गुरुवार, 19 जनवरी 2023

योगदर्शन १.२ (भाग २)

चित्त, जो सत्व रजस् तमस् से बना है और मुख्यतः जिसमें सत्व की प्रधानता होते हुए भी तीनों गुण जीवात्मा के प्रयत्न, ज्ञान के अनुरूप कार्यान्वित होते है अथवा दब जाते है, उसकी पाँच भूमियाँ है। क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध, उनके विषय में भाष्यकार बताते है,

क्षिप्त : यह चित्त की रजोगुण प्रधान अवस्था है। यहाँ रजस् और तमस् अधिक कार्यरत रहते है।

जीव इसमें ऐश्वर्य और विषयभोग प्रिय होता है। उसका ध्येय सांसारिक सुखों को भोगना रहता है। (यहाँ उसके ऐश्वर्यप्रिय होने की बात है ऐश्वर्यवान होने की नहीं।) 

यह चित्त की निकृष्ट अवस्था है जहां जीव प्रवृत्तिशील तो होता है पर अविद्याग्रस्त भी। जिससे वह चित्त में अविद्या वाले संस्कार को और दृढ कर लेता है। 

मूढ : यह चित्त की तमोगुण प्रधान अवस्था है, रजस् और सत्त्व दबे रहते है।

चित्त की इस अवस्था में जीव अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य (मोह), अनैश्वर्य की दिशा में जाता है। यह मोह युक्त अवस्था है। (मोह और मूढ दोनों में एक ही धातु है।) तमस् से प्रभावित होने से सांसारिक सुखों, ऐश्वर्य को प्राप्त करने के लिए भी प्रवृत्ति नहीं रहती जिससे अनैश्वर्य की दिशा में गति होती है। प्रवृत्ति की न्यूनता के कारण जीव का स्वयं का नुकसान करने की गति यहाँ क्षिप्त से कुछ कम रहती है।

विक्षिप्त : यह चित्त की सत्त्वगुण प्रधान अवस्था है, यहाँ रजस् की थोडी सी मात्रा रहती है और तमस् एकदम दबा रहता है। भाष्यकार कहते है की यहाँ प्रख्यास्वरूप चित्त, जिसके मोह के आवरण प्रक्षीण हो गए है (तमस् लेशमात्र भी नहीं है), वह चारों और से प्रकाशमान होता हुआ रजस् से अनविद्ध है अर्थात् थोडा सा ही रजस् है जो धर्मयुक्त प्रवृत्ति में सहायक बनता है।

इस अवस्था के चित्त से जीव धर्म ज्ञान ऐश्वर्य वैराग्य की दिशा में जाता है। (क्षिप्त में ऐश्वर्य के लिए मोह था यहाँ ऐश्वर्य की प्राप्ति है पर मोह नहीं।)

यह एक उच्च स्थिति है जिसके आगे योग की भूमियाँ है।

एकाग्र : वह चित्त जिसका थोडी सी मात्रा वाला रजस् भी समाप्त हो गया है, वह अब स्वयं के वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हुवा है।

अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) के अंतिम चरण समाधि में एकाग्र और निरुद्ध अवस्था आएगी। उसके पहले के चरणों में भी उत्तरोत्तर कुछ वृत्ति निरोध और एकाग्रता तो है पर जिसे एकाग्र भूमि कहेंगे वह स्तर की एकाग्रता अष्टांग योग की समाधि है।

इस एकाग्र भूमि में योगी जो विषय चित्त के आगे रखता है उसका प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करता है जिसे संप्रज्ञात समाधि कहते है (सम्यक रीति से प्रकर्ष रूप से जाना जाता है जिसमें)। वह किस को जानता है उससे संप्रज्ञात समाधि के प्रभेद बनते है।

प्रकृति को कार्य से कारण रूप में देखे तो जानने के स्तर यह बनते है।

पञ्च स्थूलभूत (पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश) ^ पञ्च सूक्ष्मभूत/तन्मात्र (पृथ्वी तन्मात्र, जल तन्मात्र ..), सूक्ष्म इंद्रियाँ, मन ^ अहंकार ^ महत् तत्व ^ सत्त्व रजस् तमस् (प्रकृति साम्यावस्था)

यह सारे इंद्रियातीत विषय है अर्थात् जो इंद्रियों से नहीं जाने जा सकते। इंद्रियों से जाने जा सके ऐसे विषयों को जिज्ञासु समाधि के पहले ही जान सकता है।

१. वितर्कानुगत समाधि :  पंच स्थूलभूत पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश के परमाणु* का ज्ञान वितर्कानुगत समाधि के अंतर्गत आएगा। परमाणु का प्रत्यक्ष हम इंद्रियों से नहीं कर सकते (अनेक परमाणुओं से बनी वस्तुओं का कर सकते है)। एकाग्र अवस्था में, जिस स्थूलभूत का प्रत्यक्ष करना है उसी एक विषय को चित्त के आगे रख कर उसका प्रत्यक्ष वितर्कानुगत समाधि में योगी कर सकता है।

*परमाणु = जो सबसे अणु है। जिसके कोई अवयव नहीं है।

२. विचारानुगत समाधि : पंच सूक्ष्मभूत अर्थात् पृथ्वी तन्मात्र, जल तन्मात्र अग्नि तन्मात्र वायु तन्मात्र आकाश तन्मात्र जिसमें से उनके स्थूलभूत बनते है उनसे लेकर महत् तत्व तक का प्रत्यक्ष विचारानुगत समाधि के अंतर्गत आता है।

३. आनंदानुगत : यहाँ योगी प्रकृति का प्रत्यक्ष करता है।

४. अस्मितानुगत : यहाँ जीव स्वयं का प्रत्यक्ष करता है। वह चित्त और स्वयं को पृथक पृथक देख पाता है और स्वयं के स्वरूप को चित्त की सहायता से जानता है। इसे सत्वपुरुषान्यताख्याति (सत्व=चित्त पुरुष=आत्मा अन्यता=पृथकता ख्याति=ज्ञान) कहा जाता है।