मंगलवार, 5 जुलाई 2022

यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः। १.२.२, स प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा। १.२.३

यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः। १.२.२

(यथोक्तोपपन्नः) जैसा (वाद के लिए) कहा गया है उससे युक्त तथा (छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भः) जिसमें छल जाति निग्रहस्थान से स्व पक्ष का साधन तथा प्रतिपक्ष का प्रतिषेध होता है (जल्पः) वह जल्प है।

वाद के लिए कही गई बातें जल्प में भी है। यहां भी पक्ष प्रतिपक्ष पंचावयव से तथा तर्क तथा प्रमाणों के उपयोग से स्व पक्ष की सिद्धि और प्रतिपक्ष का खंडन करते है परंतु जल्प में वे छल जाति तथा निग्रहस्थान (जिनके लक्षण हम आगे देखेंगे)  का भी प्रयोग करते है जो वाद में नहीं होता। ऐसा इस लिए की जल्प में उद्देश्य हार जित का है सत्य तक पहुंचना नहीं। यहां न तो सामने वाले की त्रुटियाँ समझाई जाती है और न उसे वे त्रुटियाँ सुधारने का अवसर प्रदान किया जाता है। यदि उसकी त्रुटि पकडी गई तो उसे हारा हुआ घोषित कर दिया जाता है।

स प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा। १.२.३

(सः) वह जल्प (प्रतिपक्षस्थापनाहीनः) जब प्रतिपक्ष की स्थापना से रहित होता है तब (वितण्डा) वितण्डा कहा जाता है। 

जल्प में प्रवृत्त एक पक्ष यदि स्वयं के पक्ष की स्थापना किए बिना ही दूसरे पक्ष का खंडन किए जा रहा है तब उस कथा को वितण्डा कहेंगे। स्वयं के पक्ष की स्थापना (प्रतिज्ञा हेतु उदाहरण पूर्वक) न करने से वह उसके खंडन के लिए होने वाले आक्रमणों से स्वयं को बचाने का प्रयत्न करता है और स्वयं प्रतिपक्ष पर आक्रमण (छल आदि साधनों सहित) करने के लिए स्वतंत्र रहता है।

उसका स्वयं की पक्ष की स्थापना न करने का अर्थ यह नहीं है की उसका कोई पक्ष (सिद्धांत, प्रयोजन) नहीं है। प्रयोजन हीन तो कोई प्रवृत्ति होती नहीं। वह मात्र उसे सामने नहीं रखता जिससे स्वयं के सिद्धांत के खंडित होने से होने वाली हार से बचा जा सके। इस कारण से सूत्र में यह नहीं कहा की वितण्डा प्रतिपक्ष से रहित है परंतु यह कहा की वितण्डा प्रतिपक्ष की स्थापना से रहित है।

जल्प वितण्डा (और उसमें उपयोग में लिए जाने वाले छल आदि साधन) प्रयोग करने योग्य वस्तु नहीं है पर फिर भी इन का ज्ञान तत्वज्ञान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले और उसकी रक्षा करने वाले को होना आवश्यक है। एक तो, इनको जानकर यदि प्रतिपक्ष जल्प वितण्डा कर रहा है तो उसे समझकर उसके प्रहारों से सत्य और स्व पक्ष की रक्षा हो सकती है (तथा स्वयं प्रतिपक्ष के असत्य को सत्य मानने की भूल से बच सकते है) और यदि तत्वरक्षा करने का और कोई मार्ग न हो तो प्रतिपक्ष को उसके ही साधनों का उपयोग करते हुए परास्त किया जा सकता है।

[मेरे मत में यदि परिस्थिति उस हद तक खराब हुई मिले भी जहां सत्य की रक्षा के लिए सत्य पक्ष को जल्प वितण्डा का उपयोग करना पडे तो भी जीत के उपरांत प्रथम अवसर पर उसे वाद अनुकूल तर्कों और प्रमाणों से भी उसी सत्य को पुनः स्थापित (तथा प्रतिपक्ष को पुनः खंडित) करना चाहिए। जल्प वितण्डा से मिली विजय युद्ध के क्षण में तो कदाचित पराजय को रोक सकती है पर यदि उसे वाद अनुकूल तर्कों तथा प्रमाणों से सुदृढ नहीं किया गया तो वह क्षणिक जीत दीर्घकालीन हार में परिवर्तित हो जाएगी क्योंकि योग्य प्रमाणों के अभाव को (और जीते हुए पक्ष की जल्प प्रवृत्ति को) बाद में देख पाना सरल होगा और वह जीत और जीतने वाले के सिद्धांत पर से विश्वास को डिगाने वाला सिद्ध होगा। उस अविश्वास के बीच असत्य पक्ष के लिए पलटवार करना सरल होगा तथा सत्य प्रिय मनुष्य जो अभी स्वयं सत्य तक पूरा नहीं पहुँच पाए है उनके लिए सिद्ध पक्ष को अप्रामाणिक मानना स्वाभाविक होगा जिससे सत्य पक्ष की ही हानि होगी।]

शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः। १.२.१

जब अनुमान प्रमाण से किसी वस्तु के निर्णय पर पहुंचने के हेतु से चर्चा होती है उसे कथा (कथ वाक्यप्रबंधे) कहते है। यह कथा तीन प्रकार की होती है।
१। वाद जिसमें चर्चा का उद्देश्य सत्य तक पहुंचना है।
२। जल्प जिसमें हेतु चर्चा में स्वपक्ष के लिए विजय पाना मात्र है फिर चाहे वह सत्य तक पहुँचाए अथवा असत्य तक।
३। वितंडा जिसमें हेतु मात्र प्रतिपक्ष का खंडन है और स्वपक्ष की स्थापना भी नहीं करता वैतंडिक।

सूत्रकार वाद का लक्षण इस प्रकार करते है।

प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः। १.२.१

(प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः) प्रमाण तथा तर्क से जिसमें स्वपक्ष का समर्थन और प्रतिपक्ष का प्रतिषेध (उपालंभ) है, (सिद्धान्ताविरुद्धः) जिसमें स्व सिद्धांत के विरुद्ध बात नहीं कही जाती, (पञ्चावयवोपपन्नः) जो पंचावयव से युक्त है, (पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो) जिसमें परस्पर विरुद्ध सिद्धांतों को मानने वाले पक्ष तथा प्रतिपक्ष का ग्रहण किया गया है, (वादः) वह वाद नामक कथा है।

यहां परस्पर विरुद्ध सिद्धांतों को मानने वाले पक्ष प्रतिपक्ष है और दोनों ही स्वयं के पक्ष को स्थापित और प्रतिपक्ष को खंडित करने का प्रयास भी करते है पर यह प्रवृत्ति इस लिए है की दोनों ही स्वयं का पक्ष प्रामाणिक है ऐसा दृढता से मानते है और दोनों ही जो भी पक्ष प्रामाणिक हो वही सिद्ध होना चाहिए ऐसा मानते है। अर्थात् वाद की प्रक्रिया में उनमें से किसी को स्वयं के पक्ष में त्रुटियाँ ज्ञात हो जाए तो वे उन्हें सुधारने के लिए और प्रतिपक्ष की बात सत्य लगी तो उसे भी स्वीकार करने को तत्पर रहेंगे। स्वयं की  त्रुटियों को छुपाने और प्रतिपक्ष के पराजय के प्रयास कुतर्क, असत्य, छल पूर्वक नहीं करेंगे।

दोनों पक्ष स्वयं के पक्ष की सिद्धि एवं प्रतिपक्ष का खंडन करने के लिए प्रमाणों तथा तर्क का प्रयोग करेंगे। पूर्व निर्धारित नियमों के अनुसार चर्चा चलती है और दोनों पक्ष पंचावयव का उपयोग करेंगे। (जब वाद औपचारिक व्यवस्था के अंतर्गत सार्वजनिक रूप से / सभा में न चल रहा हो अपितु दो व्यक्ति जैसे गुरु शिष्य, पिता पुत्र, दो मित्र वगैरह आपस में चर्चा कर रहे हो तो पंचावयव का पालन करना अनिवार्य नहीं है।)

दोनों पक्ष सत्य की इच्छा रखते हुए भी क्योंकि परस्पर विरुद्ध सिद्धांत को लिए हुए है, कम से कम एक पक्ष तो अवश्य ही (यह भी हो सकता है दोनों ही पक्ष) असत्य मान्यता को सत्य माने हुए है। जब जिसका सिद्धांत असत्य है वह अपना पक्ष रखेगा अथवा सत्य सिद्धांत का खंडन करेगा तो स्वाभाविक है की उसके हेतु, उदाहरण, तर्कों, प्रमाणों की प्रस्तुति में त्रुटियाँ होगी। ऐसी त्रुटियाँ करना (जल्प वितंडा में) हार का कारण बनती है परंतु क्योंकि यहां वाद चल रहा है, कोई लडाई नहीं, तो ऐसी त्रुटियाँ होने पर भी उसे हारा हुआ घोषित न करके उसे उसकी त्रुटियाँ समझाई जाती है और सुधारने के अवसर दिए जाते है।

अब यहां क्योंकि जो पक्ष गलत भी है और त्रुटियाँ कर भी रहा है पर वह जान बुझ कर, छल पूर्वक ऐसा नहीं कर रहा है। ऐसे में एक गलती वाद में नहीं होती। वह है स्वयं के ही सिद्धांत के विरुद्ध की बात कहना। इस लिए सूत्र में सिद्धांत अविरुद्ध विशेषण दिया गया है।
[मेरे मत में यह त्रुटि इस लिए नहीं होती क्योंकि जिसके लिए सत्य ही सर्वोपरि हो वह जान बुझ कर तो स्वयं के सिद्धांत के विरुद्ध की बात नहीं ही करेगा (स्वयं का बचाव अथवा प्रतिपक्ष पर आक्रमण के लिए) पर वह अनजाने में भी ऐसा नहीं करेगा। क्योंकि दो विरोधी बात एक दूसरे को काटती है यह तो प्रत्यक्ष ही दिखता है और किसी को भूल से भी वह न दिखे उसका अर्थ तो यही है की उसकी आंखें सत्य को देखने के लिए खुली हुई ही नहीं है। अथवा उसका मन सत्य दिखने वाली आँखों से नहीं पर स्वपक्ष की सिद्धि के लोभ मोह से जुडा हुआ है भले ही वह स्वयं उसे (अपने लोभ मोह को) जान पाया हो अथवा नहीं।]

अर्थात् स्व सिद्धांत के विरोध में यदि कोई पक्ष बोलता है तो चर्चा फिर जल्प की श्रेणी में चली जाएगी जहां सिद्धांत विरुद्ध बात का प्रतिपक्ष द्वारा पकडा जाना उसके लिए हार का कारण बनेगा।

आगे जल्प और वितंडा के लक्षण देखेंगे।

बुधवार, 29 जून 2022

विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः। १.१.४१

विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः। १.१.४१

(विमृश्य) संशय द्वारा (पक्षप्रतिपक्षाभ्याम्) पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों से (अर्थावधारणं) अर्थ का निश्चय करना (निर्णयः) निर्णय है।

एक साथ सत्य न हो सके ऐसे दो अर्थों की प्राप्ति होती देखकर जब संशय होता है तब वह परस्पर विरुद्ध अर्थ में से कौन सा सच है यह जानने के लिए दोनों अर्थों के हेतु ढूँढने के लिए तर्क का प्रयोग होता है और पक्ष और प्रतिपक्ष बनते है। उन दोनों पक्षों पर प्रमाणों तथा तर्क सहित विचार करने पर कोई एक पक्ष खंडित हो जाता है (हट जाता है) और दूसरा पक्ष सिद्ध हो जाता है (बच जाता है)। इस एक पक्ष के सिद्ध होने से अर्थ का निर्धारण होता है जिसको निर्णय कहते है।

यह निर्णयरूपी तत्वज्ञान ही प्रमाणों का फल है। 

शंका :- निर्णय तो जो पक्ष बच गया उसी से होता है। फिर पक्ष प्रतिपक्ष दोनों से होता है क्यों कहा? जो पक्ष खंडित हो गया उसका निर्णय में क्या योगदान?

उत्तर :- जब पक्ष प्रतिपक्ष में से एक खंडित हो जाए और एक सिद्ध हो जाए तभी निर्णय होता है। यदि दोनों खंडित हो जाए अथवा दोनों सिद्ध हो जाए अथवा (जहां एक का सिद्ध/खंडित होना स्वतः ही दूसरे को खंडित/सिद्ध नहीं करता), एक खंडित हो पर दूसरा सिद्ध न हो पाए अथवा एक सिद्ध हो जाए पर दूसरा खंडित न हो पाए तब संशय की निवृत्ति नहीं होती। इस लिए एक का सिद्ध होना और दूसरे का खंडित होना दोनों मिलकर संशय की निवृत्ति और तत्वज्ञान की प्राप्ति कराते है।

भाष्यकार आगे यह स्पष्ट करते है की जहां हेतु से यह सिद्ध होता हो की एक धर्मी परस्पर विरुद्ध धर्मों का आश्रय हो सकता है तब वहां उन सभी परस्पर विरुद्ध धर्मों का होना मान लेना चाहिए (उसको पक्ष प्रतिपक्ष बनाकर निरर्थक विवाद नहीं करना चाहिए)। जैसे गाय का काला, सफेद, लाल रंग की होना परस्पर विरुद्ध धर्म है, तब भी यह कहना की गाय काली, सफेद, लाल होती है ठीक है। क्योंकि यहां गाय का अर्थ गाय जाति है गाय व्यक्ति नहीं। एक व्यक्ति में तो वह एक साथ न रह पाने वाले विरुद्ध धर्म बनेंगे पर जाति में भिन्न भिन्न व्यक्ति में भिन्न भिन्न रंग मिलता है।

ऐसे ही एक ही वस्तु में भी परस्पर विरोधी धर्म भिन्न भिन्न समय पर मिल सकते है। जैसे यान कभी गतिमान होता है और कभी स्थिर। अथवा एक समय में विरुद्ध धर्म भिन्न अधिकरण के लिए हो सकते है जैसे आत्मा में इच्छा और अनिच्छा दोनों भिन्न भिन्न वस्तु के प्रति एक ही समय में हो सकती है।

तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए सदा संशय और पक्ष प्रतिपक्ष का होना अनिवार्य नहीं है। जैसे प्रत्यक्ष और शब्द प्रमाण से इनके बिना भी तत्वज्ञान की प्राप्ति होती है। 

(हाँ, जिज्ञासा अवश्य होनी चाहिए। यदि जानने की इच्छा ही न हो तो कितने ही प्रत्यक्ष और शब्द प्रमाण हमारे सामने से निकल जाएंगे और हमारा चित्त एक को भी ग्रहण नहीं करेगा। यह मेरा अनुभव है, पाठ का भाग नहीं। अर्थात् मैंने यह प्रत्यक्ष पूर्वक जाना है शब्द प्रमाण से नहीं।)

इस के साथ प्रथम अध्याय का प्रथम आह्निक समाप्त होता है।

रविवार, 26 जून 2022

अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः। १.१.४०

आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना।
यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः॥  - मनुस्मृति १२-१०६

जो वेद और ऋषिविहित धर्मोपदेश अर्थात धर्मशास्त्र का वेदशास्त्र के अनुकूल तर्क के द्वारा अनुसंधान करता है वही धर्म के तत्व को समझ पाता है अन्य नहीं।


आगे हम प्रथम सूत्र में कहे गए सोलह पदार्थ में आठवें पदार्थ  तर्क का लक्षण देखेंगे। 

अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः। १.१.४०

जिस विषय का वास्तविक स्वरूप ज्ञात नहीं है उसके वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए प्रमाणों की संगति से किया जाता विचार तर्क है।

किसी वस्तु का सामान्य ज्ञान होने पर (परंतु उसका विशेष न ज्ञान होने पर) उसका वास्तविक स्वरूप जानने की इच्छा होती है वह जिज्ञासा है। जिज्ञासा से प्रेरित मनुष्य सोचता है की इस का कारण यह है अथवा दूसरा? ऐसे उसके मन में विरोधी कारणों की प्राप्ति होती है। अब जब वह स्वयं ने सोचे विरुद्ध कारणों/पक्षों में से कौन सा सत्य है यह जानने के लिए दोनों पक्ष के प्रत्येक गुण पर विचार करता है और ऐसा विचार करने पर वह एक पक्ष के सत्य होने अथवा न होने की प्रबल संभावना देखता है, उस संभावना तक पहुँचने के विचार की प्रक्रिया को तर्क कहते है।

उदाहरण
किसी को यह जानने की जिज्ञासा हुई की आत्मा उत्पन्न होता है अथवा नित्य है? और इस को ले कर उसके मन में उह चली।

यदि आत्मा उत्पन्न होता हो तो? जन्म के साथ शरीर, मन के साथ साथ आत्मा को भी उत्पन्न हुआ मान लो तो? जब आत्मा जन्म के साथ ही उत्पन्न हो रहा है तब उसके कोई संचित कर्म तो हो नहीं सकते क्योंकि वह पहले था ही नहीं। फिर किस आधार पर सब को शरीर, भिन्न भिन्न योनि, भिन्न भिन्न बुद्धि, संस्कार तथा उन के आधार से सुख दुख मिलेंगे? यदि इन सब के लिए पूर्वजन्म का कर्माशय काम नहीं करता तो यही मानना पडेगा की बिना कारण से ऐसे ही कार्य हो जाते है। और जब आत्मा शरीर के साथ नष्ट भी हो जाएगा तो वह सारे कर्म जिसका फल उसको अभी नहीं मिला है वह व्यर्थ हो जाएंगे। यदि कर्मफल सिद्धांत की हानि अथवा बिना कारण कार्य उत्पन्न नहीं होता इस सिद्धांत की हानि उसको स्वीकार्य नहीं तो वह आत्मा के उत्पन्न होने को भी स्वीकार नहीं करेगा।

स्वयं को सत्य से समीप पहुंचता हुआ देख जिज्ञासु के मन में प्रसन्नता* का भाव भी उत्पन्न होता है। (फिर भले ही वह सत्य कितना ही कडवा भी क्यों न हो। कोई भी स्वयं अंधेरे में रहने की इच्छा नहीं करता। दुनिया का सब से बडा असत्य भाषण करने वाला भी स्वयं तो वस्तुओं को ठीक ठीक ही जानना चाहेगा।)

*प्रसन्न शब्द सन्न से बनता है। सन्न का उपयोग गति के पूर्ण अभाव को दर्शाने के लिए हम करते है। जैसे वह ये सुनकर सन्न रह गया। प्रसन्न = प्र (प्रकृष्ट रूप से) सन्न। मन की स्थिरता प्रसन्नता है और चंचलता अथवा कोई निश्चय पर न पहुँच पाना अप्रसन्नता। क्योंकि सत्य स्थिरता देता है सत्य का ज्ञान प्रसन्नता का कारण बनता है।

न्यायदर्शन में तर्क को स्वयं में प्रमाण नहीं माना गया है। हाँ तर्क जिस पक्ष को बल देता है उस पक्ष को जिज्ञासु आगे प्रमाणों के आधार पर अधिक सरलता से सिद्ध कर सकता है और तर्क की प्रक्रिया उसे प्रमाणों तक पहुँचने में भी सहायक होती है इस लिए उसे प्रमाणों का अनुग्राहक बताया गया है।

गुरुवार, 23 जून 2022

उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः। १.१.३८, हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्। १.१.३९

अनुमान प्रमाण के चतुर्थ अवयव उपनय के लक्षण।

उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः। १.१.३८

उदाहरण की अपेक्षा से यह ऐसा ही है अथवा यह ऐसा नहीं है ऐसा कथन करके उपसंहार करना उपनय है। 

हेतु और साध्य का संबंध उदाहरण के द्वारा देने के बाद उसको प्रतिज्ञा की सिद्धि की तरफ खींचना (उपसंहार करना) उपनय है। जैसे शब्द उत्पत्ति धर्म वाला है (हेतु) और जो जो उत्पत्ति धर्म वाला होता है वह वह अनित्य होता है जैसे स्थाली (उदाहरण) देने के बाद यह कथन करना की "स्थाली के समान शब्द भी उत्पत्ति धर्म वाला है" उपनय कहलाता है। 

हेतु और उपनय एक समान दिख सकते है परंतु हेतु साध्य में साधन धर्म है यह मात्र बताता है जब की उपनय उदाहरण में बतायी गई व्याप्ति के बल पर वह हेतु में दिखाया गया धर्म वास्तव में साधन धर्म है इस बात का कथन है।
  
हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्। १.१.३९

हेतु के उपदेश से प्रतिज्ञा का पुनः कथन करना निगमन है।

जब तक प्रतिज्ञा साध्य कोटि में है तब तक वह प्रतिज्ञा कहलाएगी परंतु जब हेतु उदाहरण उपनय द्वारा उसकी सिद्धि हो जाती है तब वह साध्य कोटि में न रहकर सिद्ध कोटि में आ जाती है। सिद्धांत (प्रतिज्ञा) की सिद्धि के उपरांत पुनः कथन करना निगमन है। जैसे "उत्पत्ति धर्म वाला होने से शब्द अनित्य है" हमारे पंचावयव का निगमन होगा। निगमन = निश्चित/पूर्ण रूप से प्राप्ति/जानकारी।

पूरे पंचावयव इस प्रकार रहेंगे।
प्रतिज्ञा : शब्द अनित्य है।
हेतु : उत्पत्ति धर्म वाला होने से।
(व्याप्ति सहित) उदाहरण : जो जो उत्पत्ति धर्म वाला होता है वह वह अनित्य होता है जैसे स्थाली। अथवा जो जो उत्पत्ति धर्म वाला नहीं होता वह वह नित्य होता है जैसे आत्मा।
उपनय : स्थाली के समान शब्द भी उत्पत्ति धर्म वाला है। अथवा आत्मा से विरुद्ध शब्द उत्पत्ति धर्म वाला है।
निगमन : उत्पत्ति धर्म वाला होने से शब्द अनित्य है

प्रतिज्ञा आदि पाँच अवयवों का परस्पर संबंध।

आगे भाष्यकार समझाते है की कैसे अनुमान प्रमाण में इन पांचों अवयवों का अपना महत्व है और इनका परस्पर अटूट संबंध है। इन में से एक भी के नहीं होने से काम नहीं चलेगा।

पहला वाक्य प्रतिज्ञा है। यदि वह न हो तो बाकी चार के लिए आधार ही नहीं रहेगा। किस को सिद्ध करने के लिए बाकी चार कहें जाएंगे? और यदि वक्ता बाकी वाक्यों का कथन करने लगता है तो सुनने वालों को समझ नहीं आएगा की वह क्या बोल रहा है और क्यों बोल रहा है।

यदि हेतु को निकाल दिया जाए तो साध्य के लिए साधन धर्म ही नहीं होगा। बिना साधन धर्म के सिद्धि कैसे होगी?

उदाहरण के न होने पर साधन धर्म से साध्य धर्म का निश्चय हो सकता है यह प्रतिपादित नहीं होगा। और न ही उपनय बनेगा।

हेतु में जिस धर्म की उपस्थिति साध्य में दिखाई गयी है उसको उपनय उदाहरण में दिखाई गई व्याप्ति से जोडकर उसका साधन धर्म होना सिद्ध करता है और ऐसे ही प्रतिज्ञा में साध्य विषय का कथन मात्र है जब की निगमन उस विषय की सिद्धि हो जाने का कथन है । इस तरह से शब्दों की समानता होते हुए भी हेतु-उपनय और प्रतिज्ञा-निगमन का अर्थ भिन्न भिन्न है और उनका स्वतंत्र महत्व है।
 
उपनय और निगमन आगे आए हुए वाक्यों के अर्थों को जोडकर उनका समर्थन करते है और पूरी चर्चा में गांठ लगाकर उसके निष्कर्ष को व्यवस्थित रूप से रखते है। उनके अभाव में चर्चा बिखर जाएगी। और वक्ता यह भी जनाता है की वो जो सिद्ध करने चला था वह (और वही) उसने सिद्ध कर दिया है। चर्चा में भटक कर कहीं और ही नहीं पहुँच गया।

इन पांचों के उपयोग से अर्थसिद्धि में किसी प्रकार का संशय अथवा आशंका शेष नहीं रहते।

आगे हम क्रमप्राप्त पदार्थ तर्क का लक्षण देखेंगे।

बुधवार, 22 जून 2022

साध्यसाधर्म्यात्तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम्। १.१.३६, तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम्। १.१.३७

साध्यसाधर्म्यात्तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम्। १.१.३६
तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम्। १.१.३७

साध्य के समान धर्म से युक्त दृष्टांत से साध्य की समता दिखाना उदाहरण है।
साध्य के विपरीत धर्म से युक्त दृष्टांत से साध्य का विपर्यय (विपरीतता) दिखाना उदाहरण है।

उदाहरण में साध्य धर्म तथा साधक धर्म प्रवर्तमान हो अर्थात् अन्वयव्याप्ति को दिखाता हुआ उदाहरण हो तो उसे साधर्म्य उदाहरण कहेंगे और जब दोनों धर्म से रहित हो तो उसे वैधर्म्य उदाहरण कहेंगे। जैसे "शब्द अनित्य है" प्रतिज्ञा और "उत्पत्तिधर्म वाला होने से" हेतु के उदाहरण यह बन सकते है।

जो जो उत्पन्न होता है वह वह अनित्य होता है जैसे स्थाली। - अन्वय व्याप्ति सहित साधर्म्य उदाहरण।
जो जो उत्पन्न नहीं होता है वह वह नित्य होता है जैसे आत्मा। - व्यतिरेक व्याप्ति सहित वैधर्म्य उदाहरण।

हेतु की चर्चा करते समय वहां व्याप्ति समझने के लिए हेतु के साथ दिखाई थी पर पंचावयव में व्याप्ति उदाहरण के साथ कही जाएगी।

यद्यपि अन्वय तथा व्यतिरेक कोई भी व्याप्ति का उपयोग किया जाता है, यदि दोनों उपलब्ध हो तो साधारणतः अन्वय व्याप्ति तथा साधर्म्य उदाहरण उपयोग में लाए जाते है। पर कहीं कहीं दो में से एक ही व्याप्ति का उदाहरण मिलना संभव होता है वहां जिसका उदाहरण प्राप्त हो वह व्याप्ति और संबंधित उदाहरण से काम लिया जाता है।

जब हम साध्य धर्म को सिद्ध करने के लिए हेतु और उदाहरण देते है तब हमारे साध्य और उदाहरण दोनों में साधक धर्म और साध्य धर्म दोनों रहेंगे (अथवा वैधर्म्य उदाहरण में नहीं रहेंगे) परंतु उदाहरण में वह दोनों धर्मों का होना (अथवा न होना) पहले से सिद्ध होना चाहिए ऐसे ही साध्य में साधक धर्म का होना भी पहले से सिद्ध होना पडेगा तभी हेतु + व्याप्ति सहित उदाहरण साध्य धर्म को सिद्ध कर पाएगा।

अन्य महत्वपूर्ण बात यह है की हेतु और उदाहरण में जिस धर्म को हम साधक धर्म (आगे साधन धर्म शब्द प्रयोग हुआ है) बताएंगे उसकी साध्य धर्म के साथ व्याप्ति प्रमाणित होनी चाहिए। हेतु का मुख्य आधार तो व्याप्ति की प्रामाणिकता ही है उदाहरण तो उस व्याप्ति को समझने के लिए एक दृष्टांत मात्र ही है।

ऐसी कोई भी वस्तु जिसमें साध्य धर्म हो/न हो और अन्य कोई धर्म साध्य के समान/विपरीत हो उसको उठाकर उदाहरण, और अन्य धर्म को साधन धर्म नहीं बना सकते (यदि उन दो धर्मों के बीच की व्याप्ति सिद्ध न हो तो)। ऐसा करने वाला हार जाएगा जो हम आगे देखेंगे।

जैसे आत्मा के साथ (अथवा अन्य कोई वस्तु के साथ भी) ऐसे हेतु और उदाहरण नहीं बना सकते जिसकी व्याप्ति ही न बनती हो।
शब्द अनित्य है।
गुण होने से।
जो जो गुण नहीं होता वह वह नित्य होता है जैसे आत्मा। (आत्मा गुण नहीं है और नित्य है भी पर ये कोई व्याप्ति नहीं है। )

शनिवार, 18 जून 2022

प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः। १.१.३२, १.१.३३-३५

अब हम क्रम प्राप्त अवयव के लक्षण देखेंगे।
 
प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः। १.१.३२

प्रतिज्ञा हेतु उदाहरण उपनय तथा निगमन यह पाँच अवयव है।

इन को अवयव कहा गया है क्योंकि वह एक विशेष वाक्यसमूह जो इन पांचों को मिलकर बनता है उनके अवयव है। वह वाक्यसमूह इन का अवयवी कहा जाएगा।

जैसे की हम जानते है न्यायदर्शन का मुख्य विषय प्रमाणों का उपयोग करना है और प्रमाणों में मुख्य (सर्वोच्च नहीं) अनुमान प्रमाण है। यह पाँच अवयव इसी अनुमान प्रमाण के लिए है।

अनुमान प्रमाण का उपयोग दो प्रकार से होता है।

एक तो जब हम स्वयं किसी निर्णय पर पहुँचने के लिए उसका प्रयोग करते है। जिसको स्वार्थानुमान (स्वार्थ में अनुमान) कहा जाता है उस समय हम विधिवत इन पांचों अवयवों का उपयोग नहीं करते। वहां हमारे मन में मुख्यतः हेतु तक पहुंचने की प्रक्रिया ही होती है। (इस लिए हेतु अवयव को ही अनुमान भी कहते है)।

परंतु जब इस प्रमाण का उपयोग प्रतिपक्ष के साथ चर्चा करने के लिए किया जाता है जहां हम इस का उपयोग जिस निर्णय पर हम पहुँच चुके है उसको एक सुव्यवस्थित रूप से प्रतिपक्ष और अन्यों को समझाने के लिए करते है अथवा किसी अर्थ तक पहुँचने के लिए अन्य से चर्चा कर रहे है और हमारा वर्तमान निर्णय और उसका आधार अन्य के सामने रखते है, जिसको परार्थानुमान कहते है, तब स्वयं के पक्ष को इन पाँच अवयवों द्वारा प्रस्तुत करना अनिवार्य है।

अनेक मतों के भिन्न भिन्न विचार के अनुसार कई इन पाँच में से कुछ अवयव को निरर्थक बताते है तो कई इन पाँच के उपरांत अन्य अवयव भी होने चाहिए यह मानते है। इन मतों की चर्चा भाष्यकार ने की है पर हमारे लिए इस समय वह महत्वपूर्ण न होने से हम सीधे सीधे इन पाँच अवयव के लक्षण ही देखते है।


साध्यनिर्देशः प्रतिज्ञा। १.१.३३

साध्य (सिद्ध करने योग्य) का निर्देश (कथन) प्रतिज्ञा है।

जिस विषय के निर्णय के लिए चर्चा (वाद/जल्प) हो रही है उसमें पक्ष तथा प्रतिपक्ष अपने अपने सिद्धांत का कथन करेंगे। यह दोनों सिद्धांत अभी साध्य (जिसको सिद्ध करना है) कोटि में है। इन को उनकी प्रतिज्ञा कहेंगे। निर्णय होने पर प्रमाणित प्रतिज्ञा सिद्ध हो जाएगी और दूसरी खंडित हो जाएगी। 

जैसे एक पक्ष मानता है की शब्द अनित्य है पर सामने वाला मानने को तैयार नहीं वह उसे नित्य मानता है। अब चर्चा के प्रारंभ में वादी अपनी प्रतिज्ञा का कथन करेगा। "शब्द अनित्य है" कहकर।

यहां अनित्यत्व साध्य धर्म है और उस धर्म का अधिकरण(आधार/धर्मी) शब्द है। साध्य धर्म के अधिकरण को 'पक्ष' (पक्ष यहां पारिभाषिक शब्द है) कहा गया है।

जो पदार्थ निश्चित रूप से अनित्य है (जिसकी अनित्यता पहले से ज्ञात है और सर्वमान्य है) वह शब्द के सपक्ष (पक्ष के समान) कहें जाएंगे। इनको सधर्मा (समान धर्म वाले) भी कहा जा सकता है। जैसे घडा, स्थाली(बर्तन) इत्यादि।

जो पदार्थ निश्चित रूप से नित्य है (जिसकी नित्यता पहले से ज्ञात है और सर्वमान्य है) वह शब्द के विपक्ष कहें जाएंगे। इन को विधर्मा भी कहा जा सकता है। जैसे आत्मा।

संक्षेप में, (उदाहरण : शब्द के अनित्यत्व को सिद्ध करने की चर्चा में)
- सिद्धांत(जो अभी साध्य है) के कथन को प्रतिज्ञा कहेंगे। (शब्द अनित्य है।)
- जिस पर संशय बना हुआ है (जिस को सिद्ध करने के लिए चर्चा हो रही है) उस धर्म को साध्य धर्म कहेंगे। (अनित्यता)
- साध्य धर्म के अधिकरण को पक्ष कहेंगे। (शब्द)
- पदार्थ जिसमें साध्य धर्म पहले से निश्चित है उसे सपक्ष अथवा सधर्मा कहेंगे। (घडा, स्थाली)
- पदार्थ जिसमें साध्य धर्म का अभाव पहले से निश्चित है उसे विपक्ष अथवा विधर्मा कहेंगे। (आत्मा)

प्रश्न :- आप गोपाल के घर गए हो। गोपाल के पास कई गायें है। आप को गायों के बारे में कुछ ज्ञान नहीं है। गोपाल आपको सामने खडे गौरांग और गायत्री को दिखाकर कहता है की यह देसी गाय की प्रजाति है। उतने में एक और गाय गौरी वहां आती है। आप पूछते हो की क्या गौरी भी देसी गाय है?

अब क्योंकि गोपाल गायों के बारे में ठीक ठीक जनता है और आप को ठीक ठीक ही बताएगा उसके हाँ अथवा ना जवाब को आप शब्द प्रमाण मान ही सकते हो। पर फिर भी क्योंकि गोपाल को पता है की कोई वस्तु शब्द प्रमाण से जानने पर भी उसको स्वयं समझ सके ऐसे जानने की इच्छा रहती ही है इस लिए वह आप को जवाब में मात्र हाँ न कहकर अनुमान प्रमाण से भी जनाने के लिए पंचावयव का प्रयोग करता है।

उसकी प्रतिज्ञा क्या होगी?
और यहां साध्य धर्म, पक्ष, सपक्ष/सधर्मा, विपक्ष/विधर्मा क्या है?


उदाहरणसाधर्म्यात्साध्यसाधनं हेतुः। १.१.३४
तथा वैधर्म्यात्। १.१.३५


उदाहरण के साधर्म्य से साध्य का जो साधन है वह हेतु है।
ऐसे ही [उदाहरण के] वैधर्म्य से [साध्य का जो साधन है वह हेतु है]।

हेतु अनुमान प्रमाण के पंचावयव का मुख्य अवयव है जो साध्य को सिद्ध करने का मुख्य साधन है। इसी को अनुमान भी कहा जाता है। (इस मुख्य अवयव के नाम से ही प्रमाण का नाम अनुमान प्रमाण बना।)

हेतु में सपक्ष अथवा विपक्ष पदार्थ जिसका भी उदाहरण हम देना चाहते है उसमें विद्यमान/अविद्यमान साध्य धर्म और उनमें विद्यमान/अविद्यमान साधक धर्म (जो पक्ष में भी विद्यमान/अविद्यमान है) उनका संबंध दिखाते है।

जैसे शब्द अनित्य है इस प्रतिज्ञा का साधर्म्य हेतु अनित्यता को सपक्ष स्थाली के उत्पत्ति धर्म वाले होने से जोडकर बनेगा।

(शब्द अनित्य है)
उत्पत्ति धर्म वाला होने से। क्योंकि जो जो उत्पन्न होता है वह वह अनित्य होता है।

यहां उत्पत्ति धर्म (जो स्थाली और शब्द दोनों में है) का संबंध साध्य धर्म अनित्यत्व (जो स्थाली में सिद्ध है और शब्द में सिद्ध करना है) से जोडा गया है। इस संबंध को व्याप्ति कहते है।

ऐसे ही यदि वैधर्म्य हेतु बनाना है तो विपक्ष आत्मा के नित्यत्व (अनित्यत्व के न होने) को उस में उत्पत्ति धर्म के न होने से जोडेंगे।

(शब्द अनित्य है)
वैधर्म्य हेतु :- उत्पत्ति धर्म वाला होने से। क्योंकि जो जो उत्पन्न नहीं होता वह वह अनित्य नहीं होता।

साधर्म्य से दिखाई गई व्याप्ति (जहां जहां यह होता है वहां वहां वह होता है) को अन्वय कहते है।

वैधर्म्य से दिखाई गई व्याप्ति (जहां जहां यह नहीं होता वहां वहां वह नहीं होता) को व्यतिरेक कहते है।

यदि हम कोई भी व्याप्ति को विपरीत दिशा से देखें, अर्थात साध्य को साधक और साधक को साध्य बनाकर देखें, यदि वह व्याप्ति तब भी सत्य रहती है तब उसको समव्याप्ति कहेंगे।

जैसे उत्पत्ति धर्म और अनित्यत्व की व्याप्ति जो हमनें अभी हेतु में दिखाई वह यह थी,
जो जो उत्पत्ति धर्म वाला (साधक धर्म वाला) होता है  वह वह अनित्य (साध्य धर्म वाला) होता है।

अब यदि इसको उलटा कर दे तब भी वह ठीक है।
जो जो अनित्य (साधक धर्म वाला) होता है वह वह उत्पत्ति धर्म वाला (साध्य धर्म वाला) होता है।

हम उत्पत्ति धर्म से अनित्यत्व तथा अनित्यत्व से उत्पत्ति धर्म दोनों ही सिद्ध कर सकते है। इसको समव्याप्ति कहेंगे।

परंतु यदि हम जो उदाहरण हम पहले अनेक बार प्रयोग कर चुके है (पर्वत अग्नि वाला है) उसके हेतु की व्याप्ति को देखें, "जहां जहां धुआँ होता है वहां वहां अग्नि होता है।" अब यदि इस के साध्य साधक धर्म को उलटा करेंगे और कहें,
जहां जहां अग्नि होता है वहां वहां धुआँ होता है। तो यह व्याप्ति सही नहीं होगी।
ऐसी व्याप्ति को विषम व्याप्ति कहेंगे।

विषम व्याप्ति में जिस साधक धर्म से हमने अन्वय व्याप्ति बनाई थी उसी से व्यतिरेक व्याप्ति नहीं बना सकते। अर्थात् हम ऐसा नहीं कह सकते की जहां जहां धुआं नहीं होता वहां वहां अग्नि नहीं होता।
 
(व्याप्ति, समव्याप्ति, विषमव्याप्ति, अन्वय, व्यतिरेक इन शब्दों का हम प्रचुर उपयोग करेंगे आगे जा कर।)


प्रश्न :-

गोपाल हमें गौरी देसी गाय है यह निर्णय पर पहुँचाने के लिए यह प्रतिज्ञा तथा हेतु देता है।
प्रतिज्ञा : गौरी देसी गाय है।
हेतु : कूबडधारी होने से। क्योंकि जो जो गाय प्रजाति कूबडधारी होती है वह वह गाय प्रजाति देसी होती है।

गोपाल ने जो व्याप्ति दी है वह अन्वय है अथवा व्यतिरेक?
क्या उसको अन्वय से व्यतिरेक (अथवा व्यतिरेक से अन्वय) कर सकते है? यदि कर सकते है तो व्याप्ति क्या होगी? यदि नहीं कर सकते तो क्यों नहीं कर सकते?
गोपाल ने दी है वह व्याप्ति सम है अथवा विषम?   


(अति सरल उदाहरणों से निराश न हो। अभी मूलभूत सिद्धांतों और शब्दावली को ठीक ठीक समझना हमारा उद्देश्य है। विस्तार तथा गहराई में जाने के अवसर बाद में आ सकते है।)