गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

Resources

१. न्यायदर्शन by आचार्य चंद्रदत्त शर्मा (audio lectures, hindi)
at https://archive.org/details/Nyayadarshana

२. न्यायदर्शन by आचार्य सत्यजित् आर्य (audio lectures, hindi)
at https://archive.org/details/001NDBHOOMIKA14.09.01


Books

१. न्यायदर्शन by आचार्य ढुंढिराज शास्त्री
at https://archive.org/details/HindiNyayaDarshanaDhundhirajShastri

२. न्यायदर्शनम् by आचार्य उदयवीर शास्त्री
at https://archive.org/details/20210504_20210504_2251/Nyaya_Darshanam_Uday_Vir_Shastri/

३) भारतीय दर्शन परिचय खंड १ न्यायदर्शन
     - हरिमोहन झा

https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.538446/
pdf: https://archive.org/download/in.ernet.dli.2015.538446/2015.538446.Bharatiya-Darshan.pdf

४) न्यायदर्शनम् - स्वामी दर्शनानंद सरस्वती
https://archive.org/details/KRI136NyayaDarshanam1919MuradabadSw.DarshananadaSaraswati/

५) न्यायदर्शनम्  ન્યાયાર્થપ્રકાશ ભાષ્ય - પં. મયાશંકર શર્મા
https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.258037/

शनिवार, 16 अप्रैल 2022

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः। १.१.२

प्रथम सूत्र में सूत्रकार कहते है की सूत्र में निर्दिष्ट १६ पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

अब प्रश्न उठता है की क्या उनका तत्वज्ञान प्राप्त होते ही मोक्ष मिल जायेगा?

इस प्रश्न का उत्तर सूत्रकार दूसरे सूत्र में देते है।

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः। १.१.२ 

दुःख जन्म प्रवृत्ति दोष मिथ्याज्ञान के उत्तर उत्तर के (अगले अगले के) नष्ट हो जाने पर उसके अव्यवहित पूर्व के नाश हो जाने पर मोक्ष मिलता है।

जन्म प्रवृत्ति दोष मिथ्याज्ञान ये दुःख जन्म प्रवृत्ति दोष के कारण है और कारण के नाश होने पर कार्य का नाश होता जायेगा। 

प्रथम सूत्र में निर्दिष्ट पदार्थों के तत्वज्ञान से मिथ्याज्ञान का नाश होगा। 
मिथ्याज्ञान का नाश होने पर दोषों का नाश होगा। 
दोषों का नाश होने पर प्रवृत्ति हटेगी।
प्रवृत्ति के हटने पर जन्मचक्र का नाश होगा। 
जन्म के हटने पर दुखों से आत्यंतिक मुक्ति मिलेगी (जहां लेशमात्र भी दुःख शेष नहीं होगा) अर्थात् मोक्ष मिलेगा। 

दुःख के मूल में मिथ्याज्ञान है और जब तक मिथ्याज्ञान को पूर्णतया नहीं हटाएंगे तब तक दुःख पूर्ण रूप से नहीं मिटेगा। 

प्रथम सूत्र में आये प्रमेय के अंतर्गत सूत्रकार १२ प्रमेय दर्शाएंगे। उन १२ प्रमेयों के तत्वज्ञान से मुक्ति मिलेगी जो की इस शास्त्र का निःश्रेयस है। यहां भाष्यकार संकेत करते है की उन प्रमेयों के विषय में क्या क्या मिथ्याज्ञान होता है। जैसे की,

आत्मा होता ही नहीं है ऐसा मानना। जो आत्मा नहीं है उसको आत्मा मानना। सुख को दुःख, दुःख को सुख मानना। नित्य को अनित्य, अनित्य को नित्य मानना। जो अत्राण (रक्षा करने में असमर्थ है) है उसको त्राण (रक्षक) मानना। भयावह में निर्भयता की भावना करना। घृणित को स्वीकार्य मानना। त्याज्य को अत्याज्य मानना। यह सब आत्मा तथा तत्व संबंधी मिथ्याज्ञान है। 

प्रवृत्ति के विषय में, कर्म को न मानना (सब काम पूर्व निर्धारित अथवा आकस्मिक अथवा नैसर्गिक ही होते रहते है), कर्मफल को न मानना, यह मिथ्याज्ञान है। यह संसार दोष निमित्तक नहीं है और न ही आत्मा इसमें दोष के कारण आता है (इस शास्त्र में दोष = राग द्वेष मोह)। यह दोष विषयक मिथ्याज्ञान है। 

मृत्यु के साथ सब समाप्त हो जाता है। बस देह ही था जो नष्ट हो गया और ऐसा कुछ नहीं है जो एक देह को छोडकर दूसरे को प्राप्त करेगा। कोई चेतन आत्मा नहीं है जिसके देह से संयोग को जन्म और वियोग को मृत्यु कहते है। अथवा मृत्यु के बाद जन्म है भी तो वह अनिमित्तक / आकस्मिक / कर्म से अतिरिक्त कोई निमित्त से हो जाता है। यह प्रेत्यभाव के बारे में मिथ्याज्ञान है। प्रेत्य =प्रकर्ष रूप से गया हुआ, भाव = होना, प्रेत्यभाव = प्रकर्ष रूप से जा कर फिर से होना।
(प्रेत शब्द "जिसमें से प्रकर्ष रूप से जाया जा चूका है" अर्थात् वह शरीर जिसमें से आत्मा निकल गया है उसके लिए भी कहा जाता है।)

मोक्ष अत्यंत भयंकर वस्तु है। उसमें सर्व प्रियजन, सुख के साधन, कल्याणकारी सर्व वस्तु से वियोग हो जाता है। ऐसा कौन बुद्धिमान होगा के जो सर्व कल्याणकारी वस्तुओं के वियोग रूप भयजनक मोक्ष की कामना करेगा। ऐसा मानना अपवर्ग के बारे में मिथ्याज्ञान है।
अपवर्ग = अप +वर्ग। अप = दूर, वर्ग = छोडना वृजीँ (वृज् ) वर्जने धातु से, अपवर्ग = दुःखों को दूर छोडना
मोक्ष, मुक्ति का अर्थ भी (दुःखों को) छोडना है। मुच् (मुचँ) प्रमोचने मोदने च, मुच् (मुचॢँ) मोक्षणे धातु से।  

ऐसे सब मिथ्याज्ञानों से जो जो वस्तु हमें अनुकूल प्रतीत होती है उसमें हम राग कर लेते है और जो जो प्रतिकूल लगती है वहां द्वेष कर लेते है। 

याद रहें की जो जो प्राप्त करने अथवा छोड़ने की इच्छाएं हमें तत्वज्ञान से होती है (मिथ्याज्ञान से नहीं) वह राग द्वेष नहीं है।

(कुछ लोग कहते है की मुक्ति पाने के लिए सभी इच्छाएं छोडनी पडेगी, मुक्ति की इच्छा भी। पर उनसे यदि पूछा जाए की मुक्ति की इच्छा क्यों छोडनी है तो जवाब मिलेगा ऐसा नहीं करने पर मुक्ति नहीं मिलेगी)

मिथ्याज्ञान से उत्पन्न दोष (राग, द्वेष, मोह) के कारण मनुष्य असत्य, ईर्ष्या, असूया (गुण में दोष देखना), लोभ से युक्त प्रवृत्ति करता है।

शरीर, वाणी तथा मन से होने वाली धर्म अधर्म (पुण्य पाप)  प्रवृत्तियां इस प्रकार है। दोष से मात्र पापात्मक ही नहीं पुण्यात्मक प्रवृत्ति भी होती है। और मोक्ष में पाप के साथ साथ पुण्य भी बाधक होता है। (सकाम पुण्य जो पुण्य के फल को साध्य मान कर किया गया है वह बाधक होता है। निष्काम धर्माचरण जहां उसके फल को साध्य नहीं माना है उसका फल आत्मा को मोक्ष की दिशा में आगे बढने के लिए साधन जुटाने में हेतु बनता है।)

अशुभ / अधर्म / पापात्मिका प्रवृत्तियां 

शरीर : हिंसा, चोरी, प्रतिषिद्ध मैथुन
वाणी : असत्य, कठोर वचन, चुगली(अयथार्थ कथन, जिसको बात नहीं कहनी चाहिए उससे कहना), प्रलाप (असम्बद्ध कथन)
मन : परद्रोह भावना, परद्रव्य अभीप्सा, नास्तिकता

शुभ / धर्म / पुण्यात्मिका प्रवृत्तियां 

शरीर : दान, परित्राण(रक्षण), परिचर्या(सेवा)
वाणी : सत्य, हितकर, प्रिय, स्वाध्याय (योगदर्शन में स्वाध्याय का अर्थ मोक्ष दिलाने वाले शास्त्रों का अध्ययन यह किया गया है।)
मन : दया, अस्पृहा, श्रद्धा
श्रद्धा = श्रत् (सत्य) +धा (धारण करना). सत्य को धारण करना और यदि हमें कोई सत्य पहले नहीं पता था पर अब पता चला है तो उसको स्वीकार करके धारण करना। (यहां यह अन्तर्भावित है की यदि हमें पहले कोई असत्य ज्ञान था और बाद में पता चला की वह असत्य है तो उसको छोड देना।)

यहां प्रवृत्ति को जन्म का कारण बताया गया है। और दोष को प्रवृत्ति का कारण। अर्थात् मात्र दोष जनित प्रवृत्ति (धर्माधर्म) ही जन्म का कारण है। दोष रहित प्रवृत्ति नहीं। दोष सहित धर्म अधर्म रूपी प्रवृत्ति सकाम कर्म है। इससे विपरीत निष्काम कर्म जो तत्वज्ञान पर आधारित है वह बंधन का कारण नहीं बनते। जब तक शरीर है तब तक कर्म न करना तो संभव ही नहीं है इस लिए न तो यह समझना चाहिए की अकर्मण्यता मुक्ति का मार्ग है न ही निष्काम कर्म (जो तत्वज्ञान से प्रेरित हो) को त्यागने योग्य समझना चाहिए।

सूत्र में आया हुआ प्रवृत्ति शब्द प्रवृत्ति से उत्पन्न होने वाले धर्म अधर्म के लिए है। प्रवृत्ति है साधन जिनका।

हम अन्य प्रसंगों में भी कार्य के लिए कारण का शब्द प्रयोग देखते है। जैसे की "अन्न प्राणीयों का प्राण है। यहां अन्न कारण और प्राण कार्य होते हुए भी कार्य कारण में अभेद शब्द प्रयोग होता है। ऐसे ही यहां प्रवृत्ति शब्द प्रवृत्ति के कार्य के लिए प्रयोग हुआ है। 

यह प्रवृत्ति(धर्म/अधर्म) अच्छे/बुरे जन्म का कारण बनते है। 
जन्म = शरीर, इंद्रिय, बुद्धि के समूहविशेष के साथ आत्मा का संयोग

और जब तक जन्म रहेगा तब तक कोई न कोई दुःख तो रहेगा ही। 
दुःख = प्रतिकूल संवेदना, पीडा, ताप, बाधना

इस प्रकार मिथ्याज्ञान से लेकर दुःख तक की श्रृंखला टूटेगी नहीं और जन्म मरण का चक्र चलता ही रहेगा। यह मात्र तत्वज्ञान से ही टूटेगा। 

तत्वज्ञान से मिथ्याज्ञान का नाश होगा। मिथ्याज्ञान के नाश से दोष का, दोष के नाश से प्रवृत्ति का, प्रवृत्ति से जन्म का और जन्म के नाश से दुःख का नाश होगा अर्थात अपवर्ग की प्राप्ति होगी। 


प्रश्न :-

१) दुख की गहरी जड में क्या है?

२) मिथ्याज्ञान के दूर होने से उससे तुरंत बाद क्या हटता है?

३) पुण्य भी मुक्ति में बाधा बनता है जिससे वह पाप जितना ही हानिकारक और त्यागने योग्य है। सही/गलत? क्यों?

४) प्राप्त करने अथवा छोडने की प्रत्येक इच्छा अंततः मोक्ष में बाधा बनती है। सही/गलत?

गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

न्यायदर्शन १.१.१ (तर्क - निग्रहस्थान)

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१


प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।


तर्क

तर्क को प्रमाण नहीं कहा जा सकता पर फिर वह प्रमाण से भिन्न भी नहीं है। वह प्रमाणों का सहायक है।

एक उदाहरण देखते है।
मान लो किसी को यह प्रश्न हुआ के हमारा जो ये जन्म है उसका कारण क्या है? (जन्म = जन्म मरण का क्रम)
क्या वह कारण नित्य है के उत्पन्न हुआ हो ऐसा है?
के फिर उसके पीछे कोई कारण ही नहीं है? बस आकस्मिक जन्म हो गया।

इस प्रश्न से उसके मन में ऊह चली (तर्क को ऊह भी कहते है। उह वितर्के)
यदि जन्म का कारण उत्पन्न हुआ है तब तो वह नष्ट भी हो सकता है (जो वस्तु उत्पन्न होती है वह नष्ट भी होती है यह एक सिद्धांत है। ऐसे ही यह भी सिद्धांत है की जो वस्तु उत्पन्न नहीं हुई अर्थात् नित्य है वह नष्ट भी नहीं होती।)। अर्थात् उस कारण को नष्ट करके हम जन्म (जन्म मरण के चक्र से ) छूट सकते है।

पर यदि जन्म का हेतु नित्य है तो उसका उच्छेद अशक्य होने से जन्म के क्रम का उच्छेद भी अशक्य है। और ऐसे में मोक्ष के लिए कोई भी प्रयास करना व्यर्थ है। ऐसे ही यदि हमारा जन्म कोई निश्चित कारण से नहीं अपितु आकस्मिक ही हुआ है तो भी हमारा प्रयास करना व्यर्थ है। वह जैसे आकस्मिक शुरू हुआ है ऐसे ही कभी आकस्मिक अंत भी हो सकता है या फिर नहीं भी हो सकता।

अब यह तर्क हमें इससे आगे ले जाने में समर्थ नहीं है। हमें अब प्रमाण की आवश्यकता होगी। जब हम प्रमाण खोज ने जायेंगे तो हमें शास्त्र से शब्द प्रमाण मिलता है की जन्म कर्म निमित्तक है। (कर्म = अविद्या जनित कर्म। विस्तार से आगे देखेंगे।) कर्म उत्पन्न होता है इसलिए हम इसे नष्ट करने के प्रयास भी कर सकते है।

इस तरह उपस्थित हुए हुए प्रमाण (जिसको हम ने तर्क के कारण ढूंढा था), जिसकी शंका की निवृत्ति के लिए आवश्यकता पडी थी उसको तर्क अनुगृहीत कराता है। अनु = फिर से/बाद में +गृहीत

तर्क प्रमाण तक पहुंचाता है इस तरह से वह भी तत्वज्ञान का एक अंग है। वाद में प्रमाण सहित तर्क अपने पक्ष की सिद्धि और प्रतिपक्ष का खंडन करने में सहायता करता है। (प्रमाण रहित मात्र तर्क कुछ सिद्ध नहीं कर पाता).

निर्णय
निर्णय ही तत्वज्ञान है।
निर्णय = निश्चित रूप से प्राप्त करना। नी (णीञ् प्रापणे) धातु से प्राप्त करना अर्थ में,  निर् = निश्चित रूप से।
यह प्रमाणों का फल है। निर्णय होने पर अर्थात् तत्वज्ञान की प्राप्ति होने पर वाद की समाप्ति होती है। कभी कभी इसकी (निर्णय = तत्वज्ञान की) रक्षा के लिए जल्प और वितंडा का प्रयोग भी करना स्वीकार्य होता है।

तर्क और निर्णय से ही लोक व्यवहार चलता है।  इनकी महत्ता के कारण इन्हें प्रथम सूत्र में पृथक उल्लिखित किया गया है।

वाद
अपने अपने सिद्धांतों की रक्षा करते वाक्यसमूह जो दोनों में से एक पक्ष की सिद्धि होने पर समाप्त हो जाते है उनको (उन दोनों पक्ष के वाक्यसमूहों को) वाद कहते है। इसका उद्देश्य तत्वज्ञान है, हार जीत नहीं। इस लिए यदि वाद में प्रतिपक्ष से कोई गलती भी हो जाती है तो तुरंत उस गलती को पकड के प्रतिपक्ष को निग्रहस्थान में लाने (हारा हुआ घोषित करने) के बदले गलती दिखाकर प्रतिपक्ष को उसे सुधारने का अवसर देते है।

जल्प, वितंडा
वाद से विशेष (अलग/भिन्न) जल्प और वितंडा है। विशेष शब्द में शेष धातु है अर्थात् जो बाकी बचा वह। विशेष का अर्थ वाद से अच्छा ऐसा नहीं लेना है।

जल्प में मुख्य प्रयोजन हार जीत रहता है और अपने स्थापित पक्ष की किसी भी प्रकार से सिद्धि करने का प्रयत्न किया जाता है, अपना पक्ष तत्व के विपरीत हो तो भी। वितंडा में तो वैतंडिक अपने पक्ष की स्थापना ही नहीं कराता और दूसरे के पक्ष पर प्रहार किए जाता है। पक्ष की स्थापना न करने का अर्थ है या तो वह अपनी प्रतिज्ञा ही नहीं बताएगा या फिर अपनी प्रतिज्ञा की हेतु और उदाहरण दे के स्थापना नहीं करेगा।

इनका उपयोग तत्व की रक्षा के लिए भी हो सकता है। जब समय अथवा अन्य कारणों से वाद शक्य न हो तब प्रतिपक्ष तत्व की हानि न कर पाए इस हेतु से सिद्धांती भी जल्प/वितंडा का प्रयोग कर सकता है। (यह हम आगे सूत्र में देखेंगे।)

हेत्वाभास

हेतु वह होता है जिसमें साध्य को सिद्ध करने का सामर्थ्य होता है। हेत्वाभास वह है जो हेतु जैसा लगता तो हो पर हो नहीं। मात्र हेतु के समान आभास-प्रतीत हो रहा हो और इस कारण से वह प्रतिज्ञा को सिद्ध नहीं कर पाएगा। जब ऐसा हेतु दिया जाता है तब उसको हेत्वाभास कहते है, जो उपयोग करने वाले को निग्रहस्थान में ले जाएगा।

निग्रहस्थान (हार के स्थान) में होते हुए भी हेत्वाभास को अलग से प्रथम सूत्र में उल्लिखित क्यों किया गया है?

वाद में यदि प्रतिपक्ष गलती करता है तो उसको तुरंत निग्रहस्थान में न लाकर उसको उसकी गलती दिखाकर उसे सुधारने का अवसर देते है। यहां हेत्वाभास को समझकर प्रतिपक्ष को समझना भी पडता है और हम स्वयं भी हेत्वाभास का प्रयोग न करें इसकी सावधानी रखनी पडती है। इस का ज्ञान इस कारण से महत्व रखता है जो उसे प्रथम सूत्र में लेने का कारण है। 


छल जाती निग्रहस्थान

छल : प्रतिपक्ष के वक्तव्य का जिस अर्थ में वह किया गया है उससे अन्य अथवा विपरीत अर्थ में उसका अर्थघटन करना छल है।

जाति : जाति इस शास्त्र का एक पारिभाषिक शब्द है। (जिस धर्म की चर्चा नहीं हो रही हो उससे) साधर्म्य और वैधर्म्य द्वारा प्रतिपक्ष का खंडन करना यह जाति है। (इसका विस्तार आगे देखेंगे)

निग्रहस्थान : निग्रहस्थान वह है जहां निग्रहस्थान में पहुँचने वाला पकड में आ जाता है। (निश्चित गृहीत हो जाता है) अर्थात् हार जाता है। विपरीत समझना अथवा समझ न पाना यह निग्रहस्थान है। अलग अलग निग्रहस्थानों को हम बाद में विस्तार से देखेंगे।

हेत्वाभास की ही तरह इनका ज्ञान प्रतिपक्ष की गलती को समझने तथा स्वयं गलती न करने के हेतु महत्वपूर्ण है। और यदि हमें तत्व की रक्षा के लिए जल्प वितंडा का आलंबन लेना पडा है तब भी प्रतिपक्ष यदि छल जाति का उपयोग करता है तब उसको पकड के उसको निग्रहस्थान में लाने के लिए हमें इसका ज्ञान होना आवश्यक है। 


हमने प्रथम सूत्र में आए हुए १६ पदार्थों का प्राथमिक परिचय किया। आगे इन सब को विस्तृत रूप से जानेंगे।

१५ पदार्थों के कारण आन्वीक्षिकी विद्या विशिष्ट है। इसकी महत्ता दर्शाने कौटिल्य अर्थशास्त्र के विघोद्देश प्रकरण में न्याय विद्या के बारे में कहा गया है

    प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्।
    आश्रयः सर्वधर्माणां विघोद्देशे प्रकीर्तिता।।

यह विद्या सर्व विद्याओं के स्वरूप को प्रकाशित करता हुआ दीपक, सर्व कर्मों का उपाय और सर्व धर्मों का आश्रय है।

प्रथम सूत्र में कहा गया है की इन १६ पदार्थों के तत्वज्ञान से हमें निःश्रेयस की प्राप्ति होती है। अब प्रमाणों का उपयोग हम हर समय हर क्षेत्र हर विद्या में करते है। उस दृष्टि से तत्वज्ञान और निःश्रेयस का अर्थ हम जिन जिन विद्याओं में न्याय का प्रयोग करते है उन उन के अनुरूप होगा। जैसे की आयुर्वेद में तत्वज्ञान शरीर और औषध का ज्ञान और निःश्रेयस स्वास्थ्य होगा, वाणिज्य में वाणिज्य संबंधी ज्ञान और सफलता होगा।

परन्तु न्यायशास्त्र का (आन्वीक्षिकी विद्या होने पर भी) अपना विषय अध्यात्म है। इसका तत्वज्ञान जो प्रमेय के अंतर्गत आत्मा आदि १२ प्रमेय गिनाये गए है उनका तत्वज्ञान और इसका निःश्रेयस आत्यंतिक दुःख निवृत्ति रूप अपवर्ग अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति है। प्रथम सूत्र का अर्थ अब यह होगा।

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।


प्रश्न :-
१) तर्क,
क) प्रमाणों का अनुग्राहक है।
ख) प्रमाणों में से एक है क्योंकि वह हमें तत्वज्ञान कराता है। 
ग) हमें अध्यात्म से विमुख करता है। 
घ) लोक व्यवहार में बाधा उत्पन्न करता है।

२) वाद में,
क) प्रयोजन हार जीत नहीं अपितु तत्वज्ञान होता है इस लिए निर्णय का वाद में स्थान नहीं है।
ख) यदि प्रतिपक्ष गलती करें तो उसे गलती दिखाकर सुधारने का अवसर दिया जाता है।
ग) वाद समान विचार वाले व्यक्ति के बीच चल रही कथा को कहते है।

३) जल्प वितंडा,
क) का प्रयोग तत्व की रक्षा के लिए भी हो सकता है।
ख) का ज्ञान उन्हीं के लिए उपयोगी है जिनका तत्वज्ञान से कुछ लेना देना नहीं है मात्र और मात्र हार जित ही जिनका लक्ष्य है।
ग) में यदि प्रतिपक्ष गलती करें तो उसे उसको सुधारने का अवसर दिया जाता है।

४) इन में से कौन से वाक्य सही है।
क) हेत्वाभास निग्रहस्थान में से एक है
ख) हेत्वाभास का प्रयोग तत्व की रक्षा के लिए भी हो सकता है।
ग) छल जाती निग्रहस्थान में आते है।

५) इन में से कौन से वाक्य सही और कौन से गलत है। 
क) न्यायशास्त्र में दिए गए प्रमेय अध्यात्म विषयक है।
ख) न्याय विद्या का प्रयोग अध्यात्म में ही होता है।
ख) न्याय विद्या का प्रयोग अध्यात्म को छोडकर बाकी विषयों में होता है क्यों की अध्यात्म श्रद्धा का विषय है जिसमें संशय तर्क वाद सब वर्ज्य है।
ग) न्याय विद्या का प्रयोग सभी क्षेत्र में होता है और उन उन क्षेत्र के तत्वज्ञान को पाकर भी हम अपवर्ग अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति कर सकते है।

रविवार, 10 अप्रैल 2022

न्यायदर्शन १.१.१ (सिद्धांत, अवयव)

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१


प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।


सिद्धांत
"यह ऐसा है" ऐसा कहकर जो अर्थ जनाया जा रहा है वही सिद्धांत है। 
दृष्टान्त के बारे में बात करते समय लिए गए वाक्यसमूह में प्रथम वाक्य अर्थात प्रतिज्ञा 'पर्वत पर आग है।' सिद्धांत है। 

दो पक्षों में सिद्धांत की जब भिन्नता होती है तभी चर्चा (वाद जल्प वितंडा) होती है इस लिए सिद्धांत एक महत्वपूर्ण प्रमेय (जिसको जाना जाता है) है। इस लिए इसको भी मुख्य १६ पदार्थों में जगह मिली है।

अवयव
(अनुमान प्रमाण में) साधनीय अर्थ की सिद्धि जिस पूरे वाक्यसमूह से होती है उस वाक्यसमूह के पांच अवयव है। वाक्यसमूह स्वयं इन पांच अवयव का अवयवी कहलायेगा। 

यह पांच अवयव इस प्रकार है।
१) प्रतिज्ञा : दोनों पक्ष अपने अपने सिद्धांत को रखेंगे जिसे प्रतिज्ञा कहा जाता है। इस को (अपनी अपनी तरफ से, सिद्ध हो चूका हो उस अर्थ में नहीं) आगम भी कहा जाता है।
हमारे पहले के उदाहरण में पर्वत पर आग है यह प्रथम पक्ष की प्रतिज्ञा थी।

२) हेतु : यह अनुमान प्रमाण का मुख्य आधारभूत अवयव है। यहां दोनों पक्ष यह बतायेंगे की उनकी प्रतिज्ञा किस आधार पर सिद्ध होती है। इस अवयव को अनुमान भी कहते है और यह अवयव वाक्यसमूह में सबसे महत्वपूर्ण होने से सम्पूर्ण वाक्यसमूह को भी इसी के नाम से अनुमान प्रमाण कहा जाता है।
हमारे पहले के उदाहरण में 'पर्वत पर धुआं होने से।' यह प्रथम पक्ष का हेतु था।

३) दृष्टान्त : यह ऐसा उदाहरण है जो दोनों पक्ष ने पहले प्रत्यक्ष किया हुआ है और जिसके बारे में दोनों पक्ष का ज्ञान एक समान है। जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती ही है। जैसे रसोई के चूल्हे में और हवन में। यह हमारा व्याप्ति सहित दृष्टान्त अर्थात तीसरा अवयव था।
जैसे प्रतिज्ञा में आगम, हेतु में अनुमान ऐसे दृष्टान्त में प्रत्यक्ष प्रमाण अंतर्भावित है।

जब हम अनुमान प्रमाण का उपयोग स्वार्थ में करते है (स्वयं किसी निर्णय पर पहुंचने के लिए) तब ऊपर के तीन अवयवों से हमारे उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है। परन्तु यदि हम अनुमान प्रमाण किसी के साथ चर्चा करते समय प्रयोग में लाते है तो दो और अवयव जो कथा का तरीके से उपसंहार करके निर्णय प्रस्तुत करेंगे वह भी आवश्यक है। 

४) उपनय : 'जैसा वह ऐसा यह' कहकर उदाहरण और साध्य में साम्य दिखाना यह उपनय है। जैसे रसोई में धुआं होता है ऐसे ही पर्वत पर भी धुआं है। यह वाक्य उपनय अवयव बनेगा। इसमें उपमान प्रमाण अन्तर्निहित है।

५) निगमन : ऊपर के तीन अवयवों से जो हमने प्रतिज्ञा वाक्य में कहा है वह  सिद्ध होता है यह कहना निगमन है। 'इस से सिद्ध होता है की पर्वत पर अग्नि है' यह निगमन अवयव बनेगा।  


प्रश्न :-

१) सिद्धांत के विषय में इन में से क्या सही है?
क) पंचावयवों में से प्रथम अवयव प्रतिज्ञा सिद्धांत है।
ख) पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों के हेतु अलग अलग है पर सिद्धांत एक ही होता है।
ग) यदि प्रतिपक्ष अपना सिद्धांत ही नहीं बता रहा है तो वह वैतंडिक कहलाएगा (वितंडा करने वाला)। 
घ) अपना सिद्धांत बताने से अपने पक्ष की स्थापना हो जाती है।

२) अनुमान प्रमाण जब स्वार्थ में उपयोग करते है तो कौन कौन से अवयव की आवश्यकता नहीं?

३) अनुमान प्रमाण के किस अवयव को अनुमान कहा जाता है? उदाहरण (दृष्टांत) किस प्रमाण पर आधारित है?

शनिवार, 9 अप्रैल 2022

न्यायदर्शन १.१.१ (प्रयोजन, दृष्टांत)

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

प्रयोजन
जिस अर्थ को प्राप्त करने की अथवा छोडने की इच्छा करते हुए कर्म किया जाता है वह अर्थ उस कर्म का प्रयोजन है।
सर्व मनुष्य तथा सर्व प्राणियों के कर्मों में प्रयोजन व्याप्त है। 
बिना प्रयोजन के कभी कोई प्रवृत्ति नहीं करता और न्याय की प्रवृत्ति भी प्रयोजन पर आश्रित है।

संशय : क्या वितंडा भी सप्रयोजन होती है?
इस संशय को समझने के लिए पहले यह जानते है की वितंडा क्या है फिर इसका उत्तर देखेंगे। 

न्याय प्रवृत्ति के अंतर्गत जब पक्ष प्रतिपक्ष में चर्चा* होती है वह तीन प्रकार में से एक की होती है। 
*चर्चा शब्द चर्च् अध्ययने से बनता है। अध्ययन = अधि अयन। किसी वस्तु को अंदर तक घुसकर उसको प्राप्त करना (समझना)
चर्चा को कथा भी कहते है। कथ वाक्यप्रबन्धे। प्रबंध = प्रकृष्ट रूप से बांधना। 

कथा तीन प्रकार की होती है। 
वाद : वाद में पक्ष प्रतिपक्ष तत्व का निर्णय करने के लिए चर्चा करते है। 
जल्प : यहां प्रयोजन तत्व तक पहुंचना नहीं अपितु हार जित का होता है। अर्थात स्वयं के पक्ष को किसी भी तरह से सिद्ध करना (यदि वह गलत हो फिर भी)
वितंडा : यहां वैतण्डिक अपने पक्ष की स्थापना ही नहीं करता। और उसका अपना कोई पक्ष ही नहीं होने पर भी वह सामने वाले की बातों पर प्रहार करता रहता है। (वितंडा शब्द तड् आघाते धातु से बनता है) 

वाद और जल्प के प्रयोजन तो स्पष्ट है पर क्या वितंडा का भी कोई प्रयोजन है?

भाष्यकार उत्तर देते कहते है की यदि कोई वैतण्डिक सिद्धान्ती के पक्ष पर प्रहार करता है तो उसे अपने पक्ष की स्थापना करने के लिए कहना चाहिए। यदि वह अपने पक्ष की स्थापना कर देता है तो वह कथा वाद अथवा जल्प बन जाएगी, यदि वो यह भी कहे की उसका कोई पक्ष नहीं है बस सिद्धान्ति के पक्ष का खंडन करना ही उसका प्रयोजन है तो भी यदि वह हेतु और दृष्टान्त से अपने पक्ष की स्थापना करता है (सिद्धान्ति के पक्ष का खंडन हो सके ऐसे हेतु और दृष्टान्त देता है) तो भी उसकी प्रवृत्ति सप्रयोजन सिद्ध हो जाएगी (और कथा जल्प बन जाएगी।) और यदि वह अपने पक्ष की स्थापना न करें (ये तो कह दे की सिद्धान्ति गलत है पर ये न समझाये की कैसे गलत है) तो फिर उसके शब्द प्रलाप मात्र बन कर रह जायेंगे और कथा का स्वरूप ही नष्ट हो जायेगा।

अर्थात वितंडा में भी प्रयोजन तो होता है वैतण्डिक का अपने पक्ष की स्थापना न करना मात्र उसकी रणनीति का भाग है। (और ऐसे लोग मिलने पर या तो उनसे उनके पक्ष की स्थापना करवानी चाहिए या ये सिद्ध करके के वह चर्चा करने योग्य नहीं है अपना समय नष्ट होने से बचाना चाहिए )

दृष्टान्त

न्याय क्या है? प्रमाणों से अर्थ का परीक्षण करना यह न्याय है। 
इन प्रमाणों में अनुमान प्रमाण (जो की प्रत्यक्ष तथा आगम पर आधारित है) वह मुख्य है. उसी को अन्वीक्षा कहते है। इस अनुमान प्रमाण के पांच अवयव है जिसमें से तीसरा दृष्टान्त है। (जब हम अनुमान प्रमाण का प्रयोग दूसरे के साथ चर्चा करते समय करते है तब यह पांचों अवयवों का उपयोग करना आवश्यक है। यह चर्चा हम आगे करेंगे)

दृष्टान्त ऐसा होता है जिसमें शास्त्रीय और लौकिक दोनों ज्ञान वाले का बुद्धिसाम्य हो और उसके पीछे प्रत्यक्ष का आधार हो।
दृष्टान्त = दृष्ट अंत = अंत तक (निश्चित रूप से) जाना हुआ। 

जैसे किसी ने कहा के 'वहां दूर पर्वत पर आग लगी है।' यह प्रथम अवयव अर्थात प्रतिज्ञा है। अब उसने वहां जा के आग को प्रत्यक्ष देखा नहीं है न ही किसी और व्यक्ति जिसने वहां जा के आग को देखा हो उसने बताया है फिर भी उसने यह अनुमान प्रमाण से जान लिया के वहां आग है।

यह कैसे सिद्ध होता है? तो सिद्धान्ति कहेगा 'क्यों की वहां धुआँ है।' इस वाक्य को हेतु कहा जाता है जो की अनुमान प्रमाण का दूसरा अवयव है। और 'जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती ही है। जैसे रसोई के चूल्हे में और हवन में।' यह व्याप्ति सहित दृष्टान्त अर्थात तीसरा अवयव है।' दृष्टान्त के न होने पर प्रथम दो अवयव भी नहीं टिक पाते।

दृष्टान्त का उपयोग अपने पक्ष की सिद्धि और प्रतिपक्ष का खंडन (व्याप्ति में दोष दिखाकर) करने में दोनों में ही अनिवार्य है। 

दृष्टान्त ऐसा होना चाहिए जो दोनों पक्ष को मान्य हो। अर्थात् उन्हें उस बारे में पहले ही ज्ञान हो।

अब यदि किसी ने कभी धुआँ ही न देखा हो और उसे यह न पता हो की आग के बिना धुआँ नहीं उठता तो उसके साथ चर्चा में यह दृष्टान्त नहीं दे सकते। ऐसे ही यदि कोई दूर से उठने वाले धुँए को नहीं देख पा रहा हो (अथवा किसी के कहने से उस बात को नहीं जान पाया हो) उसको हमने जो हेतु दिया वह भी नहीं दे पाएंगे। अर्थात अनुमान प्रमाण स्वतंत्र नहीं होता। उसके पीछे अनुमान प्रमाण प्रयोग करने वाले को प्रत्यक्ष अथवा शब्द प्रमाण से प्राप्त ऐसा ज्ञान होना अनिवार्य है जिसके आधारित अनुमान किया जा सके। (कहते है पैसे पैसे को खींचता है। यहाँ यह देख सकते है की कैसे ज्ञान ज्ञान को बढाता है। जितना अधिक हम जानते है और अधिक जानना उतना ही संभव होता जाता है।)

अनुमान प्रमाण को विस्तार से हम आगे जानेंगे पर यहाँ ये उल्लेख कर ले की अनुमान से हमेशा (निश्चित, पर) सामान्य ज्ञान ही होता है विशेष नहीं। जैसे दूर से धुँए को देख कर हम आग का निश्चय अनुमान प्रमाण से कर सकते है पर उस आग की विशेषताएँ जैसे की उसका आकार विस्तार बिना आग को प्रत्यक्ष देखे नहीं जान सकते। 

अनुमान कभी यदि प्रत्यक्ष अथवा आगम से विरुद्ध जाता दिखता है तो वह अनुमान अमान्य हो जायेगा। ऐसा अनुमान न्यायाभास मात्र है न्याय नहीं। 

प्रश्न :-
१) इन में से कौन सा वाक्य गलत है ?
क) एक जैसी प्रवृत्ति हमेशा उसके साथ जुड़े हुए कोई एक निश्चित प्रयोजन से ही होती है। जैसे की नौकरी, व्यवसाय का प्रयोजन अर्थोपार्जन होता है।
ख) प्रयोजन वह अर्थ है जिसे प्रवृत्ति करने वाला प्राप्त करना अथवा छोडना चाहता है। 
ग) जल्प का प्रयोजन हार जित है, सत्य तक पहुंचना नहीं।  

२) दृष्टांत,
क) आगम और अनुमान प्रमाण का एक अवयव है। 
ख) प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधारित होता है। 
ग) जिस दृष्टांत पर हमें पूर्ण विश्वास हो वह हम प्रयोग कर सकते है। प्रतिपक्ष का उस पर सहमत होना आवश्यक नहीं है। 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

न्यायदर्शन १.१.१

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।*
*इस सूत्र के अंत में हम इस अर्थ को फिर से देखेंगे। 

यह प्रथम सूत्र में सम्पूर्ण न्यायदर्शन में आने वाली हर एक वस्तु समाविष्ट कर ली गयी है। अर्थात् हमारा न्यायदर्शन अध्ययन इन्हीं १६ पदार्थ जो की सारे सत्तात्मक (विद्यमान) है उनका अध्ययन होगा। 

इसके पहले की हम इन १६ पदार्थ का संक्षिप्त परिचय जाने, इस पहले सूत्र पर एक आक्षेप किया गया वह और उसका उत्तर देखते है। (हमारे शास्त्रों में बात को अन्य पक्ष के आक्षेप और जिज्ञासु की शंकाओं का समाधान करते हुए आगे बढा जाता है।)

आक्षेप यह है की जब जिसके विषय में ज्ञान प्राप्त करना है उसको प्रमेय कहते है तो सूत्रकार यहां संशय आदि १४ पदार्थ को प्रमेय से भिन्न क्यों लिखते है? वह भी तो जानने योग्य होने से प्रमेय के अंतर्गत ही आ जाएंगे। और यह शास्त्र मुख्यतः प्रमाण पर केंद्रित है तो यह कह देते के प्रमाण और प्रमेय के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

उत्तर- इन को अलग निर्दिष्ट न करने पर यह अध्यात्म विद्या में गिना जा सकता था जैसे की उपनिषद् जब की यह आन्वीक्षिकी विद्या है। 

विद्याओं को चार प्रकार में विभाजित किया गया है। 
१. त्रयी - अध्यात्म विद्या (यहां तीन प्रकार के मन्त्र होने से इसको त्रयी कहा गया है। ऋक् - जिसमें अर्थ के अनुसार पद हो, साम - जिन मंत्रो को गाया जा सके, यजु - बाकी के मन्त्र। ध्यान रहे के वेद चार है ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद तथा अथर्ववेद। इन चार वेदों में तीन प्रकार के मंत्र है।)

२. वार्ताः - व्यापार वाणिज्य का ज्ञान 

३. दण्डनीति - शासन व्यवस्था का ज्ञान

४. आन्वीक्षिकी - विशेष ज्ञान प्राप्त करने का ज्ञान देने वाली विद्या। न्याय।
आन्वीक्षिकी अन्वीक्षा* से बनता है। अन्वीक्षा = अनु ईक्षा (ईक्ष दर्शने) = नैमित्तिक ज्ञान (वो ज्ञान जो हमें स्वाभाविक रूप से ही प्राप्त नहीं है पर हमने बाद में प्राप्त किया है) प्राप्त करना। 

*आगे हम जब प्रमाण के विषय में विस्तृत चर्चा करेंगे तो देखेंगे की प्रमाण चार प्रकार के है। प्रत्यक्ष, शब्द अथवा आगम, अनुमान तथा उपमान (अथवा तीन जो उपमान को अलग न गिनो तो) पर इसमें अनुमान का क्षेत्र सबसे बडा है। यह अनुमान जो प्रत्यक्ष तथा आगम पर आधारित है, एक तरह से यही इस शास्त्र का मुख्य विषय है और इसी को अन्वीक्षा कहते है। 

संशय आदि १४ पदार्थों का पृथक उल्लेख न करने पर यह शास्त्र अध्यात्म विद्या जिसमें संशय जल्प वाद आदि प्रक्रिया नहीं अपितु सीधा तत्वज्ञान होता है उसमें गिना जा सकता था। इन पदार्थों का पृथक उल्लेख करने से यह स्पष्ट होता है की यह अध्यात्म विद्या नहीं अपितु आन्वीक्षिकी विद्या है।

हम प्रमाण और प्रमेय शब्द से परिचित है। अब संशय आदि पदार्थों की व्याख्या तथा उन्हें यहां सम्मिलित करने का संक्षिप्त हेतु समझते है। 

संशय
इन में से पहला संशय है। जिज्ञासु संशय के बारे में संशय करते हुए प्रश्न उठा सकता है की संशय की क्या आवश्यकता है? संशय कोई इच्छनीय वस्तु तो नहीं है। क्या संशयात्मा विनश्यति यह नहीं कहा गया है?

उत्तर - न्याय की प्रवृत्ति दो स्थितियों में होती ही नहीं है। एक जब किसी वस्तु का निर्णय हो गया हो और दूसरा जब विषय निर्णय के लिए उपलब्ध ही न हो। अर्थात् जब कोई उपलब्ध विषय पर अनिर्णय की स्थिति, संशय हो तब ही न्याय की प्रवृत्ति होती है।

संशय = विमर्श =कोई वस्तु का सामान्य ज्ञान (विशिष्ट ज्ञान नहीं).
कोई वस्तु का सामान्य ज्ञान तो हुआ है (अर्थात् विषय की उपलब्धि हुई है) जैसे की अंधेरे में थोडी दूर एक वस्तु देख के हमें जब संशय होता है की यह रस्सी है या सांप है तो हमें उस वस्तु के उन गुणों के बारे में सामान्य ज्ञान हुआ है जो रस्सी और सांप दोनों में होते है जैसे लम्बाई मोटाई पर उस वस्तु के विशिष्ट गुण नहीं जानने से वह वास्तव में रस्सी है या सांप यह निर्णय पर नहीं पहुंच पाए है। 

जब संशय होगा तो पक्ष विपक्ष बनेंगे और परीक्षा करके निर्णय पर पहुंचा जायेगा।


प्रश्न:-
१)
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१

इस प्रथम सूत्र में आने वाले पदार्थ,
क) सत्तात्मक है  
ख) इनमें से कुछ सत्तात्मक है और कुछ असत्तात्मक (अभावात्मक)
ग) इन पर सत्तात्मक अथवा असत्तात्मक का वर्गीकरण लागू नहीं होता। 

२) इन में से कौन सा विकल्प सही है। 
क) प्रथम सूत्र हमें प्रथम अध्याय में आने वाली सम्पूर्ण विषयवस्तु की रूपरेखा देता है। 
ख) प्रथम सूत्र हमें सम्पूर्ण न्यायदर्शन में आने वाली विषयवस्तु की रूपरेखा देता है। 
ग) ऊपर के दोनों ही विकल्प गलत है। 

३) प्रथम सूत्र में सूत्रकर्ता हमें क्या विश्वास दिलाते है। 
क) सूत्र में बताये गए पदार्थों का अध्ययन प्रारम्भ करने से पुण्य मिलेगा। 
ख) सूत्र में बताये गए पदार्थों का तत्वज्ञान प्राप्त करने के पश्चात और कोई शास्त्र का अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। 
ग) सूत्र में बताये गए पदार्थों का तत्वज्ञान प्राप्त करने से निश्चित कल्याण होगा। 

४) चार विद्याएं त्रयी, वार्ताः, दंडनीति और आन्वीक्षिकी के क्षेत्र अनुक्रम से क्या है।
क) अध्यात्म विद्या, वाणिज्य विद्या, शासन विद्या, विशेष ज्ञान प्राप्त करने का ज्ञान देने वाली विद्या।
ख) चार वेद, शासन विद्या, वाणिज्य विद्या, विशेष ज्ञान प्राप्त करने का ज्ञान देने वाली विद्या।
ग) चार वेद, वाणिज्य विद्या, शासन विद्या, अध्यात्म विद्या।

५) न्याय की प्रक्रिया इन में से कौन सी परिस्थिति में संभव है। 
क) जब हमें कोई वस्तु का तत्वज्ञान हो जाए। 
ख) जब हमें कोई विषय की उपलब्धि न हो। 
ग) क और ख दोनों में ही संभव है यदि हमने न्यायदर्शन का अध्ययन कर लिया है। 
घ) संशय होने पर।

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

सामान्य परिचय तथा विषय प्रवेश

 न्यायदर्शन शब्द को खोला जाये तो,

दर्शन अर्थात जिसके द्वारा जाना जाता है वह (दृश्यते अनेन इति दर्शनम्) तथा न्याय* अर्थात उचित तत्वात्मक ज्ञान।

* न्याय शब्द के लिए अष्टाध्यायी में दो सूत्र आते है।
१. अध्यायन्यायोद्यावसंहाराधारावायाश्च (३.३.१२२) में न्याय निपातन दिया गया है जिसका अर्थ है जिसके द्वारा (जिस विषय को हम प्राप्त करना चाहते है वह) प्राप्त किया जाता है। नि उपसर्ग पूर्वक इण् धातु से। नीयते अनेन इति न्यायः
२. परिन्योर्नीणोर्द्यूताभ्रेषयोः (३.३.३७) यहां न्याय शब्द अभ्रेष अर्थ में है। भ्रेष अर्थात गति, चंचलता, स्थिरता का अभाव (संदेह) से विपरीत स्थिरता अर्थात तत्वात्मक ज्ञान।

न्यायदर्शन का मुख्य विषय प्रमाण है। जो ज्ञान प्राप्त करने के साधन को कहते है। प्रमाण के साथ तीन और वस्तु जुडी रेहती है। 
प्रमेय - जिसके बारे में ज्ञान प्राप्त किया जा रहा है वह
प्रमिति - वो ज्ञान जो प्राप्त किया गया है
प्रमाता - ज्ञान प्राप्त करने वाला

यही चार में सारा अर्थतत्व आ जाता है। 

यह शास्त्र मुख्यतः प्रमाण पर केंद्रित है तो भाष्यकार ने प्रथम सूत्र से पूर्व प्रमाण कब सार्थक होता है इस बात को खोला है। 

प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यात् अर्थवत् प्रमाणम् 

प्रमाण से अर्थ के ज्ञान होने पर तद् अनुसार की गयी प्रवृत्ति के सफल होने पर ही प्रमाण को सार्थक माना जाता है।

प्रमाणमन्तरेण नार्थप्रतिपत्तिः। नार्थप्रतिपत्तिमन्तरेण प्रवृत्तिसामर्थ्यम्।
बिना प्रमाण के अर्थ जाना नहीं जायेगा। बिना अर्थ जाने प्रवृत्ति नहीं कर सकते। 

प्रमाणेन खल्वयं ज्ञाताऽर्थमुपलभ्य तमर्थमभीप्सति जिहासति वा।   
प्रमाण द्वारा अर्थ को जानकर ज्ञाता उस अर्थ को प्राप्त करने अथवा छोडने की इच्छा करेगा।
अभीप्सा = प्राप्त करने की इच्छा
जिहासा =छोडने की इच्छा

तस्य ईप्सा जिहासा प्रयुक्तस्य समीहा प्रवृत्ति।
समीहा = सम्यक ईहा (ईह् चेष्टायाम्)
जाने हुए अर्थ को प्राप्त करने अथवा छोडने की इच्छा से की गयी वह प्रवृत्ति जो प्राप्त किये गये ज्ञान के अनुसार हो उस को प्रवृत्ति कहा है।

प्रवृत्ति के सफल होने पर ही प्रमाण को सार्थक माना जाता है। 

और प्रमाण के सार्थक होने पर ही प्रमाता, प्रमेय और प्रमिति भी सार्थक होते है। (इन चारों में से एक भी सार्थक न हो तो बाकी तीन भी सार्थक नहीं है।)

प्रमाता का अर्थ अब यह होगा।
प्रमाता = अर्थ का ज्ञान प्राप्त करके उसको प्राप्त करने / छोडने के लिए जाने हुए अर्थ के अनुसार प्रवृत्ति करने वाला। 


प्रश्न
भाग १:- बस स्टॉप पे खडा एक व्यक्ति आँख अथवा चश्मे के नंबर ठीक न होने पर बस का नंबर नहीं पढ पाता और वह अपनी बस कौनसी है वह निश्चित नहीं कर पाता।

१) यहां प्रमाता, प्रमेय, प्रमिति तथा प्रमाण क्या क्या है।
क) प्रमाता = व्यक्ति, प्रमेय =लिखा हुवा बस नंबर, प्रमिति = बस नंबर का ज्ञान, प्रमाण =नेत्र /+उपनेत्र
ख) प्रमाता = व्यक्ति, प्रमेय =बस, प्रमिति = बस का नंबर, प्रमाण =सही बस का निश्चित हो जाना।

२) यहाँ प्रमाता, प्रमेय, प्रमिति तथा प्रमाण में से कौन/क्या सार्थक हुवा और कौन/क्या नहीं और क्यूँ। 
क) चारों ही सार्थक नहीं हुए क्यों की बाकी तीन के सार्थक होने पर भी प्रमिति नहीं हो पायी तो बाकी तीन भी निरर्थक हो गए।
ख) प्रमाण सार्थक नहीं हुआ (नेत्र /उपनेत्र अर्थ का ज्ञान कराने में निष्फल रहे ) तो बाकि तीन भी सार्थक नहीं हुए।
ग) प्रमाण और प्रमिति सार्थक नहीं हुए पर प्रमाता और प्रमेय तो सार्थक ही है क्योंकि व्यक्ति और बस पर लिखा नंबर तो है ही।

भाग २:- व्यक्ति नेत्र विशेषज्ञ के पास उपनेत्र के सही नंबर जानने के लिए जाता है जिससे वो ठीक ठीक पढ पाए। वह विशेषज्ञ के दिए हुए सही नंबर के उपनेत्र बनवा लेता है। 
३) यहां प्रमाता, प्रमेय, प्रमिति तथा प्रमाण क्या क्या है।
क) प्रमाता = व्यक्ति, प्रमेय =व्यक्ति जो भी पढना चाहता है वह, प्रमिति = पढने से होने वाला ज्ञान, प्रमाण =नेत्र /+उपनेत्र
ख) प्रमाता = व्यक्ति, प्रमेय =उपनेत्र के सही नंबर, प्रमिति = उपनेत्र के सही नंबर का ज्ञान, प्रमाण =नेत्र विशेषज्ञ।

४) क्या हम यहाँ उपर के प्रमाता, प्रमेय, प्रमिति तथा प्रमाण को सार्थक कहेंगे।
क) अब तक व्यक्ति ने प्रमाण (विशेषज्ञ) द्वारा उपनेत्र के सही नंबर जान तो  लिया है पर अब जब वो उपनेत्र से ठीक ठीक पढ पायेगा तभी प्रमाण (और बाकि तीन) सार्थक कहे जाएंगे।
ख) जब विशेषज्ञ ने उपनेत्र के नंबर दे दिए तब चारों को सार्थक ही कहेंगे। आगे क्या होता है वह अलग विषय है।
ग) इनकी सार्थकता का प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि व्यक्ति का मूल प्रश्न तो बस का नंबर पढना है तो प्रमाण की सार्थकता की चर्चा उसी विषय में ही योग्य है। 
घ) निरर्थक कहेंगे

भाग ३:- व्यक्ति नए उपनेत्र लगाके अगली बार ठीक पढ के सही नंबर की बस में बैठ जाता है।
५) यहाँ कौन से प्रमाण सार्थक हुए।
क) (नेत्र+) उपनेत्र जिससे उसने बस के नंबर (प्रमेय) को जाना, विशेषज्ञ जिससे उसने उपनेत्र के सही नंबर (प्रमेय) को जाना। 
ख) बस पर लिखा हुआ नंबर जिससे उसने सही बस को जाना, उपनेत्र का नंबर जिससे उसने उस नंबर के उपनेत्र बनवाये। 
ग) यहाँ उसने कोई ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया ही नहीं की तो कोई प्रमाण के सार्थक होने या न होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

भाग ४:- व्यक्ति नए उपनेत्र लगाकर बस का नंबर पढ के वह उसको जो नंबर की बस पकडनी है वह नहीं है यह जानके बस छोड देता है। यहां कौन से प्रमाण सार्थक हुए और क्यूँ।
क) मात्र विशेषज्ञ प्रमाण सार्थक हुआ क्योंकि वो पढ तो पाया पर सही नंबर की बस में अभी तक बैठा नहीं। 
ख) कोई भी प्रमाण सार्थक नहीं होते क्योंकि वह अभी भी बस स्टॉप पे ही खडा है। 
ग) दोनों ही प्रमाण सार्थक है क्योंकि उसकी दोनों ही प्रवृत्ति (=प्रमाण के अनुसार अर्थ को पाने अथवा छोडने के लिए की गयी हुई प्रवृत्ति) सफल हुई। (गलत बस में न बैठ जाना भी बस नंबर को जान के की गयी सफल प्रवृत्ति है।)



भाष्यकार कहते है की प्रमाण से जानने योग्य समस्त अर्थतत्व इन चार में आ जाता है। सुख, सुख के हेतु, दुःख, दुःख के हेतु।

भाष्यकारने अर्थतत्व कहा है इसमें तत्व क्या है?
सत् (जो विद्यमान है, जिसकी सत्ता है उसको) को सत् के रूप में और असत् (जो नहीं है) के न होने को जानना यह तत्व ज्ञान है। 
जैसे मानो हम एक खंड में पुस्तक लेने गए। खंड में प्रकाश के अभाव से हमें पता नहीं चल पा रहा है की वहां पुस्तक है या नहीं। अब हम प्रकाश करके देखते है पर वहां पुस्तक है ही नहीं। इससे हमें पुस्तक के वहां न होने का ज्ञान हुआ जिसे हम तत्व कहेंगे क्योंकि हमने पुस्तक के अभाव को अभाव के रूप में जान लिया।

यहां प्रकाश (प्रमाण) हमें पुस्तक वहां होती तो उसका ज्ञान प्राप्त करने में भी सहायक होता और यदि पुस्तक वहां नहीं है तो उसके अभाव का ज्ञान कराने में भी सहायक होगा। अर्थात् प्रमाण से हम सत् और असत् दोनों का ज्ञान प्राप्त करते है। 

न्यायदर्शन के रचयिता ने सत् पदार्थो जिनके तत्वज्ञान से निःश्रेयस (निश्चित कल्याण) की प्राप्ति होती है उनका व्यूहन (विशेष संयोजन) १६ रूप में निर्दिष्ट किया है। 

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अयवय तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान
इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

न्यायदर्शन, जो की ५ अध्याय और प्रत्येक अध्याय में २ आह्निक (जो एक दिन में बना हुआ हो वो) में विभाजित है, उसका यह प्रथम सूत्र है। 

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः।

प्रश्न:-
इन में से क्या तत्वज्ञान नहीं है।

क) विद्यमान के विद्यमान रुप को जानना।
ख) अविद्यमान के उस स्वरुप को जानना जो उसके विद्यमान होने पर होता। 
ग) अविद्यमान के अभाव को जानना।