शनिवार, 7 मई 2022

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् । १.१.९

प्रथम सूत्र में दिए गए १६ पदार्थ में से द्वितीय प्रमेय है। सूत्रकार अब इसके विभाग बताते है।

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् । १.१.९

आत्मा शरीर इन्द्रिय अर्थ बुद्धि मन प्रवृत्ति दोष प्रेत्यभाव फल दुःख अपवर्ग यह प्रमेय है। 

इस शास्त्र में यह १२ प्रमेय लिये है इस का तात्पर्य यह नहीं है की इन १२ के अतिरिक्त कोई वस्तु जानने योग्य नहीं है। इस का तात्पर्य यह है की इस शास्त्र ने इन प्रमेयों के लिए अपने को अधिकृत किया है। इन प्रमेयों को लेते हुए भी इस शास्त्र का मुख्य विषय प्रमाण ही है।

एक तरह से ऐसे भी समझ सकते है जैसे हम कोई भी दुकान में हम जाए तो वहां तराजू मिलता है (जैसे कोई भी क्षेत्र में हमें प्रमाणों का प्रयोग करना पडता है) पर यदि हम तराजू की दुकान में जाए तो तराजू को हम देख सके इस लिए वहां पदार्थ रहते है। पर पदार्थ वहां मुख्य वस्तु नहीं है जैसे अन्य दुकानों में। पर इस का अर्थ यह भी नहीं है की इन प्रमेयों की स्वतंत्र उपयोगिता कम है। शास्त्र रचयिता ने ऐसे प्रमेय नहीं लिए है जो प्रमाणों का उपयोग कैसे करते है यह दर्शाने के काम तो आये पर उनका बाकी कोई उपयोग न हो। यह जानने योग्य पदार्थों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण भी लिए गए है। 

इन १२ प्रमेय में भी मुख्य प्रमेय आत्मा है। क्योंकि आत्मज्ञान के बिना अपवर्ग प्राप्ति नहीं होती। बाकी के प्रमेय आत्मज्ञान तक पहुंचने में सहायक है। इन सारे प्रमेय के सूत्र आगे आएंगे पर संक्षिप्त में भाष्यकार इनको यहां भी बताते है। 

आत्मा : यह सर्व वस्तुओं को देखने वाला, भोगने वाला, अनुभव करने वाला और सर्वज्ञ है। सर्व = वो सब जो सारी इन्द्रियां ग्रहण करती है और मन उनको आत्मा तक पहुंचाता है, वो सब जो विषय मन ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचता है और सर्व सुख दुःख। इस लिए आत्मा को सर्वज्ञ भी कहते है। शरीर और मन द्वारा प्राप्त सर्व अनुभूतिओं को जानने वाला।

ध्यान रहे सर्वज्ञ का अर्थ सबकुछ जानना वाला नहीं है। सर्व अर्थ को जानने वाला तो मात्र परमात्मा ही है और उसे भी आत्मा के नाम से कहा जाता है पर यहां वह अर्थ नहीं है।

कहां किस शब्द का अर्थ कैसे करना है यह मीमांसा दर्शन का विषय है वहां जैमिनी मुनि ने एक सिद्धांत दिया है की सर्व शब्द का अर्थ अधिकारक्षेत्र के अंदर आने वाले / विषय सम्बन्धी सर्व के लिए होता है। जैसे जब मां बच्चे को कहती है की सारा दूध पी जाओ तो उसका अर्थ बच्चे को जितना दूध पीना है उतना सारा दूध होता है। घर में पतीला भर के दूध है वह अथवा पूरे गांव में है वह सारा दूध नहीं।

न्यायदर्शन का विषय आत्मा तक ही सीमित है क्योंकि आत्मा के प्रत्यक्ष तक स्वयं के प्रयत्न होते है और वहां तक हम अपने करण के उपयोग से पहुंचते है। परमात्मा को न तो हम हमारे प्रयत्न से प्राप्त कर सकते है न ही हमारे पास कोई ऐसा करण है जो उसका प्रत्यक्ष करा सके। आत्मा स्वयं के प्रत्यक्ष के पश्चात जब उस लायक हो जाता है तो वह स्वयं अपनी उपलब्धि करवाता है।

शरीर : यह आत्मा के भोगों का आधार है। शरीर में रहते ही आत्मा सुख दुःख भोग सकता है। 

इन्द्रिय : यह आत्मा के भोग के साधन है। यहां पांच बाह्य इन्द्रियों (श्रोत त्वक् चक्षु रसना(जिह्वा) घ्राण जो हमें शब्द स्पर्श रूप रस गंध के ज्ञान करवाती है।) को ही लिया जायेगा क्योंकि सूत्रकार ने छठी इन्द्रिय मन को अलग प्रमेय के अंतर्गत लिया है।

अर्थ : शब्द स्पर्श रूप रस गंध यह अर्थ है जिनको इन्द्रियां ग्रहण करती है और मन आत्मा तक पहुंचता है। 

बुद्धि : वह भोग है जो आत्मा करता है (=ज्ञान, उपलब्धि)

मन : यह आंतरिक करण (इन्द्रिय) है। बाह्य इन्द्रियां मात्र अपने अपने नियत विषय का ही ग्रहण कर सकती है। जैसे चक्षु इन्द्रिय गंध रस स्पर्श अथवा शब्द का ग्रहण नहीं कर सकती और ऐसे ही अन्य इन्द्रियां। परन्तु मन सर्व विषय के ग्रहण का साधन (करण) है। (यहां भी सर्व का अर्थ है जीवात्मा का जिन विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य है वह सर्व।). मन की यह विशिष्टता को देखते हुए मन इन्द्रिय होते हुए भी इस को इन्द्रिय (जहां मात्र बाह्य इन्द्रियों का ग्रहण किया है) से पृथक इन १२ प्रमेयों में लिया है।    
 
प्रवृत्ति, दोष  : दोष और दोष पूर्वक प्रवृत्ति वह शरीर इन्द्रिय अर्थ बुद्धि सुख दुःख के उत्पन्न होने के कारण है।  

प्रेत्यभाव : एक देह को त्याग कर अन्य देह ग्रहण करना। अर्थात् ऐसा नहीं है की वर्तमान देह के पहले हमारे और देह नहीं थे न ही ऐसा है के वर्तमान के बाद और नहीं होंगे। यह आत्मा का देह प्राप्ति का क्रम जो अनादि काल से चल रहा है और अपवर्ग तक चलता रहेगा यह प्रेत्यभाव है।

फल : साधन सहित सुख दुःख की प्राप्ति फल है। ध्यान रहे यहां मात्र सुख दुःख नहीं कहा गया और एक तरह से साधन ही मुख्य फल है। साधन हमें मुफ्त में नहीं मिलते। कर्माशय में से पुण्य खर्च करके मिलते है। फिर वह साधन का उपयोग हम कितना सुख दुःख पाने के लिए करते है यह हम पर निर्धारित है।

जैसे मानो आपने एक अच्छा tele lens ख़रीदा bird photography के लिए। अब उसके पैसे तो हर एक ख़रीदकर्ता को एक से देने पडेंगे फिर चाहे कोई उसका बहोत ही उत्कृष्ट, कोई मध्यम और कोई उसका निकृष्ट प्रयोग करें। ऐसे ही हमने खूब सारे पुण्य खर्च करके मनुष्य शरीर और अच्छे से काम करने वाली इन्द्रिया ली यह हमारे कर्माशय का फल होगा। अब हम पर निर्भर है की हम इन साधन का क्या उपयोग करें। हम इन साधन का ऐसा उपयोग भी कर सकते है की इनके लिए किया गया खर्चा अनेक गुना वापस मिल जाये या फिर पैसे डुबो भी सकते है और डुबोने पर आये तो हम इस का उपयोग करके अपने आप के बडे बडे नुकसान भी कर सकते है जो मनुष्येतर शरीर में रहते हुए नहीं हो सकते है।

दुःख : यहां दुःख का अर्थ सुख का न होना नहीं है। परन्तु जब सुख भी होता है तब भी हमेशा वह दुःख से लिप्त ही होता है इसको जानना है। 

अपवर्ग : जन्म मरण प्रवाह के उच्छेद को अपवर्ग कहते है जहां लेश मात्र भी दुःख नहीं है और परमात्मा का अनंत सुख है। यह जान लेने से की एक भी (सांसारिक, शरीर रहते हुए मिलने वाला) सुख दुःख से रहित हो ही नहीं सकता, मनुष्य वह सब दुःख लाने वाले सुखों से भी विरक्त होगा और उसका अपवर्ग का मार्ग प्रशस्त होगा।

प्रश्न :- 

१) नीचे में से कौन कौन से कथन सही है?

क) सूत्रकार ने इस शास्त्र के लिए प्रमेय इस लिए लिए है की प्रमाणों का प्रयोग कैसे करना है वह दिखाने के लिए उन्हें प्रमेयों की आवश्यकता थी। 
ख) सूत्रकार ने सर्वश्रेष्ठ प्रमेय इस शास्त्र में लिए है जिनके जान लेने से अपवर्ग की प्राप्ति होगी। 
ग) इन १२ प्रमेयों में मुख्य प्रमेय आत्मा है। बाकि ११ आत्मा को समझने में सहायक है। 
घ) यहां भाष्यकार ने आत्मा को सर्वज्ञ कहा है। इससे स्पष्ट है की आत्मा का अर्थ इस शास्त्र में परमात्मा होता है क्योंकि उसके अतिरिक्त सब कुछ कोई नहीं जानता।

२) जब मन भी इन्द्रिय है तो प्रमेयों में जहां इन्द्रिय पहले ही आ चूका है मन को फिर क्यों लिया गया है?

३) आत्मा शरीर में रहते हुए इन्द्रियों और मन से गृहीत अर्थ का ज्ञान प्राप्त करता है (भोगता है). इसमें इस सूत्र में प्रयोग किया गया शब्द बुद्धि किस वस्तु के लिए प्रयोग किया है?

शुक्रवार, 6 मई 2022

स द्विविधों दृष्टादृष्टार्थत्वात् । १.१.८

स द्विविधों दृष्टादृष्टार्थत्वात् । १.१.८ 

वह (शब्द प्रमाण) दो प्रकार का होता है। दृष्टार्थ (इस जन्म में प्रत्यक्ष होने वाले विषय वाला) और अदृष्टार्थ (इस जन्म में प्रत्यक्ष न होने वाले विषय वाला।)

दृष्टार्थ : शब्द प्रमाण से जाने गए अर्थ का इसी जन्म में प्रत्यक्ष किया जा सके वह दृष्टार्थ है। जैसे किसी ने कहा की अमुक जगह पर मेला लगा है। हम वहां जा कर उसका प्रत्यक्ष कर सकते है। जीवन में ऐसे शब्द प्रमाण व्यवहार चलाने में प्रचुर मात्रा में उपयोग में आते है।

अदृष्टार्थ : शब्द प्रमाण से जाने गए अर्थ का इसी जन्म में प्रत्यक्ष न किया जा सके वह अदृष्टार्थ है। यदि कोई शब्द प्रमाण अगले जन्मों के बारे में कुछ बताता है तो उस अर्थ को हम इस जन्म में देख नहीं सकते और अगले जन्म में हमें यह याद नहीं होगा की हमने पिछले जन्म में शब्द प्रमाण से कुछ जाना था। 

तो क्या ऐसे विषयों के बारे में हम शब्द प्रमाण से अतिरिक्त कुछ नहीं जान सकते? जान सकते है। अनुमान प्रमाण का प्रयोग हम ऐसी जगहों पर कर ही सकते है।
  
उदाहरण के लिए यह शब्द प्रमाण ले लेते है की आत्मा है। (यह वैसे तो दृष्टार्थ में आयेगा क्योंकि आत्मा का (स्वयं का) प्रत्यक्ष संभव है। पर ऐसा करना इतने अल्प संख्या में योगिओं के लिए ही संभव है की सामान्य जन के लिए वह अदृष्टार्थ कहा जा सकता है। हम आत्मा का प्रत्यक्ष करने में असमर्थ होते हुए भी इच्छा द्वेष प्रयत्न आदि को देखकर आत्मा का अनुमान कर सकते है।

यह दो विभागों को स्पष्टता से बताने का उद्देश्य यह है की हम अदृष्टार्थ को शब्द प्रमाण न माने यह न हो। जैसे की वेदों में आए हुए अदृष्टार्थ शब्द प्रमाण।  
परमात्मा सबसे बडा आप्त है क्योंकि वह सर्वज्ञ है और हमारे उपकार के लिए उसका उपदेश होता है। इस लिए वेद जो ईश्वर का उपदेश है (जो वह प्रत्येक सृष्टि के प्रारंभ में श्रेष्ठ ऋषिओं के अंतःकरण में प्रकाशित करता है।) शब्द प्रमाण है।* और ऐसे शब्द प्रमाणों को भी अनुमान प्रमाण से जानने के प्रयत्न किए जा सकते है।

*वेद अथवा अन्य वेद सम्मत शास्त्र को शब्द प्रमाण मानने का अर्थ यह बिलकुल नहीं है की कोई भी उनका जो अर्थ करने लगे वही शब्द प्रमाण है। या तो हम व्याकरण निरुक्त वगैरह पढकर, हमारे अंतःकरण को पूर्ण निर्मल और पवित्र बनाकर अपने आप को इस लायक बनाए जिससे हम उनका अर्थ स्वयं समझ सके अथवा ऐसा आप्त ढूंढे जो हमें अर्थ बता सके। (और वहां पहुंचने के लिए भी हमें कई शब्द प्रमाणों से लाभान्वित होना पडेगा तो हमें आप्त तो ढूंढना ही पडेगा।)

प्रश्न :-

१) शब्द प्रमाण वह है जहां हम आप्त उपदेश से कोई वस्तु जानते है और ऐसा करके जब हमें ज्ञान मिल ही जाता है तो अनुमान प्रमाण अथवा प्रत्यक्ष से जानने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। सही/गलत?

२) वेद और वेद सम्मत ऋषिकृत शास्त्र में कही गयी वस्तु शब्द प्रमाण है फिर भले ही वह अदृष्टार्थ हो। सही/गलत?

३) जब भाई मैक्समूलर हमें वेदो का अर्थ समझाते है तो वह हमारे लिए शब्द प्रमाण है क्यों की वेद में कही गयी बात ईश्वर का शब्द होने से शब्द प्रमाण है। सही/गलत? क्यों?

४) आप अपने मित्र को मिलने उसके घर जाते है। आंगन में उसका ४ साल का बच्चा खेल रहा है। वह आप को बताता है की पापा तो घर पर नहीं है और आप वापस आ जाते है। क्या यहां बच्चे द्वारा दी गयी जानकारी शब्द प्रमाण है?

रविवार, 1 मई 2022

प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्। १.१.६ आप्तोपदेशः शब्दः। १.१.७

प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्। १.१.६
 
प्रसिद्ध वस्तु के जाने हुए समान धर्म से साध्य(जानने योग्य) वस्तु का ज्ञान कराने वाला साधन उपमान प्रमाण कहलाता है।

धर्म =जो भी द्रव्य में रहता है वह उसका धर्म कहलायेगा। गुण, कर्म, जाती
(इस दृष्टि से गुण - गुणी की तुलना में धर्म - धर्मी अधिक व्यापक है।)
सधर्म = समान धर्म
साधर्म्य = समान धर्म का होना 

जब कोई वस्तु के धर्म आप जानते हो और यह भी जानते हो की कोई अन्य वस्तु में इससे मिलते जुलते अमुक अमुक धर्म है (परन्तु उस अन्य वस्तु को नहीं जानते), उसके पश्चात अन्य वस्तु का प्रत्यक्ष करते समय उन जाने हुए समान धर्मों को वहां भी पा कर प्रत्यक्ष की जा रही वस्तु के साथ अन्य वस्तु का नाम जोडना यह उपमान प्रमाण का काम है।

जैसे आप को जंगल में जा कर मुद्गपर्णी और शालपर्णी (यह दो औषधीय पौधे है) लाने के लिए कहा गया। आप इन औषधियों को नहीं जानते पर आप को बताया  गया की इनके नाम इनके पर्ण मुंग और उडद (मुद्ग और शाल) के पत्तों के समान होने से है और आप मुंग और उडद के पौधों को पहचानते हो। तो अब जब जंगल में मुद्गपर्णी और शालपर्णी देखोगे तब उन के पत्तों को देखकर उन पौधों से उनका नाम जोड पाओगे (उनकी पहचान कर पाओगे)।

यहां आपका मुंग और उडद के पर्ण कैसे है यह जानना पहले का प्रत्यक्ष था (अब स्मृति में से आया था।)
आपका यह जानना की मुद्गपर्णी और शालपर्णी के पत्ते मुंग और उडद के पत्ते के समान होते है यह पहले का शब्द प्रमाण था (अब स्मृति में से आया था।)
मुद्गपर्णी और शालपर्णी का आप अभी प्रत्यक्ष कर रहे हो। 
उपमान प्रमाण यहां प्रत्यक्ष की जा रही वस्तु से उसका नाम जोडने का कार्य कर रहा है।

'जैसे यह वैसे वह' कहकर बोला जाता है वह उपमान प्रमाण है। अनुमान प्रमाण के पंचावयव में चतुर्थ अवयव उपनय उपमान प्रमाण सदृश्य है। (जैसे रसोई में धुआं आग के कारण था ऐसे ही पर्वत पर)


अब शब्द प्रमाण का सूत्र देखते है। 

आप्तोपदेशः शब्दः। १.१.७ 
आप्त पुरुष का कथन शब्द प्रमाण कहलाता है।

आप्त =वह पुरुष (=व्यक्ति) जिसने जिस पदार्थ का विषय है उसका साक्षात्कार किया है।
साक्षात्कार = जो वस्तु जैसी है उसको उसी रूप में निश्चयपूर्वक जानना।

ऐसा जानकार व्यक्ति (=पदार्थ का साक्षात्कृतधर्मा पुरुष = आप्त) जब उस विषय के बारे में अन्यों को बताने के लिए प्रवृत्त होता है तब उसका कथन शब्द प्रमाण कहलाता है। 

आप्ति शब्द आप् (आपॢँ व्याप्तौ) से बनता है जिसका अर्थ है पूर्ण जानकारी। उस आप्ति के साथ अपने कार्य में प्रवृत्त होने वाला पुरुष आप्त है। 

यह लक्षण उत्तम विद्वान, साधारण जन और अति सीमित ज्ञान रखने वालों पर एक सा लागू होगा। जिस जिस विषय में उनको यथार्थ जानकारी है उन उन विषय में वह आप्त बन सकते है।

जगत में अनेक व्यवहार इसी प्रमाण के आधार पर चलते है और मात्र मनुष्य ही नहीं, अन्य जीव भी (अन्य प्रमाणों के साथ साथ) इसका उपयोग करते है।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानम् पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतो दृष्टं च। १.१.५

अनुमान प्रमाण प्रत्यक्ष की भांति सीधा स्पष्ट नहीं है और यहां त्रुटियां होने की संभावना अधिक रहती है। परंतु प्रत्यक्ष की तुलना में इस का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है क्योंकि हम प्रत्यक्ष बहुत ही अल्प वस्तुओं का तथा मात्र वर्तमान का ही कर पाते है परंतु व्यवहार में हमें पग पग पर प्रमाण की आवश्यकता रहती है और विषय मात्र वर्तमान के न हो कर भूतकाल अथवा भविष्य के भी होते है जहां अनुमान प्रमाण यही उपयोगी सिद्ध होता है। इन सब कारणों से इस शास्त्र का मुख्य विषय भी अनुमान प्रमाण ही है।

अनुमान प्रमाण के लक्षण अगले सूत्र में बताए गए है।

अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानम् पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतो दृष्टं च। १.१.५

प्रत्यक्ष पूर्वक अनुमान प्रमाण तीन प्रकार का होता है। पूर्ववत् शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट।

अथ = इस के पश्चात (प्रत्यक्ष के पश्चात अनुमान का वर्णन किया जाता है)
तत्पूर्वकं = तत् (प्रत्यक्ष) पूर्वक। पहले आपने प्रत्यक्ष पूर्वक लिंग/धर्म (लक्षण) - लिंगी/धर्मी (धर्म जिसमें रहता है वह पदार्थ) का संबंध जाना हुआ है और फिर जब आप धर्म देखते हो और स्मृति में से उस संबंध के ज्ञान (व्याप्ति ज्ञान) के उभरने से अप्रत्यक्ष धर्मी का ज्ञान होता है।
वर्तमान में किया गया धर्म का प्रत्यक्ष ही अनुमान प्रमाण का हेतु बनेगा। जैसे धुआं प्रत्यक्ष होने पर अग्नि का ज्ञान होता है उसमें धुएं  का प्रत्यक्ष ही हेतु है (जो अनुमान प्रमाण के पंचावयव का दूसरा अवयव है।)
त्रिविधम् = तीन प्रकार का
अनुमानम् = अनुमान प्रमाण होता है।

(भाष्यकार पूर्ववत् शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट के दो दो अर्थ दे रहें है।)
पूर्ववत् = १) पूर्व वाला। कारण से कार्य का अनुमान २) पूर्व जैसा   
शेषवत् = १) शेष वाला। कार्य से कारण का अनुमान। २) शेष (बाकि) बचा वह 
सामान्यतोदृष्ट =सामान्य नियम के आधार पर अनुमान। 

पहले प्रथम अर्थ देखते है। 

पूर्ववत् = पूर्व वाला। कारण से कार्य का अनुमान
जैसे उमड के आये हुए काले बादल (और वर्षा के अन्य चिन्ह) देखकर यह निश्चय हो जाता है की वर्षा आएगी।
  
शेषवत् = शेष वाला। कार्य से कारण का अनुमान।
जैसे नदी में अचानक आया हुआ बहुत पानी, उसका तेज वेग और पानी का मिट्टी पत्ते को लिए हुए होने से यह पता लगता है की ऊपर कहीं वर्षा हुई है। 

सामान्यतोदृष्ट =सामान्य नियम के आधार पर अनुमान।
जैसे हमने हमेशा देखा है की यदि कोई वस्तु देशांतर को प्राप्त होती है तो ऐसा उसने गति करने पर ही होता है। अब हम कोई एक व्यक्ति को एक दिन एक जगह और अन्य दिन अन्य जगह देखते है तो हम यह जान लेते है की उसने गति की है। भले ही हमने उसे गति करते नहीं देखा।
ऐसे ही जब सूर्य किरण हम तक पहुंचती है तो यद्यपि हम उसे गति करते नहीं देख पाते पर वह सूर्य से निकल कर हम तक पहुंची है (देशांतर को प्राप्त हुई है) उससे हम जान सकते है की उसने गति की है।

अब इन का दूसरा अर्थ देखते है।
  
पूर्ववत् = पूर्व जैसा। हमने पूर्व में जो व्याप्तिज्ञान किया है उनमें से एक (जो दूसरे का निश्चय से बोध करता है) को देख कर दूसरे को अनुमान से जान लेंगे।
यदि व्याप्ति सम है जैसे जो उत्पन्न होता है वह नाश को भी प्राप्त होता है और जो नाश हुआ है वह उत्पन्न भी हुआ होगा। अर्थात् यदि दो में से कोई एक को देख कर दूसरे का निश्चय हो सकता है तब अनुमान दोनों और कर सकते है। यदि व्याप्ति विषम हो जैसे जहां धुआं होता है वहां आग होती है पर जहां आग हो वहां धुएं का होना अनिवार्य नहीं है। वहां हम व्याप्ति के अनुसार एक को देखकर दूसरे का अनुमान कर सकते है पर विपरीत नहीं। 
 
यहां पूर्ववत् में प्रथम अर्थ के पूर्ववत् और शेषवत् दोनों का समावेश हो जायेगा।
  
शेषवत् = शेष बचा वह। जैसे मानो हमारे घर तीन मित्र आये थे। उनके जाने के बाद हमने देखा की उनमें से कोई चावीयों का गुच्छा भूल गया है। हम एक को फोन करके पूछते है पर गुच्छा उसका नहीं है। हम दूसरे को पूछते है पर वह उसका भी नहीं है। अब क्योंकि एक ही मित्र बचा है जिसका वह गुच्छा हो सकता है उसको बिना पूछे ही हम निश्चय कर लेंगे की वह उसका है। 

सामान्यतोदृष्ट =सामान्य नियम के आधार पर अनुमान। जैसे हमें पता है की गुण हमेशा गुणी में ही रहता है। अब यह नियम के आधार पर जब हम कोई गुण देखते है पर गुणी का प्रत्यक्ष नहीं कर पाते है तब भी कोई न कोई गुणी तो होगा यह जान लेते है। जैसे इच्छा प्रयत्न आदि गुण को देखकर हम आत्मा (अथवा कोई न कोई यदि हम आत्मा न कहना चाहे) गुणी का अनुमान कर लेते है। 

भाष्यकार सामान्यतोदृष्ट के इस अर्थ को प्रथम अर्थ से इस आधार पर अलग बताते है की वहां कार्य-कारण का सम्बन्ध था अथवा वहां जिसका अनुमान कर रहे है उस जैसी अन्य वस्तु/क्रियाएं हमने देख रखी है जब की यहां हम ऐसी वस्तु का अनुमान भी करते है जो हमने कभी भी प्रत्यक्ष नहीं की है।

मेरी टिप्पणी :-
भाष्यकार ने दो अर्थ दिए है पर दूसरे अर्थ में प्रथम अर्थ में समाविष्ट सारे प्रसंग पूरी तरह समाविष्ट हो जाते है और वह अधिक व्यापक है। तो मुझे प्रथम अर्थ की कोई प्रासंगिकता नहीं लगती। हो सकता है आगे ऐसी स्थिति में मैं अपनी Notes में एक ही लिखूं।

मेरी तत्पूर्वकं को ले कर कुछ टिप्पणियां है पर उनको जब अनुमान प्रमाण को विस्तार से आगे देखेंगे तब उठाऊंगी। पर संक्षिप्त में, 'प्रत्यक्ष प्रमाण पूर्वक' इसको व्याप्ति स्थापना से जोडना मुझे योग्य लगता है वह व्याप्ति स्थापना प्रमाण का उपयोग कर रहा है उसके द्वारा ही हुई हो, अर्थात् उसने ही व्याप्ति का प्रत्यक्ष किया हो यह कहना उचित नहीं लगता। और क्योंकि शब्द और अनुमान दोनों ही अंततः प्रत्यक्ष मूलक होते है हम उनके द्वारा स्थापित व्याप्ति आधारित अनुमान भी कर सकेंगे (हम करते तो है ही, पर ऐसा करने से तत्पूर्वकं खंडित नहीं होगा जब उसको व्याप्ति स्थापना के साथ जोड़ेंगे।)

भाष्यकार त्रिविधम् को ले कर प्रश्न उठाते है की जब तीन प्रकार का उल्लेख ही कर दिया है तो फिर त्रिविधम् भी क्यों कहा? वह तो बिना कहे भी कोई भी समझ सकता था। इसका कोई संतोष जनक उत्तर तो नहीं दिया है पर यह निर्देश किया है की सूत्रकार ने ऐसा ही तीन और सूत्र में भी आगे किया है। तो हम उसको सूत्रकार की शैली मान सकते है। 


प्रश्न:-

१) जब प्रत्यक्ष प्रमाण को श्रेष्ठ माना गया है और वहां तक पहुंचे बिना जिज्ञासा पूर्ण शांत नहीं होती तो अनुमान प्रमाण को इस शास्त्र का मुख्य विषय क्यों माना गया है?

क) क्योंकि हम बहुत थोडी वस्तुओं का प्रत्यक्ष कर पाते है पर अनुमान का क्षेत्र अति व्यापक है इस दृष्टि से वह महत्वपूर्ण है। 
ख) प्रत्यक्ष मात्र वर्तमान का होता है पर अनुमान भूत भविष्य का भी होता है इस दृष्टि से अनुमान व्यापक और महत्वपूर्ण है। 
ग) प्रत्यक्ष सीधा स्पष्ट होता है अनुमान की तुलना में जहां गलतीयां होने की अनेक संभावनाएं रहती है इसलिए उसे विस्तार से समझना अति आवश्यक है।
घ) ऊपर के सारे कारणों से अनुमान को मुख्य विषय बनाया गया है।
ङ) प्रत्यक्ष प्रमाण ही शास्त्र का मुख्य विषय है क्योंकि वह सर्वश्रेष्ठ है।

२) सूत्रकार ने अनुमान प्रमाण कितने प्रकार का बताया है? कौन कौन से?

३) जब हमें कार्य कारण अथवा धर्म धर्मी की व्याप्ति का ज्ञान है और यदि उसमें से एक को देखकर दूसरे का अनुमान कर लेते है तो सूत्र में बताये गए किस प्रकार के अनुमान का हम प्रयोग कर रहे है?


सोमवार, 25 अप्रैल 2022

update - इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४

न्यायदर्शन Notes शुरू करने के पूर्व foreword में मैंने कहा था,
"as I learn, will put notes out here. Expect them to be blatant copy of Acharya's kathan. ... Expect the pace to be slow and do not expect me to defend / explain things in this iteration. I plan to limit myself to my 'blatant copy' notes."

और तब मैंने सोचा था की ज्यादा से ज्यादा मैं अपनी शंकाए कहीं एक दो footnotes में लिख दूंगी पर यहां मात्र चौथे सूत्र में मुझे अपनी footnote से कुछ बडी असहमति लिखने के उपरांत कोई विकल्प नहीं दिखता।

यह पोस्ट मैंने जो समझा है उस पर आधारित है। प्रथम पोस्ट की तुलना में जो नया है वह भूरे रंग में और असहमति लाल रंग में है।   
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तृतीय सूत्र में प्रमाणों के विभाग कहने के उपरांत सूत्रकार प्रथम विभाग प्रत्यक्ष के लक्षण चतुर्थ सूत्र में बताते है। 

इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४

इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ वह ज्ञान जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी तथा व्यवसायात्मक हो उसको प्रत्यक्ष कहते है।

उत्पन्न हुआ ज्ञान = नया अर्थ जो मन ने ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचाया है। 

(आत्मा सदैव मन को ही देखता रहता है। कोई भी ज्ञान आत्मा तक मन ही पहुंचाता है। जो भी वस्तु मन जानता है उसको आत्मा को जनाता है। मन जो जड है चेतन नहीं उसका काम आत्मा का उपकार करना है और वह आत्मा की इच्छा (और उन इच्छाओं से बने संस्कार) के अनुसार काम करता है।)

कैसे उत्पन्न हुआ ज्ञान?
इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ ज्ञान। 

कैसा ज्ञान ?
१) अव्यपदेश्य : व्यपदेश का अर्थ है कथन, शब्द द्वारा किसी वस्तु का बोध कराना। व्यपदेश्य = कथन करने योग्य। अव्यपदेश्य का अर्थ है वह ज्ञान जिसका शब्द द्वारा बोध न कराया जा सके। 

ऐसा ज्ञान जो किसी के कहने से उत्पन्न हुआ हो वह प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता।

जब हम किसी की कही हुई बात सुनते/पढते है तब इन्द्रिय का अर्थवाचक शब्द  से (श्रोत्र/चक्षु/त्वचा का शब्द के ध्वनि/रूप/स्पर्श के साथ) सन्निकर्ष होता है। पर ऐसे ज्ञान को प्रत्यक्ष नहीं कहेंगे। वहां इन्द्रिय का सन्निकर्ष अर्थ के साथ नहीं हुआ है मात्र अर्थ के वाचक शब्दों के साथ हुआ है। अर्थ का ज्ञान वहां हमें जब मन उन वाचक शब्दों के अर्थ को स्मृति / संस्कार में से उभारकर आत्मा को अर्थ का ज्ञान कराता है तब होता है। 

जो ज्ञान इन्द्रिय के अर्थ से सन्निकर्ष से उत्पन्न होता है वह शब्द से नहीं दिया जा सकता। शब्द अनुभूति को वर्णित करने में हमेशा अपर्याप्त रहते है इस लिए उस ज्ञान का बोध शब्दों द्वारा हो ही नहीं सकता।

अर्थ के नामधेय (=नाम, संज्ञा) होते है जिससे व्यवहार चलता है। जैसे केले के स्वाद को हम मीठा कहते है पर न तो केले के मीठेपन का अनुभव करने के लिए हमारा 'मीठा' शब्द जानना पर्याप्त है न ही यदि कोई केला खाए तो उसकी स्वाद अनुभूति में उसको मीठा शब्द ज्ञात है या नहीं उससे कोई अंतर आएगा।

२) अव्यभिचारी : अ (निषेधात्मक) +वि (उपसर्ग, विरुद्ध रूप से) +अभि (चारों ओर) +चारि (चर् धातु से गति करने वाला).
व्यभिचारी = इधर उधर गति करने वाला। अव्यभिचारी =जिसमें स्थिरता हो, जो डिगे नहीं। अर्थात् वह ज्ञान जो बदल जाने वाला/खंडित होने वाला न हो। जैसे तपती धूप में हमने पानी देखा (मृगजल) पर निकट जाने पर वह नहीं था। ऐसे ज्ञान को भी प्रत्यक्ष नहीं कहेंगे। (भाष्यकार ने न्यायदर्शन की भूमिका में प्रमाण के बारे में कहा था प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यात् अर्थवत् प्रमाणम्)

३) व्यवसायात्मक : =निश्चयात्मक। प्रत्यक्ष ज्ञान संदेह रहित होना चाहिए। जैसे यदि हम कोई वस्तु को देखते है (चक्षु इन्द्रिय का वस्तु के साथ सन्निकर्ष होता है) परंतु  हमें निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह सांप है या रज्जु तो ऐसे में उसको प्रत्यक्ष नहीं कहा जायेगा।


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* जिस प्रश्न और उत्तर से में असहमत हूँ वे इस प्रकार थे। 
प्रश्न : तो क्या प्रत्यक्ष में मात्र इन्द्रिय का अर्थ से ही सन्निकर्ष होता है? इन्द्रिय का मन से तथा मन का आत्मा के साथ सन्निकर्ष नहीं होता? इनके बगैर प्रत्यक्ष हो जायेगा? यदि यह सन्निकर्ष भी होते है तो सूत्र में क्यों नहीं बताये?

उत्तर : यह सूत्र प्रत्यक्ष के सारे कारणों का अवधारण (निश्चय) नहीं करता। प्रत्यक्ष के पीछे इतने ही कारण है यह कहना सूत्र का प्रयोजन नहीं है अपितु प्रत्यक्ष के विशेष (भेदक) कारणों (लक्षण) को बताना इसका प्रयोजन है। आत्मा का मन से सन्नीकर्ष प्रत्येक प्रमाण में होता है और वह सब में सामान्य होने से प्रत्यक्ष का विशेष लक्षण नहीं बनेगा। 

मेरा पक्ष :-
प्रश्न ही नहीं बनता पर पहले ये देखते है की गलत प्रश्न को सही मान के दिए गए उत्तर से कैसे स्वयं का ही पक्ष खंडित हो रहा है।

वहां मन-आत्मा सन्निकर्ष के बारे में यह कहा गया की क्योंकि वह सब प्रमाणों में समान है इसलिये नहीं कहा गया।
तो क्या बाकी प्रमाण व्यभिचारी, संशयात्मक हो सकते है? प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यात् अर्थवत् प्रमाणम् क्या मात्र प्रत्यक्ष के लिए कहा था? 

प्रथम तो, ऐसा नहीं है की सूत्रकार ने पहले प्रमाण के लक्षण दे दिए हो (जिससे प्रमाण को अप्रमाण से भिन्न कर दिया हो) और अब वे प्रमाणों के अंदर विभाग मात्र के लक्षण दे रहे हो। इससे यह कहना सर्वथा विपरीत है की प्रत्यक्ष प्रमाण के सारे कारणों को सूत्रकार ने नहीं बताया जब इससे पहले उन्होंने प्रमाण के कोई कारण बताए ही नहीं जहां से हम यहां न बताये हुए सामान्य कारणों को inherit कर  सकें। (अपरिचित के दो हाथ है कहना तब व्यर्थ होगा जब हम लक्षण मनुष्य से भरी गाडी में से एक मनुष्य के कर रहे हो। मान लो वहां सारे जिव जंतु हो तब? और फिर यदि अतिव्याप्ति हो रही हो तो विशेषण लगा ही सकते है। जैसे यहां अव्यभिचारी आदि लगाए ही है)

उत्तर स्वयं के पक्ष को खंडित इस लिए करता है क्योंकि वास्तव में प्रश्न ही नहीं बनता। जब हम सूत्र में कहे गए 'उत्पन्न हुए ज्ञान' की अनदेखी नहीं करेंगे तो वह प्रश्न ही नहीं बनेगा। और यदि फिर भी कोई यह प्रश्न पूछे तो इनको यह स्पष्ट करना चाहिए की सूत्रकार के शब्द उत्पनं ज्ञानम् का अर्थ क्या है? क्या मन के अर्थ को ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचाने से ही आत्मा को ज्ञान नहीं होता? क्या कोई और पद्धति से भी ज्ञान उत्पन्न हो जाता है? यदि नहीं तो सूत्रकार ने एक ही बात दो बार क्यों नहीं कही ऐसी आपत्ति क्यों?
(यहां वैसे मुझे व्याकरण का ज्ञान न होने के उत्पन्न मेरी असमर्थता दिख रही है)
  
जहाँ तक इन्द्रिय और मन के सन्निकर्ष को ले कर उत्तर था तो उसमें मेरी असहमति प्रथम post में ही व्यक्त कर दी थी। पर अब जब मेरा पक्ष यह है की प्रश्न ही नहीं बनता तो उसको यहां लिखना अर्थहीन है। फिर भी उस उत्तर के प्रति असहमति वहां देख सकते है।

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हम विषय शब्द का अनेक बार उपयोग करते है तो इस शब्द का अर्थ क्या है?
विषय शब्द वि (विशिष्ट) उपसर्ग पूर्वक सि (षिञ् बन्धने) धातु से बनता है जिसका अर्थ है जो विशिष्ट रूप से इन्द्रियों को बांध देता है वह।

प्रश्न :-

१) इनमें से कौन सा ज्ञान प्रत्यक्ष है? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है?

क) आपके पडोसी उनकी बेटी जो जापान में रहती है वहां तीन महीने रहे कर आये है और अब जापान में सब कैसा है वह आपको सविस्तार सुना रहे है। उनके वर्णन से आपको जो ज्ञान हो रहा है क्या वह प्रत्यक्ष कहा जायेगा?

ख) वो वहां के कुछ videos भी लाये है और दिखाते है।

ग) उन्होंने वहां एक राष्ट्रीय उद्यान में कुछ पक्षीओं की ध्वनि रेकॉर्ड की थी वह भी आपको सुनाते है यद्यपि वहां कोई पक्षी  दिखाई नहीं दे रहा है।
घ) वे वहां से आप के लिए कोई मिठाई ले आये है जो आप ने खायी पर उसका नाम आप को पता नहीं है। 

२) आप कल टहलने गए थे और रास्ते में सांप है ऐसा दिखने पर डर कर रास्ता बदल कर वापस आ गए थे। आज जब उस रास्ते पर फिर से जाते है तो जहां कल सांप देखा समझे थे वहां रज्जु का टुकडा पडा हुआ देखकर समझ जाते है कल आप गलत समझे थे। आपने कल किस का प्रत्यक्ष किया था? सांप अथवा रज्जु का? और आज?

३) आपके समक्ष से कोई पसार हो गया और आप को दिखा भी पर क्यों की आप का ध्यान ट्विटर में था तो वह कौन था उस पर ध्यान नहीं गया बस उसने सफेद शर्ट पहनी थी उतना ध्यान गया। दूसरे दिन वह व्यक्ति आप को कहता है की कल आपने मुझे प्रत्यक्ष देखा तो था। क्या वो सही है? 

रविवार, 24 अप्रैल 2022

इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवस्यात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४

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तृतीय सूत्र में प्रमाणों के विभाग कहने के उपरांत सूत्रकार प्रथम विभाग प्रत्यक्ष के लक्षण चतुर्थ सूत्र में बताते है। 

इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४

इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ वह ज्ञान जो अव्यपदेश्य (जिसका शब्द द्वारा बोध न कराया जा सके), अव्यभिचारी (बदल जाने वाला / खंडित होने वाला न हो) तथा व्यवसायात्मक (संदेह रहित) हो उसको प्रत्यक्ष कहते है।

सूत्र ३ के भाष्य में हमने देखा था की वृत्ति (प्रमाण) इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष अथवा उससे उत्पन्न हुए ज्ञान दोनों को कहते है। पर ध्यान रहे की इस सूत्र में सूत्रकार मात्र सन्निकर्ष से उत्पन्न हुए ज्ञान को प्रमाण बताते है। (अन्य भाष्यकार यहां यतः (जिससे) पद को अध्याहार मानकर जिस सन्निकर्ष से ज्ञान उत्पन्न होता है यह अर्थ भी करते है। पृष्ठ २६, सन्दर्भ ५)  

इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ प्रत्येक ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं कहलायेगा। सूत्रकार कुछ विशेषताएं बताते है जिनके होने पर ही उस ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा जाता है।

१) अव्यपदेश्य : व्यपदेश का अर्थ है कथन, शब्द द्वारा किसी वस्तु का बोध कराना। व्यपदेश्य = कथन करने योग्य। अव्यपदेश्य का अर्थ है वह ज्ञान जिसका शब्द द्वारा बोध न कराया जा सके। 

ऐसा ज्ञान जो किसी के कहने से उत्पन्न हुआ हो वह प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता।

जब हम किसी की कही हुई बात सुनते/पढते है तब इन्द्रिय का अर्थवाचक शब्द  से (श्रोत्र/चक्षु/त्वचा का शब्द के ध्वनि/रूप/स्पर्श के साथ) सन्निकर्ष होता है। पर ऐसे ज्ञान को प्रत्यक्ष नहीं कहेंगे। वहां इन्द्रिय का सन्निकर्ष अर्थ के साथ नहीं हुआ है मात्र अर्थ के वाचक शब्दों के साथ हुआ है। अर्थ का ज्ञान वहां हमें जब मन उन वाचक शब्दों के अर्थ को स्मृति / संस्कार में से उभारकर आत्मा को अर्थ का ज्ञान कराता है तब होता है। 

जो ज्ञान इन्द्रिय के अर्थ से सन्निकर्ष से उत्पन्न होता है वह शब्द से नहीं दिया जा सकता। १) शब्द से वह अनुभूति उत्पन्न नहीं हो सकती २) शब्द अनुभूति को वर्णित करने में हमेशा अपर्याप्त रहते है इस लिए उस ज्ञान का बोध शब्दों द्वारा हो ही नहीं सकता। 

अर्थ के नामधेय (=नाम, संज्ञा) होते है जिससे व्यवहार चलता है। जैसे केले के स्वाद को हम मीठा कहते है पर न तो केले के मीठेपन का अनुभव करने के लिए हमारा 'मीठा' शब्द जानना पर्याप्त है न ही यदि कोई केला खाए तो उसकी स्वाद अनुभूति में जिसको मीठा शब्द ज्ञात है या नहीं उससे कोई अंतर आएगा।

२) अव्यभिचारी : अ (निषेधात्मक) +वि (उपसर्ग, विरुद्ध रूप से) +अभि (चारों ओर) +चारि (चर् धातु से गति करने वाला).
व्यभिचारी = इधर उधर गति करने वाला। अव्यभिचारी =जिसमें स्थिरता हो, जो डिगे नहीं। अर्थात् वह ज्ञान जो बदल जाने वाला/खंडित होने वाला न हो। जैसे तपती धूप में हमने पानी देखा (मृगजल) पर निकट जाने पर वह नहीं था। ऐसे ज्ञान को भी प्रत्यक्ष नहीं कहेंगे। (भाष्यकार ने न्यायदर्शन की भूमिका में प्रमाण के बारे में कहा था प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यात् अर्थवत् प्रमाणम्)

३) व्यवसायात्मक : =निश्चयात्मक। प्रत्यक्ष ज्ञान संदेह रहित होना चाहिए। जैसे यदि हम कोई वस्तु को देखते है (चक्षु इन्द्रिय का वस्तु के साथ सन्निकर्ष होता है) परंतु  हमें निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह सांप है या रज्जु तो ऐसे में उसको प्रत्यक्ष नहीं कहा जायेगा।

अब भाष्यकार पूर्वपक्षी का एक प्रश्न ले कर उसका उत्तर देते है। 
प्रश्न : तो क्या प्रत्यक्ष में मात्र इन्द्रिय का अर्थ से ही सन्निकर्ष होता है? इन्द्रिय का मन से तथा मन का आत्मा के साथ सन्निकर्ष नहीं होता? इनके बगैर प्रत्यक्ष हो जायेगा? यदि यह सन्निकर्ष भी होते है तो सूत्र में क्यों नहीं बताये?

उत्तर : यह सूत्र प्रत्यक्ष के सारे कारणों का अवधारण (निश्चय) नहीं करता। प्रत्यक्ष के पीछे इतने ही कारण है यह कहना सूत्र का प्रयोजन नहीं है अपितु प्रत्यक्ष के विशेष (भेदक) कारणों (लक्षण) को बताना इसका प्रयोजन है। आत्मा का मन से सन्नीकर्ष प्रत्येक प्रमाण में होता है और वह सब में सामान्य होने से प्रत्यक्ष का विशेष लक्षण नहीं बनेगा। 

(आत्मा सदैव मन को ही देखता रहता है। कोई भी ज्ञान आत्मा तक मन ही पहुंचाता है। जो भी वस्तु मन जानता है उसको आत्मा को जनाता है। मन जो जड है चेतन नहीं उसका काम आत्मा का उपकार करना है और वह आत्मा की इच्छा (और उन इच्छाओं से बने संस्कार) के अनुसार काम करता है।)

इन्द्रिय और मन का सन्निकर्ष इस लिए नहीं कहा की
१) उस की भेदकता विषय और इन्द्रिय के सन्निकर्ष के समान ही है, एक सन्निकर्ष को कहने से ही लक्षण पूर्ण हो जायेगा और दूसरे को कहने से भेदकता में अंतर नहीं आएगा इस लिए नहीं कहा।

अथवा (जो मुझे थोडा भी तर्कसंगत नहीं लगता)
२) विषय इन्द्रिय सन्निकर्ष में प्रत्येक इन्द्रिय के अपने अपने विषय है जिससे हर एक इन्द्रिय के प्रत्यक्ष में भिन्नता है पर इन्द्रिय मन सन्निकर्ष में मन प्रत्येक इन्द्रिय के सामने एक ही होने से ऐसी भिन्नता नहीं है इस लिए उसे लक्षण नहीं बनाया।  

(इन्द्रिय मन सन्निकर्ष के उत्तर को ले कर मेरी शंका : इसका उत्तर यह क्यों नहीं दिया गया? -> अतीन्द्रिय विषय (वह विषय जो बाह्य इन्द्रियों से ग्राह्य नहीं है) में मन (अंतःकरण) का सन्निकर्ष  सीधा अर्थ के साथ होता है वहां फिर इन्द्रिय (मन) का सन्निकर्ष मन के साथ ऐसा कहना वह दोनों एक ही होने से नहीं बनता। ऐसे में यदि इन्द्रिय मन सन्निकर्ष को लक्षण बनाएंगे तो उस लक्षण की वहां अव्याप्ति हो जाएगी और यदि यह कहे की अव्याप्ति नहीं होगी क्योंकि वस्तु का स्वयं से सन्निकर्ष तो रहता ही है तब भी  ऊपर (१) तर्क के अनुसार इसका पृथक वचन व्यर्थ है। और यदि इस सन्निकर्ष का फल अर्थ का मन तक पहुंचना ऐसा लेंगे तो यह भी मन आत्मा के सन्निकर्ष की भांति सब प्रमाणों में सामान्य हो जायेगा और लक्षण नहीं बनेगा। ) 


हम विषय शब्द का अनेक बार उपयोग करते है तो इस शब्द का अर्थ क्या है?
विषय शब्द वि (विशिष्ट) उपसर्ग पूर्वक सि (षिञ् बन्धने) धातु से बनता है जिसका अर्थ है जो विशिष्ट रूप से इन्द्रियों को बांध देता है वह।

प्रश्न :-

१) इनमें से कौन सा ज्ञान प्रत्यक्ष है? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है?

क) आपके पडोसी उनकी बेटी जो जापान में रहती है वहां तीन महीने रहे कर आये है और अब जापान में सब कैसा है वह आपको सविस्तार सुना रहे है। उनके वर्णन से आपको जो ज्ञान हो रहा है क्या वह प्रत्यक्ष कहा जायेगा?

ख) वो वहां के कुछ videos भी लाये है और दिखाते है।

ग) उन्होंने वहां एक राष्ट्रीय उद्यान में कुछ पक्षीओं की ध्वनि रेकॉर्ड की थी वह भी आपको सुनाते है यद्यपि वहां कोई पक्षी  दिखाई नहीं दे रहा है।
घ) वे वहां से आप के लिए कोई मिठाई ले आये है जो आप ने खायी पर उसका नाम आप को पता नहीं है। 

२) आप कल टहलने गए थे और रास्ते में सांप है ऐसा दिखने पर डर कर रास्ता बदल कर वापस आ गए थे। आज जब उस रास्ते पर फिर से जाते है तो जहां कल सांप देखा समझे थे वहां रज्जु का टुकडा पडा हुआ देखकर समझ जाते है कल आप गलत समझे थे। आपने कल किस का प्रत्यक्ष किया था? सांप अथवा रज्जु का? और आज?

३) आपके समक्ष से कोई पसार हो गया और आप को दिखा भी पर क्यों की आप का ध्यान ट्विटर में था तो वह कौन था उस पर ध्यान नहीं गया बस उसने सफेद शर्ट पहनी थी उतना ध्यान गया। दूसरे दिन वह व्यक्ति आप को कहता है की कल आपने मुझे प्रत्यक्ष देखा तो था। क्या वो सही है? 

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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३

सूत्रकर्ता ने न्यायशास्त्र में पदार्थों के उपपादन का क्रम इस प्रकार रखा है।   
 
१) उद्देश २) लक्षण ३) परीक्षा 

उद्देश : नाममात्र से पदार्थ का उल्लेख करना वह उद्देश है। जैसे प्रथम सूत्र में १६ पदार्थों का नाम मात्र ले कर उद्देश किया गया है।
 
लक्षण : उद्दिष्ट पदार्थ का स्वरूप कथन, उसको अन्य पदार्थ से भिन्न स्पष्ट कर देने वाला धर्म लक्षण है। जैसे की यदि अनेक गायों में से आप किसी को कोई एक गाय बताना चाहते है तो उसको काली गाय/छोटी बछडी ऐसे कोई विशिष्ट लक्षण जो उस गाय में ही घटते हो उससे दिखाएंगे। 

परीक्षा : उद्दिष्ट पदार्थ के जो लक्षण कहे गए है वह उसके वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करता है की नहीं यह प्रमाणों से निश्चित करना परीक्षा है। लक्षण करने में अनेक त्रुटियां हो जाती है। जैसे की लक्षण लक्षित वस्तु पर यथार्थ घटता ही न हो (अव्याप्ति) अथवा वह अन्य वस्तुओं पर भी घटता हो (अतिव्याप्ति) अथवा लक्षण ऐसा हो की जिसका होना ही संभव न हो (असंभव)। परीक्षा से ऐसी कोई त्रुटि तो नहीं रह गयी है यह निश्चित करते है।

इस शास्त्र में दो पद्धतियां देखने को मिलती है। 
१) पदार्थ का उद्देश किया जाये (जैसे प्रथम सूत्र में 'प्रमाण') -> उसके विभाग बताये जाये (जैसे तृतीय सूत्र में प्रमाण कितने प्रकार के होते है वह बताया गया है) -> प्रत्येक विभाग के लक्षण
२) पदार्थ का उद्देश किया जाये (जैसे प्रथम सूत्र में 'छल') -> उसके लक्षण बताये जाये -> उसके विभाग बताये जाये 

तृतीय सूत्र में सूत्रकार सर्वप्रथम उद्दिष्ट पदार्थ प्रमाण के विभाग बताते है। 

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३ 

प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है। 

तृतीय सूत्र के प्रत्येक शब्द की व्याख्या करते हुए भाष्यकार कहते है,

प्रत्यक्ष : अक्षस्य अक्षस्य प्रतिविषयं वृत्तिः प्रत्यक्षम् 
अक्ष = इन्द्रिय, अक्षस्य अक्षस्य दो बार कहने से अर्थ होगा प्रत्येक इंद्रिय का
प्रतिविषय =अपने अपने विषय के साथ (आँख का रूप, श्रोत्र का शब्द, रसना का रस, त्वचा से स्पर्श, घ्राण का गंध (अथवा अंतःकरण का बाह्य करणों से ग्राह्य न हो ऐसे सूक्ष्म विषय जैसे आत्मा) के साथ)
वृत्ति =सन्निकर्ष, ज्ञान (यह दोनों अर्थ ले सकते है)

वृत्ति का अर्थ जब सन्निकर्ष लेंगे तब वस्तु का अर्थ/ज्ञान प्रमिति बनेगा। जैसे हमने आँख से देखकर यह पीने का पानी है यह निश्चय किया तो यहाँ पानी के रूप के साथ चक्षु इन्द्रिय के सन्निकर्ष को वृत्ति (=प्रमाण = जिससे कुछ जाना जाता है) मानेंगे तो प्रमिति "यह पीने का पानी है" उस ज्ञान को कहेंगे।
यदि हम "यह पीने का पानी है" इस ज्ञान को वृत्ति (=प्रमाण) कहेंगे तब प्रमिति उस पानी को ग्रहण करने अथवा छोडने/उपेक्षा (न पीने) की इच्छा को कहेंगे। 


अनुमान : मितेन लिंगेन अर्थस्य पश्चान्मानमनुमानम्
अनु + मान = पश्चात् + ज्ञान
मितेन = जाने हुए, लिंगेन = लक्षण से
जिस अर्थ को जानना है उसका कोई लक्षण पहले ज्ञात हो जाये उसके पश्चात् जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह अनुमान है। 
जैसे हमें पता है की धुआं आग का लक्षण है। अब जब हम धुएं को जानकर उसके आधार पर अग्नि के होने को जान लेते है वह अनुमान है। 

उपमान : सारूप्य ज्ञान, समान धर्मों का बोध
जैसे किसी ने नीलगाय नहीं देखी। उसको बताया गया की वह कुछ कुछ गाय जैसी होती है। अब जब वो नीलगाय को देखकर यह जान लेता है की यह नीलगाय है तब उसने उपमान प्रमाण का उपयोग किया है।

शब्द : जिसके द्वारा अर्थ की अभिव्यक्ति होती है।

भाष्यकार आगे बताते है की प्रमाण उपलब्धि (= बुद्धि =ज्ञान *) के साधन है और यह उसकी समाख्या (उसके निर्वचन) से ही पता लगता है।
*इस शास्त्र में बुद्धि उपलब्धि और ज्ञान समानार्थी के रूप में प्रयोग किए गए है। 
समाख्या =सम्यक रूप से आख्यान जिसके द्वारा =संज्ञा = नाम 
निर्वचन =निश्चित रूप से कथन करना =व्युत्पत्ति (शब्द किस धातु प्रत्यय से बना है यह जानना)
प्रमाण शब्द प्र उपसर्ग पूर्वक मा (माङ् माने) धातु से करण अर्थ में ल्युट् प्रत्यय से निष्पन्न हुआ है = प्रकर्ष रूप से जाना जाता है जिससे। 

हमारे शब्दों की यह विशेषता है की उनका अर्थ जानने के लिए हमें कहीं और नहीं जाना पडता, वह अपने अर्थ को स्वयं बताते है। 
जैसे मनुष्य शब्द का क्या अर्थ है यह जानना हो तो हम यह देखेंगे की मनुष्य शब्द किस धातु से बना है। मन् (मनुँ अवबोधने) धातु से यह शब्द बना है। उसका अर्थ है जो जानता है वह मनुष्य। 

और ऐसे ही प्रमाण के चारों विभाग के नाम भी अपने अर्थ को स्वयं ही बताते है जो हमने ऊपर उनका अर्थ करते समय देखा।

आगे भाष्यकार एक जिज्ञासा का उत्तर देते है। 
जिज्ञासा यह है की क्या कोई एक अर्थ को जनाने के लिए सारें प्रमाण आते है या किसी प्रमेय के लिए कोई प्रमाण और किसी और प्रमेय के लिए कोई प्रमाण ऐसी व्यवस्था है?

उत्तर : दोनों प्रकार देखे जाते है। उदाहरण के लिए मानो आप कहीं अंदर बैठे है और किसी ने आपको बताया की बहार कुछ दूर आग लगी है। यहां आप ने आग को शब्द प्रमाण से जाना। पर आपकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई। आप बहार निकलकर देखते है तो दूर से उठता धुआं दिखाई देता है। अब आपको अनुमान प्रमाण से भी पता लग गया की आग लगी है। आप की जिज्ञासा लेकिन अभी भी पूरी शांत नहीं हुई और आप उस दिशा में जा कर आग को प्रत्यक्ष देखते है। इस तरह यहां शब्द अनुमान और प्रत्यक्ष सारे प्रमाणों का उपयोग एक ही प्रमेय के लिए हुआ। 

ऐसा ही अन्य प्रमेय जैसे आत्मा में भी है। शास्त्र से हमें शब्द प्रमाण मिलता है की आत्मा है। हम उस शब्द प्रमाण पर विश्वास करते हुए भी आत्मा के लक्षण (सुख, दुःख, प्रयत्न, ज्ञान) देखकर आत्मा को अनुमान प्रमाण से जानने का प्रयत्न भी करते है। तथापि हमारी जिज्ञासा का सम्पूर्ण समाधान तब ही हो सकता है जब हम आत्मा का प्रत्यक्ष कर ले। (जो योगसमाधि में आत्मा और मन के संयोगविशेष से योगी कर सकता है।) (यहाँ प्रमाता और प्रमेय दोनों एक ही है।)

इस प्रकार से जब एक प्रमेय को जनाने सारे प्रमाण आते है उसको अभिसंप्लव कहते है। परन्तु कुछ प्रमेय ऐसे है जहां कोई एक प्रमाण ही आता है। जैसे हाथ में रखा हुआ आंवला। यहां यह सीधा सीधा प्रत्यक्ष ही हो रहा है और हमें कोई और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। तो कहीं मानो आप खंड में अंदर बैठे है और बिजली कडकने की ध्वनि सुनाई दी। यहां आप अनुमान प्रमाण से जान लेंगे की बाहर बिजली हुई है पर न तो यह जनाने के लिए शब्द प्रमाण है न ही उसका प्रत्यक्ष संभव है।

ऐसे ही कहा जाता है की स्वर्ग की इच्छा करने वाला अग्निहोत्र करें।  अब स्वर्ग का कोई प्रत्यक्ष नहीं कर सकता और जिसका प्रत्यक्ष असंभव हो उसका अनुमान भी नहीं करा जा सकता (उसके कोई लक्षण प्रत्यक्ष न होने पर) तो उसमें मात्र शब्द प्रमाण ही रहे जाता है। ऐसे एक प्रमेय के लिए जब एक प्रमाण आता है तो उसको व्यवस्था कहते है। 

इन सब प्रमाणों से होने वाली प्रमिति में प्रत्यक्ष प्रमाण को प्रधानता है। क्योंकि शब्द प्रमाण से जानी हुई वस्तु के भी लक्षण जानने की इच्छा रहती है और लक्षण जान कर भी उसको प्रत्यक्ष करके, पूर्ण रूप से जान कर ही आत्मा की जानने की भूख मिटती है।

प्रश्न :-

१) इन में से लक्षण के लिए कौन सा कथन सही है?
क) कोई वस्तु का प्रत्येक धर्म जो हमेशा उस में रहता हो वह उसका लक्षण कहा जायेगा।
ख) कोई वस्तु का प्रत्येक धर्म जो यदि कभी भी उस में रहता हो वह उसका लक्षण कहा जायेगा।
ग) कोई वस्तु के वह धर्म जो उसमें विशेष हो अर्थात् उसको दूसरी वस्तुओं से पृथक करने में सहायक हो वह उसके लक्षण कहे जायेंगे।

२) लक्षण करने में होने वाली कुछ त्रुटिओं के नाम हमने जाने। क्या नीचे दिए गए उदाहरणों में उन में से कोई त्रुटि है? यदि है तो कौन सी?

क) आपने रेलवे स्टेशन पर आने वाले अपने मित्र को लेने के लिए किसी को भेजा। लेने जाने वाले को आपने अपने मित्र की पहचान के लिए उसके लक्षण बताये की उसके दो हाथ दो पैर और दो आँखे है। (अधिक जानकारी : गाड़ी सामान्य ही थी - यदि किसी का एक्स्ट्रा चतुराई का मूड बन रहा हो तो।)
ख) आप अपने प्रिय महानुभाव के लक्षण किसी को बता रहे है। की वह तो त्रिकालदर्शी है और इतने बलवान की १००० व्यक्ति उन पर एक साथ हमला कर दे तो भी वह निहत्थे ही उन्हें परास्त कर सकते है।
ग) जो पढे लिखे लोग होते है उनका लक्षण है की उनको अंग्रेजी आती है। 
 
३. न्यायदर्शन में कितने प्रमाण माने जाते है? सारूप्य ज्ञान, समान धर्मों को जानकर किसी वस्तु को जान लेना कौन सा प्रमाण है?

४. किसी वस्तु का कोई लक्षण प्रत्यक्ष करना संभव न हो तो उस वस्तु को अनुमान तथा शब्द प्रमाण से ही जाना जा सकता है। सही/गलत?

५. प्रमाणों में कौन सा प्रमाण प्रधान माना जाता है? क्यों?

६. प्रमाण वह है जिससे कुछ जाना जाता है। तो यदि हम किसी वस्तु के अर्थ को प्रमाण कहे तब उससे हम क्या जानते है? (या फिर हम किसी वस्तु के अर्थ को प्रमाण नहीं कह सकते?)