चित्त की एकाग्र भूमि की सर्वोच्च समाधि अस्मितानुगत समाधि है जहां जीव स्वयं का प्रत्यक्ष करता है। वह चित्त और स्वयं को पृथक पृथक देख पाता है सत्वपुरुषान्यताख्याति को प्राप्त करता है।
जानना आत्मा का गुण है पर जीव जनाने के लिए मन को देखता रहता है और जो जो वस्तु मन दिखाता है वह वह देखता रहता है। (मन जड होने से आत्मा के निर्देशानुसार चलता है पर यहाँ तात्पर्य यह है की मन रूपी साधन के बिना आत्मा तक ज्ञान नहीं पहुंचता)। आत्मा मन की वृत्तियों के समान ही स्वयं को समझता रहता है पर जब मन की सभी बाह्य वस्तु को जानने की वृत्तियाँ रोक दी जाती है तब मन आत्मा को उसका स्वयं का रूप दिखाता है।
इसके लिए स्फटिक मणि की उपमा दी जाति है। जैसे स्फटिक मणि के पास कोई पुष्प रख दो तो वह उसी के रंग का दिखता है पर पुष्प हटा लेने पर मणि का स्वयं का रूप दिखता है ऐसे ही चित्त में जो भी वृत्ति विषय आता है आत्मा उसी में स्वयं को देखता रहता है पर अन्य सभी वृत्ति विषय के न रहने पर उसका स्वयं का रूप देख पाता है। (रूप शब्द ज्ञान को कहता है, साकार स्थूल पदार्थों वाले रूप का तात्पर्य आत्मा के संबंध में नहीं होता।)
ध्यान रहे समाधि में चिंतन नहीं है। चिंतन स्मृति आधारित होता है (चिंतन शब्द चिति स्मृत्याम् से बनता है।)। स्मृति भी चित्त की एक वृत्ति है जो धारणा, ध्यान तक रहेगी पर समाधि में मात्र एक ही वृत्ति, प्रत्यक्ष वृत्ति रहेगी। स्मृति सहित अन्य सर्व वृत्तियों का निरोध होने पर समाधि की अवस्था बनेगी।
सत्वपुरुषान्यताख्याति संप्रज्ञात समाधि की उच्चतम अवस्था है।
सत्वपुरुषान्यताख्याति अर्थात् सत्व (चित्त) और पुरुष (आत्मा) की पृथकता के ज्ञान को विवेकख्याति भी कहते है। विवेक (विचिर् पृथकभावे) = पृथक पृथक होने का ज्ञान।
निरुद्ध : एकाग्र अवस्था में हुई विवेकख्याति से भी जब राग हट जाता है तब आत्मा उस वृत्ति को (स्वयं का प्रत्यक्ष करने की) भी रोक देता है और चित्त से अपना संबंध पूरा तोड देता है। चित्त से भी संबंध समाप्त करने पर अब वह अकेला है (केवल वही है), इस अवस्था को कैवल्य कहते है। एकाग्र अवस्था की समाधि जहां कोई एक विषय का अवलंबन था - बीज था, जो निरुद्ध में नहीं है इसलिए इसे निर्बीज समाधि भी कहते है। अब यहाँ वह कुछ भी जान नहीं रहा है इस लिए इसे असंप्रज्ञात समाधि भी कहा है।
इस असंप्रज्ञात समाधि को धर्ममेघ समाधि भी कहते है। धर्म = जो धारण करता है। जीवात्मा का धर्म सुख है। उस धर्म अर्थात् सुख की जिसमें वर्षा होती है, जिसमें ईश्वर अपने आनंद की वर्षा जीवात्मा पर करता है वह समाधि = धर्ममेघ समाधि।
धर्ममेघ समाधि में क्लेशों और कर्मों की निवृत्ति होती है, अर्थात् वह सम्पूर्ण रूप से निर्बीज हो जाते है और योगी जीवनमुक्त स्थिति को प्राप्त करता है।