बुधवार, 15 जून 2022

समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रासिद्धः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः। १.१.२९, १.१.३०-३१

समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रासिद्धः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः। १.१.२९

जो समान शास्त्रों में एक समान स्वीकार्य हो और उसी रूप में अन्य शास्त्रों  में स्वीकृत न हो वह प्रतितंत्र सिद्धांत है। 

जैसे एक शास्त्र में कोई विषय अधिकृत है और शास्त्र के उद्देश्य के अनुरूप उस विषय की व्याख्या की गई है। यह व्याख्या उस शास्त्र के समान शास्त्रों* में तो उसी रूप में स्वीकार की गई है पर अन्य शास्त्र जब उसी विषय के बारे में स्वयं को अधिकृत करके उसकी व्याख्या करते है तो वह व्याख्या उन शास्त्र के प्रतिपाद्य विषय तथा स्तर के अनुरूप करते है जो पहले वाले शास्त्र की व्याख्या से भिन्न है। ऐसे विषयों को प्रतितंत्र सिद्धांत कहते है। 

*ऐसे शास्त्र जो एक दूसरे से संबंधित विषयों के बारे में है और समान स्तर पर है वह सामान शास्त्र है। जैसे न्याय और वैशेषिक यह दोनों व्यावहारिक स्तर पर पदार्थ विद्या से संबंधित है जिसमें न्यायशास्त्र विद्या कैसे पानी है उस विषय को लिए है जब की वैशेषिक विद्या कीन कीन पदार्थों की पानी है उस विषय को लिए हुए है। ऐसे ही योग और सांख्य यह दोनों परस्पर समान शास्त्र है। वह न्याय वैशेषिक की भांति बाह्य भौतिक जगत पर नहीं अपितु आंतरिक आध्यात्मिक एक गहराई वाले विषय को लिए हुए है।

उदाहरण के लिए योग-सांख्य के कुछ सिद्धांत इस प्रकार है।
- जो असत् है वह कभी सद्भाव में नहीं आता (अर्थात जो नहीं है वह उत्पन्न नहीं होता)।
- जो है वह कभी विनाश को प्राप्त नहीं होता।
- आत्मा में कभी कोई बदलाव नहीं आता और इस कारण से सब आत्मा एक समान है।

जब की न्याय वैशेषिक यह मानते है की,
- वस्तुओं की उत्पत्ति होती है (जैसे जीव के कर्माशय के अनुरूप उसका शरीर, दोषों के अनुरूप प्रवृत्ति) और जो भी उत्पन्न होता है वह नष्ट भी होता ही है। यह योग सांख्य से भिन्न है। भिन्न होते हुए भी यह परस्पर का खंडन करते है इस भाव में इसे न ले कर ऐसे समझना है जैसे एक बालक को जब माता रोटी बनाकर देती है तब उसके लिए वह उत्पन्न हुई रोटी है परन्तु अन्य दृष्टि से देखे तो आटे का रूप परिवर्तन ही हुआ है और न तो आटा नष्ट हुआ है न रोटी असत् में से उत्पन्न हुई है। न्याय वैशेषिक जो पदार्थ की व्यावहारिक स्तर पर बात करते है वे कहेंगे की मिट्टी से घडा, आटे से रोटी उत्पन्न हुए है।
 
- न्याय वैशेषिक जीवों को व्यावहारिक जगत में दिखने वाले भेद के अनुरूप भिन्न भिन्न दोषों/संस्कारों वाले मानते है योग सांख्य इन भिन्नताओं के कारणरूप संस्कार चित्त (जो आत्मा से भिन्न और जड है) के आश्रित है यह मानते है। 

ऊपर के उदाहरण प्रतितंत्र सिद्धांत के होते हुए भी ऐसे है जैसे मानो किसी को नदी के उस पार कहीं जाना है और उसने किसी को पूछा की क्या करें तो जवाब मिला नाव में बैठ जाओ। अब वह नाव सामने वाले किनारे पर पहुंच गयी तब उसने फिर से किसी को पूछा की अब क्या करें तो जवाब मिला नाव से उतर जाओ। यहाँ अधिकार क्षेत्र अलग अलग होने से विपरीत लगने वाले उत्तर भी एक दूसरे का खंडन नहीं करते।  

यत्सिद्धावन्यप्रकरणसिद्धिः सोऽधिकरणसिद्धान्तः। १.१.३०

जिसके सिद्ध होने से अन्य सम्बद्ध अर्थों की सिद्धि हो जाए वह अधिकरण सिद्धांत है।

जिस वर्तमान विषय को सिद्ध किया जा रहा है उसके सिद्ध हो जाने पर वह सारे अर्थ जिनके अभाव में वर्तमान विषय बनता ही नहीं वे भी सिद्ध हो जाते है। उन सब अर्थों का वर्तमान विषय अधिकरण (उनकी सिद्धि के अधिकार को लिए हुए) है जिससे उसको अधिकरण सिद्धांत कहते है।

इस को समझने के लिए हम एक शास्त्रीय और एक अन्य उदाहरण लेंगे।

शास्त्रीय उदाहरण :
आत्मा की सिद्धि के लिए कहा गया की आत्मा देह इन्द्रिय आदि से भिन्न है क्योंकि जो वस्तु को देखा है और स्पर्श किया है वह एक ही है ऐसा प्रतिसंधान आत्मा न हो तो कौन करेगा? अब यह प्रसंग सिद्ध होने से नीचे के सारे अर्थ जिनको सीधे सीधे कहा नहीं गया है वह भी सिद्ध हो जाएंगे।
- देखने वाली इन्द्रिय और स्पर्श करने वाली इन्द्रिय अलग अलग है अर्थात् नियत विषय वाली है । (नहीं तो प्रतिसंधान की आवश्यकता ही नहीं होती)
- इंद्रियाँ ज्ञान ग्रहण करने का साधन मात्र है स्वयं बोध का भोग नहीं करती (यदि ज्ञान इंद्रियों को ही होता तो कोई अन्य कैसे प्रतिसंधान कर सकता है)
- चेतन तत्व अनेक विषयों के ज्ञान का भोग कर सकता है और वह इंद्रियों को साधन के रूप में उपयोग कराता है।

आत्मा के उस हेतु से सिद्ध होने से ऊपर के अर्थ भी सिद्ध हो जाएंगे क्योंकि उनके सिद्ध हुए बिना आत्मा सिद्ध नहीं हो सकता। ऐसे सारे अर्थों का सिद्ध होना अधिकरण सिद्धांत की सीमा में आता है।  

अन्य उदाहरण 
सद्वृत्त आयुर्वेद में स्वास्थ्य की रक्षा के लिए दिए गए सिद्धांतों में से है। सद्वृत्त का एक सिद्धांत कहता है की सभी वस्तुओं पर बिना सोचे समझे विश्वास नहीं करना चाहिए और न ही प्रत्येक वस्तु पर शंका करनी चाहिए। यह सिद्ध हो जाने पर नीचे की बातें भी स्वयं सिद्ध हो जाएगी। 

- व्यवहार में सब वस्तु अपने पूर्ण प्रामाणिक रूप में हमारे सामने नहीं आती।
- सारी वस्तु अप्रामाणिक भी नहीं होती।
- हमारी बुद्धि का योग्य उपयोग (हमारी परिस्थितियां जो हमारे निर्णयों से प्रभावित होती है) हमारे स्वास्थ्य की रक्षा में योगदान देता है। 


अपरीक्षिताभ्युपगमात्तद्विशेषपरीक्षणमभ्युपगमसिद्धान्तः। १.१.३१

जो अभी परीक्षित नहीं है, थोडी देर परीक्षा करने के हेतु से जिसको स्वीकारा है वह अभ्युपगम सिद्धांत है।

जिस विषय को सिद्ध करने के लिए चर्चा चल रही है उस विषय में एक पक्ष के सिद्धांत को दूसरे पक्ष द्वारा आंशिक रूप से स्वीकार कर लेना यह देखने के लिए की ऐसा करने पर भी दूसरे पक्ष के सिद्धांत की पूर्ण सिद्धि होती है अथवा नहीं। ऐसा दूसरे पक्ष के मान्य सिद्धांतों में विसंगतताओं को दिखने के लिए अथवा उसके हेतु की अपूर्णता दिखाने के लिए अथवा उसके सिद्धांतों में से जो सरलता से असिद्ध हो सकता हो उसको पहले असिद्ध करने के लिए किया जा सकता है।
 
शास्त्रीय उदाहरण :
न्याय तथा वैशेषिक दर्शन शब्द को गुण और अनित्य मानते है। प्रतिपक्षी उसको द्रव्य और नित्य मानता है। सिद्धांती यदि प्रतिपक्षी को कहे के चलो थोडी देर के लिए मान लेते है की शब्द द्रव्य है और ऐसा मानकर भी देखते है की वह नित्य सिद्ध हो सकता है क्या? तो यह (शब्द को नित्यत्व की परीक्षा के समय द्रव्य मान लेना) अभ्युपगम सिद्धांत कहा जाएगा।

अन्य उदाहरण :
एक पक्ष मानता है की आज कल शिक्षण/परीक्षण की गुणवत्ता कम हो गई है इस लिए स्नातक होने पर भी व्यक्ति उस योग्यता को लिए हुए नहीं होता जो अपेक्षित है। दूसरा पक्ष कहता है की समस्या समस्त शिक्षण व्यवस्था में नहीं अपितु नई उभर आई अनेक शिक्षण संस्थाओं के कारण है जिनकी गुणवत्ता कम है।

अब यदि प्रथम पक्ष कहे के चलो मान लेते है की नई संस्थाओं के स्नातक उन संस्थाओं की गुणवत्ता के कारण पूर्ण योग्य नहीं है तो भी क्या पुरानी संस्थाओं के स्नातक पहले जैसे है? तो यहां नई संस्थाओं के शिक्षण पर दुष्प्रभाव को मान लेना अभ्युपगम सिद्धांत होगा। ऐसे ही दूसरा पक्ष कह सकता है की चलो मान लेते है की समस्त शिक्षण का स्तर ही गिर गया है तो फिर पुरानी संस्थाओं के स्नातक क्यों अभी भी पहले की ही भांति योग्य है? (यदि वो हो तो)

ध्यान रहें यहां सिद्धांत शब्द तत्व, सत्य, सिद्ध, के लिए प्रयुक्त नहीं है। यहां सिद्धांत का अर्थ है जिसको स्वपक्ष अथवा प्रतिपक्ष सिद्ध मानता है। प्रारंभ में दोनों पक्ष स्वयं के सिद्धांत रखेंगे और दोनों एक दूसरे से विरुद्ध होने से एक तो असत्य होगा ही (दोनों भी असत्य हो सकते है)। पर फिर भी उन दोनों को यहां उनके अपने अपने सिद्धांत ही कहेंगे।

अधिकरण तथा अभ्युपगम दोनों को ठीक से जानना वर्तमान परिस्थिति में अत्यंत उपयोगी है। (वह सदा ही अत्यंत उपयोगी है वैसे तो, क्योंकि असत्य का प्रचार करने वाले सदा ही होते है।) उन परिस्थितियों में भी जहां हम स्वयं तत्वज्ञान तक अभी नहीं पहुँच पाए है यह कम से कम हमें उन असत्यों से शीघ्रता से अवगत करा देगा जिसमें सत्य का अभाव उनकी आंतरिक विसंगतताओं से अथवा सिद्धांत से जुडे हुए अन्य अर्थ के ज्ञात होने से पता चल जाता हो।

और यह हमें किसको आप्त कोटि में नहीं लेना चाहिए यह समझने भी सहायता कर सकता है। उदाहरण के लिए मानो किसी ने कहा की यह पुष्प सूरजमुखी* का है और हेतु दिया वह सूरज की दिशा के साथ दिशा परिवर्तन कर रहा है इस लिए। हमें यह पता नहीं है की वह पुष्प सूर्यमुखी का है अथवा नहीं और हमने उस व्यक्ति को इस लिए पूछा था क्योंकि हम उसे पुष्पों के विषय में विशेषज्ञ मानते थे।

*सूरजमुखी जिसकी संज्ञा है उस का। अर्थात् रूढ अर्थ लेना है यौगिक नहीं।

अब हमें यद्यपि उस पुष्प के विषय में ज्ञान नहीं है, हमने अन्य अनेक पुष्पों को स्वयं का मुख सूर्य की दिशा में बना रहे ऐसे दिशा परिवर्तन करते हुए देखा है। यहां यदि हम उस व्यक्ति के हेतु को मान ले तो वह सारे भिन्न भिन्न पुष्प भी सूरजमुखी सिद्ध हो जाएंगे जो सत्य नहीं होगा। इससे हमें उस पुष्प के विषय में भले ही न पता चला हो वह व्यक्ति पुष्पविशेषज्ञ नहीं है उतना पता तो चल गया।

अधिकरण सिद्धांत के क्षेत्र में कौन कौन से अर्थों का समावेश होता है यह अच्छी प्रकार से जानने से हम कहाँ प्रतिपक्ष का खंडन करने के लिए अभ्युपगम का प्रयोग करना है यह निर्णय भी कर सकते है।

ऐसे ही यदि कोई सिद्धांत आंतरिक विसंगतताओं से ग्रस्त हो तो उसके अधिकरण क्षेत्र में आने वाले दो अर्थ (अथवा अधिकरण में आने वाले अर्थ और प्रतिपक्ष ने माना हुआ कोई अन्य सिद्धांत) एक दूसरे का ही खंडन करते मिलेंगे जिससे उस सिद्धांत के सत्य होने की कोई संभावना नहीं है यह हम अल्प प्रयास से ही जान जाएंगे।

इन दोनों के वर्तमान में प्रासंगिक कई उदाहरण लिए जा सकते है पर उनको जब हम इन विषयों को विस्तार से परीक्षा के समय देखेंगे तब के लिए रखते है।

सिद्धांत के लक्षण के साथ हमने प्रथम सूत्र में आए १६ पदार्थों में से प्रथम छह पदार्थ के लक्षण देख लिए है। आगे हम सातवें पदार्थ अवयव के लक्षण देखेंगे।

शनिवार, 11 जून 2022

यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम्। १.१.२४ , १.१.२५-२८

यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम्। १.१.२४

जिस अर्थ को उद्येशकर (जिस उद्देश्य से) प्राणियों की प्रवृत्ति होती है वह प्रयोजन है।

जिस अर्थ को प्राप्त करने योग्य अथवा छोडने योग्य निश्चय से मानकर प्राणी उसको प्राप्त करने अथवा छोडने की प्रवृत्ति करता है वह प्रयोजन है। इस में सुख प्राप्ति/दुख त्याग को मुख्य प्रयोजन तथा उनके साधन को प्राप्त करने/छोडने को गौण प्रयोजन कह सकते है।


लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः। १.१.२५

लोक व्यवहार को जानने वाले (लौकिक) और शास्त्र को जानने वाले (परीक्षक) दोनों की बुद्धि जिस विषय को ले कर समान हो वह दृष्टांत बन सकता है।

दृष्टांत शब्द में से भी यही अर्थ निकलता है। दृष्ट = ज्ञात, अंत = पूर्णता तक। पूर्ण रूप से ज्ञात विषय।

स्वार्थ तथा परार्थ दोनों में अनुमान प्रमाण का प्रयोग करते समय दृष्टांत के बिना संशय निवृत्ति अर्थात् निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता। दृष्टांत इस लिए न्याय का अंग भी है। विरोधी के दृष्टांत में (उसी के पक्ष से) विरोध दिखने से प्रतिपक्ष का खंडन और स्वयं के दृष्टांत की योग्यता स्थापित करके स्वयं के पक्ष की सिद्धि हो सकती है।

तन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः। १.१.२६

तंत्र (शास्त्र), अधिकरण (अधिकार) तथा अभ्युपगम (थोडी देर परीक्षण करने के लिए स्वीकृत) इन तीनों के माने हुए विषयों की संस्थिति (व्यवस्था) मानना सिद्धांत है।

"यह ऐसा ही है" ऐसा कहकर जिस अर्थ समूह को स्वीकार किया जाता है उसको सिद्ध कहते है। ऐसे सिद्ध विषय की अच्छी प्रकार की व्यवस्था को सिद्धांत कहते है।

सिद्धांत = सिद्ध + अंत = पूर्णतया सिद्ध। संस्थिति = सम् + स्थिति = जो अच्छी प्रकार से ठहर गया है (निश्चित हो गया है)।

इस सूत्र में सिद्धांत का लक्षण संस्थिति है। ऐसा निश्चय से स्वीकारा गया अर्थसमूह शास्त्र (तंत्र) का हो सकता है, अधिकरण का हो सकता है अथवा किसी अर्थ समूह को परीक्षा करने के लिए थोडी देर के लिए स्वीकारा गया हो सकता है।

तंत्र सिद्धांत दो प्रकार का हो सकता है सर्वतन्त्र और प्रतितंत्र जिससे सिद्धांत के चार विभाग बनेंगे। इन के बारे में आगे के सूत्र स्वयं बताएंगे।

स चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थान्तरभावात्। १.१.२७

परस्पर भिन्न होने से वह सिद्धांत चार प्रकार का होता है। सर्वतन्त्र सिद्धांत, प्रतितंत्र सिद्धांत, अधिकरण सिद्धांत तथा अभ्युपगम सिद्धांत।

सर्वतन्त्राविरुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः। १.१.२८

सभी शस्त्रों में समान रूप से स्वीकृत (अविरुद्ध) तथा किसी शास्त्र में अधिकृत (विशेष रूप से वर्णित) अर्थ (विषय) सर्वतन्त्र सिद्धांत है। 

कोई विषय किसी शास्त्र का मुख्य विषय होने से उसमें विस्तार से वर्णित है और दूसरे शास्त्रों में उस शास्त्र में वर्णित सिद्धांत से कोई विरोध नहीं है तब वह विषय सर्व शास्त्र (तंत्र) को समान रूप से मान्य होने से उसे सर्वतन्त्र सिद्धांत कहा जाता है।

जैसे घ्राण रसना चक्षु त्वक् श्रोत्र ये इंद्रियाँ है और पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश पंचमहाभूत है, किसी विषय का ज्ञान प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से किया जाता है यह न्याय वैशेषिक में विशेष रूप से वर्णित है और अन्य शास्त्रों में उसे उसी रूप में स्वीकारा गया है। ऐसे सिद्धांतों को सर्वतन्त्र सिद्धांत कहेंगे।

शुक्रवार, 10 जून 2022

समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः। १.१.२३

समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः। १.१.२३

समान धर्म के ज्ञान से अथवा अनेक (*विशेष) धर्म के ज्ञान से अथवा परस्पर विरोधी ज्ञान से अथवा उपलब्धि की अव्यवस्था से अथवा अनुपलब्धि की अव्यवस्था से विशेष ज्ञान की अपेक्षा रखने वाला द्विकोटिक ज्ञान (विमर्श) संशय कहलाता है।

*एक शब्द का प्रयोग हम समान के लिए भी करते है। उस अर्थ को लेते हुए अनेक का अर्थ होगा जो समान नहीं है वह अर्थात् विशेष। 

यहां संशय का लक्षण बताने के लिए विमर्श शब्द का उपयोग हुआ है। विमर्श शब्द में वि उपसर्ग विरोध अर्थ में है और यह शब्द मृश् (मृशँ आमर्शने) धातु जिसका अर्थ स्पर्श करना (जानकारी के लिए किसी वस्तु तक पहुंचना) है उससे बना है। अर्थ होगा जो विरोधी अर्थों को छू रहा हो। अर्थात् ऐसा ज्ञान जो विरोधी धर्मों तक पहुंचता हो और इससे धर्मी का निश्चय नहीं हो सकता।

पर प्रत्येक ऐसी अवस्था में जहां किसी वस्तु का निश्चय न हो रहा हो वहां संशय उभरेगा यह नहीं कह सकते। यदि निश्चय करने की इच्छा भी हो तब संशय उभरेगा। जब वर्तमान ज्ञान से निश्चय नहीं हो पा रहा हो और निश्चय पर पहुंचने की इच्छा हो तब धर्मी (प्रमेय) के विशेष धर्म को जानने की इच्छा होगी जिससे निश्चय हो सके। इस लिए विशेष की अपेक्षा रखने वाला ज्ञान इसको विमर्श का विशेषण बनाया है।

जैसे मान लो किसी ने अलग अलग मत आत्मा के विषय में क्या कहते है वह पढा। उसका अपना न ही कोई आत्मा के बारे में मत/ज्ञान है न ही उसके विषय में विरुद्ध धर्मों को पढकर उसे यह जिज्ञासा हुई की इन में से कौन सही है और कौन गलत। उसने यह जाना की ये मत वाले ऐसा मानते है और वे मत वाले ऐसा मानते है और आगे बढ गया। यहां विरोधी धर्मों की प्राप्ति तो हुई पर संशय नहीं उभरा।

सूत्र में संशय उत्पन्न होने की पाँच अवस्था बतायी है।

१। समानधर्मोंपपत्ति अर्थात् दो भिन्न वस्तुओं के समान धर्मों का दिखना : हमारे सामने जो धर्मी है उसमें ऐसे लक्षणों का दिखना जो एक से अधिक धर्मी में होते है। अब उनको देखकर यह संशय उत्पन्न होगा की उन अनेक धर्मी जिनमें वो समान लक्षण होते है उन में से सामने वाला (जिसका विषय है वह) धर्मी कौन सा है।

जैसे संध्या के समय हम निर्जन स्थल से जा रहे है और कुछ दूर हमें ५-६ फिट की कोई आकृति दिखी और हमें संशय हुआ की वह कोई मनुष्य है (जो हमारे लिए भय का कारण बन सकता है) अथवा स्थाणु (ठूँठ, सूखे हुए वृक्ष का तना)। स्थाणु और मनुष्य की ऊंचाई चौडाई एक समान होने से और अपर्याप्त प्रकाश से वस्तु के विशेष गुण जैसे यदि मनुष्य हो तो उसके हाथ पैर सर और स्थाणु हो तो वृक्ष की आकृति न दिखने से यह संशय उत्पन्न हुआ जिसका निराकरण उन विशेष धर्मों को जानकर होगा।   

ध्यान रहे की यहां देखने वाले को दोनों धर्मी के समान गुणों के बारे में पहले से ज्ञान होना पडेगा तभी उसको संशय उत्पन्न होगा।

२। अनेकधर्मोंपपत्ति अर्थात् अनेक (विशेष) धर्म का दिखना : कोई ऐसा धर्म दिखना जो कहीं और नहीं दिख रहा हो और उस धर्म के आधार पर वस्तु का वर्गीकरण न हो पा रहा हो।

वैशेषिक दर्शन कहता है की कोई भी उत्पन्न पदार्थ द्रव्य गुण कर्म इन तीन में से एक होता है। अब किसी ने विभाग से शब्द को उत्पन्न होते हुए देखा (जैसे कपडा चीरने से शब्द उत्पन्न होता है, जैसे फटाका फूटते समय शब्द उत्पन्न होता है ) परंतु यह विशेष लक्षण की शब्द विभाग से उत्पन्न होता है उससे वह शब्द को द्रव्य गुण अथवा कर्म क्या माने वह वो निश्चय नहीं कर पा रहा  है अर्थात् उस विषय में उसे संशय उत्पन्न हुआ है जिसका निराकरण वह अब शब्द के अन्य विशेष लक्षणों को जानकार करने का प्रयत्न करेगा।

यहां धर्म और धर्मी दोनों प्रत्यक्ष है पर प्रत्यक्ष धर्म को देखकर देखने वाला धर्मी का यथायोग्य वर्गीकरण करने में असमर्थ है और संशय वहां उत्पन्न हुआ है।  

३। विप्रतिपत्ति अर्थात् विरोधी धर्मों का दिखना : वि = विरुद्ध, प्रतिपत्ति = ज्ञान। एक ही धर्मी के लिए एक साथ सच न हो सके ऐसी विरोधी बातों का सामने आना। जैसे किसी ने कहा की आज मंगलवार है और दूसरे ने कहा की बुधवार है अब यदि सुनने वाले को पता नहीं है की आज कौन सा दिन है तो यह संशय का कारण बन सकता है।

४। उपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु मिल रही है (उपलब्धि हो रही है) पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां होते हुए उपलब्ध हो रही है अथवा न होते हुए। उदाहरण : रण में जाते समय सामने पानी दिखने से यह संशय हो सकता यही की यह मृगमरीचिका है अथवा सच में पानी है। 

५। अनुपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु की उपलब्धि नहीं हो रही है पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां न होते हुए अनुपलब्ध हो रही है अथवा होते हुए। जैसे हमने अनेक उदाहरण देखें है जहां वस्तु होते हुए भी (प्रथम दृष्ट्या) नहीं दिखती। किसी स्थल पर तो हम न दिखती हुई वस्तु के होने के बारे में निश्चय से कह सकते है जैसे खडे हुए जीवित वृक्ष की जडें और कहीं जो नहीं दिख रहा है वह नहीं है वह भी निश्चय से कह सकते है जैसे हमारी हथेली पर (न दिखता हुआ) आंवला। पर कहीं कहीं वस्तु न दिख पाने पर भी यह संशय बना रहता है की वह है अथवा नहीं जैसे भूगर्भ जल। यह संशय अनुपलब्धि की अव्यवस्था के कारण उत्पन्न हुआ है क्योंकि जब वह होता है तब भी नहीं दिखता और नहीं होता है तब भी नहीं दिखता।


प्रश्न :-

नीचे के प्रसंग संशय उत्पन्न होने की कौन सी अवस्था का उदाहरण है। 

१। आप ने हमेशा देखा है की शरदी खांसी ऋतु परिवर्तन में प्रचुर मात्रा में दिखने को मिलते है और उनसे भयभीत होने का कोई कारण नहीं समझते थे। अब नया सायन्स कहेता है की यही लक्षण एक नए रोग में भी दिखते है जिससे भयभीत होना चाहिए। अब जब आप किसी को शरदी खांसी से ग्रसित देखते है तो आप को संशय होता है की यह हमेशा वाली शरदी खांसी है या नया रोग।

२। किसी ने एक स्तनधारी जीव देखा जिसके पंख भी थे। ऐसा उसने कहीं और नहीं देखा था न ही इस जीव के बारे में उसे कोई ज्ञान है। अब उसे संशय हो सकता है की यह जीव स्थलचर है या नभचर।

३। जीवाणु परीक्षा का परिणाम यदि यह कहता है की जीवाणु पाए गए है तब भी यह संशय रहता है की वह होते हुए प्राप्ति का परिणाम आया है अथवा न होते हुए। (True Positive / False Positive)

४। आप ट्विटर पर फॉलो करने योग्य हैन्डल ढूंढ रहे थे। अकस्मात @nyaynotes तक पहुंचते है। देखते है की इस हैन्डल के followers नहीं है पर आप को यह संशय बना रहता है की क्या यह हैन्डल फॉलो करने योग्य नहीं है इस लिए इसके फॉलोवर्स नहीं है अथवा फॉलो करने योग्य होते हुए भी ऐसा है।

सोमवार, 30 मई 2022

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२ (चर्चा भाग ३)



भाग १ में दी गई चर्चा जो भाष्यकार ने प्रस्तुत की है वह मुझे अत्यंत निराशाजनक लगी। माना की मैं अभी एक प्राथमिक विद्यार्थी ही हूँ पर सामने दिखती हुई विसंगतताओं को अनदेखा भी नहीं कर सकती। 

यद्यपि आनंद कहाँ से आएगा इस बात का कोई प्रसंग नहीं था पर फिर भी यह भाष्यकार पर निर्भर है यदि वह सूत्र के आस पास का कोई विषय उठाना चाहे तो। तो मुद्दा चर्चा जहां से और जैसे शुरू की गई वह नहीं है, खास कर के तब जब भाष्यकार दुख की निवृत्ति अवस्था (मोक्ष) में ब्रह्म का आनंद है वह पहले ही कह चुके है। मेरी समस्या नीचे के कारणों से बनी।

चर्चा शुरू करते समय ऐसा भास हो रहा था की भाष्यकार का पक्ष आनंद की सत्ता को स्वीकार कर रहा है पर अंत तक आते आते नीचे के तर्क देना बिलकुल ही ठीक नहीं था। और चर्चा में एक तरह से उन्होंने अपने पक्ष की तो स्थापना ही नहीं की मात्र कल्पित पुर्वपक्षी का खंडन ही किया और ऐसा करते समय स्वयं के पूर्व स्वीकृत सिद्धांत से अंतर भी बना लिया। 
 
१। आनंद हो या न हो उससे कोई अंतर नहीं आता
२। आनंद है तो सही पर यदि आनंद को मानेंगे (मानकर प्रयत्न करेंगे) तो राग होगा और उस के कारण मोक्ष में बाधा आएगी
३। यह तर्क की अपवर्ग के लिए किया गया प्रयत्न इष्ट की प्राप्ति के लिए नहीं पर अनिष्ट की निवृत्ति के लिए है।

१। आनंद हो या न हो उससे कोई अंतर नहीं आता:

यदि यह कथन का तात्पर्य यह है की आनंद की सत्ता तो हम स्वीकारते है पर उससे होने या न होने से फिर भी कोई अंतर नहीं आता,

यहां शास्त्र के १२ प्रमेयों, जिसके तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है उसमें भी जो मुख्य प्रमेय है अपवर्ग उसके विषय में बात हो रही है और कहा यह जा रहा है की उस प्रमेय का अर्थ (जिसको भोगने के लिए ये सारी रामायण हो रही है) सत्तात्मक हो या असत्तात्मक उससे हमें कोई लेना देना नहीं है। प्रमेय के अर्थ की और उपेक्षा का भाव = प्रमेय की और उपेक्षा का भाव।

यदि कथन का तात्पर्य यह है की हम स्वयं ही अनिर्णय की स्थिति में है की वहां आनंद है या नहीं (पर उससे कोई अंतर नहीं आता),

पहले तो यह कथन स्वयं के पूर्व कही गई बात से विरुद्ध जाएगा जहां आनंद की सत्ता स्वीकारी गई है पर यदि उन्हें अपने पक्ष को बदलने का अवसर दिया भी जाए तो इसमें दो आपत्तियाँ आएगी। १) दुःखों से पूर्ण निवृत्ति और सर्वोच्च सुख की एकता को यह स्वीकार नहीं करते (क्योंकि यदि करते तो वह अनिर्णय की स्थिति में नहीं होते) २) ऊपर की तरह उपेक्षा का भाव बनेगा।

२। आनंद है तो सही पर यदि आनंद को मानेंगे (मानकर प्रयत्न करेंगे) तो राग होगा और उस के कारण मोक्ष में बाधा आएगी।

यहां सर्वोच्च प्रमेय के तत्वज्ञान और उससे उत्पन्न ईप्सा को अविद्या और दोष कहा जा रहा है (राग/मोह = दोष जो अविद्या से उत्पन्न होते है) और इतना पर्याप्त न हो ऐसे जिसे अविद्या/दोष कहा जा रहा है उसी की प्राप्ति में बाधा न आए उसकी चिंता की जा रही है।

३। यह तर्क की अपवर्ग के लिए किया गया प्रयत्न इष्ट की प्राप्ति के लिए नहीं पर अनिष्ट की निवृत्ति के लिए है इस में दो आपत्तियाँ है। एक तो की इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट की निवृत्ति इन का साम्य स्वीकार नहीं किया गया और दूसरा यदि मान भी लो की यह दो कोई भिन्न वस्तु है (इस पर हमने भाग २ में चर्चा की थी) और यह भी माने की यदि सुख दुःख घुल मिल गए हो तब एक को छोडना है तो दूसरे को भी छोडना पडेगा (इस पर एक और चर्चा हो सकती है पर अभी नहीं) तब यही तर्क यह भी कहेगा की एक चाहिए तो दूसरा भी स्वीकार करना पडेगा। मनुष्य इन दो में से क्या करता है वह इन की मात्रा पर निर्भर करेगा।

वह मनुष्य जो अपवर्ग से मात्र एक हाथ की दूरी पर है वह तो अनेक सुखों और ज्ञानों से परिपूर्ण होगा। एक ऐसा मनुष्य जो अभ्युदय के चरम पर है, स्थितप्रज्ञ है, द्वंद्वों से परे है, अनेक सिद्धियों का स्वामी है, अत्यंत सुखदायी जन्म, स्वस्थ शरीर, लंबी आयु या कहो इच्छा मृत्यु की सिद्धि, निर्मल आनंदित मन, तेजस्वी बुद्धि और क्या नहीं? इस जगह पर खडा व्यक्ति आगे इससे अधिक आनंद न हो तो क्यों बाकी बचे थोडे से अनिष्ट की निवृत्ति के लिए यह सब छोड देगा?

यदि कहो की ऐसे व्यक्ति को भी जब तक शरीर है तब तक कोई न कोई दुख तो होगा ही और वह उसे भी दूर करना चाहेगा तो वहां तक तो तर्क योग्य है पर यदि कहो की वह बाकी बचे थोडे से दुःख से बचने के लिए वह सर्व सुख छोड देगा तो यह बात नहीं बनती।

यदि किसी के सामने ९९ प्रतिशत दुःख और १ प्रतिशत सुख के मिश्रण को छोडने का विकल्प हो तो वह दुःख से बचने के लिए सुख को भी छोड दे यह तर्क संगत लगता है (संसार में ऐसा प्रयत्न करने का अत्यंत दुःखभरा उदाहरण आत्मघात में दिखता है) पर यदि वह मिश्रण ९९ प्रतिशत सुख और १ प्रतिशत दुःख हो तो?  क्या वह आत्मघात सादृश्य प्रवृत्ति करेगा?
 
और फिर उसकी अपवर्ग तक की यात्रा (अभ्युदय) में क्या देखने मिलता है? जैसे जैसे मनुष्य का अभ्युदय होता है तब वह अपने छोटे छोटे दुःखों से बचने के लिए बडे बडे सुख त्यागता जाता है अथवा यह की उसके सुख में वृद्धि और दुःख में अल्पता आती जाती है? तो अचानक अपवर्ग से एक हाथ की दूरी पर यह परिवर्तन क्यों?

यदि कहो की अपवर्ग के एक हाथ की दूरी पर खडे वह मनुष्य के लिए तो संसार में सब दुःख ही दुःख है (अर्थात् अनिष्ट अल्प नहीं बडा है उसके लिए) तो १) यदि उसको पूछो की क्या वह अपनी स्थिति कोई एक सामान्य सांसारिक मनुष्य (जिसको अनेक दुःख तो है पर अनेक सुख भी है और वह यह नहीं कहता के बस दुःख ही दुःख है) जैसी कर लेना चाहेगा? उसको तो हां कहनी चाहिए क्योंकि १०० प्रतिशत दुःख से तो एक सामान्य सांसारिक मनुष्य की स्थिति अच्छी ही है और कौन जीवात्मा दुःख से कम दुःख की तरफ नहीं जाना चाहेगा? और २) वो सामान्य स्थिति से यहां तक पहुँचा ही क्यों? उसे तो प्रयत्न पहले ही बंध कर देने चाहिए थे। 

यह सब देखकर कोई आश्चर्य नहीं के जो हमने पहले अपवर्ग के बारे में मिथ्याज्ञान पढा था वह प्रचलित हुआ हो। की वहां तो सारा सुख छूट जाएगा, वह कोई भयंकर स्थिति है वगैरह।

रविवार, 29 मई 2022

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२ (चर्चा भाग २)


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अपवर्ग = सुख की प्राप्ति अथवा दुःखों से अत्यंत निवृत्ति इस विषय को समझने का मेरा प्रयत्न। 
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सूत्र का अर्थ और भाष्यकार का कथन इस प्रकार था।    

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः।  १.१.२२
उस दुःख से अत्यंत छूट जाना मोक्ष है।

भाष्यकार इसको खोलते हुए कहते है की वर्तमान जन्म (शरीर) के छूटने पर नया जन्म न ग्रहण करने से जन्म के साथ नित्य संबंध रखने वाले और उससे विभक्त हो कर न रहने वाले दुःखों से आत्मा को सम्पूर्ण, अत्यंत छुटकारा मिल जाता है।

भाष्यकार आगे बताते है की मोक्ष (अपवर्ग) की अवस्था में आत्मा अभय (भय रहित), अजर (व्याधि रहित), मृत्यु रहित स्थान में परमात्मा के अनंत आनंद को अबाधित रूप से भोगता है।

सूत्रकार ने अपवर्ग को दुःखों से अत्यन्त निवृत्ति कहा है जब की अनेक मत (अथवा कम से कम ऊपर की चर्चा के पूर्वपक्षी और भाष्यकार स्वयं का मत) अपवर्ग में आत्मा की परम सुख की प्राप्ति को मानते है। इस समय यदि हो सकता है तो यह प्रश्न हो सकता है की सूत्रकार ने मोक्ष को व्याख्यायित करते समय उसे दुःखों से आत्यंतिक निवृत्ति क्यों कहा अत्यंत सुख की प्राप्ति क्यों नहीं? (जब सुख सिद्ध हो जाएगा बाद चाहे तो वह कहाँ से आता है वह प्रश्न आ सकता है।)
 
प्रथम तो हम दुःख और सुख को समझने का एक उदाहरण द्वारा प्रयास करते है।

मान लो एक व्यक्ति को काम पर जाना है पर यात्रा लिए कोई साधन नहीं है। अब वहां एक बस शुरू हुई जिससे वह यात्रा कर सकता है। उसने काम पर जाना शुरू किया जिससे उसकी परिस्थिति पहले से कुछ कम कष्टप्रद हुई। यहां हम कह सकते है की उसके दुःख कम हुए अथवा तो कुछ सुख प्राप्त हुआ।

वह एक मात्र बस जो आगे से भरी हुई आती है उसमें खूब भीड रहती है और उसमें यह व्यक्ति जैसे तैसे चढ जाता है (जो उसके लिए सुख है)। थोडी देर में उसकी दृष्टि बस के आगे वाले भाग तक पहुँचती है जहां पीछे की तुलना में थोडी कम प्रतिकूलता से खडा रहा जा सकता है। व्यक्ति प्रयत्न पूर्वक आगे पहुंचता है। पहले की अपेक्षा में वह कुछ और सुखी अथवा कम दुःखी कहा जा सकता है। ऐसे ही आगे खडे रहने की अपेक्षा तीन की seat में पांच लोग बैठते हो उसमें एक स्थान, स्वतंत्र पूरी seat, खिडकी वाली, धूप न हो, पैर फैलाने के लिए अच्छी जगह हो, बस के मध्य में जहां रोड के खड्डों से कम तकलीफ हो से लेकर बस के बदले और सुविधाजनक गाडी, हवाई यान और उसमें भी  business class, private jet या फिर स्वयं के स्वामित्व वाला  worm hole भी यदि संभव हो तो उसकी भी कल्पना कर सकते है।

ऊपर की प्रत्येक दो स्थिति के बीच के अंतर को हम प्राप्त किया गया सुख अथवा छोडा हुआ दुःख कह सकते है। किसी को यह लग सकता है यह बात बहुत दुःखी और सामान्य व्यक्ति के लिए तो ठीक है पर जो पहले से ही सुखी है उसके लिए तो दुःख की निवृत्ति का कोई अर्थ नहीं है हां अधिक सुख का अर्थ हो सकता है। पर यदि हम ध्यान से सोचे तो जब हम यह कहते है की 'जो सुखी है' वहां हमारी बुद्धि में यही है की वह जो कोई अपर्याप्तता अनुभव न कर रहा हो। पर यदि कोई अपने सुख से अधिक सुख की सत्ता को जान ले तो फिर उसे स्वयं के सुख की अपूर्णता का ज्ञान (दुख के होने का ज्ञान) हो जाएगा और यदि नहीं तो उसके लिए अन्य वस्तु अधिक सुख वाली है यह नहीं कह सकते।

इस को इस शास्त्र में ही अब तक आए हुए सूत्रों के द्वारा ऐसे समझ सकते है की इच्छा आत्मा का स्वाभाविक गुण है और सुख/सुख के साधन सामने आते ही वह उद्भूत होगा। इच्छा उद्भूत हो जाने पर यदि वह सुख/सुख के साधन की प्राप्ति में कोई बाधा रहती है तो उसी को दुःख कहते है। यहां तात्पर्य यह नहीं है की उसका सुख पहले से कम होगा, तात्पर्य मात्र यह है की उसके portfolio में अब वर्तमान सुख + नया तत्वज्ञान(+) + अपूर्ण इच्छा(-) है जिसका valuation पहले (वर्तमान सुख + अविद्या(-)) से अधिक होते हुए भी उसको हम दुःख मुक्त नहीं कह सकते। दूसरे शब्दों में कहे तो जब तक हम सर्वोच्च सुख को प्राप्त नहीं करते तब तक हम दुःख तो भोग रहे ही है भले ही हमारे ज्ञान का स्तर वह हो की हम उस दुःख को देख पाए अथवा नहीं। 

अधिक सुख का अर्थ बिना साध्य के अधिक साधन (साधन लगने वाली वस्तु मात्र) नहीं है। मान लो किसी को भूख लगी है और पेट भर भोजन के लिए उसे ५० रुपए की आवश्यकता है जो उसके पास है और वह सुखी है। अब यदि उसको पता चले की १०० रुपये में उतना ही भोजन पर सर्वश्रेष्ठ सामग्री से बना हुआ मिलता है तब और ५० रुपये का होना उसके लिए सुख का कारण और न होना दुःख का कारण बनेंगे पर उसके बाद अधिक पैसे उसके सुख का कारण नहीं बनेंगे न ही उनका न होना दुःख का कारण। यहां १०० रुपये पर उसे सर्वोच्च सुख मिलता है यह भी कह सकते है और उसके दुःखों की अत्यंत निवृत्ति हुई यह भी कह सकते है।

यही कारण है की निःश्रेयस से पहले अभ्युदय आता है। मनुष्य सुखी होता जाता है, होता जाता है (अभ्युदय) और अंत में सर्व दुःखों से मुक्त हो जाता है (मोक्ष)।

अर्थात् सर्वोच्च सुख और दुःख की अत्यन्त निवृत्ति समानार्थी है। और जब यह दोनों समानार्थी है तो सूत्रकार इन दो में से किसी का भी प्रयोग कर सकते है।
 
पर फिर भी क्या दुःखों की अत्यंत निवृत्ति पसंद करने के पीछे कोई कारण हो सकता है?

कोई भी उपदेश की उपयोगिता शब्द प्रमाण बनने तक है। वह हमें अनुमान में, उह करते समय और प्रत्यक्ष के लिए प्रयत्न करते समय भी अत्यंत उपयोगी बन सकता है पर अंत में वह रहेगा तो शब्द प्रमाण ही। प्रत्यक्ष तो व्यक्ति को स्वयं ही करना पडेगा।

शास्त्रों को हम कोई virtual reality जो हमें सीधा सीधा सुख/सत्य का अनुभव करवायेंगे ऐसा न मानते हुए उन्हें दिशा निर्देश, सुख/सत्य तक पहुंचने का मानचित्र मान के चलें तभी उनसे लाभान्वित हो पाएंगे।

अब इस दृष्टि से सूत्रकार यदि हमें ऐसा मानचित्र देना चाहते है जिससे उसका उपयोग करते समय हमारे भटकने की संभावना कम से कम हो तो क्या अपवर्ग को सर्वाधिक सुख कहो अथवा दुःखों से अत्यंत निवृत्ति इस से अंतर आएगा?

हमारे ऊपर वाले उदाहरण पर लौटते है। जहां व्यक्ति को सर्वोच्च सुख प्राप्त करने के लिए १०० रुपए चाहिए। अब हमें उसे उपदेश देना है की कैसे पता करे की पैसे क्यों कमाये जाए, कैसे कमाए जाए और पैसे कमाए जा चुके है उसका लक्षण क्या है? लक्ष्यप्राप्ति का लक्षण बताने के लिए क्या नीचे के दोनों वाक्य समान उपयोगी होंगे?

१) जब तुम्हारी लक्ष्य प्राप्ति होगी तब तुम्हारे पास अत्यंत पैसे होंगे अथवा कहो तब तुम्हारे पास १०० रुपये होंगे। (पैसा होना = सुख)

२) जब तुम्हारी लक्ष्य प्राप्ति होगी तब तुम्हारे पास पैसों की थोडी भी कमी नहीं होगी (पैसों की कमी = दुःख) 

उपदेश ग्राहक जिसके पास अभी ५० रुपये है और वह स्वयं को सुखी देखता है वह इन उपदेशों को सुनकर उस पर चलता है। 

परिस्थिति क :
उसको अधिक गुणवत्ता के भोजन के बारे में ज्ञान हुआ और उसे पाने की इच्छा भी पर अभी उसके पास मात्र ५० रुपये है। अर्थात् अब वह स्वयं की वर्तमान परिस्थिति में दुःख देख रहा है।

जीव मात्र को जब कोई भी दुःख होता है तब वह उसको दूर करने का प्रयत्न करता ही है उसके लिए उसे किसी उपदेश की आवश्यकता नहीं है। अब वह ५० रुपये प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करेगा। यहां उसकी ५० रुपए और प्राप्त करने की इच्छा तत्वज्ञान पूर्वक की इच्छा है और उसके लिए किया गया प्रयत्न सुख का/दुःख को दूर करने का कारण बनेगा।

यदि उपदेश को भी देखें तो उसके दोनों रूपों में वह अभी लक्ष्य प्राप्ति नहीं हुई है ऐसा समझकर पैसा कमाने के लिए प्रयत्न करेगा और अपने दुःख को दूर कर लेगा/सुख को पा लेगा। (वैसे तो उपदेश २ में ही उसे ठीक से पता है की वो पैसा कमाने के प्रयत्न क्यों कर रहा है तो उसी को तत्वज्ञान कहेंगे)

परिस्थिति ख :

वह सुखी है। अर्थात् उसको अधिक गुणवत्ता के भोजन के बारे में ज्ञान नहीं है और न ही पाने की इच्छा (जब तक ज्ञान नहीं होगा तो इच्छा भी नहीं होगी)

उपदेश के प्रथम रूप में वह और पैसे कमाने का प्रयत्न करेगा और वह मात्र व्यर्थ की मेहनत करके अपना सुख बढाने के बदले कम ही करेगा। क्योंकि वो अब ५० रुपये को गुणवत्ता रूपी लक्ष्य को प्राप्त करने के साधन के रूप में नहीं अपितु उसी को लक्ष्य मान कर मेहनत कर रहा है। साध्य के ज्ञान के अभाव में वह मेहनत व्यर्थ जाएगी और उसका सुख जब उसके पास ५० रुपये थे तब था उससे भी कम हो जाएगा।

यहां पैसे की कामना और उसके लिए प्रयत्न राग/मोह (जिस को उत्पन्न करने में उपदेश कारण है) जनित है और दुःख का कारण।

उपदेश के दूसरे रूप में वह सोचेगा की उस की लक्ष्य प्राप्ति हो गई है और वह अपना जितना सुख है उसकी हानि किए बिना उसको भोगेगा। अभी वो सर्वोच्च सुख से वंचित है पर उसका कारण उसकी अविद्या है (अधिक गुणवत्ता युक्त भोजन के अस्तित्व के प्रति), लक्ष्यप्राप्ति का लक्षण नहीं।

परिस्थिति ग :
वह सुखी है। उसने प्रयत्न करके १०० रुपये कमा लिए है और सर्वोत्तम गुणवत्ता युक्त भरपेट भोजन प्राप्त कर लिया है। 

हमारे उदाहरण में तो वह यहां भी और पैसे कमाने के प्रयत्न के पीछे अपनी हानि कर सकता है पर मोक्ष वाले उदाहरण में जब उसने लक्ष्य प्राप्ति कर ली है तब उसे कोई शब्द प्रमाण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसने स्वयं ने प्रत्यक्ष कर लिया है। न ही अब कोई हानि की संभावना है। 

दूसरे उपदेश रूप में उसकी हानि की संभावना नहीं है और इस कारण से सर्वोच्च सुख और दुःखों से अत्यंत निवृत्ति तत्वतः समानार्थी होने पर भी जिसको अभी पूरा तत्वज्ञान नहीं हुआ है उसके लिए दुःखों से अत्यंत निवृत्ति अधिक उपयोगी मानचित्र बन सकता है और वही सूत्रकार ने प्रयोग किया है।


शनिवार, 28 मई 2022

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२ (चर्चा भाग १)

सूत्र २२ के भाष्य में अपवर्ग के अनुसंधान में एक मुद्दा उठाया गया है और उसकी विस्तृत चर्चा (प्रतिपक्षी की कल्पना करके) की गई है। पहले नीचे वह चर्चा प्रस्तुत की है पर उसके बाद में मेरे कुछ अपने विचार रखे है।

सूत्र २२ और उसका अर्थ इस प्रकार था। 

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२
उस  दुःख से अत्यंत छूट जाना मोक्ष है।

भाष्यकार इसको खोलते हुए कहते है की वर्तमान जन्म (शरीर) के छूटने पर नया जन्म न ग्रहण करने से जन्म के साथ नित्य संबंध रखने वाले और उससे विभक्त हो कर न रहने वाले दुःखों से आत्मा को सम्पूर्ण, अत्यंत छुटकारा मिल जाता है।

भाष्यकार आगे बताते है की मोक्ष (अपवर्ग) की अवस्था में आत्मा अभय (भय रहित), अजर (व्याधि रहित), मृत्यु रहित स्थान में परमात्मा के अनंत आनंद को अबाधित रूप से भोगता है।

भाष्यकार द्वारा प्रस्तुत चर्चा :

कुछ लोग ऐसा मानते है की मोक्ष मिलने पर जो आनंद आत्मा भोगता है वह उसका अपना है अर्थात् आत्मा का स्वाभाविक आनंद है जो उसका अपना ही गुण होने पर भी संसार में रहते हुए प्रकट नहीं हो रहा था (आत्मा को अपने अंदर के आनंद का ज्ञान नहीं हो पा रहा था) और अब बंधनों के हट जाने पर प्रकट हो गया। (जब की सिद्धांत पक्ष में आत्मा की आनंद भोग करने की शक्ति अपनी स्वाभाविक है पर अपवर्ग में मिलने वाला आनंद परमात्मा का है।)

इसका खंडन करते हुए भाष्यकार कहते है की पूर्वपक्षी के इस मत में प्रत्यक्ष अनुमान अथवा शब्द कोई भी प्रमाण न होने से यह मत सर्वथा अप्रामाणिक है।
 
यद्यपि प्रमाण के अभाव से उपरोक्त मत का खंडन हो ही जाता है पर फिर भी भाष्यकार उस मत के पक्षधर कल्पित पूर्वपक्षी की और से स्वयं ही कुछ तर्क दे कर उनका भी खंडन प्रस्तुत करते है।

मान लो की आनंद आत्मा का अपना स्वभाव है और मोक्ष में वही आनंद प्रकट हो जाता है तो उस प्रकटीकरण का कारण क्या है?
यदि कहो की कारण नित्य है (अर्थात् कोई कारण नहीं है, आनंद नित्य प्रगट ही रहता है) तो मोक्ष और बद्धावस्था में कोई अंतर नहीं रह जाएगा क्योंकि दोनों ही अवस्थाओं में जीवात्मा वह आनंद से परिपूर्ण रहेगा। धर्म अधर्म से उत्पन्न सुख दुःख के साथ साथ जीवात्मा का अपना स्वाभाविक आनंद भी रहेगा। 

यदि कहो की ऐसा मानने में क्या हानि है तो वह प्रत्यक्ष से विपरीत जाता है क्योंकि मनुष्य अधर्म से उत्पन्न दुःख भोगते समय आनंद का अनुभव नहीं करता। और फिर अपवर्ग अवस्था का आनंद इतना अधिक और प्रबल है की यदि उसका सांसारिक सुख दुःख के साथ मिश्रण माने तो सांसारिक सुख दुःख का अस्तित्व नगण्य ही रह जाएगा और ऐसे में न धर्म अधर्म के फल का कोई अर्थ रहेगा न ही बद्धावस्था और मुक्तावस्था में कोई अंतर। 

उपरोक्त तर्क से बाधित होकर यदि पूर्वपक्षी कहता है की मोक्ष अवस्था में आनंद के प्रकटीकरण का कोई अनित्य कारण है तो उसको वह कारण बताना चाहिए और क्योंकि वह कारण अनित्य है अर्थात् उत्पन्न हुआ हो ऐसा है तो उसके उत्पन्न होने का कारण भी बताना चाहिए। मान लो की उसने कोई कारण जैसे योगसमाधि से उत्पन्न धर्म को आत्मा के स्वाभाविक आनंद के प्राकट्य का कारण बताया (वो जो भी कारण बताएगा वह आत्मा के बद्धावस्था के समय उत्पन्न हुआ होगा) तो वह कारण कार्यजगत के रहते उत्पन्न हुआ है और उसके प्रलय पर वह कारण (जैसे योगसमाधि से उत्पन्न धर्म) भी समाप्त हो जाएगा और आत्मा का आनंद भी। मोक्ष में भी आनंद का अभाव होने से संदेह उत्पन्न होगा की वह अभाव आनंद जिसका अस्तित्व है उसकी अप्राप्ति के कारण है अथवा आनंद का अस्तित्व ही नहीं है?जब सुख का बोध न हो रहा हो फिर भी सुख है ऐसा मानने के लिए कोई प्रमाण नहीं है।

यदि ये कहा जाए की योगसमाधि से उत्पन्न धर्म का नाश नहीं होता तो वह भी अप्रामाणिक है क्यों की जो भी उत्पन्न होता है उसका नाश होता ही है।

कोई नित्य अथवा अनित्य कारण है जिससे आत्मा के आनंद का मोक्ष में प्रकटीकरण होता है इस तर्क के न चल पाने पर पूर्वपक्षी यदि यह कहता है की बद्धकाल में आत्मा का आनंद बाधक कारण से अप्रकट रहता है जैसे शरीर के होने पर तो यह भी तर्क भी युक्ति वाला नहीं है की शरीर जिसका कार्य भोग की उपलब्धि करवाना है वही भोग की उपलब्धि में बाधक बनेगा और वह भी सर्वश्रेष्ठ आनंद के भोग की। भोग के साधन ही भोग को रोक दे ऐसा मानने में कोई अनुमान प्रमाण भी नहीं है। आत्मा को जब उसके पास शरीर नहीं होता (जैसे मृत्यु और जन्म के बीच में (संसार के रहते हुए अथवा प्रलयावस्था में)) तब कोई भी भोग (अनुभूति / ज्ञान / उपलब्धि) प्राप्त होता हो उस विषय में प्रमाण का अभाव है और शरीर आदि भोग के साधन न रहने पर भोग नहीं हो सकता यह अनुमान हो सकता है।

अब यदि पूर्वपक्षी यह कहता है की आत्मा शरीर के बिना आनंद भोग कर सकता है और करता है उसमें शास्त्र के वह सारे वचन को प्रमाण रूप ले सकते है जिसमें मोक्ष के लिए प्रयत्न करने का उपदेश है। अर्थात् मोक्ष इष्ट (प्राप्त करने योग्य) वस्तु है जो आनंद देगी तभी तो मनुष्य उसके लिए प्रयत्न करेगा।   

तो यह तर्क भी योग्य नहीं है क्योंकि मनुष्य मात्र इष्ट को प्राप्त करने के लिए नहीं अनिष्ट को छोडने के लिए भी प्रयत्न करता ही है और जन्म के रहते दुःखों से निवृत्ति नहीं हो सकती क्योंकि जो सुख भी है इस संसार में वह दुःख से ऐसे घुल मिल गए है की उनको अलग अलग कर के सुख सुख को ले लेना और दुःख दुःख तो त्याग देना संभव नहीं है। दुःख को यदि छोडना है तो साथ में सांसारिक समस्त सुखों को भी छोडना ही पडेगा। इसी लिए जन्म के चक्र से छूटने का उपदेश है और प्रयत्न भी होना चाहिए। दुःख से छूट जाने के लिए सुख शब्द का व्यवहार भी होता है।  

पूर्वपक्षी का मत यदि यह है की संसार के अनित्य सुख को मोक्ष के नित्य सुख की प्राप्ति के लिए छोडना चाहिए तो मनुष्य उसी तर्क से संसार के अनित्य शरीर और इन्द्रिय के बदले नित्य शरीर और इंद्रियाँ प्राप्त करने की भी इच्छा रख सकता है और उसी को मोक्ष कह सकता है। (जब की पूर्वपक्षी भी नित्य शरीर इंद्रियाँ के पक्ष में नहीं है।) पूर्वपक्षी कहें की नित्य शरीर इन्द्रिय की बात कोई युक्ति पूर्वक की नहीं है तो फिर उसी तरह नित्य सुख की बात भी युक्ति वाली नहीं है। 

आगे यह कहा गया की यदि नित्य सुख के राग में कोई मोक्ष के लिए प्रयत्न करें तो वह सफल नहीं होगा क्योंकि राग तो बंधन का कारण है और यह कहो की मोक्ष मार्ग में आगे जाता हुआ मनुष्य अपने राग क्षीण कर लेगा तो फिर उसको नित्य आनंद है या नहीं उससे कोई अंतर नहीं होगा (क्योंकि उसने उससे अपना राग हटा लिया है।) जो बात दोनों पक्ष को स्वीकार्य होगी।

भाष्यकार ने स्वयं अपवर्ग अभय अजर अमृत्युपद और ब्रह्मक्षेम (ब्रह्मानन्द) से युक्त अवस्था है यह कहा है तो वहां आनंद न होने का पक्ष वे नहीं ले रहे है। सूत्रकार ने दुःखों से मुक्ति की ही बात रखी है उसका तात्पर्य यह है की समस्त दुःखों अर्थात् जन्म चक्र के अंत के बिना उस आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती और सारें प्रयत्न भी उसी के लिए करने है उसके बाद ब्रह्म का आनंद तो बिना प्रयत्न के ही मिलेगा तो उसके लिए कोई उपदेश की भी आवश्यकता नहीं है।


गुरुवार, 26 मई 2022

प्रवृत्तिदोषजनितोऽर्थः फलम्। १.१.२० बाधनालक्षणं दुःखम्। १.१.२१ तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२

प्रवृत्तिदोषजनितोऽर्थः फलम्। १.१.२०

प्रवृत्ति और दोष से उत्पन्न अर्थ (=भोग = सुख दुःख) फल है।

दोष और प्रवृत्ति अर्थात् जो धर्म अधर्म हम मन वाणी तथा शरीर से करते है उनसे जो सुख दुःख की प्राप्ति हमें होती है वह उनके फल है। और क्योंकि उन सुख दुःख की उत्पत्ति के लिए उनके साधन (देह इन्द्रिय अर्थ मन आदि) भी आवश्यक है, उन साधनों की प्राप्ति भी फल है।

यहां यह प्रश्न हो सकता है की दोष प्रवृत्ति का कारण है तो फिर यहां फिर से उसे क्यों कहा गया। उसका समाधान एक तो यह है की दोष रहित क्रिया को धर्म अधर्म रूपी कर्म उत्पन्न करने वाली प्रवृत्ति न समझनी चाहिए यह पुनः स्पष्ट करने के लिए कहा गया परन्तु पुनः कथन वाला तर्क आवश्यक नहीं है क्योंकि प्रवृत्ति से जो फल मिलते है उनको आत्मा तब ही भोगता है जब वह दोष जिनके कारण से धर्म अधर्म किया था वह अब भी हो। अर्थात् फल के लिए स्वतंत्र रूप से भी दोष की आवश्यकता है। 

अर्थात् दोष रहने पर मनुष्य धर्म अधर्म करेगा। अब जब धर्म अधर्म का फल मिलने का समय आएगा तब वही दोष सुख दुःख भोगने में भी कारणरूप बनेंगे। यदि इस बीच में उसने तत्वज्ञान पा कर दोषों को हटा लिया है तो कर्म फल सामने आने पर भी आत्मा उसका भोग नहीं करेगा अर्थात् सुख दुःख नहीं भोगेगा।    


बाधनालक्षणं दुःखम्। १.१.२१

बाधा स्वरूप वाला (जो प्रतिकूल है, जो पीडा, ताप देता है) वह दुःख है।
  
भाष्यकार कहते है की सुखदुःख के अनुभव रूपी तथा शरीर इन्द्रिय आदि साधनों रूपी जो फल है वही दुःख है। यहां समस्त फल को (जिसको हम सुख रूपी समझते है उसको भी) दुःख ही कहा क्योंकि कोई भी सुख दुःख से अलिप्त नहीं है और बडे से बडे सुख रूपी फल को भोगने के लिए भी शरीर आवश्यक है और शरीर के रहते दुःखों से (बाधनाओं से, पीडा से) अत्यंत निवृत्ति संभव नहीं है।

अर्थात् समस्त फल, जब वह सुख रूपी हो तब भी बाधनाओं से बिंधा हुआ, उससे सना हुआ ही होता है और उस फल को भोगने के लिए आवश्यक जन्म भी दुःख ही है।    


तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः।  १.१.२२

उस दुःख से अत्यंत छूट जाना मोक्ष है। 

भाष्यकार इसको खोलते हुए कहते है की वर्तमान जन्म (शरीर) के छूटने पर नया जन्म न ग्रहण करने से जन्म के साथ नित्य संबंध रखने वाले और उससे विभक्त हो कर न रहने वाले दुःखों से आत्मा को सम्पूर्ण, अत्यंत छुटकारा मिल जाता है।

भाष्यकार आगे कहते है की मोक्ष (अपवर्ग) की अवस्था में आत्मा अभय (भय रहित), अजर (व्याधि रहित), मृत्यु रहित स्थान में परमात्मा के अनंत आनंद को अबाधित रूप से भोगता है।