चित्त की वृत्तियों के रोध को योग कहते है। वह वृत्तियाँ कैसी है वह जानेंगे तो उनका निरोध कर पाएंगे। पाँचवाँ सूत्र हमें वृत्तियों के बारे में बताता है।
वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टा। १.५
वृत्तियाँ पांच प्रकार की होती है। क्लिष्ट तथा अक्लिष्ट।
(वृत्तियों के पांच प्रकार हम अगले सूत्रों में देखेंगे। यहाँ भाष्यकार क्लिष्ट अक्लिष्ट समझाते है।)
क्लिष्ट वृत्तियाँ वह है जो दुखों को उत्पन्न करने वाली होती है, क्लेश के संस्कार बनाती है। वे कर्माशय के संग्रह में आधाररूप बनती है। यह वृत्तियाँ रोकने योग्य है।
जो वृत्तियाँ ख्यातिविषयक है, जो गुणों (सत्त्व रजस् तमस्) के अधिकार को विरोध करने वाली है (मोक्ष से पहले चित्त आत्मा को नहीं छोडेगा, उसका अधिकार समाप्त करना = मोक्ष प्राप्ति) वह अक्लिष्ट वृत्तियाँ है। अक्लिष्ट वृत्तियाँ कर्मशाय नहीं बनाती है।
चित्त में क्लिष्ट और अक्लिष्ट दोनों वृत्तियों का प्रवाह चलता रहता है और साथ साथ उठने पर भी (एक क्षण में एक तो दूसरे क्षण में दूसरी) वह स्वयं के स्वरूप में ही रहती है। एक दूसरे के स्वरूप को प्रभावित नहीं करती। मान लो किसी चित्त में भयंकर क्लिष्ट वृत्तियों का प्रवाह चल रहा है और बीच में एक अक्लिष्ट वृत्ति उभरती है तो वह अक्लिष्ट ही रहेगी। ऐसे ही विपरीत दिशा में, प्रबल अक्लिष्ट प्रवाह में यदि एक क्लिष्ट वृत्ति उभरती है तो वह क्लिष्ट ही रहेगी। एक के प्रवाह में दूसरी पानी में रंग की भांति नहीं घुल जाएगी अपितु पानी में काष्ट की भांति स्वयं के रूप में ही रहेगी।
वृत्तियाँ चित्त के परिदृष्ट (जो दिखते है ऐसे) धर्म है। उठ रही वृत्तियों के उपरांत चित्त में अन्य अनेक संस्कार भी है जो दिख नहीं रहे वे चित्त के अपरिदृष्ट धर्म है। यह दोनों एक दूसरे को उत्पन्न करते रहते है। वृत्ति से संस्कार बनेंगे, संस्कार से वृत्ति उठेगी, वृत्ति से संस्कार बनेंगे। यह चक्र दिन रात चलता ही रहता है। जो वृत्तियाँ हम उठाते है उसके संस्कार दृढ होते जाते है और जिसे नहीं उठाते उसके क्षीण। हमें चाहिए की हम अक्लिष्ट वृत्तियाँ उठाकर उसके संस्कार को पुष्ट करें और क्लिष्ट वृत्तियों को रोककर उनके संस्कार को क्षीण करें।
यह आत्मा का निर्णय है की किस वृत्ति को वह उभारे और किस को रोकें वृत्तियों पर नियंत्रण मन का नहीं आत्मा का ही होता है। ऐसे में हमें क्लिष्ट को रोकना और अक्लिष्ट को उभारना चाहिए। यदि क्लिष्ट प्रवाह अत्यंत प्रबल हो तो ऐसा करना असंभव सा लग सकता है परंतु असंभव का कभी भी उपदेश नहीं होता। (सांख्य में सूत्र आता है जो कहता है की असंभव का उपदेश नहीं होता क्योंकि यदि असंभव का उपदेश करो भी तो वह अनुपदेश ही होता है। जो संभव ही नहीं है उसका क्या उपदेश।) अर्थात् यदि ऐसा करना उचित है यह उपदेश दिया गया है तो वैसा करना असंभव नहीं है।
(Think of an AI trained with wrong answers. If you simply agree to every answer it generates you will reinforce its incorrect training. but if you keep giving correct feedback for wrong and right answers, add new training data with correct answers, it will start retraining itself based on the feedback.
Now see that what we are talking about is not some artificial model trained with a unimaginably thin slice of time's data but a natural model trained over say crores (i.e. uncountable) number of births - where the data includes almost all possible conditions and our choices every moment in those conditions.
Do you see why it was stressed that that efforts to retrain it, one decision at a time, is still something we should do it, that it is NOT impossible to retrain it? Because the task may appear impossible, hence the reassurance that it isn't.
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