्या उन शास्त्र के प्रतिपाद्य विषय तथा स्तर के अनुरूप करते है जो पहले वाले शास्त्र की व्याख्या से भिन्न है। ऐसे विषयों को प्रतितंत्र सिद्धांत कहते है।
*ऐसे शास्त्र जो एक दूसरे से संबंधित विषयों के बारे में है और समान स्तर पर है वह सामान शास्त्र है। जैसे न्याय और वैशेषिक यह दोनों व्यावहारिक स्तर पर पदार्थ विद्या से संबंधित है जिसमें न्यायशास्त्र विद्या कैसे पानी है उस विषय को लिए है जब की वैशेषिक विद्या कीन कीन पदार्थों की पानी है उस विषय को लिए हुए है। ऐसे ही योग और सांख्य यह दोनों परस्पर समान शास्त्र है। वह न्याय वैशेषिक की भांति बाह्य भौतिक जगत पर नहीं अपितु आंतरिक आध्यात्मिक एक गहराई वाले विषय को लिए हुए है।
उदाहरण के लिए योग-सांख्य के कुछ सिद्धांत इस प्रकार है।
- जो असत् है वह कभी सद्भाव में नहीं आता (अर्थात जो नहीं है वह उत्पन्न नहीं होता)।
- जो है वह कभी विनाश को प्राप्त नहीं होता।
- आत्मा में कभी कोई बदलाव नहीं आता और इस कारण से सब आत्मा एक समान है।
जब की न्याय वैशेषिक यह मानते है की,
- वस्तुओं की उत्पत्ति होती है (जैसे जीव के कर्माशय के अनुरूप उसका शरीर, दोषों के अनुरूप प्रवृत्ति) और जो भी उत्पन्न होता है वह नष्ट भी होता ही है। यह योग सांख्य से भिन्न है। भिन्न होते हुए भी यह परस्पर का खंडन करते है इस भाव में इसे न ले कर ऐसे समझना है जैसे एक बालक को जब माता रोटी बनाकर देती है तब उसके लिए वह उत्पन्न हुई रोटी है परन्तु अन्य दृष्टि से देखे तो आटे का रूप परिवर्तन ही हुआ है और न तो आटा नष्ट हुआ है न रोटी असत् में से उत्पन्न हुई है। न्याय वैशेषिक जो पदार्थ की व्यावहारिक स्तर पर बात करते है वे कहेंगे की मिट्टी से घडा, आटे से रोटी उत्पन्न हुए है।
- न्याय वैशेषिक जीवों को व्यावहारिक जगत में दिखने वाले भेद के अनुरूप भिन्न भिन्न दोषों/संस्कारों वाले मानते है योग सांख्य इन भिन्नताओं के कारणरूप संस्कार चित्त (जो आत्मा से भिन्न और जड है) के आश्रित है यह मानते है।
ऊपर के उदाहरण प्रतितंत्र सिद्धांत के होते हुए भी ऐसे है जैसे मानो किसी को नदी के उस पार कहीं जाना है और उसने किसी को पूछा की क्या करें तो जवाब मिला नाव में बैठ जाओ। अब वह नाव सामने वाले किनारे पर पहुंच गयी तब उसने फिर से किसी को पूछा की अब क्या करें तो जवाब मिला नाव से उतर जाओ। यहाँ अधिकार क्षेत्र अलग अलग होने से विपरीत लगने वाले उत्तर भी एक दूसरे का खंडन नहीं करते।
यत्सिद्धावन्यप्रकरणसिद्धिः सोऽधिकरणसिद्धान्तः। १.१.३०
जिसके सिद्ध होने से अन्य सम्बद्ध अर्थों की सिद्धि हो जाए वह अधिकरण सिद्धांत है।
जिस वर्तमान विषय को सिद्ध किया जा रहा है उसके सिद्ध हो जाने पर वह सारे अर्थ जिनके अभाव में वर्तमान विषय बनता ही नहीं वे भी सिद्ध हो जाते है। उन सब अर्थों का वर्तमान विषय अधिकरण (उनकी सिद्धि के अधिकार को लिए हुए) है जिससे उसको अधिकरण सिद्धांत कहते है।
इस को समझने के लिए हम एक शास्त्रीय और एक अन्य उदाहरण लेंगे।
शास्त्रीय उदाहरण :
आत्मा की सिद्धि के लिए कहा गया की आत्मा देह इन्द्रिय आदि से भिन्न है क्योंकि जो वस्तु को देखा है और स्पर्श किया है वह एक ही है ऐसा प्रतिसंधान आत्मा न हो तो कौन करेगा? अब यह प्रसंग सिद्ध होने से नीचे के सारे अर्थ जिनको सीधे सीधे कहा नहीं गया है वह भी सिद्ध हो जाएंगे।
- देखने वाली इन्द्रिय और स्पर्श करने वाली इन्द्रिय अलग अलग है अर्थात् नियत विषय वाली है । (नहीं तो प्रतिसंधान की आवश्यकता ही नहीं होती)
- इंद्रियाँ ज्ञान ग्रहण करने का साधन मात्र है स्वयं बोध का भोग नहीं करती (यदि ज्ञान इंद्रियों को ही होता तो कोई अन्य कैसे प्रतिसंधान कर सकता है)
- चेतन तत्व अनेक विषयों के ज्ञान का भोग कर सकता है और वह इंद्रियों को साधन के रूप में उपयोग कराता है।
आत्मा के उस हेतु से सिद्ध होने से ऊपर के अर्थ भी सिद्ध हो जाएंगे क्योंकि उनके सिद्ध हुए बिना आत्मा सिद्ध नहीं हो सकता। ऐसे सारे अर्थों का सिद्ध होना अधिकरण सिद्धांत की सीमा में आता है।
अन्य उदाहरण
सद्वृत्त आयुर्वेद में स्वास्थ्य की रक्षा के लिए दिए गए सिद्धांतों में से है। सद्वृत्त का एक सिद्धांत कहता है की सभी वस्तुओं पर बिना सोचे समझे विश्वास नहीं करना चाहिए और न ही प्रत्येक वस्तु पर शंका करनी चाहिए। यह सिद्ध हो जाने पर नीचे की बातें भी स्वयं सिद्ध हो जाएगी।
- व्यवहार में सब वस्तु अपने पूर्ण प्रामाणिक रूप में हमारे सामने नहीं आती।
- सारी वस्तु अप्रामाणिक भी नहीं होती।
- हमारी बुद्धि का योग्य उपयोग (हमारी परिस्थितियां जो हमारे निर्णयों से प्रभावित होती है) हमारे स्वास्थ्य की रक्षा में योगदान देता है।
अपरीक्षिताभ्युपगमात्तद्विशेषपरीक्षणमभ्युपगमसिद्धान्तः। १.१.३१
जो अभी परीक्षित नहीं है, थोडी देर परीक्षा करने के हेतु से जिसको स्वीकारा है वह अभ्युपगम सिद्धांत है।
जिस विषय को सिद्ध करने के लिए चर्चा चल रही है उस विषय में एक पक्ष के सिद्धांत को दूसरे पक्ष द्वारा आंशिक रूप से स्वीकार कर लेना यह देखने के लिए की ऐसा करने पर भी दूसरे पक्ष के सिद्धांत की पूर्ण सिद्धि होती है अथवा नहीं। ऐसा दूसरे पक्ष के मान्य सिद्धांतों में विसंगतताओं को दिखने के लिए अथवा उसके हेतु की अपूर्णता दिखाने के लिए अथवा उसके सिद्धांतों में से जो सरलता से असिद्ध हो सकता हो उसको पहले असिद्ध करने के लिए किया जा सकता है।
शास्त्रीय उदाहरण :
न्याय तथा वैशेषिक दर्शन शब्द को गुण और अनित्य मानते है। प्रतिपक्षी उसको द्रव्य और नित्य मानता है। सिद्धांती यदि प्रतिपक्षी को कहे के चलो थोडी देर के लिए मान लेते है की शब्द द्रव्य है और ऐसा मानकर भी देखते है की वह नित्य सिद्ध हो सकता है क्या? तो यह (शब्द को नित्यत्व की परीक्षा के समय द्रव्य मान लेना) अभ्युपगम सिद्धांत कहा जाएगा।
अन्य उदाहरण :
एक पक्ष मानता है की आज कल शिक्षण/परीक्षण की गुणवत्ता कम हो गई है इस लिए स्नातक होने पर भी व्यक्ति उस योग्यता को लिए हुए नहीं होता जो अपेक्षित है। दूसरा पक्ष कहता है की समस्या समस्त शिक्षण व्यवस्था में नहीं अपितु नई उभर आई अनेक शिक्षण संस्थाओं के कारण है जिनकी गुणवत्ता कम है।
अब यदि प्रथम पक्ष कहे के चलो मान लेते है की नई संस्थाओं के स्नातक उन संस्थाओं की गुणवत्ता के कारण पूर्ण योग्य नहीं है तो भी क्या पुरानी संस्थाओं के स्नातक पहले जैसे है? तो यहां नई संस्थाओं के शिक्षण पर दुष्प्रभाव को मान लेना अभ्युपगम सिद्धांत होगा। ऐसे ही दूसरा पक्ष कह सकता है की चलो मान लेते है की समस्त शिक्षण का स्तर ही गिर गया है तो फिर पुरानी संस्थाओं के स्नातक क्यों अभी भी पहले की ही भांति योग्य है? (यदि वो हो तो)
ध्यान रहें यहां सिद्धांत शब्द तत्व, सत्य, सिद्ध, के लिए प्रयुक्त नहीं है। यहां सिद्धांत का अर्थ है जिसको स्वपक्ष अथवा प्रतिपक्ष सिद्ध मानता है। प्रारंभ में दोनों पक्ष स्वयं के सिद्धांत रखेंगे और दोनों एक दूसरे से विरुद्ध होने से एक तो असत्य होगा ही (दोनों भी असत्य हो सकते है)। पर फिर भी उन दोनों को यहां उनके अपने अपने सिद्धांत ही कहेंगे।
अधिकरण तथा अभ्युपगम दोनों को ठीक से जानना वर्तमान परिस्थिति में अत्यंत उपयोगी है। (वह सदा ही अत्यंत उपयोगी है वैसे तो, क्योंकि असत्य का प्रचार करने वाले सदा ही होते है।) उन परिस्थितियों में भी जहां हम स्वयं तत्वज्ञान तक अभी नहीं पहुँच पाए है यह कम से कम हमें उन असत्यों से शीघ्रता से अवगत करा देगा जिसमें सत्य का अभाव उनकी आंतरिक विसंगतताओं से अथवा सिद्धांत से जुडे हुए अन्य अर्थ के ज्ञात होने से पता चल जाता हो।
और यह हमें किसको आप्त कोटि में नहीं लेना चाहिए यह समझने भी सहायता कर सकता है। उदाहरण के लिए मानो किसी ने कहा की यह पुष्प सूरजमुखी* का है और हेतु दिया वह सूरज की दिशा के साथ दिशा परिवर्तन कर रहा है इस लिए। हमें यह पता नहीं है की वह पुष्प सूर्यमुखी का है अथवा नहीं और हमने उस व्यक्ति को इस लिए पूछा था क्योंकि हम उसे पुष्पों के विषय में विशेषज्ञ मानते थे।
*सूरजमुखी जिसकी संज्ञा है उस का। अर्थात् रूढ अर्थ लेना है यौगिक नहीं।
अब हमें यद्यपि उस पुष्प के विषय में ज्ञान नहीं है, हमने अन्य अनेक पुष्पों को स्वयं का मुख सूर्य की दिशा में बना रहे ऐसे दिशा परिवर्तन करते हुए देखा है। यहां यदि हम उस व्यक्ति के हेतु को मान ले तो वह सारे भिन्न भिन्न पुष्प भी सूरजमुखी सिद्ध हो जाएंगे जो सत्य नहीं होगा। इससे हमें उस पुष्प के विषय में भले ही न पता चला हो वह व्यक्ति पुष्पविशेषज्ञ नहीं है उतना पता तो चल गया।
अधिकरण सिद्धांत के क्षेत्र में कौन कौन से अर्थों का समावेश होता है यह अच्छी प्रकार से जानने से हम कहाँ प्रतिपक्ष का खंडन करने के लिए अभ्युपगम का प्रयोग करना है यह निर्णय भी कर सकते है।
ऐसे ही यदि कोई सिद्धांत आंतरिक विसंगतताओं से ग्रस्त हो तो उसके अधिकरण क्षेत्र में आने वाले दो अर्थ (अथवा अधिकरण में आने वाले अर्थ और प्रतिपक्ष ने माना हुआ कोई अन्य सिद्धांत) एक दूसरे का ही खंडन करते मिलेंगे जिससे उस सिद्धांत के सत्य होने की कोई संभावना नहीं है यह हम अल्प प्रयास से ही जान जाएंगे।
इन दोनों के वर्तमान में प्रासंगिक कई उदाहरण लिए जा सकते है पर उनको जब हम इन विषयों को विस्तार से परीक्षा के समय देखेंगे तब के लिए रखते है।
सिद्धांत के लक्षण के साथ हमने प्रथम सूत्र में आए १६ पदार्थों में से प्रथम छह पदार्थ के लक्षण देख लिए है। आगे हम सातवें पदार्थ अवयव के लक्षण देखेंगे।