शनिवार, 14 जनवरी 2023

योगदर्शन १.१

भारतीय दर्शन न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा(मीमांसा), उत्तर मीमांसा(ब्रह्मसूत्र) सभी अपने अपने विषय को लिए हुए है पर एक बात में सभी में समानता है। भिन्न भिन्न विषय को लेते हुए भी सभी अध्यात्म की और ले जाते है।

इन छह दर्शनों में सबसे प्रसिद्ध योगदर्शन है। इसके प्रणेता रचनाकार महर्षि पतंजलि है और इस पर महर्षि व्यास ने भाष्य किया है। पतंजलि शब्द पतत् अंजली से बना है अर्थ होता है जिनको नमन करने के लिए हमारी अंजली झुक जाती है वह।

योग शब्द युज् (युजँ समाधौ) से समाधि अर्थ में बनता है। यद्यपि योग शब्द अन्य दो धातुओं, युजिँर् योगे से जोड अर्थ में और युजँ संयमने से नियमन अर्थ में भी बन सकता है (और कोई योगदर्शन के योग का अर्थ ऐसे कर भी लेते है की यह आत्मा से परमात्मा के जोड का दर्शन है) परंतु ये अर्थ योगदर्शन में योग के नहीं है। यहाँ योग का अर्थ समाधि अर्थात् चित्तवृत्तियों का निरोध है।

योगदर्शन में चार पाद में १९५ सूत्र है। यह चार पाद है समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद।

समाधिपाद : इस प्रथम पाद में समाधि तथा उसके भेदों का वर्णन और उच्च कोटि के साधक जो समाधि से मात्र कुछ ही दूर है इन के लिए योग के उच्चस्तरीय साधनों का वर्णन है। वह इस लिए की जब भिन्न भिन्न योग्यताप्राप्त को कुछ देना हो तो सर्वोच्च योग्यताप्राप्त, जिसे अब लक्ष्य प्राप्ति के लिए बस थोड़ी ही मदद चाहिए उसे सर्वप्रथम देना योग्य है। जो थोडी सी मदद से अपना कार्य सम्पन्न कर लेगा उसको देने में देने वाले के समय का सर्वश्रेष्ठ उपयोग होगा।

साधनपाद : इस के प्रारंभ में उन मध्यम कोटि के साधक के लिए योग के साधनों का वर्णन है जिन्होंने यम नियम का पालन कर लिया है और उन्हें आगे अब क्लेशों को क्षीण करना है। उसके पश्चात साधनपाद में उन तृतीय कोटि के साधक जिन्हें अभी यम नियम से प्रारंभ करना है उनके लिए योग के साधनों का वर्णन है।

विभूतिपाद : विभूतिपाद में योग साधनों के अनुष्ठान से प्राप्त होने वाली विभूतियों का वर्णन है।

कैवल्यपाद : इस में कैवल्य अर्थात् मोक्ष के स्वरूप का वर्णन है।

जिन lectures और पुस्तकों को आधार बनाकर हम अध्ययन करेंगे वह Resources post में दिये है।


प्रथम सूत्र

अथ योगानुशासनम्। १.१

अथ : अथ का प्रयोग यहाँ अधिकार अर्थ में है। अथ मंगलवाचक भी है, कोई विशेष कार्य के प्रारंभ में उसका प्रयोग भी होता है। इस सूत्र में इस का प्रयोग अधिकार अर्थ में, इस ग्रंथ को विशेष प्रयोजन के लिए अधिकृत करने के अर्थ में है।

योगानुशासनम् : जिसके द्वारा शिक्षा दी जाए उसे अनुशासन कहते है। योगानुशासन अर्थात् जिसके द्वारा योग की शिक्षा दी जाएगी वह (ग्रंथ)। सर्व विद्याओं का मूल स्रोत परमात्मा है और योगविद्या भी आदि काल से चली आ रही है। काल क्रम में जब कोई विद्या क्षीण होने लगती है तो ऋषि उसकी पुनः स्थापना हेतु उसे फिर से सिखाते है। ऐसा ही पतंजलि कर रहे है इस लिए उन्होंने 'अनु' (फिर से) शासन कहा है।

शासन शास् (शासुँ अनुशिष्टौ) धातु से बनता है अर्थ है आज्ञा/उपदेश करना। (शिष्य शब्द भी यही धातु से बनता है। जो गुरु के उपदेश अनुसार चले वह शिष्य।)

अथ योगानुशासनम् का अर्थ हुआ योग की शिक्षा देने के लिए इस ग्रंथ को अधिकृत किया जाता है।


प्रश्न :-

हमारे छह दर्शन,
१. अपने अपने दृष्टिकोण से बात करते है पर सभी का विषय परमात्मा है।
२. अपने अपने विषय को लिए हुए है पर स्वयं (अध्यात्म) के विषय में  सभी बात करते है।
३. इन में विषय अथवा लक्ष्य को लेकर कोई समानता नहीं है। 


यदि किसी ज्ञानी के पास दो व्यक्ति उपदेश मांगने जाए, एक जिसको कुछ भी नहीं आता और दूसरा जो एक विद्वान है तो उस ज्ञानी को,
१. पहले प्रारम्भिक जिज्ञासु को उपदेश देना चाहिए क्योंकि वह निर्बल है और निर्बल को पहले मदद करनी चाहिए।
२. पहले विद्वान जिज्ञासु को उपदेश देना चाहिए।
३. उसे दोनों के बीच कोई भेदभाव न करते हुए दोनों को एक साथ एक ही उपदेश देना चाहिए।
 
योगदर्शन में योग का अर्थ
१. संयम से, नियम पूर्वक जीना है।
२. आत्मा का परमात्मा से जुडना है।
३. समाधि अर्थात् इंद्रियों का निरोध है।


योग का ज्ञान,
१. सर्व प्रथम पतंजलि से सभी को मिला।
२. आदि काल से चला आ रहा था जिसको पतंजलि ने फिर से सुव्यवस्थित करके हमें दिया।
३. व्यास ऋषि से हमें मिला।