गुरुवार, 19 जनवरी 2023

योगदर्शन १.२ (भाग २)

चित्त, जो सत्व रजस् तमस् से बना है और मुख्यतः जिसमें सत्व की प्रधानता होते हुए भी तीनों गुण जीवात्मा के प्रयत्न, ज्ञान के अनुरूप कार्यान्वित होते है अथवा दब जाते है, उसकी पाँच भूमियाँ है। क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध, उनके विषय में भाष्यकार बताते है,

क्षिप्त : यह चित्त की रजोगुण प्रधान अवस्था है। यहाँ रजस् और तमस् अधिक कार्यरत रहते है।

जीव इसमें ऐश्वर्य और विषयभोग प्रिय होता है। उसका ध्येय सांसारिक सुखों को भोगना रहता है। (यहाँ उसके ऐश्वर्यप्रिय होने की बात है ऐश्वर्यवान होने की नहीं।) 

यह चित्त की निकृष्ट अवस्था है जहां जीव प्रवृत्तिशील तो होता है पर अविद्याग्रस्त भी। जिससे वह चित्त में अविद्या वाले संस्कार को और दृढ कर लेता है। 

मूढ : यह चित्त की तमोगुण प्रधान अवस्था है, रजस् और सत्त्व दबे रहते है।

चित्त की इस अवस्था में जीव अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य (मोह), अनैश्वर्य की दिशा में जाता है। यह मोह युक्त अवस्था है। (मोह और मूढ दोनों में एक ही धातु है।) तमस् से प्रभावित होने से सांसारिक सुखों, ऐश्वर्य को प्राप्त करने के लिए भी प्रवृत्ति नहीं रहती जिससे अनैश्वर्य की दिशा में गति होती है। प्रवृत्ति की न्यूनता के कारण जीव का स्वयं का नुकसान करने की गति यहाँ क्षिप्त से कुछ कम रहती है।

विक्षिप्त : यह चित्त की सत्त्वगुण प्रधान अवस्था है, यहाँ रजस् की थोडी सी मात्रा रहती है और तमस् एकदम दबा रहता है। भाष्यकार कहते है की यहाँ प्रख्यास्वरूप चित्त, जिसके मोह के आवरण प्रक्षीण हो गए है (तमस् लेशमात्र भी नहीं है), वह चारों और से प्रकाशमान होता हुआ रजस् से अनविद्ध है अर्थात् थोडा सा ही रजस् है जो धर्मयुक्त प्रवृत्ति में सहायक बनता है।

इस अवस्था के चित्त से जीव धर्म ज्ञान ऐश्वर्य वैराग्य की दिशा में जाता है। (क्षिप्त में ऐश्वर्य के लिए मोह था यहाँ ऐश्वर्य की प्राप्ति है पर मोह नहीं।)

यह एक उच्च स्थिति है जिसके आगे योग की भूमियाँ है।

एकाग्र : वह चित्त जिसका थोडी सी मात्रा वाला रजस् भी समाप्त हो गया है, वह अब स्वयं के वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हुवा है।

अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) के अंतिम चरण समाधि में एकाग्र और निरुद्ध अवस्था आएगी। उसके पहले के चरणों में भी उत्तरोत्तर कुछ वृत्ति निरोध और एकाग्रता तो है पर जिसे एकाग्र भूमि कहेंगे वह स्तर की एकाग्रता अष्टांग योग की समाधि है।

इस एकाग्र भूमि में योगी जो विषय चित्त के आगे रखता है उसका प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करता है जिसे संप्रज्ञात समाधि कहते है (सम्यक रीति से प्रकर्ष रूप से जाना जाता है जिसमें)। वह किस को जानता है उससे संप्रज्ञात समाधि के प्रभेद बनते है।

प्रकृति को कार्य से कारण रूप में देखे तो जानने के स्तर यह बनते है।

पञ्च स्थूलभूत (पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश) ^ पञ्च सूक्ष्मभूत/तन्मात्र (पृथ्वी तन्मात्र, जल तन्मात्र ..), सूक्ष्म इंद्रियाँ, मन ^ अहंकार ^ महत् तत्व ^ सत्त्व रजस् तमस् (प्रकृति साम्यावस्था)

यह सारे इंद्रियातीत विषय है अर्थात् जो इंद्रियों से नहीं जाने जा सकते। इंद्रियों से जाने जा सके ऐसे विषयों को जिज्ञासु समाधि के पहले ही जान सकता है।

१. वितर्कानुगत समाधि :  पंच स्थूलभूत पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश के परमाणु* का ज्ञान वितर्कानुगत समाधि के अंतर्गत आएगा। परमाणु का प्रत्यक्ष हम इंद्रियों से नहीं कर सकते (अनेक परमाणुओं से बनी वस्तुओं का कर सकते है)। एकाग्र अवस्था में, जिस स्थूलभूत का प्रत्यक्ष करना है उसी एक विषय को चित्त के आगे रख कर उसका प्रत्यक्ष वितर्कानुगत समाधि में योगी कर सकता है।

*परमाणु = जो सबसे अणु है। जिसके कोई अवयव नहीं है।

२. विचारानुगत समाधि : पंच सूक्ष्मभूत अर्थात् पृथ्वी तन्मात्र, जल तन्मात्र अग्नि तन्मात्र वायु तन्मात्र आकाश तन्मात्र जिसमें से उनके स्थूलभूत बनते है उनसे लेकर महत् तत्व तक का प्रत्यक्ष विचारानुगत समाधि के अंतर्गत आता है।

३. आनंदानुगत : यहाँ योगी प्रकृति का प्रत्यक्ष करता है।

४. अस्मितानुगत : यहाँ जीव स्वयं का प्रत्यक्ष करता है। वह चित्त और स्वयं को पृथक पृथक देख पाता है और स्वयं के स्वरूप को चित्त की सहायता से जानता है। इसे सत्वपुरुषान्यताख्याति (सत्व=चित्त पुरुष=आत्मा अन्यता=पृथकता ख्याति=ज्ञान) कहा जाता है।

मंगलवार, 17 जनवरी 2023

योगदर्शन १.२

योग (संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात समाधि) के लक्षण बताने की अभीप्सा (इच्छा) से अगला सूत्र प्रवृत्त है।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। १.२

निरोध = निश्चित रूप से रुकी हुई अवस्था।

किसका निरोध? चित्तवृत्तियों का निरोध।

वृत्ति = इंद्रियों के व्यापार (आँख से देखना, कानों से सुनना..) को भी वृत्ति कहते है और उन्हें रोकने को प्रत्याहार कहते है। परंतु यहाँ उसकी बात नहीं हो रही है, यहाँ चित्त की उन वृत्तियों को, जो प्रत्याहार के उपरांत भी चलती रहती है (जैसे स्मृति, विकल्प), उन्हें भी रोकने की बात हो रही है।

चित्त की दो प्रकार की वृत्तियाँ होती है। १. ज्ञानात्मक २. धारणात्मक। वृत्ति निरोध मात्र ज्ञानात्मक वृत्तियों के लिए कहा गया है। धारणात्मक वृत्तियाँ, जो शरीर को धारण करने का काम करती है, जैसे रक्त परिभ्रमण, पाचन क्रिया वह चलती रहेगी।

भाष्यकार बताते है की सूत्र में सर्व चित्तवृत्तियों का निरोध न कहे जाने से संप्रज्ञात समाधि, जिसमें चित्त की एक वृत्ति अभी भी है (अन्तःकरण से किया जाने वाला प्रत्यक्ष) वह भी योग पक्ष में आ जाती है।

हम चित्त शब्द का बार बार प्रयोग कर रहे है। इस चित्त शब्द से जिसे हम मन कहते है उसका ग्रहण होता है। अंतःकरण के मन बुद्धि चित्त अहंकार ऐसे भेद किए जाते है यहाँ हम इन सब को/मन बुद्धि चित्त को चित्त शब्द से समझ सकते है परंतु विशेषतः मन जो संस्कारों का आश्रय है उसे ग्रहण करेंगे। इसी चित्त के लिए न्याय में मन तथा सांख्य में बुद्धि शब्द का प्रयोग किया गया है।

चित्त त्रिगुणात्मक है, सत्त्व रजस् तमस् से बना है। जैसे हम देख चुके है, सत्त्व रजस् तमस् द्रव्य है और चित्त के उपादान कारण है।

चित्त सत्त्व रजस् तमस् से बना होने के कारण इन तीनों उपादान कारण के गुण चित्त में है।

इन तीनों के गुण क्या है?

सत्त्व प्रखयाशील है। प्रकृष्ट ख्याति (ज्ञान) के (साधन बनने के) स्वभाव वाला।
रजस् प्रवृतिशील है।
तमस् स्थितिशील है।

इन तीनों के होने पर भी चित्त मुख्यतः सत्त्व से बना होने के कारण उसे सत्त्व भी कहा जाता है। (हम प्रधान वस्तु के नाम से वस्तु समूह का नामकरण अनेक स्थानों पर करते है। जैसे पंचप्राण को प्राण, अन्वीक्षा(अनुमान) प्रमाण को लिए हुए शास्त्र को आन्वीक्षिकी (न्याय)..)

थोडा off-topic:

चित्त के सत्त्व गुण का (सत्त्व गुण के उभरने का) सतयुग कलियुग वगैरह से कोई लेना देना नहीं है। युगों के नाम काल गणना के लिए है और वह नाम मात्र है जैसे सप्ताह के दिन के नाम रवि सोम है। उनका हमारे चित्त पर कोई प्रभाव नहीं पडता। हमारी काल गणना में हम सृष्टि - मन्वन्तर - चतुर्युग - युग नाम के कालखंडों का प्रयोग करते है।

सृष्टिकाल ४३२ करोड वर्ष का है। सृष्टिकाल से पहले और बाद में प्रलयकाल रहेगा जब तक नई सृष्टि की रचना नहीं होती।
एक सृष्टि में १४ मन्वन्तर आते है।
१ मन्वन्तर में ७१ चतुर्युग आते है।
१ चतुर्युग में सतयुग त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग चार युग आते है। जिनका समय है,
कलियुग = ४,३२,००० वर्ष
द्वापर = ८,६४,००० वर्ष (कलियुग x २)
त्रेता = १२,९६,००० वर्ष (कलियुग x ३)
सत = १७,२८,००० वर्ष (कलियुग x ४)
जिससे एक चतुर्युग ४३,२०,००० वर्ष का होता है।

और एक मन्वन्तर ४३,२०,००० x ७१ = ३०,६७,२०,००० वर्ष।

आप सोच रहे होंगे की ३०.६९२ करोड x १४ तो ४३२ करोड नहीं होते। ४,२९,४०,८०,००० वर्ष ही होते है। 

वह इस लिए की प्रत्येक मन्वन्तर संधि में (और प्रथम मन्वन्तर के पहले, अंतिम मन्वन्तर के पश्चात) एक सतयुग (चार कलियुग) जितने समय का संधिकाल रहता है। जिसमें आंशिक प्रलय जैसी स्थिति होती है। (पांचों महाभूतों का नहीं पर किसी एक का उस अवस्था में होना जो जीवन के लिए सानुकूल न हो। i.e. extinction level event every 30.682 cr yrs, unfavourable climate lasts for 17.27 lakh yrs.)

जीवन सृष्टिकाल की पूरी अवधि नहीं रहता अपितु प्रत्येक शरीर की आवश्यकता पूर्ण हो सके ऐसा वातावरण होने पर रहता है। सृष्टि के प्रारंभ में मनुष्य सबसे अंत में आता है क्योंकि उसकी आवश्यकताएं सबसे अधिक है और उसी कारण से प्रलय के पहले उसका अंत सर्व प्रथम होगा।

इन १५ संधिकाल को मिलाकर सृष्टिकाल ४३२ करोड वर्ष बनेगा।

अभी हम इन ४३२ करोड वर्ष में कहाँ है?
हम ७वें मन्वन्तर के २८वें चतुर्युग में कलियुग के प्रारम्भिक काल में (४,२०,००० में से) ५१२२वे वर्ष में है।

तात्पर्य  यह है की "अभी तो कलियुग चल रहा है इसलिए  हमारा मन अविद्या प्रमाद की और खींच जाना स्वाभाविक है, यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रतिकूल समय है इसलिए हम ज्ञान प्राप्त नहीं कर पा रहे है" जैसा कुछ नहीं होता। हमारा मन प्रधान रूप से सत्व से बना है और हमें ज्ञान प्राप्त कराने के लिए कोई भी दिन वर्ष युग मन्वन्तर अथवा सृष्टि में वह सक्षम है। वह जड प्रकृति से बना पदार्थ है और हमारा ऐसा साधन है जो wear out नहीं होता। हमारी इच्छा से चलता है तो हमारी इच्छा के अनुसार ही चलेगा कोई वार वर्ष युग को देखकर नहीं।

रविवार, 15 जनवरी 2023

योगदर्शन १.१ (भाग २)

हमने प्रथम सूत्र देखा था,

अथ योगानुशासनम्। १.१
योग की शिक्षा देने के लिए इस ग्रंथ को अधिकृत किया जाता है।

भाष्यकार योग को खोलते हुए कहते है की योग समाधि है।

समाधि शब्द की अपेक्षा हम समाधान शब्द सरलता से समझते है। समाधि का अर्थ वही है जो समाधान का। सम् (अच्छी प्रकार से) आ (चारों और से) धा (डुधाञ् धारणपोषणयोः) धातु से जिसका अर्थ है धारण करना। धारण करने के लिए यहाँ दो विशेषण लगाए गए है। सम् गुणवत्ता दर्शाता है तो आ बहुलता। यह ऐसा धारण करना है जहां कार्य की गुणवत्ता और मात्रा दोनों सम्पूर्ण है। चित्त की ऐसी अवस्था जहां उसे सरलता से पूर्णरूप से नियंत्रण में किया गया है वह समाधि है।

समाधि चित्त का धर्म है (जीवात्मा का नहीं) और वह चित्त की प्रत्येक अवस्था, जिसे चित्त की भूमि भी कहते है उसमें रहता है।  

चित्त की पाँच भूमियां है। क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध।

क्षिप्त : यह चित्त की रजोगुण प्रधान अवस्था है और यहाँ रज और तम अधिक कार्यरत रहते है और सत्त्व दबा रहता है।

मूढ : यह चित्त की तमोगुण प्रधान अवस्था है और यहाँ रज और सत्त्व दबे रहते है।

विक्षिप्त : यह चित्त की सत्त्वगुण प्रधान अवस्था है, यहाँ रज की थोड़ी सी मात्रा रहती है और तम एकदम दबा रहता है।

एकाग्र : यहाँ सत्त्व को रज तम प्रभावित नहीं करते।

निरुद्ध : यह चित्त की गुणरहित अवस्था है। एक भी गुण कार्यशील नहीं है।

ध्यान रहे चित्त का निर्माण सत्त्व रज तम यह प्रकृति के तीनों गुणों* से हुआ है और उसमें सत्त्व की ही प्रधान मात्रा है जिससे चित्त को सत्त्व भी कहा जाता है। चित्त की अलग अलग भूमिओ में उन गुणों की मात्रा में अंतर नहीं आता, मात्र उनकी कार्यशीलता में परिवर्तन आता है।

*यह कणाद (वैशेषिक दर्शन) का गुण जो द्रव्य में रहता है (जो गुण शब्द का व्यापक अर्थ है), नहीं है। जैसे रुई में सफेदी। गुण में क्रिया नहीं होती, द्रव्य में क्रिया होती है। सत्त्व रजस् तमस् द्रव्य है, प्रकृति के मूल कण। पर क्योंकि प्रकृति से बनी वस्तु स्वयं के लिए नहीं होती (कोई भी अन्य वस्तुओं से मिलकर बनी हुई वस्तु स्वयं के लिए नहीं होती, दूसरे के लिए होती है - सांख्य सिद्धांत), जीवात्मा के लिए होती है, अर्थात् जीवात्मा प्रधान और प्रकृति के कण गौण है। और उन्हें गौण होने के कारण से गुण कहा गया है।
गुण यहाँ एक पारिभाषिक शब्द है जिसका इस शास्त्र में अर्थ उसके व्यापक अर्थ से भिन्न है। (जैसे न्याय में जाति शब्द, जिसका अर्थ वहाँ असत् उत्तर है।)

इन पाँच भूमियों के क्रम पर किसी को प्रश्न हो सकता है। प्रायः अध्यात्म में क्रम तमस् रजस् सत्त्व यह रहता है जब की यहाँ क्रम रजस् तमस् सत्त्व है। वह इस लिए की अविद्या ग्रसित चित्त जो क्षिप्त और मूढ दोनों में है वहाँ क्षिप्त का क्रियाशील चित्त मूढ के अक्रियाशील चित्त की तुलना में अधिक हानिकारक बनेगा। मूढ अवस्था में कम से कम अधर्म युक्त प्रवृत्ति करके नये नये अधिक उलटे संस्कार बनाने का काम तो नहीं हो रहा है। तमोगुण प्रधान अवस्था में वो बिना ज्यादा कुछ किये जहां है वहाँ रुका हुआ है।

प्रश्न यह भी हो सकता है की समाधि को पांचों भूमियों में रहने वाला धर्म क्यों कहा? वह इस लिए की कितनी भी निकृष्ट अवस्था हो, जीव कुछ न कुछ समाधान के बिना तो जीवन चला ही नहीं सकता। खाना, चलना, बात करना सभी प्रवृत्तियों में थोडा सा ही सही चित्त वस्तुओं को जानने समझने का कोई न कोई कार्य, अर्थात् समाधान तो करता ही है।
    
भाष्यकार कहते है की विक्षिप्त चित्त की समाधि योग पक्ष में नहीं आती। (इससे क्षिप्त और मूढ जो विक्षिप्त के नीचे है वह स्वभाविक ही योग पक्ष में नहीं आएंगे।) अर्थात् योग मात्र एकाग्र और निरुद्ध भूमि की समाधि को कहते है।

यह थोडा अटपटा लग सकता है की भाष्यकार पहले कहते है की योग समाधि है। समाधि पांचों भूमियों में रहती है। और अब यह की मात्र दो भूमियों की समाधि को ही योग कहते है। तो इसको ऐसे समझ सकते है की जैसे यदि कोई पूछे की आम क्या होता है तो उसे उत्तर देंगे की फल। पर सारे फल आम नहीं है। ऐसे ही योग समाधि है पर सारी समाधि योग नहीं है।

योग का प्रारंभ एकाग्र चित्त की समाधि से होता है जो,

१. यथार्थ ज्ञान कराती है। 

२. क्लेशों (इस शास्त्र में क्लेश = अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश) को क्षीण करती है।

३. कर्म बंधन को शिथिल करती है। (कर्म का विनाश नहीं होता तो फिर कर्म बंधन शिथिल भी नहीं होने चाहिए। इसका समाधान यह है की कर्मफल मिलते समय भी क्लेश हो तब फल मिलता है। इस लिए क्लेशों के क्षीण होने से कर्म बंधन भी शिथिल होते है - यह विषय आगे आएगा।)

४. निरुद्ध अवस्था तक ले जाती है। (जैसे नाव हमें दूसरे किनारे तक ले जाती है पर दूसरे किनारे पर जाने के लिए हमें नाव को छोडना पडेगा ऐसे ही एकाग्र चित्त हमें निरुद्ध अवस्था तक ले जाएगा पर निरुद्ध अवस्था प्राप्त करने के लिए हमें एकाग्र अवस्था को छोडना पडेगा।)

ऐसे यह एकाग्र अवस्था के योग को संप्रज्ञात योग कहते है। अच्छी प्रकार से (सम्) प्रकर्ष रूप से (प्र) जाना जाता है जिसमें।

एक ही विषय जो चित्त के आगे है उसे अच्छी प्रकार से प्रकर्ष रूप से जान रहें होते है इस लिए उस योग को संप्रज्ञात योग कहते है।

निरुद्ध अवस्था में चित्त की एक भी वृत्ति नहीं रहती और वहाँ वह एक विषय को जानने की प्रक्रिया भी नहीं है। उस योग को असंप्रज्ञात योग कहते है।

संप्रज्ञात योग में क्या क्या जाना जाता है उसके भेद से संप्रज्ञात समाधि के चार प्रभेद किए गए है। इसमें प्रथम तीन में प्रकृति को और अंतिम अवस्था में जीव स्वयं को जानता है।

प्रकृति को कार्य से कारण रूप में देखे तो जानने के स्तर यह बनते है।

पञ्च स्थूलभूत (पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश) 
  ^
पञ्च सूक्ष्मभूत/तन्मात्र (पृथ्वी तन्मात्र, जल तन्मात्र ..), सूक्ष्म इंद्रियाँ, मन
  ^
अहंकार
  ^
महत् तत्व
  ^
सत्त्व रजस् तमस् (प्रकृति साम्यावस्था)

संप्रज्ञात समाधि के प्रभेदों के बारे में चर्चा आगे आएगी।

असंप्रज्ञात समाधि को कैवल्य कहते है। यहाँ अब  चित्त भी नहीं है और केवल वह स्वयं, अकेला ही परमात्मा के साथ है।


प्रश्न :-

इन में से कौन सा वाक्य गलत है।
१. समाधि चित्त का धर्म है।
२. समाधि योग है।
३. योग समाधि है।


चित्त की कौन सी भूमि में सत्त्व गुण की प्रधानता रहती है, रज अल्प मात्रा में कार्य करता है जब की तमोगुण बिलकुल दब गया है?
१. क्षिप्त
२. विक्षिप्त
३. निरुद्ध


सत्त्व रजस् तमस् गुण है तो वह किस द्रव्य के आश्रित है?
१. प्रकृति के आश्रित
२. चित्त के आश्रित
३. सत्त्व रजस् तमस् उस अर्थ में गुण नहीं है, वह द्रव्य है। उन्हें गुण मात्र उनके गौण होने से कहा गया है।


एकाग्र अवस्था की समाधि जिसे संप्रज्ञात योग कहते है उसमें,
१. पुण्य बनते है।
२. यथार्थ ज्ञान होता है।
३. परमात्मा का प्रत्यक्ष होता है।

शनिवार, 14 जनवरी 2023

योगदर्शन १.१

भारतीय दर्शन न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा(मीमांसा), उत्तर मीमांसा(ब्रह्मसूत्र) सभी अपने अपने विषय को लिए हुए है पर एक बात में सभी में समानता है। भिन्न भिन्न विषय को लेते हुए भी सभी अध्यात्म की और ले जाते है।

इन छह दर्शनों में सबसे प्रसिद्ध योगदर्शन है। इसके प्रणेता रचनाकार महर्षि पतंजलि है और इस पर महर्षि व्यास ने भाष्य किया है। पतंजलि शब्द पतत् अंजली से बना है अर्थ होता है जिनको नमन करने के लिए हमारी अंजली झुक जाती है वह।

योग शब्द युज् (युजँ समाधौ) से समाधि अर्थ में बनता है। यद्यपि योग शब्द अन्य दो धातुओं, युजिँर् योगे से जोड अर्थ में और युजँ संयमने से नियमन अर्थ में भी बन सकता है (और कोई योगदर्शन के योग का अर्थ ऐसे कर भी लेते है की यह आत्मा से परमात्मा के जोड का दर्शन है) परंतु ये अर्थ योगदर्शन में योग के नहीं है। यहाँ योग का अर्थ समाधि अर्थात् चित्तवृत्तियों का निरोध है।

योगदर्शन में चार पाद में १९५ सूत्र है। यह चार पाद है समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद।

समाधिपाद : इस प्रथम पाद में समाधि तथा उसके भेदों का वर्णन और उच्च कोटि के साधक जो समाधि से मात्र कुछ ही दूर है इन के लिए योग के उच्चस्तरीय साधनों का वर्णन है। वह इस लिए की जब भिन्न भिन्न योग्यताप्राप्त को कुछ देना हो तो सर्वोच्च योग्यताप्राप्त, जिसे अब लक्ष्य प्राप्ति के लिए बस थोड़ी ही मदद चाहिए उसे सर्वप्रथम देना योग्य है। जो थोडी सी मदद से अपना कार्य सम्पन्न कर लेगा उसको देने में देने वाले के समय का सर्वश्रेष्ठ उपयोग होगा।

साधनपाद : इस के प्रारंभ में उन मध्यम कोटि के साधक के लिए योग के साधनों का वर्णन है जिन्होंने यम नियम का पालन कर लिया है और उन्हें आगे अब क्लेशों को क्षीण करना है। उसके पश्चात साधनपाद में उन तृतीय कोटि के साधक जिन्हें अभी यम नियम से प्रारंभ करना है उनके लिए योग के साधनों का वर्णन है।

विभूतिपाद : विभूतिपाद में योग साधनों के अनुष्ठान से प्राप्त होने वाली विभूतियों का वर्णन है।

कैवल्यपाद : इस में कैवल्य अर्थात् मोक्ष के स्वरूप का वर्णन है।

जिन lectures और पुस्तकों को आधार बनाकर हम अध्ययन करेंगे वह Resources post में दिये है।


प्रथम सूत्र

अथ योगानुशासनम्। १.१

अथ : अथ का प्रयोग यहाँ अधिकार अर्थ में है। अथ मंगलवाचक भी है, कोई विशेष कार्य के प्रारंभ में उसका प्रयोग भी होता है। इस सूत्र में इस का प्रयोग अधिकार अर्थ में, इस ग्रंथ को विशेष प्रयोजन के लिए अधिकृत करने के अर्थ में है।

योगानुशासनम् : जिसके द्वारा शिक्षा दी जाए उसे अनुशासन कहते है। योगानुशासन अर्थात् जिसके द्वारा योग की शिक्षा दी जाएगी वह (ग्रंथ)। सर्व विद्याओं का मूल स्रोत परमात्मा है और योगविद्या भी आदि काल से चली आ रही है। काल क्रम में जब कोई विद्या क्षीण होने लगती है तो ऋषि उसकी पुनः स्थापना हेतु उसे फिर से सिखाते है। ऐसा ही पतंजलि कर रहे है इस लिए उन्होंने 'अनु' (फिर से) शासन कहा है।

शासन शास् (शासुँ अनुशिष्टौ) धातु से बनता है अर्थ है आज्ञा/उपदेश करना। (शिष्य शब्द भी यही धातु से बनता है। जो गुरु के उपदेश अनुसार चले वह शिष्य।)

अथ योगानुशासनम् का अर्थ हुआ योग की शिक्षा देने के लिए इस ग्रंथ को अधिकृत किया जाता है।


प्रश्न :-

हमारे छह दर्शन,
१. अपने अपने दृष्टिकोण से बात करते है पर सभी का विषय परमात्मा है।
२. अपने अपने विषय को लिए हुए है पर स्वयं (अध्यात्म) के विषय में  सभी बात करते है।
३. इन में विषय अथवा लक्ष्य को लेकर कोई समानता नहीं है। 


यदि किसी ज्ञानी के पास दो व्यक्ति उपदेश मांगने जाए, एक जिसको कुछ भी नहीं आता और दूसरा जो एक विद्वान है तो उस ज्ञानी को,
१. पहले प्रारम्भिक जिज्ञासु को उपदेश देना चाहिए क्योंकि वह निर्बल है और निर्बल को पहले मदद करनी चाहिए।
२. पहले विद्वान जिज्ञासु को उपदेश देना चाहिए।
३. उसे दोनों के बीच कोई भेदभाव न करते हुए दोनों को एक साथ एक ही उपदेश देना चाहिए।
 
योगदर्शन में योग का अर्थ
१. संयम से, नियम पूर्वक जीना है।
२. आत्मा का परमात्मा से जुडना है।
३. समाधि अर्थात् इंद्रियों का निरोध है।


योग का ज्ञान,
१. सर्व प्रथम पतंजलि से सभी को मिला।
२. आदि काल से चला आ रहा था जिसको पतंजलि ने फिर से सुव्यवस्थित करके हमें दिया।
३. व्यास ऋषि से हमें मिला।

योगदर्शन Resources

योगदर्शन
Audio lectures by Acharya Chandradutt Sharma
https://archive.org/details/Yogdarshana

योगदर्शनम्
- स्वामी सत्यपति परिव्राजक
https://archive.org/details/vyasbhashyayogdarshanall/


Shall add more as and when start using them.

गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

End of iteration One

न्यायदर्शन के अध्ययन का यह प्रथम iteration यहीं समाप्त करती हूँ। बाकी बचे सूत्र में से अधिकांश वर्तमान अध्ययन हेतु अधिक प्रासंगिक नहीं है और कुछ जो किसी मात्रा में प्रासंगिक हो सकते है मात्र उनको लेने से पूर्वापर संबंध नहीं बनने से उनको लेना व्यर्थ होगा।

जैसे की मैंने प्रथम प्रयास के प्रारंभ में कहा था, यह न तो न्यायदर्शन सीखाने का प्रयास था न ही जो मैंने सिखा है उसे बताने का। मेरा उसे सीखने के प्रथम प्रयास को अंकित करना मात्र था।

एक वस्तु जो इस प्रथम iteration में होनी चाहिए थी पर नहीं हो पाई वह है अधिक स्थानों में वर्तमान व्यवहार जगत से उदाहरण। आशा है की यह अपूर्णता द्वितीय iteration में पूरी हो पाएगी।

मेरे अध्ययन की अनियमितता ने posts के समय की नियमितता और उनकी लंबाई दोनों को कभी कभी प्रभावित किया। इस अध्ययन यात्रा में एक ऐसे handle से जुडने के लिए जो न तो प्रसिद्ध है न तो किसी प्रसिद्ध handle ने recommend किया हुआ, आप single digit सहपाठियों का में धन्यवाद करती हूँ।

So, what next? Second iteration of Nyay which is spaced more regularly, has better sized posts plus has attempted enrichment in content? Yes, but not just that.

Lets start first iteration of Yogdarshan as well in parallel. Okay, not right away. Give me two three weeks.

क्या आप इस शास्त्राध्ययन में अपने उन मित्रों को जिनकी इसमें रुचि हो सकती है उन्हें भी जुडने के लिए आमंत्रित करेंगे?

बुधवार, 23 नवंबर 2022

प्रमाण विभाग परीक्षा। (२.२.१-२)

सूत्र १.१. में सूत्रकार ने प्रमाण के चार विभाग बताए थे।

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३ 

प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है।
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.3.html

इस पर पूर्वपक्षी का आक्षेप है की इन के उपरांत अन्य प्रमाण भी है जो विभाग में होने चाहिए थे।

न चतुष्ट्वमैतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात्। २.२.१

ऐतिह्य अर्थापत्ति संभव और अभाव भी प्रमाण होने से प्रमाण चार ही नहीं है।

ऐतिह्य : "ऐसा कहा जाता है" करके जो बातें प्रचलन में है पर जिनके बारे में यह नहीं पता की किसने कहा है, ऐसी बातें, जिसे हम जनमानस का ज्ञान कह सकते है उसे ऐतिह्य कहा जाता है।

अर्थापत्ति : एक कही हुई बात से उससे संलग्न न कही बात को जान लेना अर्थापत्ति है।

संभव : एक वस्तु के प्रमाणित होने पर दूसरी वस्तु का होना जब सिद्ध हो जाता है उसे संभव कहते है।

अभाव : किसी कार्य के न होने पर (उसके अभाव से) कोई अन्य बाधक कारण की सत्ता को जानने को अभाव प्रमाण कहते है।

उत्तर :-

शब्द ऐतिह्यानर्थान्तरभावादनुमानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावानर्थान्तरभावाच्चाप्रतिषेधः। २.२.२

शब्द में ऐतिह्य का अर्थ और अनुमान में अर्थापत्ति संभव और अभाव के अर्थ आ जाने से प्रतिषेध नहीं बनता।

ऐतिह्य यदि किसी आप्त ने कहा सत्य है (भले ही हमें अब बताने वाले का नाम न पता हो) तब वह शब्द प्रमाण है और यदि असत्य है तो प्रमाण नहीं है। अर्थापत्ति संभव और अभाव अनुमान से भिन्न नहीं है। इसलिए प्रमाणों की संख्या चार जो बताई गई है वह ठीक है।

इस के बाद दूसरे अध्याय के द्वितीय आह्निक में शब्द और पद के ऊपर चर्चा है जिसे छोड कर हम आगे चलेंगे।