रविवार, 22 मई 2022

पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः । १.१.१९

पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः । १.१.१९ 

पुनः (फिर) पैदा होना प्रेत्यभाव है।

प्रेत्यभाव शब्द स्वयं ही यह अर्थ स्पष्ट करता है।
प्रेत्य = प्रकर्ष रूप से जाकर (जो मर गया है अब वापस उसी शरीर में नहीं आएगा), भाव = होना। अर्थात् मर कर फिर से होना। 

आत्मा शरीर मन इंद्रियाँ इन सब का बंधना (संयोग होना) जन्म है। जब आत्मा शरीर छोडकर जाता है तब मन, इंद्रियाँ* और पंचप्राण उसके साथ जाते है और नया शरीर मिलने पर इनकी निकाई (समूह) फिर बनता है। हम अनेक योनि के और एक एक योनि में भी अनेक शरीर को प्राप्त कर के छोड चुके है (और पीछे के शरीरों से अब हमारा कोई लगाव नहीं) और आगे भी ऐसा ही होगा।

* यहां तात्पर्य सूक्ष्म इंद्रियों से है, स्थूल इंद्रियां अर्थात् इंद्रियों के गोलक शरीर का भाग है और शरीर के साथ ही नष्ट हो जाती है।
   
फिर पैदा (उत्पन्न) होने का अर्थ एक दूसरे से सम्बद्ध तत्वों की निकाई का उत्पन्न होना है आत्मा का फिर उत्पन्न होना नहीं। क्योंकि आत्मा न तो उत्पन्न होता है न ही नष्ट होता है।

यह जन्म मरण जन्म का चक्र अनादि काल से चला आ रहा है और अपवर्ग (मोक्ष) पर तुटेगा।

यहां प्रश्न हो सकता है की यदि कोई वस्तु अनादि है तो वह अनंत ही होगी। अथवा सांत है तो उसका आदि भी होगा। अनादि और सांत तो हो नहीं सकती। यह तर्क सर्वथा उचित है और यहां तात्पर्य यह है की वह प्रवाह से अनादि है और प्रवाह से अनंत भी।

मोक्ष एक बहुत ही लंबे काल तक यह चक्र का रुकना है और यह काल इतना लंबा है की मोक्ष मिलने पर यह कहना की अब यह चक्र रुक गया है गलत नहीं होगा। पर वह हमारी बुद्धि की पकड में न आए उतने लंबे काल बाद ही सही वह चक्र फिर से शुरू होगा। अर्थात् अभी हम जिस चक्र में है वह भी पीछे कभी मोक्ष से वापस आने पर शुरू हुआ होगा जो १०, १००, १०,००,००० या उससे भी अधिक कितने भी जन्म पहले हो सकता है। और उस मोक्ष के पहले भी अनंत ऐसे चक्र थे।

इसका कोई आदि न होने से यह अनादि है। और आगे भी ऐसे अनंत चक्र होंगे (अर्थात् यह प्रवाह से अनंत भी है) पर वर्तमान चक्र का एक लंबे समय तक रुकना मोक्ष में होगा जो हमारा वर्तमान लक्ष्य है जिस आधार पर ये कहा है की यह चक्र मोक्ष में रुकेगा।

शनिवार, 21 मई 2022

युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिंगम्। १.१.१६, १.१.१७ -१८

आगे सूत्रकार मन का लक्षण बताते है। यद्यपि सूत्रकार ने मन का एक लक्षण बताया है भाष्यकार ने मन के कुछ लक्षण और बताये है जैसे की,

स्मृति : जहाँ ज्ञान उभरता है पर बाह्य इन्द्रिय से कोई काम नहीं हो रहा है।

अनुमान : यहाँ लिंग का प्रत्यक्ष हो रहा है पर स्मृति और उस स्मृति को लिंग के प्रत्यक्ष से जोडकर नये ज्ञान की प्राप्ति होने में भी कोई बाह्य करण काम नहीं कर रहा है। यह भी अंतःकरण का लक्षण है।

शब्दप्रमाण : शब्दप्रमाण में भी किसी के कहे शब्दों को उन शब्दों के पहले से जाने हुए अर्थों को उभारकर, उनके साथ जोडकर नए ज्ञान की उत्पत्ति करना मन का लक्षण है।

संशय : जब कोई ऐसे सामान्य ज्ञान होने पर जो निर्णय पर पहुंचने के लिए अपर्याप्त हो, विशेष की अपेक्षा से अनिर्णय की स्थिति उत्पन्न करना अर्थात् संशय उत्पन्न करना भी मन का लक्षण है। 

ऐसे ही प्रतिभा (अचानक कोई ज्ञान का अंदर से उभर आना), स्वप्न, उह (तर्क), संकल्प आदि में भी बाह्य इन्द्रिय का कोई व्यापार (उपयोग) नहीं है और वह भी मन के लक्षण है। 

ऐसे ही सुख दुख का प्रत्यक्ष और इच्छा आदि भी मन के बिना संभव नहीं है। यहाँ प्रश्न हो सकता है की सुख दुःख (को अनुभव करने का सामर्थ्य) और इच्छा द्वेष प्रयत्न तो सूत्रकार ने आत्मा के लक्षण बताये थे। इसका समाधान यह है की इन के लिए आत्मा और मन दोनों ही आवश्यक है तो इन्हें देखकर दोनों का अनुमान हो सकता है। पर दोनों के कार्य में अंतर है।

सुख दुःख मन में उत्पन्न होते है और आत्मा उसको अनुभव करता है (इस लिए सुख दुःख आत्मा के गुण नहीं है पर सुख दुःख को अनुभव करने का सामर्थ्य आत्मा का गुण है) जब की इच्छा द्वेष जो आत्मा के गुण है वह आत्मा में सदा रहते है और निमित्त पा कर उद्भूत (प्रकट) होते है। यहाँ मन निमित्त को आत्मा तक पहुंचाने और इच्छा द्वेष के प्रकटीकरण का साधन बनता है।  

भाष्यकार के ऊपर बताए हुए लक्षणों से मन का पता लगता है पर सूत्रकार मन का एक ही सुगम लक्षण बताते है।

युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिंगम्। १.१.१६ 

एक साथ (युगपत्) अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति न करना यह मन का लक्षण है।

मन एक समय एक ही ज्ञान को ग्रहण करता है। बाह्य इन्द्रियां एक साथ अपने अपने विषयों से जुडी रहती है पर क्योंकि मन एक समय में एक ही ज्ञान उत्पन्न करता है वह इन में से कोई एक ही (अथवा एक भी नहीं यदि वह बाह्य इन्द्रियों से होने वाले प्रत्यक्ष के उपरांत की अन्य कोई अपनी वृत्ति उत्पन्न कर रहा है तब) मन से सन्निकर्ष स्थापित कर पायेगी और वह एक ज्ञान ही एक समय में आत्मा तक पहुंचेगा।


अब प्रवृत्ति का लक्षण देखेंगे। 

प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भः। १.१.१७ 

वाणी मन तथा शरीर से कार्यों को करना प्रवृत्ति है। 

इस सूत्र में आया हुआ बुद्धि शब्द मन के अर्थ में है। बुद्धि शब्द बोध (ज्ञान) के अर्थ में जो हमने पीछे प्रयोग किया था भी बनता है और बोध के करण अर्थात् मन के अर्थ में भी जो अर्थ यहाँ लेना है।

पीछे हमने १.१.२ सूत्र (दुःखजन्मप्रवृत्तिदोष...) में वाणी मन तथा शरीर से होने वाले १० - १० धर्म अधर्म (पुण्य पाप) जाने थे। प्रवृत्ति वही कार्य है। (अविद्या जनित दोष युक्त प्रवृत्ति से ही पुण्य पाप बनते है तत्वज्ञान जनित निष्काम कर्म से नहीं) 


दोष का लक्षण

प्रवर्तनालक्षणा दोषाः। १.१.१८ 

जो आत्मा को सकाम कर्मों में प्रेरित करते है वे (राग द्वेष मोह) दोष कहलाते है।
 
दोष तीन है राग द्वेष और मोह। राग अविद्या जनित फल की इच्छा है। यह रजस प्रधान है। जब की मोह में अविद्या जनित फल की कामना होने पर भी मूढ़ता ज्यादा है रजस नहीं। अर्थात् यह तमस प्रधान अवस्था है।

जहाँ अविद्या (मिथ्याज्ञान) है वहां राग द्वेष मोह है ही। 

अब राग द्वेष मोह को तो हम देख नहीं सकते पर जब मनुष्य उनसे प्रेरित हो कर प्रवृत्ति करता है तो उन प्रवृत्तियों को देखकर उनके पीछे विद्यमान दोष का पता लगता है।

दोष (संस्कार) से उत्पन्न प्रवृत्ति चित्त के दृष्ट धर्म है और संस्कार जिनको हम सीधे सीधे देख नहीं सकते है वह चित्त के अदृष्ट धर्म है।

जिज्ञासु : यह दोषों के बारे में तो प्रत्येक आत्मा जानता ही है तो इनका लक्षण प्रवृत्ति है बताने की क्या आवश्यकता थी?

उत्तर : जब रागयुक्त, द्वेषयुक्त अथवा मोहयुक्त मनुष्य कर्म करता है (मन, वाणी अथवा शरीर से) तब ही उन दोषों के होने की सिद्धि होती है। यदि कभी कोई दोषयुक्त प्रवृत्ति होती ही नहीं तो दोषों की सिद्धि नहीं होती।

यदि हमें स्वयं के दोषों (संस्कारों) को समझना है तो भी अपनी प्रवृत्तियों को ध्यान से देखने पर उनको समझ पाएंगे।

शनिवार, 14 मई 2022

घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रियाणि भूतेभ्यः। १.१.१२, १.१.१३ -१५

इन्द्रियों के लक्षण

घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रियाणि भूतेभ्यः।  १.१.१२

घ्राण रसना चक्षु त्वक् तथा श्रोत्र ये पाँच ज्ञानेंद्रियाँ पांच भूतों के सहयोग से कार्य करती है तथा इनके गोलक पञ्चभूतों से उत्पन्न होते है।

यह लक्षण सूत्र है पर सूत्रकार ने मात्र इन्द्रियों के नाम बताये है। ऐसा इसलिए की इनके नाम में ही इनके लक्षण अंतर्निहित है जो इनके निर्वचन से स्पष्ट होता है। 

घ्राण का निर्वचन है जिघ्रति अनेन इति घ्राणम्। जिससे सूंघता है, गंध को ग्रहण करने का साधन।

रसन = रासयति अनेन इति रसनम्। चखता है जिससे वह रसन (रसना) है। 

चक्षु = चष्टे अनेन इति चक्षुः। देखता है जिसके द्वारा वह इन्द्रिय चक्षु है।
 
त्वक्  =बाकी इन्द्रियों की तरह त्वक् में निर्वचन नहीं हो पायेगा।
त्वक् (=त्वचा) शब्द त्वच संवरणे (संवरण = अच्छी तरह से ढक लेना) धातु से जो अच्छी तरह से ढक लेता है अर्थ में होता है। यह शब्द तनु विस्तारे से भी बन सकता है जिसका अर्थ फैला हुआ होगा। दोनों निर्वचन का तात्पर्य समान है। जिसने शरीर को ढका हुआ है अथवा सम्पूर्ण शरीर पर फैला हुआ है। यहाँ इन्द्रिय त्वक् में रहती है तो उसे त्वक् इन्द्रिय कह दिया जाता है। उसको स्पर्शन इन्द्रिय भी कहा जाता है। छूता है जिस इन्द्रिय के द्वारा। 

श्रोत्र = शृणोति अनेन इति श्रोत्रम्। सुनता है जिसके द्वारा वह इन्द्रिय श्रोत्र है

अपने अपने विषय को ग्रहण करना प्रत्येक इन्द्रिय का लक्षण (उसकी पहचान) है।  

सूत्रमें 
भूतेभ्यः का अर्थ है इन्द्रियां भूतों (पाँच महाभूतों) से सम्बद्ध है। इनसे उत्पन्न हुई है और उनके गुणों का ग्रहण कराती है।


यह भूत कौन से है यह अगला सूत्र बताता है। 

पृथिव्यापस्तेजो वायुरकाशमिति भूतानि।  १.१.१३

पृथ्वी जल अग्नि वायु तथा आकाश ये पाँच स्थूलभूत या महाभूत कहे जाते है।


अर्थ के लक्षण 

गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः। १.१.१४

गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द यथाक्रम पृथ्वी आदि के गुण है तथा घ्राणादि इंद्रियों के विषय है। (यह बाह्य इन्द्रियों से गृहीत होने वाले अर्थ है।)

घ्राण पृथ्वी से (उसकी प्रधानता से) उत्पन्न होती है और गंध जो को पृथ्वी का गुण है उसको ग्रहण कराती है। ऐसे ही रसना चक्षु त्वक् तथा श्रोत्र में जल अग्नि वायु तथा आकाश की प्रधानता है और वह उनके गुण रस रूप स्पर्श तथा शब्द का ग्रहण कराती है। 


बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यनर्थान्तरम्। १.१.१५

बुद्धि उपलब्धि और ज्ञान ये तीनों पद समानार्थक है।

अन्य शास्त्रों में बुद्धि शब्द को मन के समानार्थक के रूप में प्रयोग किया गया है (जैसे योगदर्शन) पर यहाँ इस शास्त्र में बुद्धि को ज्ञान अर्थ में लिया गया है।

शुक्रवार, 13 मई 2022

इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्। १.१.१० चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम्। १.१.११

अब सूत्रकार प्रथम प्रमेय आत्मा के लक्षण बताते है।

इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्। १.१.१०

इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दुःख ज्ञान यह आत्मा के लिङ्ग (परिचायक, लक्षण) है।

जब जीव किसी वस्तु से सुख का अनुभव करता है तो जब वह वस्तु पुनः देखता है तब उसे प्राप्त करना चाहता है। मानो किसी व्यक्ति ने आम खाया और उसे उसका स्वाद अत्यंत पसंद आया। अब जब वो आम को फिर कभी देखेगा तो उसे खाने की इच्छा करेगा। जब उसने आम खाया था तब उसका स्वाद रसना ने ग्रहण किया था और अब वह आम चक्षु से देख रहा है इन दोनों इन्द्रियों के पीछे यदि अनुभूति/ज्ञान/भोग करने वाला कोई एक ही न हो तो जैसे किसी एक व्यक्ति की अनुभूति दूसरे के साथ नहीं जुड सकती ऐसे ही रसना और चक्षु इन्द्रिय से प्राप्त ज्ञान जुड नहीं पाते। वह जो अलग अलग इन्द्रिय के विषयों को भोगता है और पूर्व के अनुभव(ज्ञान) के आधार पर इच्छा द्वेष(*अनिच्छा) करता है, इच्छा/द्वेष(अनिच्छा) के आधार पर विषय को पाने/छोडने के लिए प्रयत्न करता है, उसको पाकर/त्यागकर सुख और न पाकर/न त्यागकर दुःख की अनुभूति करने वाला कोई एक है और उससे आत्मा का अनुमान हो सकता है।

*द्वेष शब्द वर्तमान में किसी का बुरा चाहना अर्थ में प्रचलित है पर मूलतः यह शब्द द्विष् धातु से बना है जिसका अर्थ अप्रीति है (द्विषँ अप्रीतौ) अर्थात् प्रीति का अभाव मात्र, शत्रुता अथवा वैमनस्य का होना नहीं।

इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दुःख और ज्ञान इनको आत्मा के विशेष लक्षण, अर्थात् गुण बताये है। समवायी गुण जैसे पृथ्वी में गंध, जल में रस, अग्नि में रूप इत्यादि। गुण क्योंकि गुणी के बहार नहीं रह सकते गुण को देखकर गुणी का अनुमान होता है।

शरीर का लक्षण

चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम्। १.१.११

चेष्टा इन्द्रिय और अर्थों का आश्रय शरीर है।

जो क्रिया ज्ञान, इच्छा और प्रयत्नपूर्वक होती है उसको चेष्टा कहते है। ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न आत्मा के गुण है इनके उभरने पर जो क्रिया शरीर में होती है वह चेष्टा है। और क्योंकि आत्मा के शरीर में न रहते हुए यह नहीं हो सकती शरीर को इनका आश्रय बताया गया है कारण नहीं।

जब शरीर ठीक रहता है तो इन्द्रियाँ* भी ठीक रहती है और जब शरीर की हानि होती है तो इन्द्रियाँ भी ठीक काम नहीं कर पाती अथवा विनाश को प्राप्त होती है जिससे इन्द्रिय शरीर के आश्रित होना स्पष्ट होता है। 

इन्द्रिय को दो भागों में देखा जाता है। सूक्ष्म इन्द्रिय और स्थूल इन्द्रिय (जिसको गोलक कहा जाता है। आँख कान इत्यादि)। सूक्ष्म इन्द्रिय आत्मा के साथ रहती है (जड प्रकृति से बनी होने पर भी। जब तक आत्मा मुक्ति को प्राप्त नहीं करता) और शरीर की हानि होने पर यद्यपि इनकी हानि नहीं होती पर स्थूल इन्द्रिय के न रहने पर / ठीक से न काम करने पर यह भी आत्मा को संवेदना पहुँचाने में असमर्थ रहती है। यहाँ हम इन्द्रिय से स्थूल इन्द्रिय (गोलक) का ही ग्रहण करेंगे जिसका आश्रय शरीर है। 

सुख दुःख की अनुभूति का सामर्थ्य आत्मा का है शरीर का नहीं पर यह संवेदना शरीर (इन्द्रिय जो स्वयं शरीर पर आश्रित है) के न होते हुए आत्मा नहीं कर सकता।  अर्थात् इन संवेदनाओं (जिसमें सारा अर्थ आ जाता है) का आश्रय भी शरीर है।

शनिवार, 7 मई 2022

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् । १.१.९

प्रथम सूत्र में दिए गए १६ पदार्थ में से द्वितीय प्रमेय है। सूत्रकार अब इसके विभाग बताते है।

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् । १.१.९

आत्मा शरीर इन्द्रिय अर्थ बुद्धि मन प्रवृत्ति दोष प्रेत्यभाव फल दुःख अपवर्ग यह प्रमेय है। 

इस शास्त्र में यह १२ प्रमेय लिये है इस का तात्पर्य यह नहीं है की इन १२ के अतिरिक्त कोई वस्तु जानने योग्य नहीं है। इस का तात्पर्य यह है की इस शास्त्र ने इन प्रमेयों के लिए अपने को अधिकृत किया है। इन प्रमेयों को लेते हुए भी इस शास्त्र का मुख्य विषय प्रमाण ही है।

एक तरह से ऐसे भी समझ सकते है जैसे हम कोई भी दुकान में हम जाए तो वहां तराजू मिलता है (जैसे कोई भी क्षेत्र में हमें प्रमाणों का प्रयोग करना पडता है) पर यदि हम तराजू की दुकान में जाए तो तराजू को हम देख सके इस लिए वहां पदार्थ रहते है। पर पदार्थ वहां मुख्य वस्तु नहीं है जैसे अन्य दुकानों में। पर इस का अर्थ यह भी नहीं है की इन प्रमेयों की स्वतंत्र उपयोगिता कम है। शास्त्र रचयिता ने ऐसे प्रमेय नहीं लिए है जो प्रमाणों का उपयोग कैसे करते है यह दर्शाने के काम तो आये पर उनका बाकी कोई उपयोग न हो। यह जानने योग्य पदार्थों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण भी लिए गए है। 

इन १२ प्रमेय में भी मुख्य प्रमेय आत्मा है। क्योंकि आत्मज्ञान के बिना अपवर्ग प्राप्ति नहीं होती। बाकी के प्रमेय आत्मज्ञान तक पहुंचने में सहायक है। इन सारे प्रमेय के सूत्र आगे आएंगे पर संक्षिप्त में भाष्यकार इनको यहां भी बताते है। 

आत्मा : यह सर्व वस्तुओं को देखने वाला, भोगने वाला, अनुभव करने वाला और सर्वज्ञ है। सर्व = वो सब जो सारी इन्द्रियां ग्रहण करती है और मन उनको आत्मा तक पहुंचाता है, वो सब जो विषय मन ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचता है और सर्व सुख दुःख। इस लिए आत्मा को सर्वज्ञ भी कहते है। शरीर और मन द्वारा प्राप्त सर्व अनुभूतिओं को जानने वाला।

ध्यान रहे सर्वज्ञ का अर्थ सबकुछ जानना वाला नहीं है। सर्व अर्थ को जानने वाला तो मात्र परमात्मा ही है और उसे भी आत्मा के नाम से कहा जाता है पर यहां वह अर्थ नहीं है।

कहां किस शब्द का अर्थ कैसे करना है यह मीमांसा दर्शन का विषय है वहां जैमिनी मुनि ने एक सिद्धांत दिया है की सर्व शब्द का अर्थ अधिकारक्षेत्र के अंदर आने वाले / विषय सम्बन्धी सर्व के लिए होता है। जैसे जब मां बच्चे को कहती है की सारा दूध पी जाओ तो उसका अर्थ बच्चे को जितना दूध पीना है उतना सारा दूध होता है। घर में पतीला भर के दूध है वह अथवा पूरे गांव में है वह सारा दूध नहीं।

न्यायदर्शन का विषय आत्मा तक ही सीमित है क्योंकि आत्मा के प्रत्यक्ष तक स्वयं के प्रयत्न होते है और वहां तक हम अपने करण के उपयोग से पहुंचते है। परमात्मा को न तो हम हमारे प्रयत्न से प्राप्त कर सकते है न ही हमारे पास कोई ऐसा करण है जो उसका प्रत्यक्ष करा सके। आत्मा स्वयं के प्रत्यक्ष के पश्चात जब उस लायक हो जाता है तो वह स्वयं अपनी उपलब्धि करवाता है।

शरीर : यह आत्मा के भोगों का आधार है। शरीर में रहते ही आत्मा सुख दुःख भोग सकता है। 

इन्द्रिय : यह आत्मा के भोग के साधन है। यहां पांच बाह्य इन्द्रियों (श्रोत त्वक् चक्षु रसना(जिह्वा) घ्राण जो हमें शब्द स्पर्श रूप रस गंध के ज्ञान करवाती है।) को ही लिया जायेगा क्योंकि सूत्रकार ने छठी इन्द्रिय मन को अलग प्रमेय के अंतर्गत लिया है।

अर्थ : शब्द स्पर्श रूप रस गंध यह अर्थ है जिनको इन्द्रियां ग्रहण करती है और मन आत्मा तक पहुंचता है। 

बुद्धि : वह भोग है जो आत्मा करता है (=ज्ञान, उपलब्धि)

मन : यह आंतरिक करण (इन्द्रिय) है। बाह्य इन्द्रियां मात्र अपने अपने नियत विषय का ही ग्रहण कर सकती है। जैसे चक्षु इन्द्रिय गंध रस स्पर्श अथवा शब्द का ग्रहण नहीं कर सकती और ऐसे ही अन्य इन्द्रियां। परन्तु मन सर्व विषय के ग्रहण का साधन (करण) है। (यहां भी सर्व का अर्थ है जीवात्मा का जिन विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य है वह सर्व।). मन की यह विशिष्टता को देखते हुए मन इन्द्रिय होते हुए भी इस को इन्द्रिय (जहां मात्र बाह्य इन्द्रियों का ग्रहण किया है) से पृथक इन १२ प्रमेयों में लिया है।    
 
प्रवृत्ति, दोष  : दोष और दोष पूर्वक प्रवृत्ति वह शरीर इन्द्रिय अर्थ बुद्धि सुख दुःख के उत्पन्न होने के कारण है।  

प्रेत्यभाव : एक देह को त्याग कर अन्य देह ग्रहण करना। अर्थात् ऐसा नहीं है की वर्तमान देह के पहले हमारे और देह नहीं थे न ही ऐसा है के वर्तमान के बाद और नहीं होंगे। यह आत्मा का देह प्राप्ति का क्रम जो अनादि काल से चल रहा है और अपवर्ग तक चलता रहेगा यह प्रेत्यभाव है।

फल : साधन सहित सुख दुःख की प्राप्ति फल है। ध्यान रहे यहां मात्र सुख दुःख नहीं कहा गया और एक तरह से साधन ही मुख्य फल है। साधन हमें मुफ्त में नहीं मिलते। कर्माशय में से पुण्य खर्च करके मिलते है। फिर वह साधन का उपयोग हम कितना सुख दुःख पाने के लिए करते है यह हम पर निर्धारित है।

जैसे मानो आपने एक अच्छा tele lens ख़रीदा bird photography के लिए। अब उसके पैसे तो हर एक ख़रीदकर्ता को एक से देने पडेंगे फिर चाहे कोई उसका बहोत ही उत्कृष्ट, कोई मध्यम और कोई उसका निकृष्ट प्रयोग करें। ऐसे ही हमने खूब सारे पुण्य खर्च करके मनुष्य शरीर और अच्छे से काम करने वाली इन्द्रिया ली यह हमारे कर्माशय का फल होगा। अब हम पर निर्भर है की हम इन साधन का क्या उपयोग करें। हम इन साधन का ऐसा उपयोग भी कर सकते है की इनके लिए किया गया खर्चा अनेक गुना वापस मिल जाये या फिर पैसे डुबो भी सकते है और डुबोने पर आये तो हम इस का उपयोग करके अपने आप के बडे बडे नुकसान भी कर सकते है जो मनुष्येतर शरीर में रहते हुए नहीं हो सकते है।

दुःख : यहां दुःख का अर्थ सुख का न होना नहीं है। परन्तु जब सुख भी होता है तब भी हमेशा वह दुःख से लिप्त ही होता है इसको जानना है। 

अपवर्ग : जन्म मरण प्रवाह के उच्छेद को अपवर्ग कहते है जहां लेश मात्र भी दुःख नहीं है और परमात्मा का अनंत सुख है। यह जान लेने से की एक भी (सांसारिक, शरीर रहते हुए मिलने वाला) सुख दुःख से रहित हो ही नहीं सकता, मनुष्य वह सब दुःख लाने वाले सुखों से भी विरक्त होगा और उसका अपवर्ग का मार्ग प्रशस्त होगा।

प्रश्न :- 

१) नीचे में से कौन कौन से कथन सही है?

क) सूत्रकार ने इस शास्त्र के लिए प्रमेय इस लिए लिए है की प्रमाणों का प्रयोग कैसे करना है वह दिखाने के लिए उन्हें प्रमेयों की आवश्यकता थी। 
ख) सूत्रकार ने सर्वश्रेष्ठ प्रमेय इस शास्त्र में लिए है जिनके जान लेने से अपवर्ग की प्राप्ति होगी। 
ग) इन १२ प्रमेयों में मुख्य प्रमेय आत्मा है। बाकि ११ आत्मा को समझने में सहायक है। 
घ) यहां भाष्यकार ने आत्मा को सर्वज्ञ कहा है। इससे स्पष्ट है की आत्मा का अर्थ इस शास्त्र में परमात्मा होता है क्योंकि उसके अतिरिक्त सब कुछ कोई नहीं जानता।

२) जब मन भी इन्द्रिय है तो प्रमेयों में जहां इन्द्रिय पहले ही आ चूका है मन को फिर क्यों लिया गया है?

३) आत्मा शरीर में रहते हुए इन्द्रियों और मन से गृहीत अर्थ का ज्ञान प्राप्त करता है (भोगता है). इसमें इस सूत्र में प्रयोग किया गया शब्द बुद्धि किस वस्तु के लिए प्रयोग किया है?

शुक्रवार, 6 मई 2022

स द्विविधों दृष्टादृष्टार्थत्वात् । १.१.८

स द्विविधों दृष्टादृष्टार्थत्वात् । १.१.८ 

वह (शब्द प्रमाण) दो प्रकार का होता है। दृष्टार्थ (इस जन्म में प्रत्यक्ष होने वाले विषय वाला) और अदृष्टार्थ (इस जन्म में प्रत्यक्ष न होने वाले विषय वाला।)

दृष्टार्थ : शब्द प्रमाण से जाने गए अर्थ का इसी जन्म में प्रत्यक्ष किया जा सके वह दृष्टार्थ है। जैसे किसी ने कहा की अमुक जगह पर मेला लगा है। हम वहां जा कर उसका प्रत्यक्ष कर सकते है। जीवन में ऐसे शब्द प्रमाण व्यवहार चलाने में प्रचुर मात्रा में उपयोग में आते है।

अदृष्टार्थ : शब्द प्रमाण से जाने गए अर्थ का इसी जन्म में प्रत्यक्ष न किया जा सके वह अदृष्टार्थ है। यदि कोई शब्द प्रमाण अगले जन्मों के बारे में कुछ बताता है तो उस अर्थ को हम इस जन्म में देख नहीं सकते और अगले जन्म में हमें यह याद नहीं होगा की हमने पिछले जन्म में शब्द प्रमाण से कुछ जाना था। 

तो क्या ऐसे विषयों के बारे में हम शब्द प्रमाण से अतिरिक्त कुछ नहीं जान सकते? जान सकते है। अनुमान प्रमाण का प्रयोग हम ऐसी जगहों पर कर ही सकते है।
  
उदाहरण के लिए यह शब्द प्रमाण ले लेते है की आत्मा है। (यह वैसे तो दृष्टार्थ में आयेगा क्योंकि आत्मा का (स्वयं का) प्रत्यक्ष संभव है। पर ऐसा करना इतने अल्प संख्या में योगिओं के लिए ही संभव है की सामान्य जन के लिए वह अदृष्टार्थ कहा जा सकता है। हम आत्मा का प्रत्यक्ष करने में असमर्थ होते हुए भी इच्छा द्वेष प्रयत्न आदि को देखकर आत्मा का अनुमान कर सकते है।

यह दो विभागों को स्पष्टता से बताने का उद्देश्य यह है की हम अदृष्टार्थ को शब्द प्रमाण न माने यह न हो। जैसे की वेदों में आए हुए अदृष्टार्थ शब्द प्रमाण।  
परमात्मा सबसे बडा आप्त है क्योंकि वह सर्वज्ञ है और हमारे उपकार के लिए उसका उपदेश होता है। इस लिए वेद जो ईश्वर का उपदेश है (जो वह प्रत्येक सृष्टि के प्रारंभ में श्रेष्ठ ऋषिओं के अंतःकरण में प्रकाशित करता है।) शब्द प्रमाण है।* और ऐसे शब्द प्रमाणों को भी अनुमान प्रमाण से जानने के प्रयत्न किए जा सकते है।

*वेद अथवा अन्य वेद सम्मत शास्त्र को शब्द प्रमाण मानने का अर्थ यह बिलकुल नहीं है की कोई भी उनका जो अर्थ करने लगे वही शब्द प्रमाण है। या तो हम व्याकरण निरुक्त वगैरह पढकर, हमारे अंतःकरण को पूर्ण निर्मल और पवित्र बनाकर अपने आप को इस लायक बनाए जिससे हम उनका अर्थ स्वयं समझ सके अथवा ऐसा आप्त ढूंढे जो हमें अर्थ बता सके। (और वहां पहुंचने के लिए भी हमें कई शब्द प्रमाणों से लाभान्वित होना पडेगा तो हमें आप्त तो ढूंढना ही पडेगा।)

प्रश्न :-

१) शब्द प्रमाण वह है जहां हम आप्त उपदेश से कोई वस्तु जानते है और ऐसा करके जब हमें ज्ञान मिल ही जाता है तो अनुमान प्रमाण अथवा प्रत्यक्ष से जानने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। सही/गलत?

२) वेद और वेद सम्मत ऋषिकृत शास्त्र में कही गयी वस्तु शब्द प्रमाण है फिर भले ही वह अदृष्टार्थ हो। सही/गलत?

३) जब भाई मैक्समूलर हमें वेदो का अर्थ समझाते है तो वह हमारे लिए शब्द प्रमाण है क्यों की वेद में कही गयी बात ईश्वर का शब्द होने से शब्द प्रमाण है। सही/गलत? क्यों?

४) आप अपने मित्र को मिलने उसके घर जाते है। आंगन में उसका ४ साल का बच्चा खेल रहा है। वह आप को बताता है की पापा तो घर पर नहीं है और आप वापस आ जाते है। क्या यहां बच्चे द्वारा दी गयी जानकारी शब्द प्रमाण है?

रविवार, 1 मई 2022

प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्। १.१.६ आप्तोपदेशः शब्दः। १.१.७

प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्। १.१.६
 
प्रसिद्ध वस्तु के जाने हुए समान धर्म से साध्य(जानने योग्य) वस्तु का ज्ञान कराने वाला साधन उपमान प्रमाण कहलाता है।

धर्म =जो भी द्रव्य में रहता है वह उसका धर्म कहलायेगा। गुण, कर्म, जाती
(इस दृष्टि से गुण - गुणी की तुलना में धर्म - धर्मी अधिक व्यापक है।)
सधर्म = समान धर्म
साधर्म्य = समान धर्म का होना 

जब कोई वस्तु के धर्म आप जानते हो और यह भी जानते हो की कोई अन्य वस्तु में इससे मिलते जुलते अमुक अमुक धर्म है (परन्तु उस अन्य वस्तु को नहीं जानते), उसके पश्चात अन्य वस्तु का प्रत्यक्ष करते समय उन जाने हुए समान धर्मों को वहां भी पा कर प्रत्यक्ष की जा रही वस्तु के साथ अन्य वस्तु का नाम जोडना यह उपमान प्रमाण का काम है।

जैसे आप को जंगल में जा कर मुद्गपर्णी और शालपर्णी (यह दो औषधीय पौधे है) लाने के लिए कहा गया। आप इन औषधियों को नहीं जानते पर आप को बताया  गया की इनके नाम इनके पर्ण मुंग और उडद (मुद्ग और शाल) के पत्तों के समान होने से है और आप मुंग और उडद के पौधों को पहचानते हो। तो अब जब जंगल में मुद्गपर्णी और शालपर्णी देखोगे तब उन के पत्तों को देखकर उन पौधों से उनका नाम जोड पाओगे (उनकी पहचान कर पाओगे)।

यहां आपका मुंग और उडद के पर्ण कैसे है यह जानना पहले का प्रत्यक्ष था (अब स्मृति में से आया था।)
आपका यह जानना की मुद्गपर्णी और शालपर्णी के पत्ते मुंग और उडद के पत्ते के समान होते है यह पहले का शब्द प्रमाण था (अब स्मृति में से आया था।)
मुद्गपर्णी और शालपर्णी का आप अभी प्रत्यक्ष कर रहे हो। 
उपमान प्रमाण यहां प्रत्यक्ष की जा रही वस्तु से उसका नाम जोडने का कार्य कर रहा है।

'जैसे यह वैसे वह' कहकर बोला जाता है वह उपमान प्रमाण है। अनुमान प्रमाण के पंचावयव में चतुर्थ अवयव उपनय उपमान प्रमाण सदृश्य है। (जैसे रसोई में धुआं आग के कारण था ऐसे ही पर्वत पर)


अब शब्द प्रमाण का सूत्र देखते है। 

आप्तोपदेशः शब्दः। १.१.७ 
आप्त पुरुष का कथन शब्द प्रमाण कहलाता है।

आप्त =वह पुरुष (=व्यक्ति) जिसने जिस पदार्थ का विषय है उसका साक्षात्कार किया है।
साक्षात्कार = जो वस्तु जैसी है उसको उसी रूप में निश्चयपूर्वक जानना।

ऐसा जानकार व्यक्ति (=पदार्थ का साक्षात्कृतधर्मा पुरुष = आप्त) जब उस विषय के बारे में अन्यों को बताने के लिए प्रवृत्त होता है तब उसका कथन शब्द प्रमाण कहलाता है। 

आप्ति शब्द आप् (आपॢँ व्याप्तौ) से बनता है जिसका अर्थ है पूर्ण जानकारी। उस आप्ति के साथ अपने कार्य में प्रवृत्त होने वाला पुरुष आप्त है। 

यह लक्षण उत्तम विद्वान, साधारण जन और अति सीमित ज्ञान रखने वालों पर एक सा लागू होगा। जिस जिस विषय में उनको यथार्थ जानकारी है उन उन विषय में वह आप्त बन सकते है।

जगत में अनेक व्यवहार इसी प्रमाण के आधार पर चलते है और मात्र मनुष्य ही नहीं, अन्य जीव भी (अन्य प्रमाणों के साथ साथ) इसका उपयोग करते है।