शुक्रवार, 17 मार्च 2023

योगदर्शन १.६-८

हमने देखा की कुछ वृत्तियाँ दुख का कारण बनती है जो क्लिष्ट वृत्तियाँ है और कुछ दुख दूर होने (ज्ञान, मुक्ति) का कारण बनती है जो अक्लिष्ट वृत्तियाँ है। यह वृत्तियाँ (मन की प्रवृत्तियाँ) वैसे तो अनेक है पर उन्हें पांच प्रकार में विभाजित कर समझ सकते है। जो अगला सूत्र बता रहा है।

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः। १.६

चित्त की वृत्तियाँ पांच प्रकार की है। प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृति। प्रत्येक प्रकार के लिए आगे सूत्र दिए गए है तो उन्हें उन सूत्रों के अंतर्गत देखेंगे।

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि। १.७

प्रत्यक्ष अनुमान आगम प्रमाण है।

न्यायदर्शन में हमने प्रमाणों को विस्तार से देखा था यहाँ संक्षेप से,

प्रत्यक्ष : इंद्रियों के द्वारा चित्त का बाह्य विषय से उपराग होने पर विषय चित्त तक पहुँचने से चित्त बाह्य विषय से (उसके ज्ञान से) उपरक्त होगा (रंग जाएगा) जिसको प्रत्यक्ष कहते है। जिस वस्तु से इंद्रिय का संपर्क हो रहा है उसमें सामान्य तथा विशेष दोनों धर्म होंगे और दोनों का ज्ञान पहुंचेगा परंतु प्रत्यक्ष में विशेष धर्म की प्रधानता रहती है।

इंद्रिय बाह्य विषय के उसी गुण को ग्रहण करेगी जिसकी उसमें स्वयं में प्रधानता है। अर्थात् जिस द्रव्य की प्रधानता उसकी रचना में है उसके गुण को। चक्षु इंद्रिय में अग्नि की प्रधानता है वह रूप को ग्रहण करेगी, श्रोत्र में आकाश की वह शब्द को, रसना में जल की वह रस को तो स्पर्शन इंद्रिय में वायु की प्रधानता होने से वह स्पर्श को और घ्राण इंद्रिय में पृथ्वी की प्रधानता होने से वह गंध को ग्रहण करेगी। प्रत्येक इंद्रिय मात्र स्वयं का विषय ही ग्रहण कर सकती है अन्य कोई विषय नहीं जैसे आँख से सुन नहीं सकते, कान से चख नहीं सकते।

अनुमान : लिंग को जान कर लिंगी का ज्ञान होना अनुमान प्रमाण है। अनुमान प्रमाण में सामान्य ज्ञान की प्रधानता रहती है। वह निश्चित ज्ञान होने पर भी प्रत्यक्ष की भांति विशेष प्रधान नहीं होता।

आगम : आप्त के उपदेश को जो आप्त ने स्वयं के द्वारा जाना गया अर्थ दूसरे को जनाने के लिए किया है उसे सुन कर हुआ ज्ञान आगम (जो आगे से चला आया है) प्रमाण है। इसे शब्द प्रमाण भी कहते है।


विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्। १.८

विपर्यय मिथ्या ज्ञान है। वह पदार्थ के वास्तविक स्वरूप को प्रकाशित नहीं करता है।

यथार्थ ज्ञान प्रमाण है और मिथ्या विपर्यय। प्रमाण में प्रवृत्ति सामर्थ्य है, विपर्यय में नहीं। जैसे चक्षु से जल दिखने पर यदि वहाँ जा कर जल की प्राप्ति होती है तो वह प्रमाण है पर यदि नहीं (जैसे मृगजल में) तब वह इंद्रिय के द्वारा दिखाया गया होने पर भी मिथ्या ज्ञान अर्थात् विपर्यय है।

विपर्यय का खंडन प्रमाण से होता है। विपर्यय को अविद्या भी कहते है जो समस्त दुखों को उत्पन्न करने का कारण बनती है।

बुधवार, 8 मार्च 2023

मोक्ष पर चित्त आत्मा को छोडता है अथवा आत्मा चित्त को?

हमने पढ़ा था,

"चित्त जीवात्मा की संपत्ति है और चित्त और जीवात्मा का संबंध प्रवाह से अनादि है। यह संपत्ति परमात्मा ने जीवात्मा को भोग और अपवर्ग सम्पन्न करने के लिए अर्थात् धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति के लिए दी है। जब तक उसका काम समाप्त नहीं होता वह आत्मा को छोड कर नहीं जाएगा। मोक्ष पर उसका काम समाप्त हो जाता है और जीवनमुक्त का शरीर समाप्त होने पर चित्त जो प्रकृति से बना है उसका प्रकृतिलय हो जाता है। (i.e. its raw material is fully reclaimed in its pure form - सत्त्व रजस् तमस्)"

i.e. चित्त और आत्मा के संयोग को समझने के लिए ऐसे वाक्य प्रयोग किए गए थे,
"जब तक उसका काम समाप्त नहीं होता वह आत्मा को छोड कर नहीं जाएगा।"
"मोक्ष से पहले चित्त आत्मा को नहीं छोडेगा, उसका अधिकार समाप्त करना = मोक्ष प्राप्ति"

परंतु कुछ विचार करने पर मैं स्वयं इस संयोग को समझने के लिए इस तरह के शब्द प्रयोग नहीं करना चाहूँगी।

हम भले ही यह जानते है की चेतन आत्मा है और चित्त तो जड पदार्थ है और कर्तृत्व चेतन में ही होता है जड में नहीं, और हम यह भी समझते है की मोक्ष पर आत्मा को चित्त रूपी साधन की आवश्यकता नहीं रहेगी और इस आवश्यकता के अभाव के कारण संयोग समाप्त होगा। ऐसे में, "चित्त का अधिकार", "चित्त का आत्मा को छोड को जाना" एक आलंकारिक अथवा कहो सामान्य रीति से बोलचाल में प्रयोग होने वाली भाषा जिसका तात्पर्य हम समझते है (की कार्य जड नहीं कर रहा।) उस भांति का प्रयोग है। यह स्वीकार करते हुए भी की इसको आलंकारिक/बोलचाल वाले प्रयोग के रूप में समझना कठिन नहीं है, मुझे ऐसे वाक्य प्रयोग करने में फिर भी यह आपत्तियाँ है।

१) इंद्रियों का ऐसा प्रयोग जो ज्ञान से विपरीत हो प्रज्ञा अपराध कहा जाता है जो सर्व रोग, दुखों का कारण बनता है। तो यह जानते हुए की कर्तृत्व चेतन में है, वाणी से जड में उसका प्रयोग करने का कोई औचित्य नहीं है।

२) खास करके प्रारंभिक विद्यार्थी, जो अभी सिद्धांतों को पहेली बार सिख रहा है, आत्मसात कर रहा है, वहाँ यह उसके सर्वश्रेष्ठ साधन चित्त की कार्यक्षमता में बाधा उत्पन्न करेगा। आत्मा चेतन होने से वह ज्ञान को ग्रहण करेगा पर चित्त जड होने से उसमें मात्र जानकारियों का संग्रह होगा। चित्त रूपी साधन हमें न मात्र जानकारियों का संग्रह करने के काम आता है पर समय आने पर उन जानकारियों को उभारने (स्मृति), उनको नए प्रसंग के संदर्भ में जोडकर नए ज्ञान तक पहुँचने में सहायक होने (तर्क/अनुमान) के काम भी आता है।

ऐसे में, इतनी महत्वपूर्ण/मार्मिक जानकारी को 'जड कार्य कर रहा है परंतु याद रहे यह मात्र सामान्य भाषा प्रयोग है वास्तव में चेतन ही कार्य करता है।' इस रूप में संग्रह न करते हुए सीधे सीधे 'चेतन कार्य करता है' इस रूप में संग्रहीत करना हमारे आगे के ज्ञान प्राप्ति के प्रयत्नों में अधिक उपयोगी होगा। चित्त में गलत संस्कार और साथ में एक note की यह संस्कार गलत है डालने से अच्छा नहीं है की हम सही संस्कार ही डालें? और फिर संग्रहीत जानकारी के प्रयोग का अवसर आने पर हो सकता है की यह note कहीं मिले तो कहीं छूट भी जाए।

आत्मा का चित्त को छोड देना समझना सरल भी है। आत्मा हमेशा सुख प्राप्ति के उपाय करता रहता है। क्योंकि चित्त रूपी साधन उसे सुख प्राप्ति में सहायक बनता है वह उससे काम लेता रहता है। परंतु जब आत्मा स्वयं को उस लायक बना लेता है की चित्त के उपयोग से मिलने वाले सुख से भी अधिक सुख प्राप्त कर सके, चित्त का उसे तब कोई उपयोग नहीं रहता। तो अब चित्त रूपी inferior साधन से संयोग का (दुख रूपी) मूल्य चुकाने का कोई औचित्य भी नहीं बनता।

उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के नेत्र ठीक न होने से उसे उपनेत्र लगाने की आवश्यकता पड़ती थी पर अब उसने अपने नेत्र को ठीक कर लिया है और बिना उपनेत्र के भी अच्छे से देख सकता है तब हम कहेंगे की उसके उपनेत्र छूट गए न की उसके उपनेत्र उसे छोड कर चले गए। ऐसे ही मोक्ष पर चित्त का छूटना है।

हाँ हो सकता है जब सारे सिद्धांत दृढ हो तब तो ऐसे शब्द प्रयोग से कोई नुकसान न हो जैसे हम सूर्य उगा कहते है पर हमारे मन में हमेशा यह स्पष्ट होता है की पृथ्वी घूमी है तब सूर्य क्षितिज पर दिख रहा है। ऐसे ही यहाँ विद्वानों को चित्त चला गया कहने पर कोई अंतर नहीं आएगा पर जब तक हम स्वयं को विद्वान की कोटि में न रखे तब तक कर्तृत्व का प्रयोग चेतन में ही करना उचित लगता है।

रविवार, 22 जनवरी 2023

योगदर्शन १.५

चित्त की वृत्तियों के रोध को योग कहते है। वह वृत्तियाँ कैसी है वह जानेंगे तो उनका निरोध कर पाएंगे। पाँचवाँ सूत्र हमें वृत्तियों के बारे में बताता है।

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टा। १.५

वृत्तियाँ पांच प्रकार की होती है। क्लिष्ट तथा अक्लिष्ट।

(वृत्तियों के पांच प्रकार हम अगले सूत्रों में देखेंगे। यहाँ भाष्यकार क्लिष्ट अक्लिष्ट समझाते है।)
 
क्लिष्ट वृत्तियाँ वह है जो दुखों को उत्पन्न करने वाली होती है, क्लेश के संस्कार बनाती है। वे कर्माशय के संग्रह में आधाररूप बनती है। यह वृत्तियाँ रोकने योग्य है।

जो वृत्तियाँ ख्यातिविषयक है, जो गुणों (सत्त्व रजस् तमस्) के अधिकार को विरोध करने वाली है (मोक्ष से पहले चित्त आत्मा को नहीं छोडेगा, उसका अधिकार समाप्त करना = मोक्ष प्राप्ति) वह अक्लिष्ट वृत्तियाँ है। अक्लिष्ट वृत्तियाँ कर्मशाय नहीं बनाती है।

चित्त में क्लिष्ट और अक्लिष्ट दोनों वृत्तियों का प्रवाह चलता रहता है और साथ साथ उठने पर भी (एक क्षण में एक तो दूसरे क्षण में दूसरी) वह स्वयं के स्वरूप में ही रहती है। एक दूसरे के स्वरूप को प्रभावित नहीं करती। मान लो किसी चित्त में भयंकर क्लिष्ट वृत्तियों का प्रवाह चल रहा है और बीच में एक अक्लिष्ट वृत्ति उभरती है तो वह अक्लिष्ट ही रहेगी। ऐसे ही विपरीत दिशा में, प्रबल अक्लिष्ट प्रवाह में यदि एक क्लिष्ट वृत्ति उभरती है तो वह क्लिष्ट ही रहेगी। एक के प्रवाह में दूसरी पानी में रंग की भांति नहीं घुल जाएगी अपितु पानी में काष्ट की भांति स्वयं के रूप में ही रहेगी।

वृत्तियाँ चित्त के परिदृष्ट (जो दिखते है ऐसे) धर्म है। उठ रही वृत्तियों के उपरांत चित्त में अन्य अनेक संस्कार भी है जो दिख नहीं रहे वे चित्त के अपरिदृष्ट धर्म है। यह दोनों एक दूसरे को उत्पन्न करते रहते है। वृत्ति से संस्कार बनेंगे, संस्कार से वृत्ति उठेगी, वृत्ति से संस्कार बनेंगे। यह चक्र दिन रात चलता ही रहता है। जो वृत्तियाँ हम उठाते है उसके संस्कार दृढ होते जाते है और जिसे नहीं उठाते उसके क्षीण। हमें चाहिए की हम अक्लिष्ट वृत्तियाँ उठाकर उसके संस्कार को पुष्ट करें और क्लिष्ट वृत्तियों को रोककर उनके संस्कार को क्षीण करें।

यह आत्मा का निर्णय है की किस वृत्ति को वह उभारे और किस को रोकें वृत्तियों पर नियंत्रण मन का नहीं आत्मा का ही होता है। ऐसे में हमें क्लिष्ट को रोकना और अक्लिष्ट को उभारना चाहिए। यदि क्लिष्ट प्रवाह अत्यंत प्रबल हो तो ऐसा करना असंभव सा लग सकता है परंतु असंभव का कभी भी उपदेश नहीं होता। (सांख्य में सूत्र आता है जो कहता है की असंभव का उपदेश नहीं होता क्योंकि यदि असंभव का उपदेश करो भी तो वह अनुपदेश ही होता है। जो संभव ही नहीं है उसका क्या उपदेश।) अर्थात् यदि ऐसा करना उचित है यह उपदेश दिया गया है तो वैसा करना असंभव नहीं है।

(Think of an AI trained with wrong answers. If you simply agree to every answer it generates you will reinforce its incorrect training. but if you keep giving correct feedback for wrong and right answers, add new training data with correct answers, it will start retraining itself based on the feedback.

Now see that what we are talking about is not some artificial model trained with a unimaginably thin slice of time's data but a natural model trained over say crores (i.e. uncountable) number of births - where the data includes almost all possible conditions and our choices every moment in those conditions.

Do you see why it was stressed that that efforts to retrain it, one decision at a time, is still something we should do it, that it is NOT impossible to retrain it? Because the task may appear impossible, hence the reassurance that it isn't.

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शनिवार, 21 जनवरी 2023

योगदर्शन १.३, १.४

चित्तवृत्ति का निरोध हो जाने पर योगी की क्या स्थिति होती है यह तृतीय सूत्र में कहा गया है।

तदा दृष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्। १.३

तदा = उस काल में 
दृष्टुः = जो सब देखने वाला है।
१) जो चित्त में आई सभी वस्तुओं को देखता है अर्थात् आत्मा (संप्रज्ञात समाधि में) और 
२) जो सब देखता है अर्थात् परमात्मा (असंप्रज्ञात समाधि में)
स्वरूपे = के स्वरूप में
अवस्थानम् = स्थिति बनती है।

उस काल में आत्मा की स्वयं / परमात्मा के स्वरूप में स्थिति बनती है।


चित्त की अन्य भूमियों में जीवात्मा की स्थिति क्या बनती है?

वृत्ति सारूप्यमितरत्र। १.४

वृत्ति सारूप्यम् = वृत्तियों के समान रूप वाला प्रतीत होता है
इतरत्र = अन्य भूमियों में (एकाग्र और निरुद्ध भूमि से अन्य भूमियों में)

अन्य भूमियों में जीव चित्त में चल रही वृत्तियों से स्वयं का सारूप्य मानता है। भले ही वह ऐसा (चित्त में उभर रही वृत्तियों जैसा) होता हुआ भी ऐसा वास्तव में न हो पर वह योग से भिन्न भूमियों में (व्युत्थान अवस्था में) स्वयं को ऐसा ही मानता है। यह एक सामान्य मनुष्य और एक योगी जो समाधि से लौटा है, जिसने अपने क्लेश क्षीण कर लिए है उन दोनों के लिए सत्य है। (परंतु उन दोनों की वृत्तियों में अंतर रहेगा।)

ऐसा इस लिए की जनाने की शक्ति आत्मा की स्वयं की होते हुए भी वह स्वयं बिना साधन के कुछ नहीं जान सकता। जीवनमुक्ति के पहले चित्त उसका वो साधन है जिसकी सहायता से वह सब कुछ जनता है। (मुक्तवस्था में ज्ञान परमात्मा देता है)।

चित्त बना ही है उस काम के लिए। चित्त और आत्मा के इस संबंध से चित्त को अयस्कांतमणि भी कहते है। अयस = लोहा, अयस्कांत = लोहा जिसे प्रिय है वह = लोहचुंबक। आत्मा लोहे की भांति है और चित्त उससे चिपका रहता है। उसमें जो भी आता है जा कर आत्मा को दिखाता है। वो जीवात्मा का सन्निधि मात्र से उपकार करता है अर्थात् उसको जीवात्मा का उपकार करने के लिए उसका जीवात्मा के पास होना ही पर्याप्त है अन्य कोई कारण नहीं चाहिए।

चित्त जीवात्मा की संपत्ति है और चित्त और जीवात्मा का संबंध प्रवाह से अनादि* है। यह संपत्ति परमात्मा ने जीवात्मा को भोग और अपवर्ग सम्पन्न करने के लिए अर्थात् धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति के लिए दी है। जब तक उसका काम समाप्त नहीं होता वह आत्मा को छोड कर नहीं जाएगा। मोक्ष पर उसका काम समाप्त हो जाता है और जीवनमुक्त का शरीर समाप्त होने पर चित्त जो प्रकृति से बना है उसका प्रकृतिलय हो जाता है। (i.e. its raw material is fully reclaimed in its pure form - सत्त्व रजस् तमस्)

*अनादि = जिसका कोई आदि न हो, प्रवाह से अनादि = जिसमें बीच बीच में व्यवधान आते हो पर व्यवधान के पश्चात वह फिर होता हो। ऐसा क्रम जिसमें यह क्रम का कोई आदि न हो। जैसे सृष्टिक्रम, जैसे दिन रात।

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शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

योगदर्शन १.२ (भाग ३)

चित्त की एकाग्र भूमि की सर्वोच्च समाधि अस्मितानुगत समाधि है जहां जीव स्वयं का प्रत्यक्ष करता है। वह चित्त और स्वयं को पृथक पृथक देख पाता है सत्वपुरुषान्यताख्याति को प्राप्त करता है। 

जानना आत्मा का गुण है पर जीव जनाने के लिए मन को देखता रहता है और जो जो वस्तु मन दिखाता है वह वह देखता रहता है। (मन जड होने से आत्मा के निर्देशानुसार चलता है पर यहाँ तात्पर्य यह है की मन रूपी साधन के बिना आत्मा तक ज्ञान नहीं पहुंचता)। आत्मा मन की वृत्तियों के समान ही स्वयं को समझता रहता है पर जब मन की सभी बाह्य वस्तु को जानने की वृत्तियाँ रोक दी जाती है तब मन आत्मा को उसका स्वयं का रूप दिखाता है।

इसके लिए स्फटिक मणि की उपमा दी जाति है। जैसे स्फटिक मणि के पास कोई पुष्प रख दो तो वह उसी के रंग का दिखता है पर पुष्प हटा लेने पर मणि का स्वयं का रूप दिखता है ऐसे ही चित्त में जो भी वृत्ति विषय आता है आत्मा उसी में स्वयं को देखता रहता है पर अन्य सभी वृत्ति विषय के न रहने पर उसका स्वयं का रूप देख पाता है। (रूप शब्द ज्ञान को कहता है, साकार स्थूल पदार्थों वाले रूप का तात्पर्य आत्मा के संबंध में नहीं होता।)

ध्यान रहे समाधि में चिंतन नहीं है। चिंतन स्मृति आधारित होता है (चिंतन शब्द चिति स्मृत्याम् से बनता है।)। स्मृति भी चित्त की एक वृत्ति है जो धारणा, ध्यान तक रहेगी पर समाधि में मात्र एक ही वृत्ति, प्रत्यक्ष वृत्ति रहेगी। स्मृति सहित अन्य सर्व वृत्तियों का निरोध होने पर समाधि की अवस्था बनेगी।

सत्वपुरुषान्यताख्याति संप्रज्ञात समाधि की उच्चतम अवस्था है।

सत्वपुरुषान्यताख्याति अर्थात् सत्व (चित्त) और पुरुष (आत्मा) की पृथकता के ज्ञान को विवेकख्याति भी कहते है। विवेक (विचिर् पृथकभावे) = पृथक पृथक होने का ज्ञान। 

निरुद्ध : एकाग्र अवस्था में हुई विवेकख्याति से भी जब राग हट जाता है तब आत्मा उस वृत्ति को (स्वयं का प्रत्यक्ष करने की) भी रोक देता है और चित्त से अपना संबंध पूरा तोड देता है। चित्त से भी संबंध समाप्त करने पर अब वह अकेला है (केवल वही है), इस अवस्था को कैवल्य कहते है। एकाग्र अवस्था की समाधि जहां कोई एक विषय का अवलंबन था - बीज था, जो निरुद्ध में नहीं है इसलिए इसे निर्बीज समाधि भी कहते है। अब यहाँ वह कुछ भी जान नहीं रहा है इस लिए इसे असंप्रज्ञात समाधि भी कहा है।
 
इस असंप्रज्ञात समाधि को धर्ममेघ समाधि भी कहते है। धर्म = जो धारण करता है। जीवात्मा का धर्म सुख है। उस धर्म अर्थात् सुख की जिसमें वर्षा होती है, जिसमें ईश्वर अपने आनंद की वर्षा जीवात्मा पर करता है वह समाधि = धर्ममेघ समाधि।

धर्ममेघ समाधि में क्लेशों और कर्मों की निवृत्ति होती है, अर्थात् वह सम्पूर्ण रूप से निर्बीज हो जाते है और योगी जीवनमुक्त स्थिति को प्राप्त करता है।

गुरुवार, 19 जनवरी 2023

योगदर्शन १.२ (भाग २)

चित्त, जो सत्व रजस् तमस् से बना है और मुख्यतः जिसमें सत्व की प्रधानता होते हुए भी तीनों गुण जीवात्मा के प्रयत्न, ज्ञान के अनुरूप कार्यान्वित होते है अथवा दब जाते है, उसकी पाँच भूमियाँ है। क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध, उनके विषय में भाष्यकार बताते है,

क्षिप्त : यह चित्त की रजोगुण प्रधान अवस्था है। यहाँ रजस् और तमस् अधिक कार्यरत रहते है।

जीव इसमें ऐश्वर्य और विषयभोग प्रिय होता है। उसका ध्येय सांसारिक सुखों को भोगना रहता है। (यहाँ उसके ऐश्वर्यप्रिय होने की बात है ऐश्वर्यवान होने की नहीं।) 

यह चित्त की निकृष्ट अवस्था है जहां जीव प्रवृत्तिशील तो होता है पर अविद्याग्रस्त भी। जिससे वह चित्त में अविद्या वाले संस्कार को और दृढ कर लेता है। 

मूढ : यह चित्त की तमोगुण प्रधान अवस्था है, रजस् और सत्त्व दबे रहते है।

चित्त की इस अवस्था में जीव अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य (मोह), अनैश्वर्य की दिशा में जाता है। यह मोह युक्त अवस्था है। (मोह और मूढ दोनों में एक ही धातु है।) तमस् से प्रभावित होने से सांसारिक सुखों, ऐश्वर्य को प्राप्त करने के लिए भी प्रवृत्ति नहीं रहती जिससे अनैश्वर्य की दिशा में गति होती है। प्रवृत्ति की न्यूनता के कारण जीव का स्वयं का नुकसान करने की गति यहाँ क्षिप्त से कुछ कम रहती है।

विक्षिप्त : यह चित्त की सत्त्वगुण प्रधान अवस्था है, यहाँ रजस् की थोडी सी मात्रा रहती है और तमस् एकदम दबा रहता है। भाष्यकार कहते है की यहाँ प्रख्यास्वरूप चित्त, जिसके मोह के आवरण प्रक्षीण हो गए है (तमस् लेशमात्र भी नहीं है), वह चारों और से प्रकाशमान होता हुआ रजस् से अनविद्ध है अर्थात् थोडा सा ही रजस् है जो धर्मयुक्त प्रवृत्ति में सहायक बनता है।

इस अवस्था के चित्त से जीव धर्म ज्ञान ऐश्वर्य वैराग्य की दिशा में जाता है। (क्षिप्त में ऐश्वर्य के लिए मोह था यहाँ ऐश्वर्य की प्राप्ति है पर मोह नहीं।)

यह एक उच्च स्थिति है जिसके आगे योग की भूमियाँ है।

एकाग्र : वह चित्त जिसका थोडी सी मात्रा वाला रजस् भी समाप्त हो गया है, वह अब स्वयं के वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हुवा है।

अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) के अंतिम चरण समाधि में एकाग्र और निरुद्ध अवस्था आएगी। उसके पहले के चरणों में भी उत्तरोत्तर कुछ वृत्ति निरोध और एकाग्रता तो है पर जिसे एकाग्र भूमि कहेंगे वह स्तर की एकाग्रता अष्टांग योग की समाधि है।

इस एकाग्र भूमि में योगी जो विषय चित्त के आगे रखता है उसका प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करता है जिसे संप्रज्ञात समाधि कहते है (सम्यक रीति से प्रकर्ष रूप से जाना जाता है जिसमें)। वह किस को जानता है उससे संप्रज्ञात समाधि के प्रभेद बनते है।

प्रकृति को कार्य से कारण रूप में देखे तो जानने के स्तर यह बनते है।

पञ्च स्थूलभूत (पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश) ^ पञ्च सूक्ष्मभूत/तन्मात्र (पृथ्वी तन्मात्र, जल तन्मात्र ..), सूक्ष्म इंद्रियाँ, मन ^ अहंकार ^ महत् तत्व ^ सत्त्व रजस् तमस् (प्रकृति साम्यावस्था)

यह सारे इंद्रियातीत विषय है अर्थात् जो इंद्रियों से नहीं जाने जा सकते। इंद्रियों से जाने जा सके ऐसे विषयों को जिज्ञासु समाधि के पहले ही जान सकता है।

१. वितर्कानुगत समाधि :  पंच स्थूलभूत पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश के परमाणु* का ज्ञान वितर्कानुगत समाधि के अंतर्गत आएगा। परमाणु का प्रत्यक्ष हम इंद्रियों से नहीं कर सकते (अनेक परमाणुओं से बनी वस्तुओं का कर सकते है)। एकाग्र अवस्था में, जिस स्थूलभूत का प्रत्यक्ष करना है उसी एक विषय को चित्त के आगे रख कर उसका प्रत्यक्ष वितर्कानुगत समाधि में योगी कर सकता है।

*परमाणु = जो सबसे अणु है। जिसके कोई अवयव नहीं है।

२. विचारानुगत समाधि : पंच सूक्ष्मभूत अर्थात् पृथ्वी तन्मात्र, जल तन्मात्र अग्नि तन्मात्र वायु तन्मात्र आकाश तन्मात्र जिसमें से उनके स्थूलभूत बनते है उनसे लेकर महत् तत्व तक का प्रत्यक्ष विचारानुगत समाधि के अंतर्गत आता है।

३. आनंदानुगत : यहाँ योगी प्रकृति का प्रत्यक्ष करता है।

४. अस्मितानुगत : यहाँ जीव स्वयं का प्रत्यक्ष करता है। वह चित्त और स्वयं को पृथक पृथक देख पाता है और स्वयं के स्वरूप को चित्त की सहायता से जानता है। इसे सत्वपुरुषान्यताख्याति (सत्व=चित्त पुरुष=आत्मा अन्यता=पृथकता ख्याति=ज्ञान) कहा जाता है।

मंगलवार, 17 जनवरी 2023

योगदर्शन १.२

योग (संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात समाधि) के लक्षण बताने की अभीप्सा (इच्छा) से अगला सूत्र प्रवृत्त है।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। १.२

निरोध = निश्चित रूप से रुकी हुई अवस्था।

किसका निरोध? चित्तवृत्तियों का निरोध।

वृत्ति = इंद्रियों के व्यापार (आँख से देखना, कानों से सुनना..) को भी वृत्ति कहते है और उन्हें रोकने को प्रत्याहार कहते है। परंतु यहाँ उसकी बात नहीं हो रही है, यहाँ चित्त की उन वृत्तियों को, जो प्रत्याहार के उपरांत भी चलती रहती है (जैसे स्मृति, विकल्प), उन्हें भी रोकने की बात हो रही है।

चित्त की दो प्रकार की वृत्तियाँ होती है। १. ज्ञानात्मक २. धारणात्मक। वृत्ति निरोध मात्र ज्ञानात्मक वृत्तियों के लिए कहा गया है। धारणात्मक वृत्तियाँ, जो शरीर को धारण करने का काम करती है, जैसे रक्त परिभ्रमण, पाचन क्रिया वह चलती रहेगी।

भाष्यकार बताते है की सूत्र में सर्व चित्तवृत्तियों का निरोध न कहे जाने से संप्रज्ञात समाधि, जिसमें चित्त की एक वृत्ति अभी भी है (अन्तःकरण से किया जाने वाला प्रत्यक्ष) वह भी योग पक्ष में आ जाती है।

हम चित्त शब्द का बार बार प्रयोग कर रहे है। इस चित्त शब्द से जिसे हम मन कहते है उसका ग्रहण होता है। अंतःकरण के मन बुद्धि चित्त अहंकार ऐसे भेद किए जाते है यहाँ हम इन सब को/मन बुद्धि चित्त को चित्त शब्द से समझ सकते है परंतु विशेषतः मन जो संस्कारों का आश्रय है उसे ग्रहण करेंगे। इसी चित्त के लिए न्याय में मन तथा सांख्य में बुद्धि शब्द का प्रयोग किया गया है।

चित्त त्रिगुणात्मक है, सत्त्व रजस् तमस् से बना है। जैसे हम देख चुके है, सत्त्व रजस् तमस् द्रव्य है और चित्त के उपादान कारण है।

चित्त सत्त्व रजस् तमस् से बना होने के कारण इन तीनों उपादान कारण के गुण चित्त में है।

इन तीनों के गुण क्या है?

सत्त्व प्रखयाशील है। प्रकृष्ट ख्याति (ज्ञान) के (साधन बनने के) स्वभाव वाला।
रजस् प्रवृतिशील है।
तमस् स्थितिशील है।

इन तीनों के होने पर भी चित्त मुख्यतः सत्त्व से बना होने के कारण उसे सत्त्व भी कहा जाता है। (हम प्रधान वस्तु के नाम से वस्तु समूह का नामकरण अनेक स्थानों पर करते है। जैसे पंचप्राण को प्राण, अन्वीक्षा(अनुमान) प्रमाण को लिए हुए शास्त्र को आन्वीक्षिकी (न्याय)..)

थोडा off-topic:

चित्त के सत्त्व गुण का (सत्त्व गुण के उभरने का) सतयुग कलियुग वगैरह से कोई लेना देना नहीं है। युगों के नाम काल गणना के लिए है और वह नाम मात्र है जैसे सप्ताह के दिन के नाम रवि सोम है। उनका हमारे चित्त पर कोई प्रभाव नहीं पडता। हमारी काल गणना में हम सृष्टि - मन्वन्तर - चतुर्युग - युग नाम के कालखंडों का प्रयोग करते है।

सृष्टिकाल ४३२ करोड वर्ष का है। सृष्टिकाल से पहले और बाद में प्रलयकाल रहेगा जब तक नई सृष्टि की रचना नहीं होती।
एक सृष्टि में १४ मन्वन्तर आते है।
१ मन्वन्तर में ७१ चतुर्युग आते है।
१ चतुर्युग में सतयुग त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग चार युग आते है। जिनका समय है,
कलियुग = ४,३२,००० वर्ष
द्वापर = ८,६४,००० वर्ष (कलियुग x २)
त्रेता = १२,९६,००० वर्ष (कलियुग x ३)
सत = १७,२८,००० वर्ष (कलियुग x ४)
जिससे एक चतुर्युग ४३,२०,००० वर्ष का होता है।

और एक मन्वन्तर ४३,२०,००० x ७१ = ३०,६७,२०,००० वर्ष।

आप सोच रहे होंगे की ३०.६९२ करोड x १४ तो ४३२ करोड नहीं होते। ४,२९,४०,८०,००० वर्ष ही होते है। 

वह इस लिए की प्रत्येक मन्वन्तर संधि में (और प्रथम मन्वन्तर के पहले, अंतिम मन्वन्तर के पश्चात) एक सतयुग (चार कलियुग) जितने समय का संधिकाल रहता है। जिसमें आंशिक प्रलय जैसी स्थिति होती है। (पांचों महाभूतों का नहीं पर किसी एक का उस अवस्था में होना जो जीवन के लिए सानुकूल न हो। i.e. extinction level event every 30.682 cr yrs, unfavourable climate lasts for 17.27 lakh yrs.)

जीवन सृष्टिकाल की पूरी अवधि नहीं रहता अपितु प्रत्येक शरीर की आवश्यकता पूर्ण हो सके ऐसा वातावरण होने पर रहता है। सृष्टि के प्रारंभ में मनुष्य सबसे अंत में आता है क्योंकि उसकी आवश्यकताएं सबसे अधिक है और उसी कारण से प्रलय के पहले उसका अंत सर्व प्रथम होगा।

इन १५ संधिकाल को मिलाकर सृष्टिकाल ४३२ करोड वर्ष बनेगा।

अभी हम इन ४३२ करोड वर्ष में कहाँ है?
हम ७वें मन्वन्तर के २८वें चतुर्युग में कलियुग के प्रारम्भिक काल में (४,२०,००० में से) ५१२२वे वर्ष में है।

तात्पर्य  यह है की "अभी तो कलियुग चल रहा है इसलिए  हमारा मन अविद्या प्रमाद की और खींच जाना स्वाभाविक है, यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रतिकूल समय है इसलिए हम ज्ञान प्राप्त नहीं कर पा रहे है" जैसा कुछ नहीं होता। हमारा मन प्रधान रूप से सत्व से बना है और हमें ज्ञान प्राप्त कराने के लिए कोई भी दिन वर्ष युग मन्वन्तर अथवा सृष्टि में वह सक्षम है। वह जड प्रकृति से बना पदार्थ है और हमारा ऐसा साधन है जो wear out नहीं होता। हमारी इच्छा से चलता है तो हमारी इच्छा के अनुसार ही चलेगा कोई वार वर्ष युग को देखकर नहीं।