शनिवार, 21 जनवरी 2023

योगदर्शन १.३, १.४

चित्तवृत्ति का निरोध हो जाने पर योगी की क्या स्थिति होती है यह तृतीय सूत्र में कहा गया है।

तदा दृष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्। १.३

तदा = उस काल में 
दृष्टुः = जो सब देखने वाला है।
१) जो चित्त में आई सभी वस्तुओं को देखता है अर्थात् आत्मा (संप्रज्ञात समाधि में) और 
२) जो सब देखता है अर्थात् परमात्मा (असंप्रज्ञात समाधि में)
स्वरूपे = के स्वरूप में
अवस्थानम् = स्थिति बनती है।

उस काल में आत्मा की स्वयं / परमात्मा के स्वरूप में स्थिति बनती है।


चित्त की अन्य भूमियों में जीवात्मा की स्थिति क्या बनती है?

वृत्ति सारूप्यमितरत्र। १.४

वृत्ति सारूप्यम् = वृत्तियों के समान रूप वाला प्रतीत होता है
इतरत्र = अन्य भूमियों में (एकाग्र और निरुद्ध भूमि से अन्य भूमियों में)

अन्य भूमियों में जीव चित्त में चल रही वृत्तियों से स्वयं का सारूप्य मानता है। भले ही वह ऐसा (चित्त में उभर रही वृत्तियों जैसा) होता हुआ भी ऐसा वास्तव में न हो पर वह योग से भिन्न भूमियों में (व्युत्थान अवस्था में) स्वयं को ऐसा ही मानता है। यह एक सामान्य मनुष्य और एक योगी जो समाधि से लौटा है, जिसने अपने क्लेश क्षीण कर लिए है उन दोनों के लिए सत्य है। (परंतु उन दोनों की वृत्तियों में अंतर रहेगा।)

ऐसा इस लिए की जनाने की शक्ति आत्मा की स्वयं की होते हुए भी वह स्वयं बिना साधन के कुछ नहीं जान सकता। जीवनमुक्ति के पहले चित्त उसका वो साधन है जिसकी सहायता से वह सब कुछ जनता है। (मुक्तवस्था में ज्ञान परमात्मा देता है)।

चित्त बना ही है उस काम के लिए। चित्त और आत्मा के इस संबंध से चित्त को अयस्कांतमणि भी कहते है। अयस = लोहा, अयस्कांत = लोहा जिसे प्रिय है वह = लोहचुंबक। आत्मा लोहे की भांति है और चित्त उससे चिपका रहता है। उसमें जो भी आता है जा कर आत्मा को दिखाता है। वो जीवात्मा का सन्निधि मात्र से उपकार करता है अर्थात् उसको जीवात्मा का उपकार करने के लिए उसका जीवात्मा के पास होना ही पर्याप्त है अन्य कोई कारण नहीं चाहिए।

चित्त जीवात्मा की संपत्ति है और चित्त और जीवात्मा का संबंध प्रवाह से अनादि* है। यह संपत्ति परमात्मा ने जीवात्मा को भोग और अपवर्ग सम्पन्न करने के लिए अर्थात् धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति के लिए दी है। जब तक उसका काम समाप्त नहीं होता वह आत्मा को छोड कर नहीं जाएगा। मोक्ष पर उसका काम समाप्त हो जाता है और जीवनमुक्त का शरीर समाप्त होने पर चित्त जो प्रकृति से बना है उसका प्रकृतिलय हो जाता है। (i.e. its raw material is fully reclaimed in its pure form - सत्त्व रजस् तमस्)

*अनादि = जिसका कोई आदि न हो, प्रवाह से अनादि = जिसमें बीच बीच में व्यवधान आते हो पर व्यवधान के पश्चात वह फिर होता हो। ऐसा क्रम जिसमें यह क्रम का कोई आदि न हो। जैसे सृष्टिक्रम, जैसे दिन रात।

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