हमने पढ़ा था,
"चित्त जीवात्मा की संपत्ति है और चित्त और जीवात्मा का संबंध प्रवाह से अनादि है। यह संपत्ति परमात्मा ने जीवात्मा को भोग और अपवर्ग सम्पन्न करने के लिए अर्थात् धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति के लिए दी है। जब तक उसका काम समाप्त नहीं होता वह आत्मा को छोड कर नहीं जाएगा। मोक्ष पर उसका काम समाप्त हो जाता है और जीवनमुक्त का शरीर समाप्त होने पर चित्त जो प्रकृति से बना है उसका प्रकृतिलय हो जाता है। (i.e. its raw material is fully reclaimed in its pure form - सत्त्व रजस् तमस्)"
i.e. चित्त और आत्मा के संयोग को समझने के लिए ऐसे वाक्य प्रयोग किए गए थे,
"जब तक उसका काम समाप्त नहीं होता वह आत्मा को छोड कर नहीं जाएगा।"
"मोक्ष से पहले चित्त आत्मा को नहीं छोडेगा, उसका अधिकार समाप्त करना = मोक्ष प्राप्ति"
परंतु कुछ विचार करने पर मैं स्वयं इस संयोग को समझने के लिए इस तरह के शब्द प्रयोग नहीं करना चाहूँगी।
हम भले ही यह जानते है की चेतन आत्मा है और चित्त तो जड पदार्थ है और कर्तृत्व चेतन में ही होता है जड में नहीं, और हम यह भी समझते है की मोक्ष पर आत्मा को चित्त रूपी साधन की आवश्यकता नहीं रहेगी और इस आवश्यकता के अभाव के कारण संयोग समाप्त होगा। ऐसे में, "चित्त का अधिकार", "चित्त का आत्मा को छोड को जाना" एक आलंकारिक अथवा कहो सामान्य रीति से बोलचाल में प्रयोग होने वाली भाषा जिसका तात्पर्य हम समझते है (की कार्य जड नहीं कर रहा।) उस भांति का प्रयोग है। यह स्वीकार करते हुए भी की इसको आलंकारिक/बोलचाल वाले प्रयोग के रूप में समझना कठिन नहीं है, मुझे ऐसे वाक्य प्रयोग करने में फिर भी यह आपत्तियाँ है।
१) इंद्रियों का ऐसा प्रयोग जो ज्ञान से विपरीत हो प्रज्ञा अपराध कहा जाता है जो सर्व रोग, दुखों का कारण बनता है। तो यह जानते हुए की कर्तृत्व चेतन में है, वाणी से जड में उसका प्रयोग करने का कोई औचित्य नहीं है।
२) खास करके प्रारंभिक विद्यार्थी, जो अभी सिद्धांतों को पहेली बार सिख रहा है, आत्मसात कर रहा है, वहाँ यह उसके सर्वश्रेष्ठ साधन चित्त की कार्यक्षमता में बाधा उत्पन्न करेगा। आत्मा चेतन होने से वह ज्ञान को ग्रहण करेगा पर चित्त जड होने से उसमें मात्र जानकारियों का संग्रह होगा। चित्त रूपी साधन हमें न मात्र जानकारियों का संग्रह करने के काम आता है पर समय आने पर उन जानकारियों को उभारने (स्मृति), उनको नए प्रसंग के संदर्भ में जोडकर नए ज्ञान तक पहुँचने में सहायक होने (तर्क/अनुमान) के काम भी आता है।
ऐसे में, इतनी महत्वपूर्ण/मार्मिक जानकारी को 'जड कार्य कर रहा है परंतु याद रहे यह मात्र सामान्य भाषा प्रयोग है वास्तव में चेतन ही कार्य करता है।' इस रूप में संग्रह न करते हुए सीधे सीधे 'चेतन कार्य करता है' इस रूप में संग्रहीत करना हमारे आगे के ज्ञान प्राप्ति के प्रयत्नों में अधिक उपयोगी होगा। चित्त में गलत संस्कार और साथ में एक note की यह संस्कार गलत है डालने से अच्छा नहीं है की हम सही संस्कार ही डालें? और फिर संग्रहीत जानकारी के प्रयोग का अवसर आने पर हो सकता है की यह note कहीं मिले तो कहीं छूट भी जाए।
आत्मा का चित्त को छोड देना समझना सरल भी है। आत्मा हमेशा सुख प्राप्ति के उपाय करता रहता है। क्योंकि चित्त रूपी साधन उसे सुख प्राप्ति में सहायक बनता है वह उससे काम लेता रहता है। परंतु जब आत्मा स्वयं को उस लायक बना लेता है की चित्त के उपयोग से मिलने वाले सुख से भी अधिक सुख प्राप्त कर सके, चित्त का उसे तब कोई उपयोग नहीं रहता। तो अब चित्त रूपी inferior साधन से संयोग का (दुख रूपी) मूल्य चुकाने का कोई औचित्य भी नहीं बनता।
उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के नेत्र ठीक न होने से उसे उपनेत्र लगाने की आवश्यकता पड़ती थी पर अब उसने अपने नेत्र को ठीक कर लिया है और बिना उपनेत्र के भी अच्छे से देख सकता है तब हम कहेंगे की उसके उपनेत्र छूट गए न की उसके उपनेत्र उसे छोड कर चले गए। ऐसे ही मोक्ष पर चित्त का छूटना है।
हाँ हो सकता है जब सारे सिद्धांत दृढ हो तब तो ऐसे शब्द प्रयोग से कोई नुकसान न हो जैसे हम सूर्य उगा कहते है पर हमारे मन में हमेशा यह स्पष्ट होता है की पृथ्वी घूमी है तब सूर्य क्षितिज पर दिख रहा है। ऐसे ही यहाँ विद्वानों को चित्त चला गया कहने पर कोई अंतर नहीं आएगा पर जब तक हम स्वयं को विद्वान की कोटि में न रखे तब तक कर्तृत्व का प्रयोग चेतन में ही करना उचित लगता है।