शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

अविशेषसम उपपत्तिसम

एकधर्मोपपत्तेरविशेषे सर्वाविशेषप्रसङ्गात्सद्भावोपपत्तेरविशेषसमः। ५.१.२३ 

साध्य और दृष्टांत में एक धर्म (साधन धर्म) होने से साध्य धर्म की सिद्धि होती हो तो सत्ता (होना) धर्म तो सब में है इस लिए सब में साध्य धर्म की सिद्धि होती है ऐसा प्रतिषेध अविशेषसम प्रतिषेध है।

उत्तर

क्वचित्तद्धर्मोपपत्तेः क्वचिच्चानुपपत्तेः प्रतिषेधाभावः। ५.१.२४
 
साथ में दिखने वाले प्रत्येक दो धर्म व्याप्ति लिए हुए नहीं होते। कोई दो धर्म के बीच व्याप्ति होती है तो कोई के बीच नहीं होती।

सुतर्क जैसे लगने वाले अपूर्ण तर्क, कुतर्क, तर्कहीनता से होते होते हम इसके पूर्व की जाति में almost बकवास कहा जा सके ऐसी दलील तक पहुँच गए थे। इसके नीचे क्या हो सकता है?

.. जहां होना मात्र साधन धर्म का काम करता है?

जो विद्यार्थी पाठ्यक्रम को समझे है वो उत्तीर्ण होंगे। -> सारे बच्चे उत्तीर्ण होंगे।

जो विषय को बहुत अच्छे से समझे है वे उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण होंगे। -> सब उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण होंगे।

काम के अनुरूप वेतन मिलेगा। -> कोई भी काम हो एक सा वेतन। -> काम करो न करो वेतन।

रोगी के अनुसार दवा होगी। -> सभी रोगी को एक ही दवा। -> सभी को (रोगी हो न हो) एक ही 'दवा'।

(उपचार के लिए) आतुर का परीक्षण, उपचार। -> सांस लेती हुई प्रत्येक वस्तु का 'परीक्षण, उपचार'।


उपपत्तिसमा जाति
 
उभयकारणोपपत्तेरुपपत्तिसमः। ५.१.२५

दोनों के कारणों की उपपत्ति है ऐसी दलील उपपत्तिसमा जाति है।

आपकी बात सच है पर मेरी बात (जो आपकी बात से विपरीत है वह) भी सत्य है ऐसी दलील उपपत्तिसमा जाति है।

उत्तर

उपपत्तिकारणाभ्यनुज्ञानादप्रतिषेधः। ५.१.२६

वादी के कहे गए उपपत्ति के कारण को मान लेने पर उसका खंडन नहीं होता। (जब सामने वाले की बात सत्य स्वीकार कर ली गई है तो न तो उसका खंडन होता है न उसको स्वीकार करने वाले विरोधी की बात की सिद्धि।)

इसके विस्तार की कोई आवश्यकता नहीं है पर इस पर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगी की परस्पर विरोधी बातों का समर्थन करने वाले को न्यायदर्शनकार ने इस क्रम पर रखा है।

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

जाति प्रयोग सफल क्यों/कब होते है?, अर्थापत्तिसमा जाति

प्रश्न फिर से यही रहता है की ये कुतर्क अथवा उससे भी बुरी परिस्थिति, जहां दलील तर्क जैसी लगनी भी कम हो गई है, ऐसे सारे उत्तर अस्तित्व में बनें क्यों रहते है? इतनी हद तक की वे गौतम ऋषि के समय से पहले भी इतने प्रचलित थे की उन्होंने इस शास्त्र में स्थान पाया और आज भी हम आपने आस पास इन्हीं का राज चलते देख सकते है।

इसका जवाब ढूंढना है तो हमें जातिवादी से ध्यान हटाकर उनपर केंद्रित करना होगा जिन्हें जातिवादी प्रभावित करना चाह रहा है (उसका प्रतिवादी, न्यायाधीश अथवा श्रोतागण, जन सामान्य)। यह देखना सरल ही है की वो लोग जितने सत्यग्राही, स्वाध्यायशील, विद्यावान और सजग होंगे उतना ही कुतर्कों का चलना असंभव सा होने लगता है तो ऐसी दलीलें जहां तर्क का दूर दूर तक कोई लेना देना ही न हो वह तो एक क्षण भी नहीं टिकेंगे। और फिर भी कुतर्क और तर्कहीनता चलती है, चलती ही रहती है। इसका अर्थ यह है की जब समाज अथवा व्यक्ति का पतन होता है तब उनके सोचने की शक्ति और रीति में आने वाले बदलाव हमेशा से एक से रहे है (ऐसा होना expected भी है)। और यह की हम आज के समय को कितना ही भला बुरा कहें, ईश्वर की इस दुनिया में कोई वस्तु पहली बार नहीं होती।

अब मैं यहां समाज और व्यक्ति के behavioural patterns पर कोई चर्चा प्रारंभ करना नहीं चाहती, न ही मेरी कोई योग्यता है ऐसी कोई चर्चा के लिए, पर देखने का प्रयत्न करते है की पिछली दो और अर्थापत्तिसमा जाति का प्रयोग क्यों व्यवहार में बना रहता है? कौन इसे सच मान सकते है? तात्पर्य यहां यह नहीं है की इनका प्रत्येक प्रयोग चलता है अथवा सभी पर चलता है। इन के शिकंजे में फंसने वाले भी न तो सभी जातियों में फँसते है न किसी जाति के प्रत्येक प्रयोग में। पर इन जातियों को इतना खुराक कहीं न कहीं मिलता रहता है की वे बनी रहे।

प्रकरणसम : यह वितंडा में प्रवेश करने वाली पहली जाति थी। पक्ष न होते हुए (स्वयं के पक्ष की स्थापना का सामर्थ्य न रखते हुए) भी वैतंडिक ने अभी तर्क का दिखावा नहीं छोडा है। इसमें फँसने वाले लोग सोच सकते है की वादी के पक्ष में वो धर्म नहीं होगा तभी तो प्रतिपक्ष स्वयं के पक्ष में दिखा रहा है अथवा वादी के पक्ष में कोई धर्म होगा तभी तो प्रतिपक्ष स्वयं के पक्ष में उसका न होना बता रहा है। इतना सोच कर यदि वो इतने स्वाध्यायशील नहीं है की प्रमाणों को देखे तो जातिवादी की बातों में आ सकते है। और व्यवहार में यदि कोई वांछनीय धर्म बिना पुरुषार्थ से, मात्र जातिवादी को सिद्ध मान कर मिल जाता है (ऐसा लगता है की मिल जाता है) तो क्यों नहीं? 

अहेतूसम : यहां वैतंडिक ने वैतंडिक न दिखने का प्रयत्न भी छोड दिया है। कोई हेतु ही नहीं इसलिए तुम गलत हो कह कर बैठ गया है। फिर भी यह उत्तर न्यायदर्शनकार के समय से ले कर आज तक चलता आ रहा है। यह मुझे मुख्य तीन प्रकार से काम करता लगता है।

१) "बिना हेतु के तो कार्य होता नहीं, अर्थात् जब हेतु ही नहीं है तो कार्य भी नहीं है।" ऐसा सोचकर लोग कार्य की असिद्धि समझ ले। जैसे बहुत से समाचार को हम fake news इस लिए कहते है की हमें निश्चय है की त्रिकाल में इस का कोई हेतु ही नहीं है। (और फिर "कार्य है तो कारण तो होगा ही" का उपयोग करने के लिए fake news होते भी है। अर्थात् गो की सिद्धि गोत्व से ही होगी, कूबड़, सिंग से नहीं। कौन से news fake है और कौन से नहीं उसका निश्चय उनकी सत्यता जानकार ही होगा, बिना प्रमाणों के तर्क/साधर्म्य मात्र से नहीं।)

२) बिना हेतु के तो कार्य होता नहीं, अर्थात् वादी का दिया हेतु है ही नहीं तो अन्य कोई हेतु होगा। और इससे वादी का खंडन तो होता ही है। (ध्यान रहे की प्रतिवादी ने अन्य कोई हेतु नहीं रखा है, पर जाति के शिकार होने वाले ने गलत अर्थापत्ति से यह अर्थ निकाला है।)

३) जातिवादी की विजय में जाति के शिकार को अपना कोई न कोई लाभ दिखता है तो वे उस बात को मानने के लिए ज्यादा उत्सुक रहते है न की क्यों मनानी है/सच क्या है यह सोचने में।

अर्थापत्तिसम : अर्थापत्तिसमा जाति क्यों व्यवहार में बनी रहती है यह देखने से पहले देखते है वह जाति है क्या।

अर्थापत्तितः प्रतिपक्षसिद्धेरर्थापत्तिसमः। ५.१.२१

अर्थापत्ति के आभास से ही प्रतिपक्ष की सिद्धि (पक्ष का खंडन) मानने से अर्थापत्तिसम प्रतिषेध बनता है। 

किसी वस्तु के कथन से न कही हुई वस्तु का भी अर्थ निकल आ सकता है। जैसे किसी ने कहा आज राम को ऑफिस में बहुत देर तक बैठना पडा। इस में से यह अर्थ भी निकलता है की प्रतिदिन उसे इतनी देर तक नहीं बैठना पड़ता। पर जब कोई किसी के कथन से मनचाहा अर्थ निकालने लगे और यह जताये की अर्थापत्ति से यह सिद्ध होता है तब वह अर्थापत्तिसम प्रतिषेध बनता है।

जैसे उपर के उदाहरण में कोई कहे की आप के कथन अनुसार राम को छोड़कर दुनिया में आज किसी को ऑफिस में देर तक बैठना नहीं पडा तब ऐसी तोड मरोड के बनाई गई अर्थापत्ति से कोई खंडन नहीं होता।

यदि अहेतुसम शुद्ध वितंडा लगा था क्योंकि जातिवादी ने स्वयं के पक्ष की स्थापना का कोई प्रयत्न भी नहीं किया था तो यह तो उससे भी एक कदम आगे है। वहां कम से कम विरोध तो किया था, यहां तो वादी के पक्ष में से ही मनचाहा  अर्थ निकाल लिया।

इस का current real life उदाहरण फिर कभी। वैसे इस समय में कौन उससे अपरिचित होगा? 

उत्तर

अनुक्तस्यार्थापत्तेः पक्षहानेरुपपत्तिरनुक्तत्वादनैकान्तिकत्वाच्चार्थापत्तेः। ५.१.२२ 

न कहे गए का कोई भी अर्थ निकालने से यदि अर्थापत्ति होती तो अनेक विभिन्न अर्थ निकल सकते है (अनैकांतिक बन सकता है) और कोई भी पक्ष का खंडन उपलब्ध होने लगेगा।

अब वह सवाल की ये जाति प्रचलन में रहती कैसे है? जो पहली वस्तु दिमाग में आती है वह यह है की बिना सोचने की जहमत लिए यदि कोई क्लिष्ट विषय को भी समझने का दावा करने मिलता है तो मुफ़्त के पांडित्य को ना न कह पाने वाले बहुत से लोग मिल जाएंगे। वैसे और भी कारण होंगे, सोच पाने पर फिर लिखूँगी।

ऊपर जो उदाहरण मैंने अनकहा छोड दिया था उसमें तो कम से कम यही मुख्य कारण लगा मुझे। जहां एक और अति गंभीर अध्ययन करने वाला प्रामाणिक विशेषज्ञ (वादी) यह कर रहा था की जब वह हमारे शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र कैसे काम करता है उसके बारे में सोचता है तो उसके रोंगटे खडे हो जाते है उतना अद्भुत वह लगता है, वहीं एक सामान्य मनुष्य ने (जातिवादी के शिकार ने) उस प्रतिरक्षा तंत्र को उस दुश्मन के सामने भी, जिसको वह हरा चुका है, सर्वथा सामर्थ्यहीन सिद्ध कर दिया था। यह कहकर की "antibody" ३-४ महीने से ज्यादा नहीं टिकते। (अर्थापत्ति यह थी की वे ३-४ महीने दिखते है इस का अर्थ है उसके बाद तंत्र का कोई सामर्थ्य नहीं रहा।)

सोमवार, 5 सितंबर 2022

अहेतुसम प्रतिषेध

अहेतुसम प्रतिषेध

त्रैकाल्यानुपपत्तेर्हेतोरहेतुसमः। ५.१.१८

तीनों काल में कहीं हेतु की सिद्धि नहीं है ऐसा प्रतिषेध अहेतुसम प्रतिषेध है।

okay, इस जाति का अर्थ समझने में मैंने देखते ही हार सी मान ली थी। ऐसा कैसा जवाब? त्रिकाल में कोई हेतु नहीं है? ऐसे कैसे कोई हाथ खडे कर सकता है? और तभी कुछ ऐसी दलीलें जो वस्तुतः यही कहती हो की इस कार्य का हेतु तो त्रिकाल और त्रिलोक कहीं भी नहीं मिलेगा कान में गूंजने लगी।

आप को ये मधुमेह उच्च रक्तचाप जैसे रोग हुए है जिनका कारण जीवनशैली होती है।
- पर इन का कोई हेतु ही नहीं है। हमारे आहार विहार में तो इतनी भी गड़बड़ कभी भी नहीं रही। हम तो इतने जागरूक और व्यवस्थित है।

आप का बेटा इतनी छोटी आयु में इतना बिगड़ गया है। कहीं न कहीं उसके संस्कार में चूक रह गई है।
- पर हमने तो हमारे बेटे को हमेशा सर्वश्रेष्ठ संस्कार दिए है और सब प्रकार से उसे उच्च वातावरण ही प्रदान किया है। उसके बिगड़ने का तो त्रिकाल में कोई हेतु ही नहीं है।

और वो बंदूक ने किसी को मारा (अर्थात् किसी ने नहीं मारा) जैसे अनेक woke world जवाब।


यह प्रतिषेध हमें वहां मिलता है जहां जातिवादी स्वयं के पक्ष की कोई accountability fix नहीं होने देना चाहता।

यह वितंडा का शुद्ध स्वरूप है। वैतंडिक वादी को खंडित तो करना चाहता है पर कोई अन्य हेतु बताना भी नहीं चाहता, नहीं तो फिर उसे सिद्ध करने की झंझट गले पडेगी।

उत्तर 

न हेतुतः साध्यसिद्धेस्त्रैकाल्यासिद्धिः। ५.१.१९

साध्य की सिद्धि हेतु से ही होने के कारण त्रिकाल में उसकी असिद्धि नहीं हो सकती। 

प्रतिषेधानुपपत्तेश्च प्रतिषेद्धव्याप्रतिषेधः। ५.१.२०

प्रतिषेध की उत्पत्ति नहीं होने से प्रतिषेध योग्य का भी प्रतिषेध नहीं हो पाएगा।

अब तक के सारे उत्तरों में मुझे यह उत्तर सब से ज्यादा पसंद आए। basically, गौतम ऋषि ने जातिवादी को दिए जाने योग्य जवाब दिए है वो यह है।
१) (बकवास बंध करो,) हेतु का न होना नहीं होता।
२) हेतु है ही नहीं यह  कहोगे तो (तुम्हारे ऊपर सारे संभावित आरोप लग जायेंगे और उन में से किसी का भी स्वीकार नहीं करने से) तुम किसी भी आरोप का प्रतिषेध करने के लायक नहीं रहोगे।

वैसे जातिवादी भी यह जानता है और जहां उसे ऐसा वादी मिले जो इतना मूर्ख न हो जो बिना हेतु के कार्य हो गया मान ले तो किसी न किसी ऐसे हेतु को सर पर responsibility transfer करने का प्रयत्न करता है जिससे अपनी गलती न दिखे। जैसे जीवनशैली में दूसरों के द्वारा उत्पन्न तनाव मुख्य रहता है और बच्चे के बिगड़ने में समाज, मित्र, फिल्में जैसी वस्तुएं।

यदि एक वस्तु जो मुझे सबसे अधिक उपयोगी लगती है तो वो है 'यथा ब्रह्मांडे तथा पिण्डे' / 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्मांडे'। इससे हम जाति के बाह्य प्रयोग को समझकर उसके आंतरिक प्रयोग को भी समझ सकते है और उससे बच सकते है। यदि हम अवांछनीय परिस्थिति में स्वयं को पाते है तो सत्य कारण तक पहुँचने के लिए प्रत्येक प्रयास करें और यदि वह कारण ऐसा मिलता दिखे की जिसको स्वीकार करने में हमें किसी भी कारण से कष्ट हो रहा है तो वह कारण (जिससे कष्ट हो रहा है उस) का प्रतिषेध करें, न की अवांछनीय परिस्थिति के हेतु का।

और यदि ऐसा करने में कठिनाई आ रही है तो गौतम ऋषि ने दिए हुए उत्तर याद करें। हमारे न मानने से कुछ नहीं होगा, यदि कार्य है तो कारण तो है ही। और यदि उसे नहीं मानेंगे तो तो उसका प्रतिषेध (सुधार के प्रयत्न) कैसे करेंगे? जो कार्य हो चुका है उसके हेतु का त्रिकाल में न होना सिद्ध करना भले ही असंभव हो पर वह वर्तमान तथा भविष्य दो काल में वह न रहें उसके प्रयत्न करने की शक्ति हम स्वयं से न छीने।

मेरी दृष्टि में सूत्र में त्रिकाल शब्द का उपयोग गौतम ऋषि की हमारे प्रति की अपार करुणा की और संकेत करता है। हम कभी इतना नीचे भी गिर जाए की स्वयं से वाद करने के स्थान पर जल्प भी नहीं वितंडा पर उतर आए तब भी, वो हमें याद दिलाते है की हेतु का त्रिकाल में निषेध नहीं हो सकता और हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करते है की क्या दो अथवा एक काल में ऐसा हो सकता है? क्या हम हेतु को स्वीकार कर, उसे मिटाकर परिस्थिति बदल सकते है?

प्रकरणसम प्रतिषेध

उभयसाधर्म्यात्प्रक्रियासिद्धेः प्रकरणसमः। ५.१.१६

दोनों से साधर्म्य से प्रकरण चालू रहने से प्रकरणसम प्रतिषेध होता है। 

जब प्रतिवादी वादी के पक्ष को खंडित करें ऐसा कोई कारण देने के बदले स्वयं के पक्ष की स्थापना ऐसे करता है जिससे वादी के पक्ष का भी साधर्म्य हो (अथवा दोनों का वैधर्म्य हो) दोनों पक्ष खडे रहते है और प्रकरण की समाप्ति नहीं होती अथवा तो वादी को खंडित करने के प्रयत्न में प्रतिवादी स्वयं के पक्ष का भी खंडन कर देता है। ऐसा उत्तर खंडन नहीं कर पता और यदि उसे खंडन के हेतु से दिया जाता है तब वह जाति बनता है।

इस के व्यावहारिक उदाहरण अभी खास सोच नहीं पा रही हूँ। पर एक उदाहरण हो सकता है। हम प्रायः यह दलील सुनते है की (चुनाव में) फलाने उम्मीदवार को मत मत दो क्योंकि वह भ्रष्ट है जब की दूसरा उम्मीदवार जिसका वादी विरोध कर रहा है वह भी भ्रष्ट ही होता है (और वादी उसकी दूसरी कोई खराबी के कारण विरोध कर रहा होता है)। (और प्रायः लोग ये स्वीकार करने से हिचकिचाते भी नहीं। वहां दलील यह होती है की कौन भ्रष्ट नहीं होता?)

यदि प्रतिवादी का यह हेतु मान लिया जाए की भ्रष्ट को मत नहीं देना चाहिए तो भी वादी का पक्ष सिद्ध होगा जिससे न प्रतिपक्ष रहेगा न प्रतिषेध बनेगा और यदि माने की भ्रष्ट तो सब होते है तब भी प्रतिपक्ष बनेगा नहीं।

कुछ पुस्तकों में इसे प्रकरणसम हेत्वाभास की भांति समझाया है जहां कारण विरुद्ध पर समान बल वाला होता है -जिनके ऐसा होने से प्रकरण का प्रारंभ हुआ था और फिर वही वस्तु हेतु के रूप में दे दी गई थी। (इस जाति के उदाहरण उसका subset बनेंगे पर वहाँ और प्रसंग भी हो सकते है जो इस जाति में नहीं लिए जा सकते)। पर मुझे ऊपर की व्याख्या तर्कसंगत लगी - इस सूत्र में साधर्म्य कहा भी गया है और उत्तर भी साधर्म्य वाले पक्ष में ठीक बैठता है।

उत्तर

प्रतिपक्षात्प्रकरणसिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः प्रतिपक्षोपपत्तेः। ५.१.१७

प्रतिपक्ष से प्रकरण की सिद्धि होने से (संशय बना रहने से) प्रतिपक्ष को स्वीकार किये जाने पर प्रतिषेध (वादी का खंडन) नहीं हो पाता।

क्योंकि प्रतिपक्ष अपनी स्थापना ऐसे धर्म को हेतु बनाकर कर रहा है जिसका प्रथम पक्ष से भी साधर्म्य (वैधर्म्य) है, यदि प्रतिवादी की बात स्वीकार कर ली जाए तो भी वादी का खंडन नहीं होता।

अब तक चर्चा में अधिकतर हम यही भाव से चले है की वादी प्रतिवादी दोनों में से एक का पक्ष सही है और एक का गलत। परंतु ऐसा भी हो सकता है की दोनों ही गलत हो। (और यह भी की दोनों ही सही हो? जैसे मानो कोई कुछ खरीदने के लिए कौन सा brand/model सही है यह निर्णय करना चाहता है। ऐसे में हो सकता है की उसकी आवश्यकता के लिए एक से अधिक models समान रूप से उपयुक्त हो।)। ऐसे दोनों सही/दोनों गलत वाले क्षेत्रों में यह जाति का प्रयोग मिलना अधिक संभव हो सकता है।

एक और बात ध्यान देने की है की जाति प्रयोग जल्प वितंडा में होता है। और जल्प में प्रयोग में आने वाली जातियाँ फिर भी तर्क का आधार लिए हुए लगती है पर जैसे जैसे प्रतिवादी वाद से जल्प और जल्प से वितंडा की और जाता है वहां तर्क से कुतर्क और तर्कहीनता दिखने लगती है।

साथ ही में प्रत्येक स्तर पर प्रतिवादी के लिए यह लाभदायक रहता है की वह स्वयं को जितना हो सके ऊंचा (सत्यप्रिय/तार्किक) दिखाए। इस दृष्टि से देखते हुए यह जाति वितंडा जल्प की सीमा पर खड़ी है। जातिवादी है तो वैतंडिक, उसका कोई पक्ष है ही नहीं, पर वह ऐसा दिखाने का प्रयत्न कर रहा है जैसे उसका कोई पक्ष है।

रविवार, 4 सितंबर 2022

संशयसम प्रतिषेध

सामान्यदृष्टान्तयोरैन्द्रियकत्वे समाने नित्यानित्यसाधर्म्यात् संशयसमः। ५.१.१४

सामान्य (दृष्टांत की जाति) और दृष्टांत के समान रूप से इंद्रियग्राह्य होने पर नित्य जाति और अनित्य दृष्टांत के समान धर्मों के कारण किया गया प्रतिषेध संशयसम प्रतिषेध है।

पहले की भांति नीचे का विस्तार मेरा किया है। भाष्य से मेल नहीं खाता।

सामान्य उसे कहते है जो विशेष (यहां हमारे दृष्टांत) की जाति हो। जैसे यदि दृष्टांत गौरी गाय है तो जाति गौ हुई। 

अब अनेक प्रसंगों में, जब हम कोई जाति से परिचित न हो तब यह होता है की हमें उन जाति के सारे सदस्य एक से लगे परंतु जो उनसे चिरपरिचित है उन्हें प्रत्येक सदस्य की भिन्नता अपने आप दृष्टिगोचर होगी। (कभी सोचा है की ये सारे चिनी जापानी लोग एक से तो लगते है उनमें से कौन कौन है यह कैसे कोई पहचानता होगा और उनसे पूछो तो वे भी हमें देखकर ऐसा ही कहते होंगे संभवतः)

अब जाति के सब सदस्यों में जाति के अनुरूप समान धर्म होते हुए भी प्रत्येक के विशेष धर्म भी होते है। पर जो विशेषज्ञ नहीं है उसके लिए उन विशेष धर्मों को देख पाना कभी कभी असंभव सा हो सकता है। (आप ने कभी पक्षीयों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जनाने के स्तर पर रहते हुए उन में से अनेक की जाति (species) जनाने का प्रयत्न किया होगा तो आप से अधिक इस बात को किस ने भुगता, अर्थात् जाना होगा?)

यह बात medical imaging reports में भी देख सकते है। हमें सारे चित्र एक से लगेंगे जब की विशेषज्ञ उससे विशेष की सिद्धि कर सकता है। यहां तक की (कोई भी क्षेत्र में, मात्र मेडिकल क्षेत्र में नहीं) यदि विशेषज्ञ कहलाने वाला सच में सूक्ष्म ज्ञान नहीं रखता तो विशेष को सामान्य (normal) अथवा ऐसा विशेष जो वह नहीं है ऐसा समझ सकता है। ऐसे में प्रतिवादी को यदि दृष्टांत में मात्र सामान्य धर्म ही दिख रहे है तो उसका यह विरोध करना की विशेष सिद्ध नहीं होता अतार्किक नहीं लगता। परंतु इसी बात का लाभ जब विशेष धर्म दिख रहे हो तब भी यह सोचकर उठाने का प्रयत्न करना की वादी उसे नहीं दिखा पाएगा वह जाति प्रयोग बनेगा।

उत्तर
साधर्म्यात्संशये न संशयो वैधर्म्यादुभयथा वा संशयेऽत्यन्तसंशयप्रसङ्गो नित्यत्वानभ्युपगमाच्च सामान्यस्याप्रतिषेधः। ५.१.१४

समान धर्मों के कारण संशय होने पर भी वैधर्म्य के कारण संशय नहीं रहता। यदि जहां साधर्म्य और वैधर्म्य दोनों हो तब भी संशय किया जाए तब तो संशय नित्य बना रहेगा। (पर विशेष धर्म की उपस्थिति में भी मात्र) समान धर्मों के कारण संशय नहीं माना जाता इसलिए यह संशयसम प्रतिषेध खंडन करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

वादी को वह विशेष धर्म जो दृष्टांत (और साध्य) में है उन्हें दिखाकर इस का उत्तर देना चाहिए।

अनुत्पत्तिसम प्रतिषेध

अनुत्पत्तिसम प्रतिषेध

प्रागुत्पत्तेः कारणाभावादनुत्पत्तिसमः। ५.१.१२

(कार्य की) उत्पत्ति से पहले कारणों का अभाव था ऐसा आधार बनाकर जो (अयोग्य) प्रतिषेध किया जाता है वह अनुत्पत्तिसम प्रतिषेध है।

तथाभावादुत्पन्नस्य कारणोपपत्तेर्न कारणप्रतिषेधः। ५.१.१३ 

वैसा होने से उत्पन्न हुए के कारण की सिद्धि होने से कारण का प्रतिषेध नहीं हो सकता। 

भाष्य और पुस्तकें पूरी तरह एक तरफ रखकर मात्र सूत्र के आधार पर मैंने जो समझने का प्रयत्न किया है वह नीचे दिया है।

जहां कारण का संचय अनिश्चित काल तक होता है/वह सुषुप्त अवस्था में अनिश्चित काल तक/प्रत्यक्ष न होते हुए रह सकता है, और फिर कार्य दिखता है वहां इस जाति के प्रयोग के लिए सरलता बनती है।

ऐसे में जब कार्य दिखता है तब कार्य के निश्चित पूर्व में कारण उत्पन्न हुआ नहीं दिखता (जैसे ढोल बजाने से शब्द उत्पन्न होता है तब कारण-हाथों का ढोल से संयोग होना दिखता है) और वह जब संचित होता रहता है तब कार्य की निष्पत्ति नहीं होने से हो सकता है वह बिलकुल ही न दिखे अथवा उसे कारण के रूप में देख पाना कठिन हो सकता है।

इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए जातिवादी कारण के कारण होने का ऐसे खंडन कर सकता है की यदि वह कारण कार्य की उत्पत्ति से पहले भी था तब तो कार्य भी पहले होना चाहिए था। कार्य पहले नहीं था वह सिद्ध करता है की कारण भी पहले नहीं था। (जैसे कोई धीरे धीरे अपथ्य के कारण अपने शरीर में आम का संचय करता है। अब एक दिन बीमारी के दिखने पर हो सकता जो वो आम संचय न देख पाए और कार्य के तुरंत पहले के समय में कोई कारण को ढूँढने का प्रयास करने लगे।)

उत्तर
कार्य का उत्पन्न होना कारण के होने को सिद्ध करता है उसे कार्य से पहले कारण नहीं था यह सिद्ध करने के लिए प्रमाण नहीं बना सकते। (यदि कारण की कार्य के साथ की व्याप्ति सही हो तो)

उदाहरण १
वैद्य : रात्रि को खट्टे दही का सेवन तुम्हें बंध करना होगा, तुम्हारी acidity उससे हुई है। रात्रि को खट्टे दही का सेवन पित्त कफ के प्रकोप करता है इसलिए।
रोगी : acidity तो मुझे १५-२० दिन से ही हो रही है जब की रात्रि को खट्टे दही का सेवन तो मैं पिछले ३ महीने से कर रहा हूँ। जब acidity नहीं थी तो उसका कारण भी नहीं होगा (परंतु दहीं का सेवन तो तब भी था) अर्थात् खट्टे दही का acidity से कोई लेना देना नहीं है।

उदाहरण २
वादी : राम अपने १५ वर्ष के कठिन पुरुषार्थ के कारण आज इस सफलता को प्राप्त हुआ है।
जातिवादी : पुरुषार्थ से कुछ नहीं होता। एक वर्ष पहले तक तो उसे सफलता मिली नहीं थी जो वर्ष भर पहले तक सफलता के कारण का अभाव का सूचक है। पुरुषार्थ से कुछ होना होता तो १५ वर्ष पहले ही हो जाता।

जाति प्रयोग तर्क के वह प्रयोग है जो प्रमाण तक नहीं पहुंचाते। तर्क के प्रमाण तक न पहुंचा पाने के पीछे अपूर्ण तर्क, प्रमाणों से विसंगतता, अप्राप्त प्रमाण जैसे कारण रहते है जो जाति प्रयोगों में देखने मिलते है। परंतु जाति प्रयोग का अस्तित्व उस बात का सूचक है की वे सद् उत्तर जैसे लग सकते है। यदि उनके सफल होने की कोई संभावना ही न होती तो वह प्रयोग में ही न आते। क्योंकि जो तर्क कभी भी सद् उत्तर न बन पाए वह सद् उत्तर जैसा कभी लग भी नहीं सकता। इससे हम स्वयं की जाति समझ की एक परीक्षा कर सकते है। क्या हम ऐसे उदाहरण देख सकते है जहां जाति लक्षण (जिस तर्क को जाति का लक्षण बताया गया है) वादी की व्याप्ति का खंडन करता हो। (P.S. जाति प्रकरण के अंत में इसे संशोधित करेंगे। क्योंकि इस तर्क में त्रुटि, अपूर्णता है।)

एक उदाहरण जो सत्य हो सकता है (हमेशा ऐसा होता है ऐसा कहने का तात्पर्य नहीं है।)

वादी : तुम मेरी यह बात का विरोध नहीं कर सकते। क्योंकि तुम तो आज तक मेरी कही प्रत्येक बात का समर्थन करते आए हो। (व्याप्ति: वादी की बात -> प्रतिवादी का समर्थन)

प्रतिवादी : मैंने आज तक जो भी बात का समर्थन किया वह बात के योग्य लगने से किया था, आप ने कही है इसलिए नहीं। पर यह बात मुझे योग्य नहीं लग रही है तो मैं उसका विरोध कर रहा हूँ। (वादी की व्याप्ति का खंडन यह कहते हुए की जब कार्य (विरोध) नहीं था तब उसका कारण (अयोग्य बात) भी नहीं था।)

शुक्रवार, 2 सितंबर 2022

प्रसङ्गसमा, दृष्टान्तसमा जाति

प्रसङ्गसमा, दृष्टान्तसमा

दृष्टान्तस्य कारणानपदेशात्प्रत्यवस्थानाच्च प्रतिदृष्टान्तेन प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमौ। ५.१.९

दृष्टान्त के कारण का कथन न करने से किया गया प्रतिषेध प्रसङ्गसम तथा प्रतिदृष्टान्त से किया गया (अयोग्य) प्रतिषेध दृष्टान्तसम प्रतिषेध है।

प्रसङ्गसमा
पंचावयव में जब दृष्टांत दिया गया है (और दृष्टांत वही बनता है जो पहले से सिद्ध हो) तब जातिवादी यह कहता है की आपने दृष्टांत सिद्ध करने के लिए हेतु तो दिया ही नहीं और बिना हेतु सिद्धि थोडी होती है। ऐसे हेतु/दृष्टांत के भी हेतु/दृष्टांत मांग मांग कर प्रसंग को बनाए रखने के प्रयत्न को प्रसङ्गसमा जाति कहते है।

प्रसङ्गसमा का उत्तर
प्रदीपोपादानप्रसङ्गविनिवृत्तिवत्तद्विनिवृत्तिः। ५.१.१०

प्रदीप को देखने के लिए जैसे अन्य प्रदीप की आवश्यकता नहीं होती ऐसे ही दृष्टांत (जो पहले से सिद्ध है) को सिद्ध करने के लिए अन्य हेतु/दृष्टांत की आवश्यकता नहीं होती।

दृष्टान्तसमा
प्रतिदृष्टान्त से किया गया (अयोग्य) प्रतिषेध दृष्टान्तसम प्रतिषेध है।

दृष्टान्तसमा का उत्तर
प्रतिदृष्टान्तहेतुत्वे च नाहेतुर्दृष्टान्तः। ५.१.११ 
प्रतिदृष्टांत के प्रमाण होते हुए भी दृष्टांत अप्रमाण नहीं होता।
 

नीचे प्रसङ्गसमा, दृष्टान्तसमा और उनके उत्तर का मेरी समझ से किया गया विस्तार है। एक बार फिर पुस्तकों में दिया गया वर्णन मुझे संतोष जनक नहीं लगा।

इन दोनों जाति को हम उन जटिल प्रणालियों में जहां अनेक कारण/बाधक कारण मिलकर कोई कार्य सम्पन्न करते है अथवा नहीं होने देते अधिक सरलता से प्रयोग में लाये जाने वाली जाति के रूप में समझ सकते है। (अथवा उन प्रणालियों में जिनको अनेक कारणों वाला जटिल बना दिया गया है/जटिल होते हुए भी सरल दिखाया गया है इस उद्देश्य से की इन जातियों का प्रयोग हो सके।)

(जितनी वास्तविक जटिलता अधिक उतना ही वहां मात्र व्याप्तिज्ञान ही मुख्य बनता जाएगा, दृष्टांत का अधिक महत्व नहीं रह जाएगा। कार्य के पीछे की कारणों की विविधता से कोई भी दो कार्य एकदम समान कारणों के बल से सम्पन्न नहीं होंगे। और वैसे भी व्याप्तिज्ञान प्रत्यक्ष हो तो उदाहरण से क्या अंतर आएगा।)

पहले दृष्टान्तसमा समझते है।

वादी के दिए हुए दृष्टांत से विरुद्ध लगने वाले दृष्टांत को प्रतिदृष्टांत के रुप में प्रस्तुत करना जब की वह प्रतिदृष्टांत हेतु का खंडन न कर पाता हो वह दृष्टान्तसमा जाति है।

यहां यह याद रखना महत्वपूर्ण है की जाति का प्रयोग ऐसे प्रतिषेध को कहते है जिसमें उसे प्रयोग करने वाला पक्ष अपने उस प्रतिषेध से प्रतिपक्ष का खंडन और स्वयं की विजय हुई है यह सिद्ध करना चाहता हो। यही बात यदि जिज्ञासा के रूप में, चर्चा में स्पष्टता लाने के लिए अथवा प्रतिवादी का ध्यान खींचते हुए की यहां आप की बात ढीली लग रही है तो आपको इसका जवाब देना चाहिए नहीं तो आप के खंडन का भय है इस रीति से कही जाने पर उसे जाति नहीं कहेंगे। यह नीचे जब उदाहरण देखेंगे तब स्पष्ट होगा।
 
यदि प्रतिदृष्टांत पूर्णतया योग्य हो, जो हेतु को व्यभिचारी/अनैकांतिक सिद्ध करता हो तब तो वह वादी के हेतु/व्याप्ति को खंडित करने में सफल होगा और सद् उत्तर बनेगा अर्थात जाति नहीं कहा जाएगा। जब सूत्रकार प्रतिदृष्टांत का उल्लेख जाति में करते है तब वह प्रतिदृष्टांतसम है, हेतु खंडित करने वाला प्रतिदृष्टांत नहीं है यह स्पष्ट है। पुस्तकों से इसका विस्तार नहीं समझ पाने से फिर एक बार हम व्यवहार जगत की और दृष्टि करते है।

व्यवहार में हम अनेक बार ऐसे प्रतिदृष्टांत दिए जाते हुए देखते है जो सही लगते हुए भी हेतु को खंडित नहीं करते। जैसे,

(मुझे जो प्रथम दृष्टि में उदाहरण दिखे उस के आधार पर यह लिखा है। हो सकता है यह उदाहरण पूरे योग्य न हो अथवा पंचावयव में त्रुटियाँ हो। पर अभी तो यही समझ में आ रहा है। आगे चलकर त्रुटियाँ दिखी तो उसे दूर करूंगी।)
 
१। वादी : राजू को शाकभाजी बेचना छोडकर मजदूरी करनी पड रही है उसका कारण हफ्ता वसूली है। हफ्ता वसूली ने उसके स्वरोजगार की लाभदायकता नष्ट कर दी इसलिए। जैसे रामू फलवाले के साथ भी हुआ था। (साधन : हफ्ता वसूली  साध्य : स्वरोजगार की लाभदायकता में कमी)

प्रतिवादी : पर बल्लू तो अभी भी फलसब्जी बेच रहा है जब की हफ्ते तो उसे भी देने पड रहे है। इस से आप का खंडन होता है। (यही बात वह पंचावयव के रूप में भी कह सकता है।) - यह जाति प्रयोग है।

प्रतिवादी यदि अपनी बात ऐसे कहता की "पर बल्लू तो अभी भी फलसब्जी बेच रहा है जब की हफ्ते तो उसे भी देने पड रहे है। यह उदाहरण तो आप के हेतु का खंडन करता दिखाई देता है। आप इस विसंगतता को कैसे स्पष्ट करेंगे।" तब उसे जाति नहीं परंतु चर्चा का एक स्वीकार्य भाग माना जाता। 

(चर्चा में अनेक वस्तु में पक्ष प्रतिपक्ष का बुद्धिसाम्य है ऐसा पक्ष प्रतिपक्ष मान के चलते है जैसे यहां वादी को लगा की प्रतिपक्ष ये देख पाएगा की स्वरोजगार में प्रवृत्त सभी एक सा लाभ अर्जित नहीं करते न ही सब की टिक पाने की क्षमता एक सी होती है इससे अन्याय के कारण सभी एक ही साथ नष्ट नहीं होते। पर यदि यह बात प्रतिपक्ष स्वयं नहीं देख पाया तो वह प्रश्न पूछ ही सकता है।)

२। वादी :  मेरा स्वास्थ्य खराब होने का कारण सिगरेट सेवन है। प्रतिदिन १०-१२ सिगरेट सेवन करता था और सिगरेट सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। मेरे मित्र के साथ भी यही हुआ था। (साधन धर्म : सिगरेट का सेवन साध्य धर्म : स्वयं के स्वास्थ्य की खराबी)

सिगरेट बेचने वाला (प्रतिवादी) : ये देखो मेरा दूसरा ग्राहक यहीं खडा है उसका स्वास्थ्य तो इतनी ही सिगरेट पीने पर भी ठीक ही है।

यहां ऐसा नहीं है की प्रतिदृष्टांत में सिगरेट सेवन से होने वाली हानि के अपना कार्य नहीं किया परंतु स्वास्थ्य सैकड़ों कारणों से निर्णीत होता है जिसमें से अन्य कोई कारण ने उस हानि को मिटाने का काम किया है।

हाँ यदि यह देखने में आता हो की अन्य सारे कारण एकदम एक से होने पर भी (जो की मनुष्य स्वास्थ्य जैसे विषय में तो शक्य ही नहीं है पर जहां शक्य हो वहां। और यहां जितना हो सके उतना) किसी को तो सिगरेट पीने पर स्वास्थ्य हानि दिखाई देती है किसी को लाभ और किसी को कोई असर नहीं तब तो ऐसा प्रतिदृष्टांत व्याप्ति का उस हद तक खंडन कर पाएगा जिस हद तक अन्य कारणों की समानता निश्चित की जा सकी है।
 
इन प्रसंगों में एक कारण से एक कार्य का सम्बद्ध न होते हुए अनेक कारण/बाधक कारण से कार्य का संबंध है। कितने कारण/बाधक कारण मिलकर कार्य करते है/बाधित करते है उस की जटिलता पर इसका भी आधार है की कारण (जो साधन धर्म है) उसके होते हुए कार्य की निष्पत्ति (साध्य) में कितनी विविधता आती है।

जब साधन-साध्य की व्याप्ति सही हो तब सही लगने वाला प्रतिदृष्टांत अन्य कारणों अथवा बाधक कारणों के दृष्टांत से वैधर्म्य के कारण कार्य में विविधता की प्राप्ति कराता हुआ होता है, जिससे साधन धर्म और साध्य धर्म के बीच की व्याप्ति खंडित नहीं होती।

एक दृष्टि से देखे तो इन सारे उदाहरणों में वादी अपनी स्थापना को ऐसी विस्तृत और सर्व/बहु ग्राही बना सकता है जिसका सही लगने वाला प्रतिदृष्टांत देना कठिन बनता जाए। जैसे,

"राजू, जो की बहुत कम पूंजी और साधनों से भी शाकभाजी बेचकर थोडे से पैसे कमाता था, जिसमें अपने काम की इतनी योग्यता तो थी की वह न्यायपूर्ण market forces के सामने टिक पाए पर ऐसी असाधारण प्रतिभा नहीं थी की अन्यायपूर्ण वातावरण में भी टिक जाए उसे अब हफ्ता वसूली के कारण स्वरोजगार छोडकर मजदूरी करनी पड रही है। हफ्ता वसूली ने उसके स्वरोजगार की लाभदायकता नष्ट कर दी इसलिए। जैसे रामू फलवाले के साथ भी हुआ था।"

यह देख पाना कठिन नहीं है की व्यवहार में सामान्यतः कोई स्वयं के पक्ष की स्थापना ऐसे क्यों नहीं करता। और फिर यह तो अधिकतम कारणों/ बाधक कारणों की जटिलता वाला उदाहरण भी नहीं है। और फिर चर्चा का उद्देश्य स्वरोजगार में कैसे अधिक लाभ प्राप्त करें वह जानना नहीं अपितु हफ्ता वसूली (अन्यायपूर्ण वातावरण) से होने वाली हानि देखना है।

उदाहरण ३।
मान लो की घडे की मजबूती (कार्य-साध्य) तीन कारणों पर आधारित है।

मिट्टी का प्रकार
घडा बनाने की प्रक्रिया
घडा पकाने की प्रक्रिया

अब इन तीनों कारणों (प्रत्येक कारण भी अनेक कारणों से बना समूह है) का कार्य पर पडने वाला प्रभाव देख पाना विशेष ज्ञान का विषय है। जिससे यहां प्रसङ्गसमा और दृष्टान्तसमा दोनों के लिए जगह बन सकती है।

३। वादी : इस घडे की मजबूती का कारण उसका चिकनी मिट्टी* से बना होना (भी) है। चिकनी मिट्टी* घडे को मजबूती देती है इसलिए। जैसे वो घडे में जो हमने पिछले वर्ष लिया था। (साधन : चिकनी  मिट्टी साध्य : घडे की मजबूती) * यहां जो भी मिट्टी सर्वश्रेष्ठ हो मजबूती के लिए उसे समझ ले।

प्रसङ्गसमा
प्रतिवादी : पर चिकनी मिट्टी से घडा कैसे मजबूत बनता है यह तो आपने समझाया ही नहीं। 

यदि प्रतिवादी का उत्तर जाति के रूप में नहीं परंतु प्रश्न के रूप में हो तो इस के उत्तर में या तो वादी भिन्न भिन्न प्रकार की मिट्टी से मजबूती में अंतर कैसे आता है इस के विशेष ज्ञान से स्पष्टता करें (knowledge based answer) अथवा अन्य कारणों को स्थिर रखकर मात्र मिट्टी के प्रकार से क्या अंतर आता है इसके उदाहरणों से स्पष्टता करें। (जहां सीधा सीधा वस्तु के बारे में ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता न हो वहां indirect, statistics based, जिसको evidence based approach कहा जाता है वह भी लिया जा सकता है, लिया जाता है। परंतु किसी वस्तु को मात्र उदाहरणों से समझना वस्तु को तत्वतः समझने के बराबर कभी नहीं हो सकता तो जहां तत्वतः समझना शक्य हो वहां वही करना चाहिए।

दृष्टान्तसमा
प्रतिवादी : कल जो हमने घडा देखा था वह भी चिकनी मिट्टी से बना था पर वो तो मजबूत नहीं था।*

इस के उत्तर में वादी से अपेक्षित है की वह अन्य कारण जो भी मजबूती पर प्रभाव दिखाते है उनके कारण से ऐसा था वह समझाए।

पर यदि प्रतिवादी, जो की वादी के सत्य पक्ष में दोष/अपूर्णता दिखा रहा है वह यह समझ ले की उस प्रथम दृष्ट्या दिखने वाला  दोष/अपूर्णता वादी का खंडन करने में और स्वयं को जीत दिलाने में समर्थ है और उस तरह प्रस्तुति करें जहां वादी से कोई उत्तर की अपेक्षा न हो तब वह जाति कहलाएगा।

*सही प्रतिदृष्टांत होगा मजबूत घडा जो मात्र अन्य कारणों से उतना मजबूत नहीं हो सकता था परंतु चिकनी मिट्टी से नहीं बना था।  - यदि ऐसा दृष्टांत मिलता है तब व्याप्ति असिद्ध बनेगी। 

यदि वादी यह कहता की अन्य कारणों को स्थिर रखें तो अन्य मिट्टी से बना घडा इतना मजबूत नहीं हो सकता तो अब इसका ऐसा प्रतिदृष्टांत नहीं बनेगा जो व्याप्ति को खंडित न करें।


व्यवहार में विस्तृत रणनीति के भाग रूप जाति प्रयोग

जातिवादी के लिए यह लाभदायक परिस्थिति होती है जब वह स्वयं को वाद में प्रवृत्त दिखा सके। इसका अर्थ यह भी है की उसके लिए यह लाभकर है की वह वादी के पक्ष का खंडन स्पष्टता की अपेक्षा से किया गया प्रश्न हो ऐसे करें न की चर्चा जीतने के दावे की भांति। परंतु ऐसा करने से वादी उत्तर दे देगा और बात वहीं के वहीं आ जाएगी। तो जातिवादी के लिए जो प्रक्रिया जितनी जटिल है उससे उसको अधिक जटिल बना देना/कम जटिल दिखना इन जातियों का प्रयोग करने की (अथवा हेत्वाभास से स्थापना करने की) पूर्व तैयारी का कार्य है।

जातिवादी प्रक्रिया को जितनी अधिक जटिल दिखाने में सफल होगा उतना ही वादी को हेतु के हेतु में खिंचता जाएगा। ऐसे ही जटिल प्रणाली को ऐसी सरल दिखाना जैसी वह है नहीं उससे दृष्टांतसमा के प्रयोग में सरलता होगी।

व्यवहार में हम सीधी सरल बातों की ऐसी प्रस्तुति देखते ही है जहां अनेक व्याप्ति रहित कारणों और उनके काम करने की प्रक्रिया का एक जटिल जाल बुना जाता है और सटीक ज्ञान, सत्य, कार्य के साथ व्याप्ति रखने वाले कारणों को कोने में धकेल देने का प्रयत्न होता है।  



तो दूसरी तरफ असंख्य कारणों वाली जटिल प्रणालियों के अधिकतर कारणों को अनदेखा कर दिया जाता है और बाकी के कारणों का एक अल्प अंश पूर्ण के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है। (प्रतिरक्षा तंत्र उनकी दृष्टि से भी अत्यंत सशक्त और बहुआयामी प्रणाली है, पर सहूलियत के हिसाब से उसे antibody (जो रक्षा के बदले विध्वंस भी कर सकते है) में समेट लिया जाता है।)

और सोचो के यदि जातिवादी के लिए स्वयं को वादी दिखाना लाभदायक है तो वादी को जातिवादी दिखाना कितना लाभदायक होगा। इन दो जाति को हेतु का हेतु मांगते रहना और जटिल प्रक्रिया से होने वाला कार्य कोई एक ही कारण से होता है ऐसा कहना के रूप में पहचान लिया जाता है। अब यदि वह वादी को हेतु के हेतु मांगने पर अथवा जटिल लगने वाले कार्य को प्रतिदृष्टांत के बल पर असिद्ध करने के लिए प्रेरित करें तो? जैसे एक असत् हेतु को सत सिद्ध कर के उसके ऊपर अनेक अन्य हेतु की परतें चढा कर किया जा सकता है

जैसे कोई १ को गलत तरीके से सिद्ध घोषित कर दे। और १ को सिद्ध मानते हुए २ की सिद्धि करें, २ को मानते हुए ३ की, ३ को मानते हुए ४ की। यहां दोष १ की सिद्धि में ही है, २,३ ४ की सिद्धि की प्रक्रिया में नहीं (परंतु वे है तो उतने ही दोषपूर्ण जितना १ क्योंकि उसी पर आधारित है।)

अब जब पूर्वपक्षी ४ को सिद्ध करने के लिए अपने पक्ष की स्थापना करता है और ३ को हेतु के रूप में देता है तो वादी उस हेतु पर आपत्ति कर सकता है। पूर्वपक्षी ३ को २ और २ को १ से सिद्ध कर सकने की क्षमता रखता है और उस प्रक्रिया में वादी के ऊपर प्रसंगसमा जाति प्रयोग करने का आरोप लगा सकता है।

इसके उत्तर में वादी अभ्युपगम से सीधा १ पर प्रश्न कर सकता है अथवा १ प्रतिवादी के अधिकरण सिद्धांत में आता है यह दिखाकर उसे खंडित कर प्रतिवादी के हेतुओं की नींव तोड सकता है।
 
इसका एक उदाहरण हमें  money laundering में देखने को मिलता है।*


यहां एक चरण में गलत रीति से प्राप्त पैसे को योग्य रीति से प्राप्त किया हुआ सिद्ध कर दिया जाता है और फिर उसके ऊपर अनेक योग्य रीति के हस्तांतरण जैसा लगने वाली परतें चढा दी जाती है। बाद में अनेक परतों वाला सिद्धांत - की वह पैसे योग्य रीति से प्राप्त किए गए है सामने लाया जाता है।

* यह उदाहरण जातिवादी का अप्राप्यसमा का प्रयोग करने जैसा भी लग सकता है। मैंने उसे वादी को प्रसंगसमा का दोषी दिखाने के लिए किया गया प्रयोग इस दृष्टि से लिखा है की यहां बीच की परतें दिखाई देती है/उन्हें सिद्ध हेतुओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है न की छुपाई गई है/अप्राप्य कारणों के रूप में नहीं प्रस्तुत की गई। (परंतु हो सकता है यह अप्राप्यसमा का ही अधिक योग्य उदाहरण बनें क्योंकि एक तरह से यहां भी जो है (illegal money) उसके अभाव की ही सिद्धि है और कारणों के वैविध्य का आश्रय नहीं लिया मात्र कारण कार्य के बीच की प्राप्ति को धुंधला किया गया है।