गुरुवार, 22 सितंबर 2022

५.१.३२-५.१.४३

अंतिम तीन जाति प्रयोगों के नीचे मात्र अर्थ दिए है। उन तीनों को भी हम वितंडा में प्रयोग हो सकने वाले प्रयोग के रूप में देख सकते है जहां जातिवादी स्वयं का कोई पक्ष स्थापित नहीं कर रहा मात्र वादी के खंडन का प्रयत्न कर रहा है। 

अनित्यसम प्रतिषेध
साधर्म्यात्तुल्यधर्मोपपत्तेः सर्वानित्यत्वप्रसङ्गादनित्यसमः। ५.१.३२ 

साधर्म्य से यदि तुल्य धर्म की सिद्धि होती हो तो सब (सभी व्याप्ति के?) अनित्य होनेका प्रसंग बनेगा कहना अनित्यसम प्रतिषेध है।

उत्तर

साधर्म्यादसिद्धेः प्रतिषेधासिद्धिः प्रतिषेध्यसाधर्म्यात्च। ५.१.३३ 

साधर्म्य से असिद्धि होती हो प्रतिषेध की भी असिद्धि होगी प्रतिषेध्य के साथ कोई न कोई साधर्म्य होने से।

दृष्टान्ते च साध्यसाधनभावेन प्रज्ञातस्य धर्मस्य हेतुत्वात्तस्य चोभयथाभावान्नाविशेषः। ५.१.३४ 

दृष्टान्तमें साध्यसाधनभावसे ज्ञात धर्मके साधर्म्य अथवा वैधर्म्य से हेतुत्व होने से वह अविशेष नहीं है।
(साधर्म्य अथवा वैधर्म्य से सिद्धि मात्र वहाँ होती है जहां साध्यसाधनभाव व्याप्ति ज्ञात है इस लिए उसमें हेतुत्व है। कोई भी दो धर्मों के समान वह नहीं है।)

नित्यसम प्रतिषेध

नित्यमनित्यभावादनित्ये नित्यत्वोपपत्तेर्नित्यसमः। ५.१.३५ 

अनित्यमें अनित्यत्व नित्य होने से नित्य की सिद्धि होती है कहना नित्यसम प्रतिषेध है। / नित्य में अनित्यत्व की अथवा अनित्य में नित्यत्व की भावना करना नित्यसम प्रतिषेध है।

उत्तर

प्रतिषेध्ये नित्यमनित्यभावादनित्येऽनित्यत्वोपपत्तेः प्रतिषेधाभावः। ५.१.३६ 
जिसका प्रतिषेध किया जा रहा है उसमें नित्य अनित्यत्व है (वह हमेशा अनित्य है) कहने से उसके अनित्यत्व की सिद्धि होती है।
 
कार्यसम

प्रयत्नकार्यानेकत्वात्कार्यसमः। ५.१.३७ 
प्रयत्न से अनेक प्रकार के कार्य होते है ऐसा कहना कार्यसम प्रतिषेध है।

उत्तर

कार्यान्यत्वे प्रयत्नाहेतुत्वमनुपलब्धिकारणोपपत्तेः। ५.१.३८ 
प्रयत्न से अन्य कार्य हो सकने पर भी प्रयत्न का हेतुत्व सिद्ध होता है (प्रयत्न के अभाव में कार्य की) अनुपलब्धि का कोई कारण न होने से।



यदि एक पक्ष ने असत् तर्क दे भी दिया तो भी चर्चा में अन्य पक्ष को हमेशा सत् उत्तर ही देना चाहिए नहीं तो चर्चा निरर्थक हो जाएगी और अनेक पक्ष उत्पन्न हो जाएंगे यह समझाते हुए नीचे के सूत्र है।
 
प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः। ५.१.३९ 
सर्वत्रैवम्। ५.१.४० 
प्रतिषेधविप्रतिषेधे प्रतिषेधदोषवद्दोषः। ५.१.४१ 
प्रतिषेधं सदोषमभ्युपेत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधे समानो दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा। ५.१.४२ 
स्वपक्षलक्षणापेक्षोपपत्त्युपसंहारे हेतुनिर्देशे परपक्षदोषाभ्युपगमात्समानो दोषः। ५.१.४३ 


यदि प्रतिवादी जाति प्रयोग करें तब भी चर्चा ऐसे चलनी चाहिए।

प्रथम पक्ष : सद् हेतु द्वारा स्थापना
द्वितीय पक्ष : जाति प्रयोग
प्रथम पक्ष :  जाति प्रयोग को दिखाकर स्वयं के पक्ष का रक्षण

न की ऐसे।

प्रथम पक्ष : स्थापना
द्वितीय पक्ष : जाति प्रयोग
प्रथम पक्ष :  जाति प्रयोग का उत्तर अन्य जाति प्रयोग से (तृतीय पक्ष)
द्वितीय पक्ष : तृतीय पक्ष जाति प्रयोग है ऐसा विरोध (चतुर्थ पक्ष)
प्रथम पक्ष : स्वयं के पक्ष में जो दोष है वही दूसरे में दिखाना मतानुज्ञा निग्रहस्थान है ऐसा बताना। (पाँचवा पक्ष)
द्वितीय पक्ष : प्रथम पक्ष ने भी जब दोषपूर्ण उत्तर दिया है (तृतीय पक्ष में) तब यही बात उसे भी लागू होती है। (छठा पक्ष)

ऐसे असत् उत्तर का भी सत् उत्तर द्वारा निराकरण करने के बदले यदि असत् उत्तर से जवाब दिया जाए तो बात उलझ जाएगी और कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा।


इस के साथ पाँचवें अध्याय का प्रथम आह्निक समाप्त होता है।

अनुपलब्धिसम

तदनुपलब्धेरनुपलम्भादभावसिद्धौ तद्विपरीतोपपत्तेरनुपलब्धिसमः। ५.१.२९

अनुपलब्धि की प्राप्ति न होने से उससे विरुद्ध की सिद्धि होती है ऐसा कथन अनुपलब्धिसम प्रतिषेध है।

प्रतिवादी वादी से कहता है की आप का कहना है की कोई वस्तु नहीं है तो उसकी अनुपलब्धि दिखाओ। यदि अनुपलब्धि की प्राप्ति नहीं दिखा सकते तो सिद्ध होता है की वह है।

उत्तर

अनुपलम्भात्मकत्वादनुपलब्धेरहेतुः। ५.१.३०

अभाव की अनुपलब्धि ही होती है। किसी वस्तु का अस्तित्व और नास्तित्व दोनों साथ में नहीं हो सकते।

ज्ञानविकल्पानां च भावाभावसंवेदनादध्यात्मम्। ५.१.३१ 

किसी विषय के ज्ञान का होना न होना आत्मा को मन के द्वारा प्रत्यक्ष होता है।

इस जाति को सीधे सीधे व्यवहार में लाना क्लिष्ट लग सकता है पर थोडी पूर्व तैयारी के साथ खेल खेल जाए तो आधी दुनिया को आर्थिक सामाजिक शासकीय परितापों से बचने के लिए जातिवादी का उत्पाद अभाव की प्राप्ति को दिखाने के लिए उपयोग करने पर बाध्य किया जा सकता है यह हमें अब प्रत्यक्ष है।


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पीछे मैंने यह तर्क रखा था।

"जाति प्रयोग तर्क के वह प्रयोग है जो प्रमाण तक नहीं पहुंचाते। तर्क के प्रमाण तक न पहुंचा पाने के पीछे अपूर्ण तर्क, प्रमाणों से विसंगतता, अप्राप्त प्रमाण जैसे कारण रहते है जो जाति प्रयोगों में देखने मिलते है। परंतु जाति प्रयोग का अस्तित्व उस बात का सूचक है की वे सद् उत्तर जैसे लग सकते है। यदि उनके सफल होने की कोई संभावना ही न होती तो वह प्रयोग में ही न आते। क्योंकि जो तर्क कभी भी सद् उत्तर न बन पाए वह सद् उत्तर जैसा कभी लग भी नहीं सकता। इससे हम स्वयं की जाति समझ की एक परीक्षा कर सकते है। क्या हम ऐसे उदाहरण देख सकते है जहां जाति लक्षण (जिस तर्क को जाति का लक्षण बताया गया है) वादी की व्याप्ति का खंडन करता हो। (P.S. जाति प्रकरण के अंत में इसे संशोधित करेंगे। क्योंकि इस तर्क में त्रुटि, अपूर्णता है।)"

जब मैंने यह तर्क रखा था तब मेरी धारणा यह थी की जातिवादी के सिवाय अन्य सभी सत्यनिष्ठ और स्वाध्यायशील अधिक नहीं तो कम अंश में तो है ही। अर्थात वो स्वयं का हित देखने के लिए यथा शक्ति पुरुषार्थ करेंगे। परंतु मेरी वह धारणा वास्तविकता से मेल नहीं खाती यह स्पष्ट है। और यह उन जाति प्रयोगों के निरंतर बने रहने से भी स्पष्ट है जिसमें सत्य तक पहुंचाने का दिखवा मात्र भी नहीं है - जो वितंडा में प्रयोग में लाए जाने वाले प्रयोग अधिक लगते है। ऐसे प्रयोग सफल इस लिए नहीं होते क्योंकि उन जैसे प्रयोग अन्यत्र सत्य तक पहुंचाने की क्षमता रखते है अपितु इस लिए होते है की वह सामने वाले की अस्वाध्यायशीलता और अन्य निर्बलताओ का दक्षता से उपयोग करते है।
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गुरुवार, 15 सितंबर 2022

उपलब्धिसम

निर्दिष्टकारणाभावेऽप्युपलम्भादुपलब्धिसमः। ५.१.२७

निर्दिष्ट कारण के अभाव में भी कार्य होता है ऐसी त्रुटि दिखना उपलब्धिसम प्रतिषेध है।

उत्तर
कारणान्तरादपि तद्धर्मोपपत्तेरप्रतिषेधः। ५.१.२८

यदि अन्य कोई कारण से भी कार्य होता है तो वह निर्दिष्ट कारण से नहीं होता यह सिद्ध नहीं करता।

निर्दिष्ट कारण से कार्य नहीं नहीं हो रहा यह दिखाने के लिए जहां निर्दिष्ट कारण नहीं है तब भी कार्य की प्राप्ति हो रही है ऐसा तब दिखाना संभव होता है जब अन्य कारणों से भी वह कार्य होता है।

इस जाति का प्रयोग उन प्रसंगों में अधिक सरल रहता है जहां कार्य न मात्र एक से अधिक कारणों से सम्पन्न हो सकता हो पर कोई भी कारण अकेले अथवा अबाधित रूप से कार्य न करता हो अथवा कारण कार्य के साथ ही हमेशा स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो ऐसा अनिवार्य न हो। जिससे कौन से कारण से कार्य हुआ है उसमें संदेह उत्पन्न करना कुछ सरल रहे।

यह परिस्थितियाँ कुछ ऐसी ही है जैसी परिस्थितियों में अहेतुसम का प्रयोग सरल था। अन्य कारणों की भी कार्य के साथ की व्याप्ति अथवा व्याप्ति की संभावना जातिवादी का काम सरल बनाती है।

ध्यान देने की बात यह है की यहाँ जातिवादी का प्रयत्न अन्य कोई कारण की सिद्धि के लिए नहीं है, वह अन्य कारणों के होने की संभावना (=निर्दिष्ट कारण के अभाव में कार्य का होना) निर्दिष्ट कारण के खंडन के लिए मात्र आगे कर रहा है। उसका स्वयं का कोई ऐसा पक्ष नहीं है की कार्य किस कारण से हो रहा है।

व्यवहार में कोई कार्य के अनेक कारणों (कुछ सत्य, कुछ काल्पनिक) का प्रचार करके और वादी के निर्दिष्ट कारण को जितना हो सके उस कोलाहल में दबा देने से जन सामान्य को स्वयं ही इस जाति प्रयोग के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

अविशेषसम उपपत्तिसम

एकधर्मोपपत्तेरविशेषे सर्वाविशेषप्रसङ्गात्सद्भावोपपत्तेरविशेषसमः। ५.१.२३ 

साध्य और दृष्टांत में एक धर्म (साधन धर्म) होने से साध्य धर्म की सिद्धि होती हो तो सत्ता (होना) धर्म तो सब में है इस लिए सब में साध्य धर्म की सिद्धि होती है ऐसा प्रतिषेध अविशेषसम प्रतिषेध है।

उत्तर

क्वचित्तद्धर्मोपपत्तेः क्वचिच्चानुपपत्तेः प्रतिषेधाभावः। ५.१.२४
 
साथ में दिखने वाले प्रत्येक दो धर्म व्याप्ति लिए हुए नहीं होते। कोई दो धर्म के बीच व्याप्ति होती है तो कोई के बीच नहीं होती।

सुतर्क जैसे लगने वाले अपूर्ण तर्क, कुतर्क, तर्कहीनता से होते होते हम इसके पूर्व की जाति में almost बकवास कहा जा सके ऐसी दलील तक पहुँच गए थे। इसके नीचे क्या हो सकता है?

.. जहां होना मात्र साधन धर्म का काम करता है?

जो विद्यार्थी पाठ्यक्रम को समझे है वो उत्तीर्ण होंगे। -> सारे बच्चे उत्तीर्ण होंगे।

जो विषय को बहुत अच्छे से समझे है वे उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण होंगे। -> सब उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण होंगे।

काम के अनुरूप वेतन मिलेगा। -> कोई भी काम हो एक सा वेतन। -> काम करो न करो वेतन।

रोगी के अनुसार दवा होगी। -> सभी रोगी को एक ही दवा। -> सभी को (रोगी हो न हो) एक ही 'दवा'।

(उपचार के लिए) आतुर का परीक्षण, उपचार। -> सांस लेती हुई प्रत्येक वस्तु का 'परीक्षण, उपचार'।


उपपत्तिसमा जाति
 
उभयकारणोपपत्तेरुपपत्तिसमः। ५.१.२५

दोनों के कारणों की उपपत्ति है ऐसी दलील उपपत्तिसमा जाति है।

आपकी बात सच है पर मेरी बात (जो आपकी बात से विपरीत है वह) भी सत्य है ऐसी दलील उपपत्तिसमा जाति है।

उत्तर

उपपत्तिकारणाभ्यनुज्ञानादप्रतिषेधः। ५.१.२६

वादी के कहे गए उपपत्ति के कारण को मान लेने पर उसका खंडन नहीं होता। (जब सामने वाले की बात सत्य स्वीकार कर ली गई है तो न तो उसका खंडन होता है न उसको स्वीकार करने वाले विरोधी की बात की सिद्धि।)

इसके विस्तार की कोई आवश्यकता नहीं है पर इस पर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगी की परस्पर विरोधी बातों का समर्थन करने वाले को न्यायदर्शनकार ने इस क्रम पर रखा है।

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

जाति प्रयोग सफल क्यों/कब होते है?, अर्थापत्तिसमा जाति

प्रश्न फिर से यही रहता है की ये कुतर्क अथवा उससे भी बुरी परिस्थिति, जहां दलील तर्क जैसी लगनी भी कम हो गई है, ऐसे सारे उत्तर अस्तित्व में बनें क्यों रहते है? इतनी हद तक की वे गौतम ऋषि के समय से पहले भी इतने प्रचलित थे की उन्होंने इस शास्त्र में स्थान पाया और आज भी हम आपने आस पास इन्हीं का राज चलते देख सकते है।

इसका जवाब ढूंढना है तो हमें जातिवादी से ध्यान हटाकर उनपर केंद्रित करना होगा जिन्हें जातिवादी प्रभावित करना चाह रहा है (उसका प्रतिवादी, न्यायाधीश अथवा श्रोतागण, जन सामान्य)। यह देखना सरल ही है की वो लोग जितने सत्यग्राही, स्वाध्यायशील, विद्यावान और सजग होंगे उतना ही कुतर्कों का चलना असंभव सा होने लगता है तो ऐसी दलीलें जहां तर्क का दूर दूर तक कोई लेना देना ही न हो वह तो एक क्षण भी नहीं टिकेंगे। और फिर भी कुतर्क और तर्कहीनता चलती है, चलती ही रहती है। इसका अर्थ यह है की जब समाज अथवा व्यक्ति का पतन होता है तब उनके सोचने की शक्ति और रीति में आने वाले बदलाव हमेशा से एक से रहे है (ऐसा होना expected भी है)। और यह की हम आज के समय को कितना ही भला बुरा कहें, ईश्वर की इस दुनिया में कोई वस्तु पहली बार नहीं होती।

अब मैं यहां समाज और व्यक्ति के behavioural patterns पर कोई चर्चा प्रारंभ करना नहीं चाहती, न ही मेरी कोई योग्यता है ऐसी कोई चर्चा के लिए, पर देखने का प्रयत्न करते है की पिछली दो और अर्थापत्तिसमा जाति का प्रयोग क्यों व्यवहार में बना रहता है? कौन इसे सच मान सकते है? तात्पर्य यहां यह नहीं है की इनका प्रत्येक प्रयोग चलता है अथवा सभी पर चलता है। इन के शिकंजे में फंसने वाले भी न तो सभी जातियों में फँसते है न किसी जाति के प्रत्येक प्रयोग में। पर इन जातियों को इतना खुराक कहीं न कहीं मिलता रहता है की वे बनी रहे।

प्रकरणसम : यह वितंडा में प्रवेश करने वाली पहली जाति थी। पक्ष न होते हुए (स्वयं के पक्ष की स्थापना का सामर्थ्य न रखते हुए) भी वैतंडिक ने अभी तर्क का दिखावा नहीं छोडा है। इसमें फँसने वाले लोग सोच सकते है की वादी के पक्ष में वो धर्म नहीं होगा तभी तो प्रतिपक्ष स्वयं के पक्ष में दिखा रहा है अथवा वादी के पक्ष में कोई धर्म होगा तभी तो प्रतिपक्ष स्वयं के पक्ष में उसका न होना बता रहा है। इतना सोच कर यदि वो इतने स्वाध्यायशील नहीं है की प्रमाणों को देखे तो जातिवादी की बातों में आ सकते है। और व्यवहार में यदि कोई वांछनीय धर्म बिना पुरुषार्थ से, मात्र जातिवादी को सिद्ध मान कर मिल जाता है (ऐसा लगता है की मिल जाता है) तो क्यों नहीं? 

अहेतूसम : यहां वैतंडिक ने वैतंडिक न दिखने का प्रयत्न भी छोड दिया है। कोई हेतु ही नहीं इसलिए तुम गलत हो कह कर बैठ गया है। फिर भी यह उत्तर न्यायदर्शनकार के समय से ले कर आज तक चलता आ रहा है। यह मुझे मुख्य तीन प्रकार से काम करता लगता है।

१) "बिना हेतु के तो कार्य होता नहीं, अर्थात् जब हेतु ही नहीं है तो कार्य भी नहीं है।" ऐसा सोचकर लोग कार्य की असिद्धि समझ ले। जैसे बहुत से समाचार को हम fake news इस लिए कहते है की हमें निश्चय है की त्रिकाल में इस का कोई हेतु ही नहीं है। (और फिर "कार्य है तो कारण तो होगा ही" का उपयोग करने के लिए fake news होते भी है। अर्थात् गो की सिद्धि गोत्व से ही होगी, कूबड़, सिंग से नहीं। कौन से news fake है और कौन से नहीं उसका निश्चय उनकी सत्यता जानकार ही होगा, बिना प्रमाणों के तर्क/साधर्म्य मात्र से नहीं।)

२) बिना हेतु के तो कार्य होता नहीं, अर्थात् वादी का दिया हेतु है ही नहीं तो अन्य कोई हेतु होगा। और इससे वादी का खंडन तो होता ही है। (ध्यान रहे की प्रतिवादी ने अन्य कोई हेतु नहीं रखा है, पर जाति के शिकार होने वाले ने गलत अर्थापत्ति से यह अर्थ निकाला है।)

३) जातिवादी की विजय में जाति के शिकार को अपना कोई न कोई लाभ दिखता है तो वे उस बात को मानने के लिए ज्यादा उत्सुक रहते है न की क्यों मनानी है/सच क्या है यह सोचने में।

अर्थापत्तिसम : अर्थापत्तिसमा जाति क्यों व्यवहार में बनी रहती है यह देखने से पहले देखते है वह जाति है क्या।

अर्थापत्तितः प्रतिपक्षसिद्धेरर्थापत्तिसमः। ५.१.२१

अर्थापत्ति के आभास से ही प्रतिपक्ष की सिद्धि (पक्ष का खंडन) मानने से अर्थापत्तिसम प्रतिषेध बनता है। 

किसी वस्तु के कथन से न कही हुई वस्तु का भी अर्थ निकल आ सकता है। जैसे किसी ने कहा आज राम को ऑफिस में बहुत देर तक बैठना पडा। इस में से यह अर्थ भी निकलता है की प्रतिदिन उसे इतनी देर तक नहीं बैठना पड़ता। पर जब कोई किसी के कथन से मनचाहा अर्थ निकालने लगे और यह जताये की अर्थापत्ति से यह सिद्ध होता है तब वह अर्थापत्तिसम प्रतिषेध बनता है।

जैसे उपर के उदाहरण में कोई कहे की आप के कथन अनुसार राम को छोड़कर दुनिया में आज किसी को ऑफिस में देर तक बैठना नहीं पडा तब ऐसी तोड मरोड के बनाई गई अर्थापत्ति से कोई खंडन नहीं होता।

यदि अहेतुसम शुद्ध वितंडा लगा था क्योंकि जातिवादी ने स्वयं के पक्ष की स्थापना का कोई प्रयत्न भी नहीं किया था तो यह तो उससे भी एक कदम आगे है। वहां कम से कम विरोध तो किया था, यहां तो वादी के पक्ष में से ही मनचाहा  अर्थ निकाल लिया।

इस का current real life उदाहरण फिर कभी। वैसे इस समय में कौन उससे अपरिचित होगा? 

उत्तर

अनुक्तस्यार्थापत्तेः पक्षहानेरुपपत्तिरनुक्तत्वादनैकान्तिकत्वाच्चार्थापत्तेः। ५.१.२२ 

न कहे गए का कोई भी अर्थ निकालने से यदि अर्थापत्ति होती तो अनेक विभिन्न अर्थ निकल सकते है (अनैकांतिक बन सकता है) और कोई भी पक्ष का खंडन उपलब्ध होने लगेगा।

अब वह सवाल की ये जाति प्रचलन में रहती कैसे है? जो पहली वस्तु दिमाग में आती है वह यह है की बिना सोचने की जहमत लिए यदि कोई क्लिष्ट विषय को भी समझने का दावा करने मिलता है तो मुफ़्त के पांडित्य को ना न कह पाने वाले बहुत से लोग मिल जाएंगे। वैसे और भी कारण होंगे, सोच पाने पर फिर लिखूँगी।

ऊपर जो उदाहरण मैंने अनकहा छोड दिया था उसमें तो कम से कम यही मुख्य कारण लगा मुझे। जहां एक और अति गंभीर अध्ययन करने वाला प्रामाणिक विशेषज्ञ (वादी) यह कर रहा था की जब वह हमारे शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र कैसे काम करता है उसके बारे में सोचता है तो उसके रोंगटे खडे हो जाते है उतना अद्भुत वह लगता है, वहीं एक सामान्य मनुष्य ने (जातिवादी के शिकार ने) उस प्रतिरक्षा तंत्र को उस दुश्मन के सामने भी, जिसको वह हरा चुका है, सर्वथा सामर्थ्यहीन सिद्ध कर दिया था। यह कहकर की "antibody" ३-४ महीने से ज्यादा नहीं टिकते। (अर्थापत्ति यह थी की वे ३-४ महीने दिखते है इस का अर्थ है उसके बाद तंत्र का कोई सामर्थ्य नहीं रहा।)

सोमवार, 5 सितंबर 2022

अहेतुसम प्रतिषेध

अहेतुसम प्रतिषेध

त्रैकाल्यानुपपत्तेर्हेतोरहेतुसमः। ५.१.१८

तीनों काल में कहीं हेतु की सिद्धि नहीं है ऐसा प्रतिषेध अहेतुसम प्रतिषेध है।

okay, इस जाति का अर्थ समझने में मैंने देखते ही हार सी मान ली थी। ऐसा कैसा जवाब? त्रिकाल में कोई हेतु नहीं है? ऐसे कैसे कोई हाथ खडे कर सकता है? और तभी कुछ ऐसी दलीलें जो वस्तुतः यही कहती हो की इस कार्य का हेतु तो त्रिकाल और त्रिलोक कहीं भी नहीं मिलेगा कान में गूंजने लगी।

आप को ये मधुमेह उच्च रक्तचाप जैसे रोग हुए है जिनका कारण जीवनशैली होती है।
- पर इन का कोई हेतु ही नहीं है। हमारे आहार विहार में तो इतनी भी गड़बड़ कभी भी नहीं रही। हम तो इतने जागरूक और व्यवस्थित है।

आप का बेटा इतनी छोटी आयु में इतना बिगड़ गया है। कहीं न कहीं उसके संस्कार में चूक रह गई है।
- पर हमने तो हमारे बेटे को हमेशा सर्वश्रेष्ठ संस्कार दिए है और सब प्रकार से उसे उच्च वातावरण ही प्रदान किया है। उसके बिगड़ने का तो त्रिकाल में कोई हेतु ही नहीं है।

और वो बंदूक ने किसी को मारा (अर्थात् किसी ने नहीं मारा) जैसे अनेक woke world जवाब।


यह प्रतिषेध हमें वहां मिलता है जहां जातिवादी स्वयं के पक्ष की कोई accountability fix नहीं होने देना चाहता।

यह वितंडा का शुद्ध स्वरूप है। वैतंडिक वादी को खंडित तो करना चाहता है पर कोई अन्य हेतु बताना भी नहीं चाहता, नहीं तो फिर उसे सिद्ध करने की झंझट गले पडेगी।

उत्तर 

न हेतुतः साध्यसिद्धेस्त्रैकाल्यासिद्धिः। ५.१.१९

साध्य की सिद्धि हेतु से ही होने के कारण त्रिकाल में उसकी असिद्धि नहीं हो सकती। 

प्रतिषेधानुपपत्तेश्च प्रतिषेद्धव्याप्रतिषेधः। ५.१.२०

प्रतिषेध की उत्पत्ति नहीं होने से प्रतिषेध योग्य का भी प्रतिषेध नहीं हो पाएगा।

अब तक के सारे उत्तरों में मुझे यह उत्तर सब से ज्यादा पसंद आए। basically, गौतम ऋषि ने जातिवादी को दिए जाने योग्य जवाब दिए है वो यह है।
१) (बकवास बंध करो,) हेतु का न होना नहीं होता।
२) हेतु है ही नहीं यह  कहोगे तो (तुम्हारे ऊपर सारे संभावित आरोप लग जायेंगे और उन में से किसी का भी स्वीकार नहीं करने से) तुम किसी भी आरोप का प्रतिषेध करने के लायक नहीं रहोगे।

वैसे जातिवादी भी यह जानता है और जहां उसे ऐसा वादी मिले जो इतना मूर्ख न हो जो बिना हेतु के कार्य हो गया मान ले तो किसी न किसी ऐसे हेतु को सर पर responsibility transfer करने का प्रयत्न करता है जिससे अपनी गलती न दिखे। जैसे जीवनशैली में दूसरों के द्वारा उत्पन्न तनाव मुख्य रहता है और बच्चे के बिगड़ने में समाज, मित्र, फिल्में जैसी वस्तुएं।

यदि एक वस्तु जो मुझे सबसे अधिक उपयोगी लगती है तो वो है 'यथा ब्रह्मांडे तथा पिण्डे' / 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्मांडे'। इससे हम जाति के बाह्य प्रयोग को समझकर उसके आंतरिक प्रयोग को भी समझ सकते है और उससे बच सकते है। यदि हम अवांछनीय परिस्थिति में स्वयं को पाते है तो सत्य कारण तक पहुँचने के लिए प्रत्येक प्रयास करें और यदि वह कारण ऐसा मिलता दिखे की जिसको स्वीकार करने में हमें किसी भी कारण से कष्ट हो रहा है तो वह कारण (जिससे कष्ट हो रहा है उस) का प्रतिषेध करें, न की अवांछनीय परिस्थिति के हेतु का।

और यदि ऐसा करने में कठिनाई आ रही है तो गौतम ऋषि ने दिए हुए उत्तर याद करें। हमारे न मानने से कुछ नहीं होगा, यदि कार्य है तो कारण तो है ही। और यदि उसे नहीं मानेंगे तो तो उसका प्रतिषेध (सुधार के प्रयत्न) कैसे करेंगे? जो कार्य हो चुका है उसके हेतु का त्रिकाल में न होना सिद्ध करना भले ही असंभव हो पर वह वर्तमान तथा भविष्य दो काल में वह न रहें उसके प्रयत्न करने की शक्ति हम स्वयं से न छीने।

मेरी दृष्टि में सूत्र में त्रिकाल शब्द का उपयोग गौतम ऋषि की हमारे प्रति की अपार करुणा की और संकेत करता है। हम कभी इतना नीचे भी गिर जाए की स्वयं से वाद करने के स्थान पर जल्प भी नहीं वितंडा पर उतर आए तब भी, वो हमें याद दिलाते है की हेतु का त्रिकाल में निषेध नहीं हो सकता और हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करते है की क्या दो अथवा एक काल में ऐसा हो सकता है? क्या हम हेतु को स्वीकार कर, उसे मिटाकर परिस्थिति बदल सकते है?

प्रकरणसम प्रतिषेध

उभयसाधर्म्यात्प्रक्रियासिद्धेः प्रकरणसमः। ५.१.१६

दोनों से साधर्म्य से प्रकरण चालू रहने से प्रकरणसम प्रतिषेध होता है। 

जब प्रतिवादी वादी के पक्ष को खंडित करें ऐसा कोई कारण देने के बदले स्वयं के पक्ष की स्थापना ऐसे करता है जिससे वादी के पक्ष का भी साधर्म्य हो (अथवा दोनों का वैधर्म्य हो) दोनों पक्ष खडे रहते है और प्रकरण की समाप्ति नहीं होती अथवा तो वादी को खंडित करने के प्रयत्न में प्रतिवादी स्वयं के पक्ष का भी खंडन कर देता है। ऐसा उत्तर खंडन नहीं कर पता और यदि उसे खंडन के हेतु से दिया जाता है तब वह जाति बनता है।

इस के व्यावहारिक उदाहरण अभी खास सोच नहीं पा रही हूँ। पर एक उदाहरण हो सकता है। हम प्रायः यह दलील सुनते है की (चुनाव में) फलाने उम्मीदवार को मत मत दो क्योंकि वह भ्रष्ट है जब की दूसरा उम्मीदवार जिसका वादी विरोध कर रहा है वह भी भ्रष्ट ही होता है (और वादी उसकी दूसरी कोई खराबी के कारण विरोध कर रहा होता है)। (और प्रायः लोग ये स्वीकार करने से हिचकिचाते भी नहीं। वहां दलील यह होती है की कौन भ्रष्ट नहीं होता?)

यदि प्रतिवादी का यह हेतु मान लिया जाए की भ्रष्ट को मत नहीं देना चाहिए तो भी वादी का पक्ष सिद्ध होगा जिससे न प्रतिपक्ष रहेगा न प्रतिषेध बनेगा और यदि माने की भ्रष्ट तो सब होते है तब भी प्रतिपक्ष बनेगा नहीं।

कुछ पुस्तकों में इसे प्रकरणसम हेत्वाभास की भांति समझाया है जहां कारण विरुद्ध पर समान बल वाला होता है -जिनके ऐसा होने से प्रकरण का प्रारंभ हुआ था और फिर वही वस्तु हेतु के रूप में दे दी गई थी। (इस जाति के उदाहरण उसका subset बनेंगे पर वहाँ और प्रसंग भी हो सकते है जो इस जाति में नहीं लिए जा सकते)। पर मुझे ऊपर की व्याख्या तर्कसंगत लगी - इस सूत्र में साधर्म्य कहा भी गया है और उत्तर भी साधर्म्य वाले पक्ष में ठीक बैठता है।

उत्तर

प्रतिपक्षात्प्रकरणसिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः प्रतिपक्षोपपत्तेः। ५.१.१७

प्रतिपक्ष से प्रकरण की सिद्धि होने से (संशय बना रहने से) प्रतिपक्ष को स्वीकार किये जाने पर प्रतिषेध (वादी का खंडन) नहीं हो पाता।

क्योंकि प्रतिपक्ष अपनी स्थापना ऐसे धर्म को हेतु बनाकर कर रहा है जिसका प्रथम पक्ष से भी साधर्म्य (वैधर्म्य) है, यदि प्रतिवादी की बात स्वीकार कर ली जाए तो भी वादी का खंडन नहीं होता।

अब तक चर्चा में अधिकतर हम यही भाव से चले है की वादी प्रतिवादी दोनों में से एक का पक्ष सही है और एक का गलत। परंतु ऐसा भी हो सकता है की दोनों ही गलत हो। (और यह भी की दोनों ही सही हो? जैसे मानो कोई कुछ खरीदने के लिए कौन सा brand/model सही है यह निर्णय करना चाहता है। ऐसे में हो सकता है की उसकी आवश्यकता के लिए एक से अधिक models समान रूप से उपयुक्त हो।)। ऐसे दोनों सही/दोनों गलत वाले क्षेत्रों में यह जाति का प्रयोग मिलना अधिक संभव हो सकता है।

एक और बात ध्यान देने की है की जाति प्रयोग जल्प वितंडा में होता है। और जल्प में प्रयोग में आने वाली जातियाँ फिर भी तर्क का आधार लिए हुए लगती है पर जैसे जैसे प्रतिवादी वाद से जल्प और जल्प से वितंडा की और जाता है वहां तर्क से कुतर्क और तर्कहीनता दिखने लगती है।

साथ ही में प्रत्येक स्तर पर प्रतिवादी के लिए यह लाभदायक रहता है की वह स्वयं को जितना हो सके ऊंचा (सत्यप्रिय/तार्किक) दिखाए। इस दृष्टि से देखते हुए यह जाति वितंडा जल्प की सीमा पर खड़ी है। जातिवादी है तो वैतंडिक, उसका कोई पक्ष है ही नहीं, पर वह ऐसा दिखाने का प्रयत्न कर रहा है जैसे उसका कोई पक्ष है।