गुरुवार, 4 अगस्त 2022

जाति लक्षण ५.१.१-३

प्रथम अध्याय में हमने न्यायदर्शन के सोलह पदार्थों में से चौदह पदार्थों के विभाग सहित लक्षण देखे। पांचवें अध्याय में अब हम बाकी की दो पदार्थ जाति और निग्रहस्थान के लक्षण देखेंगे।

जाति का सामान्य लक्षण हमने प्रथम अध्याय में इस प्रकार देखा था।

"साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः। १.२.१८
(व्याप्ति के अभाव में भी) केवल कुछ साधर्म्य अथवा वैधर्म्य को लेकर जो प्रत्यवस्थान (दोष निरूपण) किया जाता है वह जाति है।"

और यह की उसके २४ भेद हो सकते है।

प्रथम सूत्र में इन २४ भेदों का उद्देश किया गया है।

साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविकल्पसाध्यप्राप्त्यप्राप्तिप्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तानुत्पत्तिसंशयप्रकरणहेत्वर्थापत्त्यविशेषोपपत्त्युपलब्ध्यनुपलब्धिनित्यानित्यकार्यसमाः। ५.१.१

साधर्म्यसमा वैधर्म्यसमा उत्कर्षसमा अपकर्षसमा वर्ण्यसमा अवर्ण्यसमा विकल्पसमा साध्यसमा प्राप्तिसमा अप्राप्तिसमा प्रसङ्गसमा प्रतिदृष्टान्तसमा अनुत्पत्तिसमा संशयसमा प्रकरणसमा हेतुसमा अर्थापत्तिसमा अविशेषसमा उपपत्तिसमा उपलब्धिसमा अनुपलब्धिसमा नित्यसमा अनित्यसमा कार्यसमा ये २४ जाति के भेद है। 

जाति स्त्रीलिंग शब्द होने से इन भेदों के नाम के साथ जाति जोडने पर इन्हें 'समा' कहा जाएगा पर यदि हम जाति के स्थान पर प्रतिषेध शब्द उपयोग में लाते है तब 'सम' जोडेंगे। साधर्म्यसम प्रतिषेध, वैधर्म्यसम प्रतिषेध ऐसे।

दूसरे सूत्र में प्रथम दो भेद साधर्म्यसमा तथा वैधर्म्यसमा के लक्षण दिए है। 

साधर्म्यवैधर्म्याभ्यामुपसंहारे तद्धर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्यवैधर्म्यसमौ। ५.१.२

साधर्म्य वैधर्म्य से वादी द्वारा उपसंहार करने पर साध्य धर्म से विरुद्ध धर्म के साधर्म्य वैधर्म्य मात्र से (व्याप्ति न होते हुए भी) साध्य का अभाव दिखाने का प्रयत्न साधर्म्यसमा तथा वैधर्म्यसमा जाति है।

इस को देखने से पहले हम प्रकरणसम हेत्वाभास (जिसे सत्प्रतिपक्ष भी कहा जाता है) को एक बार याद करते है।

वहां जिस प्रकरण के कारण अनिर्णय की स्थिति बनी हुई थी उसी को हेतु बनाकर प्रस्तुत करने का प्रयत्न था। जैसे यदि एक भी पक्ष को सिद्ध करने का प्रमाण न होने से संशय उत्पन्न हुआ हो और यह हेतु देना की प्रतिपक्ष असिद्ध है। ऐसे ही यह भी हो सकता है की दोनों पक्ष से कुछ कुछ (व्याप्ति रहित) साधर्म्य वैधर्म्य हो और संशय का कारण दोनों पक्ष के धर्म का दिखना हो। तब ऐसे धर्म को साधन धर्म नहीं बना सकते।

हमने पहले एक बार चमगादड़ का उदाहरण लिया था। उसमें पंख होने से नभचरों के साथ साधर्म्य था पर स्तनधारी होने से वैधर्म्य। अब इन्हीं धर्मों को उसके नभचर होने अथवा न होने के हेतु बनाने से निर्णय नहीं होगा। वह इस लिए की यदि एक को हेतु माने तब विरोधी धर्म को भी हेतु मानना पड़ेगा क्योंकि उसमें भी समान बल है। जिससे उसे सत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास भी कहा था।

अब यदि यही गलती स्थापना समय पर नहीं अपितु उत्तर देने समय की जाती है तब उसे साधर्म्यसमा अथवा वैधर्म्यसमा जाति कहेंगे।

जैसे वादी ने कहा शब्द अनित्य है। उत्पत्ति धर्म वाला होने से। स्थाली के समान। अब यदि प्रतिवादी कहे की स्थाली में स्पर्श गुण है और वह अनित्य है तो शब्द स्पर्श गुण से रहित होने पर नित्य होना चाहिए। यहां उसका तात्पर्य है की कोई एक गुण के वैधर्म्य मात्र से निर्णय हो सकता है। पर उसकी ही बात के अनुसार फिर कोई अन्य गुण के साधर्म्य से भी निर्णय हो सकता है। प्रतिवादी के खंडन में कोई विशेष हेतु नहीं है।

यहां उदाहरण में वादी के स्थापना में जो हेतु प्रस्तुत किया है वह व्याप्ति सहित था। परंतु यदि वह हेतु अशुद्ध भी होता अर्थात् हेत्वाभास भी होता तब भी यदि प्रतिवादी उस हेत्वाभास को दिखाने के बदले खंडन में अपनी यही दलील प्रस्तुत करता तब वह जाति ही कहलाती। क्योंकि यदि वादी ने कोई गलत बात की है तो उसका खंडन उसकी गलती दिखाकर करना चाहिए ना कि स्वयं वही गलती दोहरा कर।

एक और उदाहरण लेते हैं। यद्यपि वह शास्त्रीय उदाहरण नहीं है परंतु हम इससे जाति को समझने का प्रयत्न कर सकते हैं।

मान लो कोई स्कूल की प्रबंधन सभा में इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि श्याम को प्रवेश मिलना चाहिए अथवा नहीं। अब एक सदस्य यह कहता है कि श्याम को प्रवेश मिलना चाहिए क्योंकि वह उसके मित्र का बेटा है, जैसे राम, जिसको प्रवेश मिला है और उसके पिता भी प्रथम सदस्य के मित्र है। तब दूसरा सदस्य यह कहकर प्रतिषेध करता है कि राम उसकी पत्नी द्वारा संचालित प्रशिक्षण वर्ग में जाता है और उसको प्रवेश मिला है पर श्याम उन वर्गों में नहीं जाता है तो उसको प्रवेश नहीं मिलना चाहिए। (अथवा तो ऐसा ही कोई अन्य कारण जैसे राम के पिता से तो उसकी मित्रता है पर श्याम के पिता से अनबन)

अब यहां यदि प्रतिवादी प्रथम सदस्य की बात को यह कह कर खंडित करता की बच्चे के पिता का सदस्य का मित्र होना कोई हेतु नहीं है तब तो प्रथम सदस्य की पराजय हो सकती थी। परंतु जब प्रतिवादी स्वयं बच्चे के पत्नी के classes में जाने को अथवा उसके पिता से अपने संबंध को बच्चे के प्रवेश के निर्णय का आधार बनाकर प्रस्तुत करता है तब वह प्रथम सदस्य की बात का भी एक प्रकार से अनुमोदन ही करता है (अर्थात् उसके प्रतिषेध में वादी के हेतु से भिन्न कोई विशेष हेतु नहीं है।) इसलिए अब उसका यह उत्तर जाति में आएगा।

ध्यान रहे कि दूसरे सदस्य का उत्तर जाति कहलायेगा या नहीं इसका आधार प्रथम सदस्य ने क्या कहा है उस पर नहीं है न ही इस बात पर की दूसरे सदस्य का साध्य वास्तव में सही है अथवा नहीं।

मान लो प्रथम सदस्य ने सद हेतु दिया होता जैसे कि बच्चे को प्रवेश मिलना चाहिए क्योंकि वह प्रवेश योग्यता के मापदंडों पर पूरा उतरता है उसके उत्तर में भी यदि प्रतिवादी ने प्रतिषेध में वह दलील दी होती जो उसने दी हैं तब भी वह उत्तर जाति कहलाता।

और मान लो श्याम प्रवेश योग्यता के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता है अर्थात् उसको प्रवेश नहीं मिलना चाहिए। तब भी यदि प्रतिवादी की दलील योग्यता को छोडकर राम के अन्य कोई धर्म के वैधर्म्य पर आधारित है तो वह वैधर्म्यसमा जाति ही कहलाएगी।

ऐसे व्याप्ति रहित असत् प्रतिषेध जब उदाहरण के कोई धर्म के साधर्म्य से किया जाता है तब वह साधर्म्यसमा जाति और जब उदाहरण के कोई धर्म के वैधर्म्य से किया जाता है तब वह वैधर्म्यसमा जाति कहा जाता है।

साधर्म्यसमा वैधर्म्यसमा जाति का प्रतिवादी द्वारा उपयोग होने पर उसको दिखाने के लिए दिया जाने योग्य उत्तर तीसरे सूत्र में है। 

गोत्वाद्गोसिद्धिवत्तत्सिद्धिः। ५.१.३

(गोत्वादत्) गोत्वहेतुसे (गोसिद्धिवत्) गो की सिद्धि के समान (तत्सिद्धिः) साध्य की सिद्धि होती है। (अर्थात् केवल सद्हेतु से साध्य की सिद्धि होती है)

यह गौ है उसका निश्चय गौ प्राणी के गोत्व से होता है उसके सींग, सास्ना, कुबड आदि व्यभिचारी लक्षणों से नहीं। केवल कोई एक धर्म के समान होने से अन्य सारे धर्म समान नहीं हो जाते न ही एक धर्म के विपरीत होने से सारे विपरीत।

हमारे चमगादड वाले उदाहरण में भी उसके नभचर होने न होने का निश्चय उसकी नभचारिता (आशा रखती हूँ की यह शब्द है) / वह उडता है अथवा नहीं उस पर ही निर्भर है। या तो उसे प्रत्यक्ष उडता देखें, किसी ने देखा हो उससे जाने अथवा उसके ऐसे स्थानांतरण जो बिना उडे करना संभव न हो को देखकर अनुमान प्रमाण से जाने। मात्र उसके पंख अथवा उसके स्तनधारी होने से निश्चय नहीं होगा।

ऐसे ही शब्द का उत्पत्ति धर्म उसके अनित्यत्व को सिद्ध करेगा पर उसका स्पर्श रहित होना अथवा ऐसे ही कोई धर्म से साधर्म्य वैधर्म्य से नहीं जिसकी नित्यत्व अनित्यत्व के साथ व्याप्ति न बनती हो।

शनिवार, 23 जुलाई 2022

साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः। १.२.१८, विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम्। १.२.१९, १.२.२०

साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः। १.२.१८

(व्याप्ति के अभाव में भी) केवल कुछ साधर्म्य अथवा वैधर्म्य को लेकर जो प्रत्यवस्थान (दोष निरूपण) किया जाता है वह जाति है। 

जैसे वादी ने यह कह कर अपने पक्ष की स्थापना की, "शब्द अनित्य है, उत्पत्ति धर्म वाला होने से, जो जो उत्पत्ति धर्म वाला होता है वह वह अनित्य होता है, जैसे स्थाली।" यहां वादी ने उत्पत्ति धर्म और नित्यत्व के बीच की व्याप्ति जो विद्यमान है उसके बल पर हेतु प्रस्तुत किया है और स्थाली को उदाहरण के रूप में इस लिए प्रस्तुत किया है क्योंकि वह इन दोनों धर्मों को लिए हुए है। अब यदि प्रतिवादी यह कहे की स्थाली को स्पर्श किया जा सकता है और वह अनित्य है तो शब्द जिसको स्पर्श नहीं किया जा सकता वह नित्य होना चाहिए तो यह जाति का प्रयोग होगा। उसने उदाहरण में से किसी धर्म को पकडा और उसे साध्य के साथ जोड दिया जब की उस धर्म की साध्य के साथ व्याप्ति बनती ही नहीं।

जाति क्योंकि गलत तरीके से किए गए खंडन का नाम है इस लिए वह हमेशा उत्तर देने के समय ही होगी। (मान लो कोई पक्ष स्थापना के समय स्थाली के स्पर्श धर्म से शब्द को नित्य सिद्ध करने का प्रयास कर रहा होता तब उसे जाति नहीं कहते परंतु वह हेत्वाभास कहा जाता।)

नव्य में असत् उत्तर को जाति कहा गया है।  

विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम्। १.२.१९

(विप्रतिपत्ति) विरुद्धज्ञान से कथन कर देना (अनुचित/गलत/नियम विरुद्ध कथन करना) अथवा (अप्रतिपत्ति) अज्ञानता वश चुप रह जाना (बात को समझ न पाना/ समझा न पाना) निग्रहस्थान है।

निग्रहस्थान पराजय के स्थान है। जहां पहुंचकर निंदा और हार का सामना करना पडे अर्थात् जिस स्थान पर प्रतिपक्षी दूसरे पक्ष को निश्चित रूप से पकड में ले लेता है वह निग्रहस्थान है। स्वयं के पक्ष में दिखाए गए दोषों के उद्धार में निष्फलता अथवा प्रतिपक्षी के स्थापित पक्ष का खंडन कर पाने की असमर्थता  (अप्रतिपत्ति) निग्रहस्थान में पहुंचाते है।

पूर्व के दो सूत्र में न्यायदर्शनकारने जाति तथा निग्रहस्थान के लक्षण बताए है पर विभाग नहीं। तो क्या इनके विभाग है ही नहीं (जैसे दृष्टांत के विभाग नहीं थे) अथवा है? इसका उत्तर सूत्रकार अगले सूत्र में देते है।

तद्विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थानबहुत्वम्। १.२.२०

(तद्विकल्पात्) उनके (साधर्म्य,वैधर्म्य से खंडन के, विप्रतिपत्ति, अप्रतिपत्ति के) अनेक प्रकार होने से (जातिनिग्रहस्थानबहुत्वम्) जाति तथा निग्रहस्थान के अनेक भेद हो जाते है।

साधर्म्य तथा वैधर्म्य के विकल्प से जाति के २४ विभाग हो जाते है और विप्रतिपत्ति तथा अप्रतिपत्ति के विकल्प से निग्रहस्थान के २२।

न्यायदर्शन में वैसे तो पदार्थों को उद्देश लक्षण तथा परीक्षा क्रम से लिया गया है परंतु जाति तथा निग्रहस्थान के लिए ऊपर के एक एक उनके लक्षण के सामान्य सूत्र ही दिए गए है, अन्यों की भांति विभाग तथा उनके लक्षण यहां प्रथम अध्याय में नहीं दिए गए। इस के बाद द्वितीय अध्याय में परीक्षा प्रकरण प्रारंभ हो जाएगा और इन दोनों के विभागों को अंत में पाँचवें अध्याय में लिया गया है।

इस के साथ प्रथम अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त होता है।


[मैं यहां से आगे क्रम तोडते हुए प्रथम अध्याय के पश्चात पाँचवें अध्याय को लेने का विचार रखती हूँ जिससे हम सारे सोलह पदार्थ को एक बार एक स्तर पर जान ले। वैसे भी भले ही वाद में प्रवृत्त तत्वज्ञानप्राप्ति के लिए प्रयासरत समूह के लिए जाति, निग्रहस्थान अल्प महत्व रखते है परंतु आज के परिप्रेक्ष्य में जहां हमारे चारों तरफ जल्प वितंडा अधिक और वाद कम ही दिखाई देता है, हमारे लिए इन की जानकारी इतना अल्प महत्व नहीं रखती सो उनको अंत में न लेते हुए, प्रथम १४ पदार्थ जिनके लक्षण हमने देख लिए है, उनके तुरंत बाद ही हम आगे देखेंगे।]

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

सम्भवतोऽर्थस्यातिसामान्ययोगादसम्भूतार्थकल्पना सामान्यच्छलम्। १.२.१३, १.२.१४-१७

सम्भवतोऽर्थस्यातिसामान्ययोगादसम्भूतार्थकल्पना सामान्यच्छलम्। १.२.१३

(सम्भवतः) संभव हो सकने वाले (अर्थस्य) अर्थ का (अतिसामान्ययोगात्) अति सामान्य के साथ संबंध जोडकर (असम्भूतार्थकल्पना) असंभव अर्थ की कल्पना कर लेना (सामान्यच्छलम्) सामान्य छल है।

किसी के ऐसे वक्तव्य को जिसमें संभावना मात्र कही गई है उसको निश्चितता जताकर (संभावना को शत प्रतिशत के स्तर पर कल्पित कर कर) वक्ता खंडन करना यह सामान्य छल है।

जैसे किसी ने कहा की यह नवयुवक अत्यंत कार्यकुशल और प्रतिभावान है। तो दूसरे ने समर्थन में प्रशंसा के भाव से कहा की वह युवक ऐसा हो सकता है आईआईटी से जो पढा हुआ है। अब यदि कोई इस बात का खंडन यह कह कर करें की आईआईटी से पढकर निकालने वाला प्रत्येक नवयुवक ऐसा ही कार्यकुशल और प्रतिभावान होता है ऐसा आपका मन्तव्य प्रत्यक्ष से विरुद्ध होने से आप की बात जूठी है तब यह सामान्य छल का प्रयोग है। वक्ता ने आईआईटी से पढे और प्रतिभावान होने के बीच में साधन साध्य का संबंध नहीं कहा था मात्र उन दोनों धर्मों की सहचारिता की संभावना प्रशंसा के भाव से व्यक्त की थी।

दूसरा उदाहरण : किसी ने एक खेत को देखकर कहा की यहां अच्छा धान हो सकता है। अब यदि कोई इसका अर्थ यह निकालने लगे की वक्ता के अनुसार इस खेत में बिना बीज डाले ही धान उगेगा तो वह सामान्य छल का प्रयोग है।

एक विशिष्ट अर्थ में कही गई बात को जिस विशिष्ट वस्तु/व्यक्ति/संदर्भ में वह कही गई है उससे अलग कर अति सामान्य प्रत्येक वस्तु/व्यक्ति/संदर्भ के साथ जोड देना (जान बुझ कर असंभव अर्थ की कल्पना कर लेना) और फिर कहना की बात गलत है यह सामान्य छल है।


धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम्। १.२.१४

(धर्मविकल्पनिर्देशे) किसी एक अर्थ में कहे गए शब्द का (अर्थसद्भावप्रतिषेध) उससे विरुद्ध अर्थ को मानकर अर्थ की सत्ता का ही प्रतिषेध करना (उपचारच्छलम्) उपचार छल है।

शब्द कई बार उनके यथार्थ शब्दार्थ के उपरांत के अर्थ को कहने के लिए भी प्रयुक्त होते है। ऐसे भिन्न भिन्न उपयोग उस शब्द के धर्म विकल्प कहलायेंगे। अब वक्ता ने शब्द को कोई एक धर्म विकल्प में प्रयोग किया परंतु उन वैकल्पिक प्रयोग को अमान्य कर अर्थ की सत्ता हो ही नकार देना उपचार छल है।

जैसे कोई गाडी में जा रहे व्यक्ति ने कहा की दिल्ली आ गया है। और दूसरा कहे की आप की बात असत्य है। दिल्ली थोडा अपना स्थान बदलकर आता जाता है, हमारी गाडी दिल्ली या गई है। तो यह उपचार छल का प्रयोग है।

यह सत्य होते हुए भी की दिल्ली आता जाता नहीं है, क्योंकि व्यवहार में दिल्ली आ गया है कहा ही जाता है ऐसा कहने का शब्द के यथार्थ अर्थ का हवाला देते हुए खंडन करना उपचार छल बनेगा।

ऐसे ही किसी शब्द का आलंकारिक प्रयोग हुआ हो और निर्दिष्ट आलंकारिक अर्थ की सत्ता को शब्द के मूल अर्थ को लेकर अस्वीकार कर देना भी उपचार छल की कोटि में आएगा।

मुख्य बात यह है की वक्ता के तात्पर्य को अनदेखा कर शब्दों की चतुराई से खंडन पर उतर आना छल है।  

छल का उपयोग दोषपूर्ण तथा निंदनीय माना जाता है। ऐसे में हमें स्वयं ऐसे प्रयोगों से बचना चाहिए और यदि प्रतिपक्ष छल प्रयोग कर रहा है तो हमें हमारे तात्पर्य की स्पष्टता को सामने रखना चाहिए जिससे उसकी छल प्रवृत्ति सामने आ जाए।


छल परीक्षा 

न्यायदर्शन में प्रत्येक पदार्थ का पहले उद्देश किया गया है उसके पश्चात लक्षण तथा अंत में परीक्षा। पदार्थ के जो लक्षण किए है वह पूर्ण तथा त्रुटि रहित है अथवा नहीं इस की गहराई से जांच करना परीक्षा है। अब तक हम मात्र लक्षण को देखते आए है परीक्षा बाद में आएगी। परंतु छल के विषय में परीक्षा प्रकरण अत्यंत अल्प होने से सूत्रकार ने उसे छल के लक्षण के उपरांत ही ले लिया है। अगले तीन सूत्र छल परीक्षा के है।

सूत्रकार ने छल के तीन प्रकार बताए है उस पर शिष्य जिज्ञासा करता है (अगला सूत्र)।

वाक्छलमेवोपचारच्छलं तदविशेषात्। १.२.१५

वाक्छल ही उपचार छल है दोनों सामान होने के कारण। 

शिष्य का कहना है की वाक्छल और उपचार छल दोनों सामान ही है। दोनों में वक्ता शब्द का प्रयोग गौण अर्थ में करता है और प्रतिपक्षी उसका खंडन शब्द के अन्य अर्थ को ले कर करता है। तो उसे भिन्न प्रकार क्यों मना जाए? इन दोनों को एक ही मानना चाहिए।

सूत्रकार उत्तर देते है।

न तदर्थान्तरभावात्। १.२.१६

नहीं, उन दोनों में भेद होने के कारण।

दोनों छल में भिन्नता है। जहां वाक्छल में भिन्न अर्थ की कल्पना की जाती है, उपचार छल में अर्थ की सत्ता को ही नकार दिया जाता है।

आगे सूत्रकार कहते है, 

अविशेषे वा किञ्चित्साधर्म्यादेकच्छलप्रसङ्गः। १.२.१७

भेद को न मानने पर तो थोडी सी समानता से एक ही छल को मानने का प्रसंग प्राप्त हो जाएगा। 

यदि दो प्रकार में कुछ समानता होने से उनको एक मान लिया जाए तब तीनों में थोडी समानता होने से छल के दो भी प्रकार नहीं बनेंगे और मात्र एक प्रकार में ही सारे छल समाविष्ट हो जाएंगे।

विषय को ठीक समझने के लिए सूत्रकार ने तीन प्रकार उपयुक्त समझे है सो निर्दिष्ट किए है और उन सब में थोडी भिन्नता है तो उसे उसी तरह से समझना उपयोगी होगा।

रविवार, 17 जुलाई 2022

वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या छलम्। १.२.१०, १.२.११, १.२.१२

हेत्वाभास के लक्षण देखने के पश्चात हम क्रम प्राप्त पदार्थ छल के लक्षण देखेंगे।

वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या छलम्। १.२.१०

(वचनविघातः) अन्य की बात का विघात करना (काटना) (अर्थविकल्पोपपत्त्या) उसके तात्पर्य से विरुद्ध अर्थ में उसे ले कर  (छलम्) छल है।

जब कोई शब्द के वक्ता द्वारा निहित अर्थ को छोडकर अन्य ही कोई अर्थ का निरूपण उसके शब्दों में कर के फिर उस बात का खंडन करता है तब वह छल है।

चर्चा में जब कोई वाद छोडकर जीतने की इच्छा से ग्रसित हो जाता है और स्वपक्ष की रक्षा अथवा प्रतिपक्ष के खंडन का कोई सत्य मार्ग नहीं दिखता तब वह छल का आश्रय भी ले लेता है। यदि उसका छल पकडा नहीं जाता है तब वो चर्चा में बना रह सकता है परंतु छल के पकडे जाने पर वह निग्रहस्थान में आ जाएगा अर्थात् हार जाएगा।

अधिकतर छल का उपयोग प्रतिपक्ष के खंडन के लिए होता है पर उसे प्रतिपक्ष द्वारा किए गए स्वपक्ष के खंडन को काटने और स्वपक्ष की रक्षा के उपयोग में भी लाया जाता है।

छल के विभाग तथा उन विभागों के लक्षण के सूत्र आगे है तो उनको उदाहरण सहित उन सूत्रों के अंतर्गत देखेंगे। 

तत्त्रिविधं वाक्छलं सामान्यच्छलमुपचारच्छलं च। १.२.११

(तत्) वह छल (त्रिविधं) तीन प्रकार का है (वाक्छलम्) वाक् छल (सामान्यच्छलम्) सामान्य छल (च) तथा (उपचारच्छलम्) उपचार छल।   

वाक् छल का लक्षण अगले सूत्र में।

अविशेषाभिहितेऽर्थे वक्तुरभिप्रायादर्थान्तरकल्पना वाक्छलम्। १.२.१२

(अविशेषाभिहिते) सामान्य रूप से कहे गए (अर्थे) अर्थ में (वक्तुः) वक्ता के (अभिप्रायात्) अभिप्राय से (अर्थान्तरकल्पना) भिन्न अर्थ की कल्पना (वाक्छलम्) वाक् छल है।

वाक्य में कई बार कई शब्द ऐसे होते है जिनके एक से अधिक अर्थ होते है। ऐसे किसी शब्द का वह अर्थ करना जो वक्ता का अभिप्राय नहीं था (जो प्रसंग से पता चल जाता है) और फिर वह भिन्न अर्थ जो प्रसंग से मेल नहीं खाता उसे लेकर वक्ता का खंडन करना वाक् छल है।

जैसे की किसी ने कहा की यह बालक नवकम्बल वाला है (नवकम्बलोऽयं माणकः)। वक्ता का तात्पर्य है की इस बालक के पास नया कंबल है। अब कोई यह कह कर खंडन करे की आप गलत कह रहे हो इस बालक के पास तो एक ही कंबल है नव (नौ-९) कंबल कहाँ है? तब यह वाक् छल का प्रयोग है।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

साध्याविशिष्टः साध्यत्वात्साध्यसमः। १.२.८, कालात्ययापदिष्टः कालातीतः। १.२.९

साध्याविशिष्टः साध्यत्वात्साध्यसमः। १.२.८

(साध्याविशिष्टः) जो साध्य से अविशिष्ट हो-साध्य के सामान हो ऐसा हेतु स्वयं (साध्यत्वात्) साध्य कोटि में होने से (साध्यसमः) साध्यसम नाम का हेत्वाभास है।

हेतु में साधन धर्म की साध्य धर्म के साथ व्याप्ति दिखा कर साध्य धर्म सिद्ध करना होता है। यहां साधन धर्म स्वयं पहले से सिद्ध होना चाहिए (दोनों पक्ष उसे सिद्ध मानते हो ऐसा होना चाहिए)। यदि ऐसा हेतु दे दिया जिसका आश्रय अथवा स्वयं (साधन) अथवा व्याप्ति जिसे आधार रूप में प्रस्तुत किया गया है वही अभी साध्य कोटि में है तब ऐसे हेतु से साध्य धर्म को सिद्ध करना तो दूर, पहले तो उस हेतु को ही सिद्ध करना पडेगा। इस लिए जो स्वयं असिद्ध हो ऐसा हेतु शुद्ध नहीं रहता। ऐसे हेतु को साध्यसम हेतु कहते है। नव्य में इसे असिद्ध हेत्वाभास नाम से जाना जाता है।

यह साध्यसम (असिद्ध) हेत्वाभास तीन प्रकार का है। 

आश्रयासिद्ध : जिसका आश्रय ही असिद्ध हो। अर्थात् साध्यधर्म की सिद्धि जिसमें करनी है वह साध्य (पक्ष) ही सिद्ध न हो। जैसे किसी ने कहा आकाशकमल में सुगंध होती है (प्रतिज्ञा), कमल होने से (हेतु), भूमि के कमल के समान (उदाहरण)। अब यहां सिद्ध करने चले है आकाशकमल में सुगंध परंतु पहले आकाशकमल तो सिद्ध हो। जब आकाशकमल का ही ठिकाना नहीं तो सुगंध किसमें सिद्ध करेंगे।

स्वरूपासिद्धि : जो हेतु स्वरूप से असिद्ध है ऐसा हेतु देना। जैसे यह कहना की सरोवर में आग लगी है, धुआँ होने से। और धुआँ ही नहीं दिखाई दे रहा है। 

अथवा कोई कहे की छाया द्रव्य है, उसमें गति होने से। तब छाया जो प्रकाश का अभाव मात्र है जो प्रकाश को आवृत्त करने वाले द्रव्य की गति के कारण भिन्न भिन्न स्थान पर होता है उसमें गति होना ही असिद्ध है। और जब छाया में गति होना ही असिद्ध है तब वह छाया को द्रव्य सिद्ध करने का साधन कैसे बनेगी?
  
व्याप्तत्वासिद्ध : यह वह हेत्वाभास है जहां व्याप्ति जिससे साधन धर्म द्वारा साध्य धर्म को सिद्ध किया जाता है वही असिद्ध है। अर्थात् दोनों पक्ष इसी बात पर सहमत नहीं है की व्याप्ति है (अव्याप्ति नहीं है) और वह अव्यभिचारी है (अनैकांतिक नहीं है)।

जैसे कोई कहे की पर्वत पर धुआँ है, वहां अग्नि होने से। तो जहां जहां अग्नि होती है वहां वहां धुआँ होता है यह व्याप्ति अग्नि का धुएं के साथ ऐकांतिक संबंध न होने से व्यभिचारी है। जब व्याप्ति ही असिद्ध है तो वह हेतु भी सद् हेतु न होकर दुष्ट हेतु बनेगा।

(नव्य में व्याप्तत्वासिद्ध का लक्षण ऐसी व्याप्ति कहा है जिसको पूरा करने के लिए उपाधि (जो साधन में वर्णित भी नहीं है) की आवश्यकता है - जैसे जहां जहां अग्नि और आर्द्र ईंधन का संयोग होता है वहां वहां धुआँ होता है। यहां "आर्द्र ईंधन का संयोग" उपाधि है जिसके बिना व्याप्ति व्यभिचारी होगी।)

जिस भी व्याप्ति का विरुद्ध उदाहरण मिले वह अनैकांतिक है। (जिस व्याप्ति का एक भी उदाहरण न मिले वह अव्याप्ति है पर क्योंकि उदाहरण पंचावयव में अनिवार्य है यदि ऐसी व्याप्ति हुई तो पंचावयव पूर्ण नहीं हो पाएगा।)

कालात्ययापदिष्टः कालातीतः। १.२.९

समय के बीत जाने पर कहा गया हेतु/समय ने जिस हेतु को नष्ट कर दिया है, वह कालातीत हेत्वाभास है।

जैसे किसी ने कहा की अग्नि शीतल होती है, द्रव्य होने से, मिट्टी के समान। तो प्रतिपक्षी ने वहीं के वहीं अग्नि उत्पन्न कर उसको दिखाया की देखो क्या अग्नि शीतल है अथवा उष्ण। अब यदि प्रथम पक्ष फिर भी अपने उस हेतु को जो सीधा सीधा प्रत्यक्ष के विपरीत जा रहा है पकड रखें तब वह कालातीत हेत्वाभास है।

एक और उदाहरण लेते है। किसी बच्चे ने ऐसा कार्य किया जिससे किसी की हानि होती है। अब इस समय यह संशय हो सकता है की बच्चे ने ऐसा काम गलती से बिना सोचे समझे/उसकी बुद्धि वह हानि को देख पाने जितनी नहीं थी इस लिए किया अथवा उसने जान बुझ के वह हानि पहुंचाई। इस समय यदि एक पक्ष (अथवा बच्चा स्वयं) यह कहे की उसने हानि को देख नहीं पाने से उस कार्य को किया है तो वह आगे विचारणीय विषय होगा परंतु मानो उस हानि को देखने के उपरांत भी यदि बच्चा उसी कार्य को पुनः पुनः करता ही जाता है और वही हेतु देता रहता है तब वह हेतु हेत्वाभास मात्र ही है। क्योंकि उस काल के उस खंड ने जब हानि प्रत्यक्ष थी उस हेतु को अमान्य बना दिया है।

नव्य में इस हेत्वाभास को बाधित कहा गया है। (दिए गए हेतु का प्रत्यक्ष आदि अन्य बलवान प्रमाणों से साध्यकाल में बाधित हो जाना।)

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः। १.२.६, यस्मात्प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमपदिष्टः प्रकरणसमः। १.२.७

सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः। १.२.६

(सिद्धान्तम्) स्वयं के सिद्धांत को (अभ्युपेत्य) मानकर (तद्विरोधी) उसीका विरोध करने वाला हेतु (विरुद्धः) विरुद्ध नाम का हेत्वाभास है।

जब कोई ऐसा हेतु देता है जो स्वयं के ही पूर्व मान्य सिद्धांत को खंडित करता हो और वह हेतु देने वाले के पक्ष का वास्तव में समर्थन नहीं पर प्रतिषेध करता हो उसे विरुद्ध हेतु कहते है।

जैसे कोई सामने खडे पशु को गधा सिद्ध करना चाहता है। और हेतु देता है की "उसके सींग है इस लिए" तो यह विरुद्ध हेत्वाभास है।

विरुद्ध हेत्वाभास का एक उदाहरण मेरी तरफ से ..   
मान लीजिए की चौकीदार रखने से चोरी होने की संभावना निर्मूल हो जाती है यह किसी का एक पूर्व मान्य सिद्धांत है। उसने अथवा उसके आस पास में परंतु अब तक किसी ने चौकीदार रखा नहीं था न ही वहां चोरी होती थी। अब उसने एक बडी कीमत वाला चौकीदार रख लिया। चौकीदार रखने के बाद उसके वहां और आस पास में धड़ाधड़ चोरियाँ होने लगी।

अब यदि वह कहे की चौकीदार अच्छे से काम कर रहा है (प्रतिज्ञा), और हेतु दे की "इतनी चोरियाँ हुई की उसके घर में अब मात्र भारी सामान जैसे sofa, bed, table इत्यादि ही बचा हुआ है इस लिए।" तो यह विरुद्ध हेत्वाभास होगा।
(इस हेतु से उसका पक्ष सिद्ध भले ही ना हो पर उसे देखकर हम यह अनुमान कर सकते है की आगे वो ४-५ मुस्टंडे से और भी चौकीदार रखेगा बचे हुए भारी सामान की रक्षा के लिए।)


यस्मात्प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमपदिष्टः प्रकरणसमः। १.२.७

(यस्मात्) जिस से-जिस संशय के कारण से (प्रकरणचिन्ता) प्रकरण पर चिंतन चल रहा है (सः) उसीको (निर्णयार्थम्) निर्णय के लिए हेतु रूप में (अपदिष्टः) प्रस्तुत कर देना (प्रकरणसमः) प्रकरणसम हेत्वाभास है।

जिस विषय से संशय उत्पन्न हुआ है और चिंतन चल रहा है वही विषय को हेतु के रूप में प्रस्तुत कर देना प्रकरणसम हेत्वाभास है। जैसे शब्द में नित्यता अथवा अनित्यता का निश्चय न हो पाने से चिंतन चल रहा हो और उसमें एक पक्ष कहे की वह नित्य है और हेतु दें की "उसमें अनित्य धर्म के न होने से" तो यह कोई हेतु नहीं बनेगा क्योंकि उसमें नित्यत्व है अथवा अनित्यत्व यही तो संशय है (दोनों में से एक भी धर्म की प्राप्ति न देख पाने से)। नहीं तो यहां प्रतिपक्ष सामने उसी तरह का हेतु दे कर अपना पक्ष भी सिद्ध कर सकता है की शब्द अनित्य है, हेतु "उसमें नित्य धर्म के न होने से"।

एक उदाहरण मेरी तरफ से..
किसी ने सुना की शतावरी मातृत्वकांक्षिणी स्त्री के लिए और स्तनपान करा रही माता के लिए आरोग्य वर्धक औषध है। परंतु इस विषय में अधिक ज्ञान नहीं होने से उसने यह निश्चित जानना चाहा की क्या शतावरी लाभप्रद होगी अथवा हानिकारक। इस प्रकरण पर एक पक्ष जो एक ऐसी पत्रिका चलाता है जिसमें उनके सहचरों द्वारा अनुमोदित प्रमाण* प्रस्तुत होते है, उसने कहा की "शतावरी हानिकारक है", हेतु "शतावरी हानिकारक नहीं है ऐसा कोई प्रमाण (हमारी पत्रिका में) नहीं होने से।
 
यह प्रकरणसम हेत्वाभास होगा क्योंकि जिस विषय (प्रकरण) के लिए प्रमाण की खोज हो रही है उसी के प्रमाण के अभाव को हेतु बनाया गया है। यहां प्रतिपक्ष उसी प्रमाण के अभाव को इस तरह प्रस्तुत कर सकता है की शतावरी लाभप्रद है/हानिकारक नहीं है, हेतु "उसके लाभप्रद न होने का / हानिकारक होने का कोई प्रमाण न होने से"

*यहां इस उदाहरण में जिज्ञासु उस पत्रिका को आप्त वचन मान रहा है ऐसा जानना चाहिए।

प्रकरणसम हेत्वाभास में इस तरह से प्रमाण के अभाव को हेतु बनाने से प्रमाण का अभाव प्रतिपक्ष को भी सिद्ध करता है इस लिए उसे नव्य न्याय में (न्यायदर्शन में से निकली न्याय की शाखाओं में से एक, जो बहुत प्राचीन नहीं है) इसे सत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास नाम से कहा जाता है।

एक और उदाहरण जो पूर्व के समान ही है।
संशय है की factory में बनी कोई एक महेंगी वस्तु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है अथवा नहीं। यहां पत्रिका पक्ष कहता है की वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है, हेतु "वह वस्तु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ऐसा कोई प्रमाण न होने से"

(क्या आप देख सकते है की fact checkers सूत्रकार गौतम के समय से पूर्व भी अस्तित्व में थे।)

शनिवार, 9 जुलाई 2022

सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमसाध्यसमकालातीता हेत्वाभासाः। १.२.४, अनैकान्तिकः सव्यभिचारः। १.२.५

सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमसाध्यसमकालातीता हेत्वाभासाः। १.२.४

सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम, साध्यसम, कालातीत (यह पाँच प्रकार के) हेत्वाभास (जो हेतु जैसा आभास-प्रतीत हो रहा हो पर हेतु न हो) है।

इस सूत्र में हेत्वाभास के पाँच विभाग बताए गए है जिनके लक्षण आगे बताए जाएंगे और हेत्वाभास का मूल लक्षण शब्द के निर्वचन से ही पता चलता है। जो हेतु जैसा प्रतीत तो हो रहा हो पर हेतु के लक्षण से (साध्य को सिद्ध करने की साधकता-शक्ति से) रहित हो।

अनैकान्तिकः सव्यभिचारः। १.२.५

जो हेतु एक पक्ष में स्थिर न हो कर अनेक पक्षों की तरफ जाता है (अनेक अंत वाला होता है) उसे सव्यभिचार (व्यभिचार सहित) कहते है।

व्यभिचार = वि (विरुद्ध रूप से) अभी (चारों और से) चार (चर् धातु से, गति अर्थात् स्थिति का अभाव)। एक स्थिति, व्यवस्था में न टिक कर अव्यवस्थित रूप से यहां वहां गति व्यभिचार है। जिस हेतु में दर्शाया गया साधक धर्म मात्र साध्य धर्म के साथ ही नहीं परंतु (साध्य से विपरीत) अन्य धर्मों के साथ भी पाया जाता है वह हेतु जैसा लगता हुआ भी हेतु नहीं है क्योंकि वहां साधक धर्म मिलने पर यह नहीं कहा जा सकता की साध्य धर्म भी होगा ही (हो सकता है विरुद्ध धर्म भी हो)। यदि कोई पक्ष ऐसा हेतु प्रस्तुत करता है तब वह सव्यभिचार हेत्वाभास है।

जैसे कोई कहे की जहां आग है वहां आग होने से धुआँ भी है तो यह सव्यभिचार हेत्वाभास होगा क्योंकि जहां आग होती है वहां धुआँ हो भी सकता है अथवा नहीं भी हो सकता। उससे विपरीत जहां धुआँ होगा वहां आग भी होगी यह कहना दोष रहित हेतु होगा। 

ऐसे ही हमारे शब्द अनित्य है वाले उदाहरण में यदि कोई हेतु दें की "स्पर्श से रहित होने से" और उदाहरण दे "जैसे सुख दुख।" तो यह दुष्ट हेतु होगा क्योंकि भले ही,
१) शब्द अनित्य है,
२) सुख दुख भी अनित्य है,
३) शब्द और सुख दुख दोनों ही स्पर्श से रहित है,
यहां साधन साध्य धर्म के बीच की व्याप्ति त्रुटिपूर्ण है। स्पर्श गुण का अभाव अनित्य और नित्य दोनों प्रकार की वस्तु में देखा जा सकता है अर्थात् यहां दर्शाया गया साधन धर्म एकांतिक न होकर अनैकान्तिक, सव्यभिचार है। प्रतिपक्ष इस का खंडन विरुद्ध अंत वाले उदाहरण से कर सकता है जैसे आत्मा भी स्पर्श से रहित है पर वह नित्य है। प्रथम पक्ष को स्वयं के दिए गए हेतु के अनुसार अब शब्द को नित्य मानना पडेगा।

हेतु के लक्षण में कहा गया था की हेतु उदाहरण के साधर्म्य से साधन धर्म से साध्य धर्म की सिद्धि करने वाला होता है। यहां उदाहरण का अर्थ मात्र वह एक उदाहरण ही नहीं है जो पंचावयव में दिया जाता है। भले ही वहां मात्र एक उदाहरण दिया गया हो पर वह हेतु सारे शक्य उदाहरणों पर खरा उतरना चाहिए (अर्थात् महत्व व्याप्ति का है, एक उदाहरण का नहीं)। यदि एक भी अपवाद मिल गया तो हेतु दुष्ट कोटि में अर्थात् हेत्वाभास कोटि में आ जाएगा।

प्रश्न हो सकता है की तब फिर एक उदाहरण देने न देने से क्या अंतर आ जाएगा? तो वह आवश्यकता इस लिए बनाई है की कोई एकदम ही कल्पित हेतु न देने लगे (बेधडक गप हाँकने वाले हमेशा से प्रचुर मात्रा में मिलते होंगे) कम से कम एक उदाहरण तो हो। (और फिर उदाहरण से व्याप्ति को समझने में अधिक सुविधा भी रहती होगी कहीं कहीं।)

एक से अधिक उदाहरण क्यों नहीं? क्योंकि दो अथवा दस उदाहरण से भी फिर हेतु का वजन नहीं बढेगा क्योंकि उसे खंडित करने के लिए एक ही विरुद्ध उदाहरण पर्याप्त होगा।