योग (संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात समाधि) के लक्षण बताने की अभीप्सा (इच्छा) से अगला सूत्र प्रवृत्त है।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। १.२
निरोध = निश्चित रूप से रुकी हुई अवस्था।
किसका निरोध? चित्तवृत्तियों का निरोध।
वृत्ति = इंद्रियों के व्यापार (आँख से देखना, कानों से सुनना..) को भी वृत्ति कहते है और उन्हें रोकने को प्रत्याहार कहते है। परंतु यहाँ उसकी बात नहीं हो रही है, यहाँ चित्त की उन वृत्तियों को, जो प्रत्याहार के उपरांत भी चलती रहती है (जैसे स्मृति, विकल्प), उन्हें भी रोकने की बात हो रही है।
चित्त की दो प्रकार की वृत्तियाँ होती है। १. ज्ञानात्मक २. धारणात्मक। वृत्ति निरोध मात्र ज्ञानात्मक वृत्तियों के लिए कहा गया है। धारणात्मक वृत्तियाँ, जो शरीर को धारण करने का काम करती है, जैसे रक्त परिभ्रमण, पाचन क्रिया वह चलती रहेगी।
भाष्यकार बताते है की सूत्र में सर्व चित्तवृत्तियों का निरोध न कहे जाने से संप्रज्ञात समाधि, जिसमें चित्त की एक वृत्ति अभी भी है (अन्तःकरण से किया जाने वाला प्रत्यक्ष) वह भी योग पक्ष में आ जाती है।
हम चित्त शब्द का बार बार प्रयोग कर रहे है। इस चित्त शब्द से जिसे हम मन कहते है उसका ग्रहण होता है। अंतःकरण के मन बुद्धि चित्त अहंकार ऐसे भेद किए जाते है यहाँ हम इन सब को/मन बुद्धि चित्त को चित्त शब्द से समझ सकते है परंतु विशेषतः मन जो संस्कारों का आश्रय है उसे ग्रहण करेंगे। इसी चित्त के लिए न्याय में मन तथा सांख्य में बुद्धि शब्द का प्रयोग किया गया है।
चित्त त्रिगुणात्मक है, सत्त्व रजस् तमस् से बना है। जैसे हम देख चुके है, सत्त्व रजस् तमस् द्रव्य है और चित्त के उपादान कारण है।
चित्त सत्त्व रजस् तमस् से बना होने के कारण इन तीनों उपादान कारण के गुण चित्त में है।
इन तीनों के गुण क्या है?
सत्त्व प्रखयाशील है। प्रकृष्ट ख्याति (ज्ञान) के (साधन बनने के) स्वभाव वाला।
रजस् प्रवृतिशील है।
तमस् स्थितिशील है।
इन तीनों के होने पर भी चित्त मुख्यतः सत्त्व से बना होने के कारण उसे सत्त्व भी कहा जाता है। (हम प्रधान वस्तु के नाम से वस्तु समूह का नामकरण अनेक स्थानों पर करते है। जैसे पंचप्राण को प्राण, अन्वीक्षा(अनुमान) प्रमाण को लिए हुए शास्त्र को आन्वीक्षिकी (न्याय)..)
थोडा off-topic:
चित्त के सत्त्व गुण का (सत्त्व गुण के उभरने का) सतयुग कलियुग वगैरह से कोई लेना देना नहीं है। युगों के नाम काल गणना के लिए है और वह नाम मात्र है जैसे सप्ताह के दिन के नाम रवि सोम है। उनका हमारे चित्त पर कोई प्रभाव नहीं पडता। हमारी काल गणना में हम सृष्टि - मन्वन्तर - चतुर्युग - युग नाम के कालखंडों का प्रयोग करते है।
सृष्टिकाल ४३२ करोड वर्ष का है। सृष्टिकाल से पहले और बाद में प्रलयकाल रहेगा जब तक नई सृष्टि की रचना नहीं होती।
एक सृष्टि में १४ मन्वन्तर आते है।
१ मन्वन्तर में ७१ चतुर्युग आते है।
१ चतुर्युग में सतयुग त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग चार युग आते है। जिनका समय है,
कलियुग = ४,३२,००० वर्ष
द्वापर = ८,६४,००० वर्ष (कलियुग x २)
त्रेता = १२,९६,००० वर्ष (कलियुग x ३)
सत = १७,२८,००० वर्ष (कलियुग x ४)
जिससे एक चतुर्युग ४३,२०,००० वर्ष का होता है।
और एक मन्वन्तर ४३,२०,००० x ७१ = ३०,६७,२०,००० वर्ष।
आप सोच रहे होंगे की ३०.६९२ करोड x १४ तो ४३२ करोड नहीं होते। ४,२९,४०,८०,००० वर्ष ही होते है।
वह इस लिए की प्रत्येक मन्वन्तर संधि में (और प्रथम मन्वन्तर के पहले, अंतिम मन्वन्तर के पश्चात) एक सतयुग (चार कलियुग) जितने समय का संधिकाल रहता है। जिसमें आंशिक प्रलय जैसी स्थिति होती है। (पांचों महाभूतों का नहीं पर किसी एक का उस अवस्था में होना जो जीवन के लिए सानुकूल न हो। i.e. extinction level event every 30.682 cr yrs, unfavourable climate lasts for 17.27 lakh yrs.)
जीवन सृष्टिकाल की पूरी अवधि नहीं रहता अपितु प्रत्येक शरीर की आवश्यकता पूर्ण हो सके ऐसा वातावरण होने पर रहता है। सृष्टि के प्रारंभ में मनुष्य सबसे अंत में आता है क्योंकि उसकी आवश्यकताएं सबसे अधिक है और उसी कारण से प्रलय के पहले उसका अंत सर्व प्रथम होगा।
इन १५ संधिकाल को मिलाकर सृष्टिकाल ४३२ करोड वर्ष बनेगा।
अभी हम इन ४३२ करोड वर्ष में कहाँ है?
हम ७वें मन्वन्तर के २८वें चतुर्युग में कलियुग के प्रारम्भिक काल में (४,२०,००० में से) ५१२२वे वर्ष में है।
तात्पर्य यह है की "अभी तो कलियुग चल रहा है इसलिए हमारा मन अविद्या प्रमाद की और खींच जाना स्वाभाविक है, यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रतिकूल समय है इसलिए हम ज्ञान प्राप्त नहीं कर पा रहे है" जैसा कुछ नहीं होता। हमारा मन प्रधान रूप से सत्व से बना है और हमें ज्ञान प्राप्त कराने के लिए कोई भी दिन वर्ष युग मन्वन्तर अथवा सृष्टि में वह सक्षम है। वह जड प्रकृति से बना पदार्थ है और हमारा ऐसा साधन है जो wear out नहीं होता। हमारी इच्छा से चलता है तो हमारी इच्छा के अनुसार ही चलेगा कोई वार वर्ष युग को देखकर नहीं।