हमने प्रथम सूत्र देखा था,
अथ योगानुशासनम्। १.१
योग की शिक्षा देने के लिए इस ग्रंथ को अधिकृत किया जाता है।
भाष्यकार योग को खोलते हुए कहते है की योग समाधि है।
समाधि शब्द की अपेक्षा हम समाधान शब्द सरलता से समझते है। समाधि का अर्थ वही है जो समाधान का। सम् (अच्छी प्रकार से) आ (चारों और से) धा (डुधाञ् धारणपोषणयोः) धातु से जिसका अर्थ है धारण करना। धारण करने के लिए यहाँ दो विशेषण लगाए गए है। सम् गुणवत्ता दर्शाता है तो आ बहुलता। यह ऐसा धारण करना है जहां कार्य की गुणवत्ता और मात्रा दोनों सम्पूर्ण है। चित्त की ऐसी अवस्था जहां उसे सरलता से पूर्णरूप से नियंत्रण में किया गया है वह समाधि है।
समाधि चित्त का धर्म है (जीवात्मा का नहीं) और वह चित्त की प्रत्येक अवस्था, जिसे चित्त की भूमि भी कहते है उसमें रहता है।
चित्त की पाँच भूमियां है। क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध।
क्षिप्त : यह चित्त की रजोगुण प्रधान अवस्था है और यहाँ रज और तम अधिक कार्यरत रहते है और सत्त्व दबा रहता है।
मूढ : यह चित्त की तमोगुण प्रधान अवस्था है और यहाँ रज और सत्त्व दबे रहते है।
विक्षिप्त : यह चित्त की सत्त्वगुण प्रधान अवस्था है, यहाँ रज की थोड़ी सी मात्रा रहती है और तम एकदम दबा रहता है।
एकाग्र : यहाँ सत्त्व को रज तम प्रभावित नहीं करते।
निरुद्ध : यह चित्त की गुणरहित अवस्था है। एक भी गुण कार्यशील नहीं है।
ध्यान रहे चित्त का निर्माण सत्त्व रज तम यह प्रकृति के तीनों गुणों* से हुआ है और उसमें सत्त्व की ही प्रधान मात्रा है जिससे चित्त को सत्त्व भी कहा जाता है। चित्त की अलग अलग भूमिओ में उन गुणों की मात्रा में अंतर नहीं आता, मात्र उनकी कार्यशीलता में परिवर्तन आता है।
*यह कणाद (वैशेषिक दर्शन) का गुण जो द्रव्य में रहता है (जो गुण शब्द का व्यापक अर्थ है), नहीं है। जैसे रुई में सफेदी। गुण में क्रिया नहीं होती, द्रव्य में क्रिया होती है। सत्त्व रजस् तमस् द्रव्य है, प्रकृति के मूल कण। पर क्योंकि प्रकृति से बनी वस्तु स्वयं के लिए नहीं होती (कोई भी अन्य वस्तुओं से मिलकर बनी हुई वस्तु स्वयं के लिए नहीं होती, दूसरे के लिए होती है - सांख्य सिद्धांत), जीवात्मा के लिए होती है, अर्थात् जीवात्मा प्रधान और प्रकृति के कण गौण है। और उन्हें गौण होने के कारण से गुण कहा गया है।
गुण यहाँ एक पारिभाषिक शब्द है जिसका इस शास्त्र में अर्थ उसके व्यापक अर्थ से भिन्न है। (जैसे न्याय में जाति शब्द, जिसका अर्थ वहाँ असत् उत्तर है।)
इन पाँच भूमियों के क्रम पर किसी को प्रश्न हो सकता है। प्रायः अध्यात्म में क्रम तमस् रजस् सत्त्व यह रहता है जब की यहाँ क्रम रजस् तमस् सत्त्व है। वह इस लिए की अविद्या ग्रसित चित्त जो क्षिप्त और मूढ दोनों में है वहाँ क्षिप्त का क्रियाशील चित्त मूढ के अक्रियाशील चित्त की तुलना में अधिक हानिकारक बनेगा। मूढ अवस्था में कम से कम अधर्म युक्त प्रवृत्ति करके नये नये अधिक उलटे संस्कार बनाने का काम तो नहीं हो रहा है। तमोगुण प्रधान अवस्था में वो बिना ज्यादा कुछ किये जहां है वहाँ रुका हुआ है।
प्रश्न यह भी हो सकता है की समाधि को पांचों भूमियों में रहने वाला धर्म क्यों कहा? वह इस लिए की कितनी भी निकृष्ट अवस्था हो, जीव कुछ न कुछ समाधान के बिना तो जीवन चला ही नहीं सकता। खाना, चलना, बात करना सभी प्रवृत्तियों में थोडा सा ही सही चित्त वस्तुओं को जानने समझने का कोई न कोई कार्य, अर्थात् समाधान तो करता ही है।
भाष्यकार कहते है की विक्षिप्त चित्त की समाधि योग पक्ष में नहीं आती। (इससे क्षिप्त और मूढ जो विक्षिप्त के नीचे है वह स्वभाविक ही योग पक्ष में नहीं आएंगे।) अर्थात् योग मात्र एकाग्र और निरुद्ध भूमि की समाधि को कहते है।
यह थोडा अटपटा लग सकता है की भाष्यकार पहले कहते है की योग समाधि है। समाधि पांचों भूमियों में रहती है। और अब यह की मात्र दो भूमियों की समाधि को ही योग कहते है। तो इसको ऐसे समझ सकते है की जैसे यदि कोई पूछे की आम क्या होता है तो उसे उत्तर देंगे की फल। पर सारे फल आम नहीं है। ऐसे ही योग समाधि है पर सारी समाधि योग नहीं है।
योग का प्रारंभ एकाग्र चित्त की समाधि से होता है जो,
१. यथार्थ ज्ञान कराती है।
२. क्लेशों (इस शास्त्र में क्लेश = अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश) को क्षीण करती है।
३. कर्म बंधन को शिथिल करती है। (कर्म का विनाश नहीं होता तो फिर कर्म बंधन शिथिल भी नहीं होने चाहिए। इसका समाधान यह है की कर्मफल मिलते समय भी क्लेश हो तब फल मिलता है। इस लिए क्लेशों के क्षीण होने से कर्म बंधन भी शिथिल होते है - यह विषय आगे आएगा।)
४. निरुद्ध अवस्था तक ले जाती है। (जैसे नाव हमें दूसरे किनारे तक ले जाती है पर दूसरे किनारे पर जाने के लिए हमें नाव को छोडना पडेगा ऐसे ही एकाग्र चित्त हमें निरुद्ध अवस्था तक ले जाएगा पर निरुद्ध अवस्था प्राप्त करने के लिए हमें एकाग्र अवस्था को छोडना पडेगा।)
ऐसे यह एकाग्र अवस्था के योग को संप्रज्ञात योग कहते है। अच्छी प्रकार से (सम्) प्रकर्ष रूप से (प्र) जाना जाता है जिसमें।
एक ही विषय जो चित्त के आगे है उसे अच्छी प्रकार से प्रकर्ष रूप से जान रहें होते है इस लिए उस योग को संप्रज्ञात योग कहते है।
निरुद्ध अवस्था में चित्त की एक भी वृत्ति नहीं रहती और वहाँ वह एक विषय को जानने की प्रक्रिया भी नहीं है। उस योग को असंप्रज्ञात योग कहते है।
संप्रज्ञात योग में क्या क्या जाना जाता है उसके भेद से संप्रज्ञात समाधि के चार प्रभेद किए गए है। इसमें प्रथम तीन में प्रकृति को और अंतिम अवस्था में जीव स्वयं को जानता है।
प्रकृति को कार्य से कारण रूप में देखे तो जानने के स्तर यह बनते है।
पञ्च स्थूलभूत (पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश)
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पञ्च सूक्ष्मभूत/तन्मात्र (पृथ्वी तन्मात्र, जल तन्मात्र ..), सूक्ष्म इंद्रियाँ, मन
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अहंकार
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महत् तत्व
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सत्त्व रजस् तमस् (प्रकृति साम्यावस्था)
संप्रज्ञात समाधि के प्रभेदों के बारे में चर्चा आगे आएगी।
असंप्रज्ञात समाधि को कैवल्य कहते है। यहाँ अब चित्त भी नहीं है और केवल वह स्वयं, अकेला ही परमात्मा के साथ है।
प्रश्न :-
इन में से कौन सा वाक्य गलत है।
१. समाधि चित्त का धर्म है।
२. समाधि योग है।
३. योग समाधि है।
१. समाधि चित्त का धर्म है।
२. समाधि योग है।
३. योग समाधि है।
चित्त की कौन सी भूमि में सत्त्व गुण की प्रधानता रहती है, रज अल्प मात्रा में कार्य करता है जब की तमोगुण बिलकुल दब गया है?
१. क्षिप्त
२. विक्षिप्त
३. निरुद्ध
१. क्षिप्त
२. विक्षिप्त
३. निरुद्ध
सत्त्व रजस् तमस् गुण है तो वह किस द्रव्य के आश्रित है?
१. प्रकृति के आश्रित
२. चित्त के आश्रित
३. सत्त्व रजस् तमस् उस अर्थ में गुण नहीं है, वह द्रव्य है। उन्हें गुण मात्र उनके गौण होने से कहा गया है।
एकाग्र अवस्था की समाधि जिसे संप्रज्ञात योग कहते है उसमें,
१. पुण्य बनते है।
२. यथार्थ ज्ञान होता है।
३. परमात्मा का प्रत्यक्ष होता है।
१. पुण्य बनते है।
२. यथार्थ ज्ञान होता है।
३. परमात्मा का प्रत्यक्ष होता है।