गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

End of iteration One

न्यायदर्शन के अध्ययन का यह प्रथम iteration यहीं समाप्त करती हूँ। बाकी बचे सूत्र में से अधिकांश वर्तमान अध्ययन हेतु अधिक प्रासंगिक नहीं है और कुछ जो किसी मात्रा में प्रासंगिक हो सकते है मात्र उनको लेने से पूर्वापर संबंध नहीं बनने से उनको लेना व्यर्थ होगा।

जैसे की मैंने प्रथम प्रयास के प्रारंभ में कहा था, यह न तो न्यायदर्शन सीखाने का प्रयास था न ही जो मैंने सिखा है उसे बताने का। मेरा उसे सीखने के प्रथम प्रयास को अंकित करना मात्र था।

एक वस्तु जो इस प्रथम iteration में होनी चाहिए थी पर नहीं हो पाई वह है अधिक स्थानों में वर्तमान व्यवहार जगत से उदाहरण। आशा है की यह अपूर्णता द्वितीय iteration में पूरी हो पाएगी।

मेरे अध्ययन की अनियमितता ने posts के समय की नियमितता और उनकी लंबाई दोनों को कभी कभी प्रभावित किया। इस अध्ययन यात्रा में एक ऐसे handle से जुडने के लिए जो न तो प्रसिद्ध है न तो किसी प्रसिद्ध handle ने recommend किया हुआ, आप single digit सहपाठियों का में धन्यवाद करती हूँ।

So, what next? Second iteration of Nyay which is spaced more regularly, has better sized posts plus has attempted enrichment in content? Yes, but not just that.

Lets start first iteration of Yogdarshan as well in parallel. Okay, not right away. Give me two three weeks.

क्या आप इस शास्त्राध्ययन में अपने उन मित्रों को जिनकी इसमें रुचि हो सकती है उन्हें भी जुडने के लिए आमंत्रित करेंगे?

बुधवार, 23 नवंबर 2022

प्रमाण विभाग परीक्षा। (२.२.१-२)

सूत्र १.१. में सूत्रकार ने प्रमाण के चार विभाग बताए थे।

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३ 

प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है।
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.3.html

इस पर पूर्वपक्षी का आक्षेप है की इन के उपरांत अन्य प्रमाण भी है जो विभाग में होने चाहिए थे।

न चतुष्ट्वमैतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात्। २.२.१

ऐतिह्य अर्थापत्ति संभव और अभाव भी प्रमाण होने से प्रमाण चार ही नहीं है।

ऐतिह्य : "ऐसा कहा जाता है" करके जो बातें प्रचलन में है पर जिनके बारे में यह नहीं पता की किसने कहा है, ऐसी बातें, जिसे हम जनमानस का ज्ञान कह सकते है उसे ऐतिह्य कहा जाता है।

अर्थापत्ति : एक कही हुई बात से उससे संलग्न न कही बात को जान लेना अर्थापत्ति है।

संभव : एक वस्तु के प्रमाणित होने पर दूसरी वस्तु का होना जब सिद्ध हो जाता है उसे संभव कहते है।

अभाव : किसी कार्य के न होने पर (उसके अभाव से) कोई अन्य बाधक कारण की सत्ता को जानने को अभाव प्रमाण कहते है।

उत्तर :-

शब्द ऐतिह्यानर्थान्तरभावादनुमानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावानर्थान्तरभावाच्चाप्रतिषेधः। २.२.२

शब्द में ऐतिह्य का अर्थ और अनुमान में अर्थापत्ति संभव और अभाव के अर्थ आ जाने से प्रतिषेध नहीं बनता।

ऐतिह्य यदि किसी आप्त ने कहा सत्य है (भले ही हमें अब बताने वाले का नाम न पता हो) तब वह शब्द प्रमाण है और यदि असत्य है तो प्रमाण नहीं है। अर्थापत्ति संभव और अभाव अनुमान से भिन्न नहीं है। इसलिए प्रमाणों की संख्या चार जो बताई गई है वह ठीक है।

इस के बाद दूसरे अध्याय के द्वितीय आह्निक में शब्द और पद के ऊपर चर्चा है जिसे छोड कर हम आगे चलेंगे।

बुधवार, 16 नवंबर 2022

शब्द प्रमाण परीक्षा (२.१.४७-५५)

शब्द प्रमाण का लक्षण हमने देखा था,

आप्तोपदेशः शब्दः। १.१.७ 
आप्त पुरुष का कथन शब्द प्रमाण कहलाता है।
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/05/1.1.6-7.html

अब परीक्षा सूत्र देखते है।

संक्षेप में,

पूर्वपक्षी का कहना है की शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है। क्योंकि,
१. जब हम शब्द प्रमाण से कुछ जानते है तब अर्थ का प्रत्यक्ष तो करते नहीं वह तो उनुपलब्ध ही रहता है जैसे अनुमान में।
२. दोनों में ज्ञान की प्रवृत्ति एक सी ही होती है।
३. जैसे अनुमान में अग्नि को धूम के साथ के संबंध से जानते है ऐसे अर्थ के शब्द के साथ के संबंध से शब्द प्रमाण में ज्ञान होता है।

उत्तर :-
१. शब्द प्रमाण में आप्त पुरुष के सामर्थ्य से शब्द के अर्थ का ज्ञान होता है। अनुमान में जैसे लिंग को जानकर व्याप्ति ज्ञान से लिंगी का ज्ञान होता है ऐसा यहाँ नहीं है।
२. अनुमान में लिंग के और व्याप्ति के प्रमाण होते है जिसके आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान होता है शब्द में ऐसे कोई प्रमाणों की उपलब्धि से नहीं अपितु आप्त के सामर्थ्य से ही अर्थ का ज्ञान होता है। (वैसे आप्त के शब्द भी आप्त के प्रत्यक्ष/अन्य प्रमाण से यथार्थ ज्ञान पर आधारित होते है पर जिसे शब्द प्रमाण से ज्ञान हो रहा है उसके पास अन्य प्रमाणों की उपलब्धि नहीं है।)
३. न ही जैसे आप (पूर्वपक्षी) कह रहे हो ऐसे अर्थ से संबंध। यदि शब्द का अर्थ से व्याप्ति संबंध होता तो पूरण जलन कहते ही मुख भर जाता, जल जाता।

पूर्वपक्षी :-  
शब्द और अर्थ जुडे हुए तो है आप उनके संबंध का निषेध नहीं कर सकते।

उत्तर :- 
उनका संबंध संकेत अर्थात् वाच्यवाचकभाव का है व्याप्ति का नहीं। 

उनके संबंध का अलग अलग जाती और देश में अलग अलग होने से भी देखा जाता है की कोई एक शब्द का कोई एक अर्थ के साथ नियमपूर्वक संबंध हो ऐसा नहीं है। (भिन्न भिन्न भाषाओं में एक ही शब्द भिन्न भिन्न अर्थों के लिए प्रयोग किए जाते है और एक अर्थ को कहने के लिए सब के भिन्न भिन्न शब्द भी होते है।)
  

सूत्र सहित 

पूर्वपक्षी :-

शब्दोऽनुमानमर्थस्यानुपलब्धेरनुमेयत्वात्। २.१.४७

शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण ही है। अर्थ की अनुपलब्धि होने से, अर्थ अनुमेय होने से।

जब हम शब्द प्रमाण से कुछ जानते है तब अर्थ का प्रत्यक्ष तो करते नहीं वह तो उनुपलब्ध ही रहता है जैसे अनुमान में। इसलिए शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है।


उपलब्धेरद्विप्रवृत्तित्वात्। २.१.४८

ज्ञान की प्रवृत्ति एक सी होने से। (भी शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है।) 

अनुमान प्रमाण से जैसा ज्ञान होता है ऐसा ही ज्ञान शब्द प्रमाण से भी होता है।

सम्बन्धाच्च। २.१.४९

और संबंध होने से भी। (शब्द और अर्थ का संबंध)

जैसे अनुमान में अग्नि को धूम के साथ के संबंध से जानते है ऐसे अर्थ के शब्द के साथ के संबंध से शब्द प्रमाण में ज्ञान होता है इसलिए शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण ही है।

उत्तर :-

आप्तोपदेशसामर्थ्याच्छब्दादर्थसम्प्रत्ययः। २.१.५०

आप्त पुरुष के सामर्थ्य से शब्द के अर्थ का ज्ञान होता है।

लिंग को जानकर व्याप्ति ज्ञान से लिंगी का ज्ञान जैसे अनुमान में होता है ऐसा यहाँ नहीं है।

प्रमाणतोऽनुपलब्धेः। २.१.५०

प्रमाणों से उपलब्धि न होने से।

अनुमान में लिंग के और व्याप्ति के प्रमाण होते है जिसके आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान होता है शब्द में ऐसे कोई प्रमाणों की उपलब्धि से नहीं अपितु आप्त के सामर्थ्य से ही अर्थ का ज्ञान होता है। (वैसे आप्त के शब्द भी आप्त के प्रत्यक्ष/अन्य प्रमाण से यथार्थ ज्ञान पर आधारित होते है पर जिसे शब्द प्रमाण से ज्ञान हो रहा है उसके पास अन्य प्रमाणों की उपलब्धि नहीं है।)

पूरणप्रदाहपाटनानुपलब्धेश्च सम्बन्धाभावः। २.१.५२

पूरण जलन पाटन (फटना) की उपलब्धि न होने से संबंध का अभाव है।

अनुमान की तरह यहाँ भी व्याप्ति है इस के उत्तर में यहाँ कहा है की पूरण जलन पाटन जैसे शब्द बोलते ही हमारा मुख भर नहीं जाता, जल नहीं जाता, फट नहीं जाता, अर्थात् उन शब्दों के साथ अर्थ की व्याप्ति नहीं है। 

और न ही जैसे आप (पूर्वपक्षी) कह रहे हो ऐसे अर्थ से संबंध। यदि शब्द का अर्थ से व्याप्ति संबंध होता तो पूरण जलन कहते ही मुख भर जाता, जल जाता।

पूर्वपक्षी :-  
शब्दार्थव्यवस्थानादप्रतिषेधः। २.१.५३

शब्द और अर्थ की व्यवस्था के कारण संबंध का निषेध नहीं कर सकते।

शब्द और अर्थ जुडे हुए तो है आप उनके संबंध का निषेध नहीं कर सकते।

उत्तर :-
न सामयिकत्वाच्छब्दार्थसम्प्रत्ययस्य। २.१.५४

नहीं (व्याप्ति संबंध नहीं है), संकेत व्यवस्था से शब्द से अर्थ का बोध होता है।

उनका संबंध संकेत अर्थात् वाच्यवाचकभाव का है व्याप्ति का नहीं। 
*संकेत, समय, शक्ति और वाच्यवाचकभाव यह सब न्याय में समानार्थी है।
  
जातिविशेषे चानियमात्। २.१.५५

उनके संबंध का अलग अलग जाती और देश में अलग अलग होने से भी देखा जाता है की कोई एक शब्द का कोई एक अर्थ के साथ नियमपूर्वक संबंध हो ऐसा नहीं है। (भिन्न भिन्न भाषाओं में एक ही शब्द भिन्न भिन्न अर्थों के लिए प्रयोग किए जाते है और एक अर्थ को कहने के लिए सब के भिन्न भिन्न शब्द भी होते है।)  

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

उपमान प्रमाण परीक्षा (२.१.४२-२.१.४६)

उपमान प्रमाण का लक्षण सूत्र था,

प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्। १.१.६
 
प्रसिद्ध वस्तु के जाने हुए समान धर्म से साध्य(जानने योग्य) वस्तु का ज्ञान कराने वाला साधन उपमान प्रमाण कहलाता है।
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/05/1.1.6-7.html

अब उसके परीक्षा सूत्र देखते है।

पूर्वपक्षी :-

अत्यन्तप्रायैकदेशसाधर्म्यादुपमानासिद्धिः। २.१.४२

अत्यन्त प्रायः अथवा एकदेश के साधर्म्य से उपमान प्रमाण की सिद्धि नहीं होती।

साधर्म्य तीन कोटि का हो सकता है।
१। अत्यन्त अर्थात् एकदम समानता। ऐसे में उपमान की सिद्धि नहीं होती जैसे गाय जैसी गाय कहने से क्या लाभ?
२। प्रायः अर्थात् बहु समानता। बहु सामान्य होने पर भी एक से दूसरे को नहीं पहचान जाता। जैसा बैल ऐसा भैंसा ऐसा नहीं कहा जाता। 
३। एकदेश अर्थात् थोडी सी समानता। अल्प समानता से भी उपमान सिद्ध नहीं होता। हाथी और बिल्ली में भी कुछ समानता है पर जैसा हाथी ऐसी बिल्ली कहने से कुछ सिद्ध नहीं होता।

अर्थात् उपमान से कभी कुछ सिद्ध नहीं होता जिससे उपमान प्रमाण की सिद्धि नहीं होती।

उत्तर :-
प्रसिद्धसाधर्म्यादुपमानसिद्धेर्यथोक्तदोषानुपपत्तिः। २.१.४३

लोक में प्रसिद्ध साधर्म्य से उपमान की सिद्धि होने से ऊपर कहा गया दोष नहीं है।

जो साधर्म्य लोक में प्रसिद्ध है उनका उपयोग वस्तुएं जनाने के लिए होता ही है। शहर में रहने वाले को नीलगाय गाय जैसी होती है कहने से उसे नीलगाय प्रथम बार देखने पर वह नीलगाय है यह बोध हो जाता है। कवि भी कमल जैसी आँख, पल्लव जैसे कोमल हाथ ऐसी उपमाओं का प्रयोग करते है। इस लिए उपमान प्रमाण असिद्ध नहीं है। 
 
पूर्वपक्षी :-
प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षसिद्धेः। २.१.४४

प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की सिद्धि होती है इसलिए (उपमान प्रमाण वास्तव में अनुमान प्रमाण ही है।)

जैसे अनुमान में प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की सिद्धि होती है (धुएं से अग्नि की) ऐसे ही यहाँ (गौ से गवय की), इसलिए उपमान अनुमान ही है, अलग प्रमाण नहीं।
  
उत्तर :-
नाप्रत्यक्षे गवये प्रमाणार्थमुपमानस्य पश्यामः। २.१.४५
तथेत्युपसंहारादुपमानसिद्धेर्नाविशेषः। २.१.४६

अप्रत्यक्ष गवय (नीलगाय) में हम उपमान का फल नहीं देख पाते।
"तथा" कहकर उपसंहार होने से उपमान प्रमाण की सिद्धि होने से अविशेष नहीं है। (उपमान अनुमान प्रमाण से भिन्न है।)

उपमान का फल शब्द और प्रत्यक्ष के संबंध को जानना है। जब नीलगाय प्रत्यक्ष हो तब यह जानना की यह नीलगाय है वह उपमान का फल होगा। अप्रत्यक्ष नीलगाय में उपमान का फल नहीं होता। न ही गाय और नीलगाय के बीच धुएं और अग्नि की भांति कोई व्याप्ति संबंध है। अनुमान स्वार्थ और परार्थ दोनों में होता है, उपमान मात्र परार्थ ही होता है। 

उपमान का उपसंहार साध्य साधन की समानता दिखाते होता है। जैसी गौ ऐसी गवय। अनुमान में ऐसा नहीं है। अर्थात् उपमान प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न ही है।

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

अनुमान प्रमाण परीक्षा (२.१.३५-२.१.४१)

पूर्वपक्षी :-

रोधोपघातसादृश्येभ्यो व्यभिचारादनुमानमप्रमाणम्। २.१.३५

रोध उपघात तथा सादृश्य के कारण अनुमान गलत होने से अनुमान प्रमाण नहीं है।  

कभी कोई कारण आ जाने से अनुमानित कार्य जो अन्यथा होता वह बाधित हो जाता है, कभी कोई कारण आ जाने से कोई कार्य जिसके न होने का अनुमान हो वह वह हो जाता है अथवा कारण/कार्य के सादृश्य से कार्य/कारण का अनुमान गलत हो सकता है ऐसे में अनुमान को प्रमाण अर्थात् निश्चित ज्ञान कराने वाला नहीं कह सकते।

जैसे खूब काले बादल उमड आने पर कोई वर्षा होगी ऐसा अनुमान करता है परंतु वायु बादलों को उडा ले जाता है और वर्षा नहीं होती, नदी में खूब पानी आने से कोई ऊपर वर्षा हुई होगी यह अनुमान करता है परंतु पानी ऊपर बांध टूटने से अथवा हिम पिघलने से आया हो सकता है, चींटीयों को अपना घर बदलते देख कुछ दिनों में वर्षा होने का अनुमान करते हो परंतु वह उनके वर्तमान घर पर अन्य कोई आपत्ति के कारण स्थानांतरण कर रही हो यह हो सकता है, मनुष्य द्वारा मोर जैसी ध्वनि करने पर कोई उससे मोर का अनुमान कर सकता है। ऐसे प्रसंगों से पता चलता है की अनुमान निश्चित ज्ञान नहीं है और इसलिए उसे प्रमाण नहीं कहा जा सकता।

उत्तर :-   
नैकदेशत्राससादृश्येभ्योऽर्थान्तरभावात्। २.१.३६

एक देश त्रास तथा सादृश्य के कारण भिन्न अनुमान होने से अनुमान प्रमाण असिद्ध नहीं होता।

गलत अनुमान का कारण कार्य कारण में से कोई एक देश मात्र को देखकर अथवा अन्य कारणों की उपेक्षा अथवा कार्य कारण को यथायोग्य न समझना है। परिस्थिति को समग्रता से देखकर उसके अनुसार व्याप्ति विचार करते हुए किए गये अनुमानमें गलती नहीं होने से वह पूरी परिस्थिति को ठीक से समझे बिना किए गए अनुमान से भिन्न है और अप्रमाण नहीं है।

जैसे ऊपर वर्षा होने पर आई हुई बाढ में पेड पत्ते मिट्टी वगैरह होते है जो बिना वर्षा के आए पानी में नहीं होते, चींटियाँ यदि बिना भूमि की गर्मी और वर्षा अनुकूल वातावरण के अथवा अन्य विपत्ति के दिखते हुए घर बदल रही है तब उन परिस्थितियों की उपेक्षा करके अनुमान करना गलत होगा। ऐसे ही मोर की ध्वनि सुनकर मोर का अनुमान होता है मनुष्य के स्वर को मोर का समझना वह प्रमाण प्रयोग करने वाले की गलती है। मानो कोई धूल के बादल को धुआँ समझकर आग का अनुमान कर ले तो उससे धुएं और आग की व्याप्ति खंडित नहीं होती।

सूत्र २.१.३७-४१ के विस्तार में न जाते हुए आगे चलते है। सूत्र और अर्थ नीचे दिए है।

पूर्वपक्षी :-
वर्तमानाभावः पततः पतितपतितव्यकालोपपत्तेः। २.१.३७
गिरते हुए के संबंध में गिरा अथवा गिरेगा ऐसा भूतकाल अथवा भविष्यकाल का ही बोध होता है इसलिए वर्तमानकाल का अभाव है।

पूर्वपक्षी का कहना है की अनुमान का प्रयोग मात्र भूत और भविष्य के लिए ही हो सकता है जैसे गिरती हुई वस्तु को देखकर वह गिर गई अथवा गिरेगी यही अनुमान हो सकता है अर्थात् वर्तमान का अभाव है।


उत्तर :-

तयोरप्यभावो वर्तमानाभावे तदपेक्षत्वात्। २.१.३८
वर्तमान के अभाव में भूत भविष्य का भी अभाव मानना पडेगा क्योंकि उन दोनों को वर्तमान की अपेक्षा है।

नातीतानागतयोरितरेतरापेक्षासिद्धिः। २.१.३९
भूत भविष्य की एक दूसरे की अपेक्षा से सिद्धि नहीं होती।

वर्तमानाभावे सर्वाग्रहणम्प्रत्यक्षानुपपत्तेः। २.१.४०
वर्तमान के अभाव में प्रत्यक्ष की सिद्धि न हो पाने से कोई भी ज्ञान नहीं हो पाएगा। (क्योंकि बाकी प्रमाण प्रत्यक्ष मूलक होते है।)

कृतताकर्तव्यतोपपत्तेस्तूभयथा ग्रहणम्। २.१.४१
वर्तमानकाल में भूत भविष्य की भी सिद्धि हो पाने से दोनों प्रकार से ग्रहण होता है।

जो क्रिया अभी चल रही है उसके उल्लेख में तीनों कालों का ग्रहण हो जाता है, क्रिया के आरंभ से लेकर वर्तमान तक के भूत, वर्तमान और वर्तमान से क्रिया के अंत तक के भविष्य। वर्तमान का प्रयोग इस तरह से भी होता है।

रविवार, 6 नवंबर 2022

प्रत्यक्ष प्रमाण परीक्षा (२.१.२८-३४)

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३ 
प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है। 

यह प्रमाणों का विभाग दर्शाता सूत्र है। इस पर पूर्वपक्षी कहता है की प्रत्यक्ष प्रमाण वास्तव में अनुमान प्रमाण के अंतर्गत ही आ जाता है।

प्रत्यक्षमनुमानमेकदेशग्रहणादुपलब्धेः। २.१.२८
प्रत्यक्ष अनुमान ही है एक देश के ग्रहण से ज्ञान के उत्पन्न होने से।  

जिसे आप प्रत्यक्ष कह रहे हो वह वास्तव में अनुमान प्रमाण ही है क्योंकि प्रत्यक्ष (इन्द्रिय अर्थ का सन्निकर्ष) तो किसी वस्तु के एक देश का कर रहे हो और उस वस्तु के बाकी देशों को अनुमान से जान रहे हो। जैसे जिसे आप वृक्ष का प्रत्यक्ष कह रहे हो उसमें वृक्ष का आगे के भाग (और उसकी भी ऊपरी सतह) से ही चक्षु इन्द्रिय का सन्निकर्ष (प्रत्यक्ष) हो रहा है, उसके बाकी के अवयवों का उस अल्प प्रत्यक्ष के आधार पर अनुमान हो रहा है। इस लिए वृक्ष का अनुमान हो रहा है प्रत्यक्ष नहीं।

न प्रत्यक्षेण यावत्तावदप्युपलम्भात्। २.१.२९
जितना हुआ उतना पर प्रत्यक्ष से हुआ ज्ञान होने पर उसे अनुमान नहीं कह सकते।

वृक्ष के आगे के भाग का ज्ञान जो इन्द्रिय से प्राप्त हुआ है उसे जब आप स्वयं ही प्रत्यक्ष मन रहे हो तो प्रत्यक्ष प्रमाण के निषेध की आपकी प्रतिज्ञा वहीं भंग हो जाति है। 

और फिर अनुमान (व्याप्ति ज्ञान) प्रत्यक्ष पूर्वक ही होता है यदि प्रत्यक्ष की सत्ता को ही नकार दोगे तो अनुमान भी कैसे हो पाएगा? 

पूर्वपक्षी का विरोध गुणों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) के प्रत्यक्ष* में तो बनता ही नहीं क्योंकि वहाँ आगे पीछे के भाग का प्रश्न नहीं उठता।
 
* गुण द्रव्य में रहता है। (शब्द को छोड कर,) गुण का प्रत्यक्ष गौण रूप से होता है जब हम द्रव्य का प्रत्यक्ष करते है। जैसे हम गौ को देखते है तब उसके रंग (रूप) का, उसकी दौडने की क्रिया (कर्म) का, उसके गोत्व (जाति) का भी गौण रूप से प्रत्यक्ष करते है पर हम मुख्य रूप से यही कहेंगे की हमने गौ का प्रत्यक्ष किया।

यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण की सत्ता को ही अस्वीकार करने वाले पूर्वपक्षी के आरोप का खंडन यहाँ हो जाता है, उस आरोप के पीछे पूर्वपक्षी और सिद्धांती के सिद्धांतों में अवयव अवयवी को लेकर भिन्नता कारणभूत है।

पूर्वपक्षी (बौद्ध) वस्तुओं को अवयवसमूह मानता है (समुदायवाद) जब की सिद्धांती अवयवी की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार करता है (उत्पत्तिवाद अथवा आरंभवाद)। नैयायिक उपदान(=समवायी) कारण में से अवयवी रूप कार्य की उत्पत्ति मानते है। इसलिए घडा पूर्वपक्षी के लिए मिट्टी के कणों का समूह मात्र है जो घडा नाम धारण करता है तो नैयायिक के लिए वह घडा उत्पन्न हुआ कार्य द्रव्य है जो मिट्टी के कणों के साथ समवाय संबंध से रहता है।

इस लिए पूर्वपक्षी के मत में वृक्ष के कुछ अवयवों का प्रत्यक्ष हुआ है, सभी अवयवों का नहीं। जब की सिद्धांती जो वृक्ष को एक इकाई के रूप में देखता है जड, तना, पत्ते के समूह मात्र के रूप में नहीं उसके लिए उसने किया प्रत्यक्ष वृक्ष का ही है। (पूर्वपक्षी के अपने सिद्धांत के हिसाब से भी वह वृक्ष का ज्ञान अनुमान से हुआ नहीं कह सकता क्योंकि जैसे कुछ अवयवों के प्रत्यक्ष से सम्पूर्ण अवयवसमूह का प्रत्यक्ष वह नहीं मानता ऐसे ही कुछ अवयवों के अनुमान से सम्पूर्ण अवयवसमूह का अनुमान भी नहीं मान सकता।)

सूत्रकार अब अवयव का प्रत्यक्ष अवयवी का प्रत्यक्ष ही है यह बताते है।

न चैकदेशोपलब्धिरवयविसद्भावात्। २.१.३०
और, अवयवी की सत्ता होने से उसके एक भाग की ही उपलब्धि है ऐसा नहीं कह सकते।

जैसे हम किसी मनुष्य को देखते है तब उसकी त्वचा का प्रत्यक्ष हुआ ऐसा नहीं परंतु उस मनुष्य का प्रत्यक्ष हुआ यह कहते है (ऐसे ही कहना उचित है।) क्योंकि उसके जीतने रूप का प्रत्यक्ष हुआ उससे हमें उस व्यक्ति के होने का ज्ञान हुआ है। अवयव और अवयवों में समवाय संबंध से रहने वाले अवयवी दोनों का ज्ञान अवयव के प्रत्यक्ष से हो जाता है।

जिज्ञासु जिसने समुदायवाद और उत्पत्तिवाद दोनों को सुन रखा है उसे वो विपरीत बातें सुनकर संदेह होता है की अवयवी है की नहीं। उसका प्रश्न।

साध्यत्वादवयविनि संदेहः। २.१.३१
अवयवी ही साध्य कोटि में होने से (अभी प्रमाणित न होने से) संदेह बना रहता है।

क्या अवयवी होता है अथवा अवयवसमूह मात्र होते है। यदि अवयवी ही न हो तो उसका प्रत्यक्ष होने का प्रश्न ही नहीं उठेगा। मात्र अवयवों का ही प्रत्यक्ष / अनुमान हो पाएगा।

उत्तर

सर्वाग्रहणमवयव्यसिद्धेः। २.१.३२
अवयवी न होने पर किसी भी वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं हो पाएगा।

परमाणु* तो इंद्रियग्राह्य नहीं है तो यदि अनेक परमाणु से बना अवयवी न हो और मात्र अवयवों का ही प्रत्यक्ष हो सकता हो तो किसी भी वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं हो पाएगा। 
*परमाणु = परम अणु। सबसे छोटा पदार्थ। जो खंडित न हो सके और दूसरे पदार्थों से (अवयवों से) न बना हो। (क्योंकि नहीं तो उसके खंड / अवयव उससे छोटे बन जाएंगे।)

धारणाकर्षणोपपत्तेश्च। २.१.३३
और धारण तथा आकर्षण से भी अवयवी होने का पता चलता है।

अवयवों के बीच में धारण तथा आकर्षण से भी अवयवी का पता चलता है। अवयवसमूह मात्र होने से एक अवयव को धारण करने, खींचने से अन्य अवयवों पर प्रभाव नहीं पडता जैसे गेहूँ के ढेर में से एक गेहूँ उठाते है तो अन्य गेहूँ भी उसके साथ खींच कर नहीं आते।

अवयवी को न मानने वालों को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए की जो मुझे यह एक वस्तु है ऐसा ज्ञान हो रहा है वह एक वस्तु क्या है। समुदाय अनेक वस्तुओं से बनता है अनेक में एक का ज्ञान नहीं हो सकता वह मिथ्या ज्ञान कहलाएगा।

सेनावनवद्ग्रहणमिति चेन्नातीन्द्रियत्वादणूनाम्। २.१.३४
सेना तथा वन के लिए जैसा ज्ञान है ऐसा कहो तो वह गलत है परमाणुओं के अतीन्द्रिय होने से।

जैसे अनेक सैनिकों से एक सेना और अनेक वृक्षों से एक वन बनता है ऐसा कहो तो वह गलत उदाहरण होगा। वहाँ एक एक सैनिक और वृक्ष की पृथकता का ज्ञान समीप से देखने से होता है, दूर से देखने से एक सेना वन का ज्ञान जो होता है वह गौण ज्ञान है। यह उदाहरण परमाणु समूह जैसा नहीं है क्योंकि परमाणु अतेंद्रिय है उनको पृथक पृथक देख ही नहीं पाने से और मात्र अवयवी का ही प्रत्यक्ष हो पाने से मुख्य गौण का अवसर ही प्राप्त नहीं होता।

और अवयवसमूह पक्ष में तो सेना और वन वैसे भी एक सिद्ध नहीं है तो जो स्वयं सिद्ध नहीं है उसे उदाहरण नहीं बनाया जा सकता।

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

प्रमाण सामान्य, प्रत्यक्ष लक्षण परीक्षा (२.१.१७-२७)

प्रमाणतः सिद्धेः प्रमाणानां प्रमाणान्तरसिद्धिप्रसङ्गः। २.१.१७
तद्विनिवृत्तेर्वा प्रमाणसिद्धिवत्प्रमेयसिद्धिः। २.१.१८
न प्रदीपप्रकाशसिद्धिवत्तत्सिद्धेः। २.१.१९
क्वचिन्निवृत्तिदर्शनादनिवृत्तिदर्शनाच्च क्वचिदनेकान्तः। २.१.२०

सूत्र १६ में कहा गया था की प्रमाण प्रसंग के अनुरूप प्रमेय भी बन सकते है, तुला की भांति। तो पूर्वपक्षी कहता है यदि प्रमाणों की परीक्षा अन्य प्रमाणों से करनी हो तो जो प्रत्यक्ष आदि जो चार प्रमाण कहे है उनसे अतिरिक्त और प्रमाण लाने होंगे। और यदि बिना अतिरिक्त प्रमाण लाए ही उनकी सिद्धि मान ली जाति है तो फिर उसी तरह प्रमेय की भी सिद्धि मान सकते है, प्रमाणों की आवश्यकता ही क्या है।

इन दो प्रश्नों का उत्तर देते हुए सूत्रकार कहते है की इन प्रमाणों की सिद्धि बिना प्रमाण के नहीं है और इनको प्रमाणित करने के लिए अन्य प्रमाणों की आवश्यकता भी नहीं है। दीपक के प्रकाश के समान। दीपक का प्रकाश प्रमाण है यह अंधकार में दीपक के होने पर वस्तुओं के दिखने और न होने पर न दिखने से अनुमान प्रमाण से सिद्ध होता है और दीपक के प्रकाश से वस्तुएं दिखेगी ऐसा अन्य के कहने पर शब्द प्रमाण से भी। और यहाँ प्रमाण से प्रमाण का ज्ञान होना नहीं कहेंगे, प्रमाण से प्रमेय का ज्ञान होना ही कहेंगे। जिसकी परीक्षा की जा रही है वह प्रमेय है भले ही किसी अन्य समय वह प्रमाण का काम करता हो।

सूत्र २.१.१७-२० को इतना ही रखते हुए आगे चलते है।


प्रत्यक्ष लक्षण परीक्षा

प्रथम अध्याय के चौथे सूत्र में प्रत्यक्ष का लक्षण दिया गया है वहाँ परीक्षा प्रकरण के सूत्रों का विषय भाष्य के अंतर्गत लिया गया था। दोनों जगह का भाष्य मुझे विसंगतता पूर्ण, बात को मात्र लंबी, जटिल बनाता हुआ और तर्क रहित लगा।

जिसने श्रद्धा के साथ अध्ययन अभी प्रारंभ ही किया था उसके लिए चौथे ही सूत्र में ऐसे भाष्य का सामना होना अत्यंत आघात और निराशा जनक था और मैंने तब भी अपना दृष्टिकोण रखा था। भाष्यकार के उत्तर और मेरे उन उत्तर के प्रतिकार को छोड दे तो मेरा पक्ष संक्षेप में यह था।
 
लक्षण सूत्र :-
इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४

इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ वह ज्ञान जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी तथा व्यवसायात्मक हो उसको प्रत्यक्ष कहते है।

पूर्वपक्षी :-
आत्मा-मन, मन-इन्द्रिय के सन्निकर्ष को लक्षण में क्यों नहीं कहा।

मेरा पक्ष :-
उत्पन्न हुआ ज्ञान = नया अर्थ जो मन ने ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचाया है।

जब हम सूत्र में कहे गए 'उत्पन्न हुए ज्ञान' की अनदेखी नहीं करेंगे तो आत्मा-मन, मन-इन्द्रिय सन्निकर्ष के न कहे जाने का प्रश्न ही नहीं बनेगा। और यदि फिर भी कोई यह प्रश्न पूछे तो इनको यह स्पष्ट करना चाहिए की सूत्रकार के शब्द उत्पनं ज्ञानम् का अर्थ क्या है? क्या मन के अर्थ को ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचाने से ही आत्मा को ज्ञान नहीं होता? क्या कोई और पद्धति से भी ज्ञान उत्पन्न हो जाता है? यदि नहीं तो सूत्रकार ने एक ही बात दो बार क्यों नहीं कही ऐसी आपत्ति क्यों?

पूरी चर्चा के लिए १.१.४ की posts देख सकते है। (यह उन्हीं के के लिए उपयोगी होगा जिन्होंने पहले भाष्य के अनुरूप विषय को समझ रखा है। जिनको unlearn करने की आवश्यकता नहीं है उनके लिए नहीं।)
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.4update.html
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.4.html


अब परीक्षा प्रकरण के सूत्र देखते है।

भाष्य के पीछे न जाते हुए मैंने यहां जो लिखा है वह सीधे सूत्र के आधार पर लिखा है। (पुस्तक में से सूत्र के पदार्थ की मदद से।)

पूर्वपक्षी :-
प्रत्यक्षलक्षणानुपपत्तिरसमग्रवचनात्। २.१.२०

प्रत्यक्ष के सभी लक्षण नहीं देने से लक्षण सिद्धि नहीं हो सकती।

पूर्वपक्षी :-
नात्ममनसोः संनिकर्षाभावे प्रत्यक्षोत्पत्तिः। २.१.२१

आत्मा और मन के संयोग के अभाव में प्रत्यक्ष नहीं हो सकता।

पूर्वपक्षी :-
दिग्देशकालाकाशेष्वप्येवं प्रसङ्गः। २.१.२२

दिशा देश काल आकाश के विषय में भी ऐसा ही है (उनको भी नहीं कहा गया जब की उनके बिना प्रत्यक्ष नहीं हो सकता।)

उत्तर :-
ज्ञानलिङ्गत्वादात्मनो नानवरोधः। २.१.२३

ज्ञान आत्मा का गुण होने से आत्मा का अग्रहण नहीं है। (जब ज्ञान कहा तो आत्मा को हुआ ज्ञान ही अर्थ होता है।) 

उत्तर :-
तदयौगपद्यलिङ्गत्वाच्च न मनसः। २.१.२४

एक समय में एक ही ज्ञान उत्पन्न करना (एक साथ अनेक ज्ञान उत्पन्न न करना) यह मन का धर्म होने से मन का भी अग्रहण नहीं है।

(एक साथ सभी इंद्रियाँ ज्ञान उत्पन्न नहीं करती इससे मन की सिद्धि होती है और ज्ञान उत्पन्न होने में मन की अनिवार्यता सिद्ध करती है। अर्थात् ज्ञान के उत्पन्न होने में जैसे अनिवार्य रूप से आत्मा ग्रहण हो जाता है ऐसे ही मन भी।)

उत्तर :-
तैश्चापदेशो ज्ञानविशेषाणाम्। २.१.२५

ज्ञान विशेष का (अर्थ का) व्यवहार इंद्रियों से होता है। (दिशा देश काल आकाश का नहीं। इस लिए अर्थ और इन्द्रिय का सन्निकर्ष लक्षण है और दिशा देश काल आकाश का होना/उनसे सन्निकर्ष का होना नहीं है।) 

पूर्वपक्षी :-
व्याहतत्वादहेतुः। २.१.२६

व्याघात होने से यह हेतु ठीक नहीं है। (अर्थ जिसका ज्ञान हो रहा है वह तो आपके लक्षण में है परंतु दिशा देश काल आकाश के भी होने और उनके ज्ञान के होने पर आपने उन्हें प्रत्यक्ष लक्षण में नहीं लिया।)

उत्तर :-
नार्थविशेषप्राबल्यात्। २.१.२७

(व्याघात) नहीं है। ज्ञान में अर्थ विशेष की ही मुख्यता रहती है।  (प्रत्यक्ष में अर्थ - शब्द स्पर्श रूप रस गंध की ही प्रमुखता रहती है दिशा देश काल आकाश की नहीं इस लिए अर्थ को लक्षण में कहना और दिशा देश काल आकाश को न कहना इसमें व्याघात दोष नहीं है।)

नीचे के दो सूत्र कुछ पुस्तक में है कुछ में नहीं। जिन पुस्तकों में वह नहीं है वह पुस्तक overall भी अधिक तर्कसंगत लगते है और यह सूत्र भाष्यकार ने किए विचित्र अर्थों को बल देने के लिए डाले हो ऐसे लगते है तो मैंने भी उन्हें नहीं लिया है।

प्रत्यक्षनिमित्तत्वाच्चेन्द्रियार्थयोः संनिकर्षस्य स्वशब्देन वचनम्। २.१.२६ 
सुप्तव्यासक्तमनसां चेन्द्रियार्थयोः संनिकर्षनिमित्तत्वात्। २.१.२७