शनिवार, 14 जनवरी 2023

योगदर्शन १.१

भारतीय दर्शन न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा(मीमांसा), उत्तर मीमांसा(ब्रह्मसूत्र) सभी अपने अपने विषय को लिए हुए है पर एक बात में सभी में समानता है। भिन्न भिन्न विषय को लेते हुए भी सभी अध्यात्म की और ले जाते है।

इन छह दर्शनों में सबसे प्रसिद्ध योगदर्शन है। इसके प्रणेता रचनाकार महर्षि पतंजलि है और इस पर महर्षि व्यास ने भाष्य किया है। पतंजलि शब्द पतत् अंजली से बना है अर्थ होता है जिनको नमन करने के लिए हमारी अंजली झुक जाती है वह।

योग शब्द युज् (युजँ समाधौ) से समाधि अर्थ में बनता है। यद्यपि योग शब्द अन्य दो धातुओं, युजिँर् योगे से जोड अर्थ में और युजँ संयमने से नियमन अर्थ में भी बन सकता है (और कोई योगदर्शन के योग का अर्थ ऐसे कर भी लेते है की यह आत्मा से परमात्मा के जोड का दर्शन है) परंतु ये अर्थ योगदर्शन में योग के नहीं है। यहाँ योग का अर्थ समाधि अर्थात् चित्तवृत्तियों का निरोध है।

योगदर्शन में चार पाद में १९५ सूत्र है। यह चार पाद है समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद।

समाधिपाद : इस प्रथम पाद में समाधि तथा उसके भेदों का वर्णन और उच्च कोटि के साधक जो समाधि से मात्र कुछ ही दूर है इन के लिए योग के उच्चस्तरीय साधनों का वर्णन है। वह इस लिए की जब भिन्न भिन्न योग्यताप्राप्त को कुछ देना हो तो सर्वोच्च योग्यताप्राप्त, जिसे अब लक्ष्य प्राप्ति के लिए बस थोड़ी ही मदद चाहिए उसे सर्वप्रथम देना योग्य है। जो थोडी सी मदद से अपना कार्य सम्पन्न कर लेगा उसको देने में देने वाले के समय का सर्वश्रेष्ठ उपयोग होगा।

साधनपाद : इस के प्रारंभ में उन मध्यम कोटि के साधक के लिए योग के साधनों का वर्णन है जिन्होंने यम नियम का पालन कर लिया है और उन्हें आगे अब क्लेशों को क्षीण करना है। उसके पश्चात साधनपाद में उन तृतीय कोटि के साधक जिन्हें अभी यम नियम से प्रारंभ करना है उनके लिए योग के साधनों का वर्णन है।

विभूतिपाद : विभूतिपाद में योग साधनों के अनुष्ठान से प्राप्त होने वाली विभूतियों का वर्णन है।

कैवल्यपाद : इस में कैवल्य अर्थात् मोक्ष के स्वरूप का वर्णन है।

जिन lectures और पुस्तकों को आधार बनाकर हम अध्ययन करेंगे वह Resources post में दिये है।


प्रथम सूत्र

अथ योगानुशासनम्। १.१

अथ : अथ का प्रयोग यहाँ अधिकार अर्थ में है। अथ मंगलवाचक भी है, कोई विशेष कार्य के प्रारंभ में उसका प्रयोग भी होता है। इस सूत्र में इस का प्रयोग अधिकार अर्थ में, इस ग्रंथ को विशेष प्रयोजन के लिए अधिकृत करने के अर्थ में है।

योगानुशासनम् : जिसके द्वारा शिक्षा दी जाए उसे अनुशासन कहते है। योगानुशासन अर्थात् जिसके द्वारा योग की शिक्षा दी जाएगी वह (ग्रंथ)। सर्व विद्याओं का मूल स्रोत परमात्मा है और योगविद्या भी आदि काल से चली आ रही है। काल क्रम में जब कोई विद्या क्षीण होने लगती है तो ऋषि उसकी पुनः स्थापना हेतु उसे फिर से सिखाते है। ऐसा ही पतंजलि कर रहे है इस लिए उन्होंने 'अनु' (फिर से) शासन कहा है।

शासन शास् (शासुँ अनुशिष्टौ) धातु से बनता है अर्थ है आज्ञा/उपदेश करना। (शिष्य शब्द भी यही धातु से बनता है। जो गुरु के उपदेश अनुसार चले वह शिष्य।)

अथ योगानुशासनम् का अर्थ हुआ योग की शिक्षा देने के लिए इस ग्रंथ को अधिकृत किया जाता है।


प्रश्न :-

हमारे छह दर्शन,
१. अपने अपने दृष्टिकोण से बात करते है पर सभी का विषय परमात्मा है।
२. अपने अपने विषय को लिए हुए है पर स्वयं (अध्यात्म) के विषय में  सभी बात करते है।
३. इन में विषय अथवा लक्ष्य को लेकर कोई समानता नहीं है। 


यदि किसी ज्ञानी के पास दो व्यक्ति उपदेश मांगने जाए, एक जिसको कुछ भी नहीं आता और दूसरा जो एक विद्वान है तो उस ज्ञानी को,
१. पहले प्रारम्भिक जिज्ञासु को उपदेश देना चाहिए क्योंकि वह निर्बल है और निर्बल को पहले मदद करनी चाहिए।
२. पहले विद्वान जिज्ञासु को उपदेश देना चाहिए।
३. उसे दोनों के बीच कोई भेदभाव न करते हुए दोनों को एक साथ एक ही उपदेश देना चाहिए।
 
योगदर्शन में योग का अर्थ
१. संयम से, नियम पूर्वक जीना है।
२. आत्मा का परमात्मा से जुडना है।
३. समाधि अर्थात् इंद्रियों का निरोध है।


योग का ज्ञान,
१. सर्व प्रथम पतंजलि से सभी को मिला।
२. आदि काल से चला आ रहा था जिसको पतंजलि ने फिर से सुव्यवस्थित करके हमें दिया।
३. व्यास ऋषि से हमें मिला।

योगदर्शन Resources

योगदर्शन
Audio lectures by Acharya Chandradutt Sharma
https://archive.org/details/Yogdarshana

योगदर्शनम्
- स्वामी सत्यपति परिव्राजक
https://archive.org/details/vyasbhashyayogdarshanall/


Shall add more as and when start using them.

गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

End of iteration One

न्यायदर्शन के अध्ययन का यह प्रथम iteration यहीं समाप्त करती हूँ। बाकी बचे सूत्र में से अधिकांश वर्तमान अध्ययन हेतु अधिक प्रासंगिक नहीं है और कुछ जो किसी मात्रा में प्रासंगिक हो सकते है मात्र उनको लेने से पूर्वापर संबंध नहीं बनने से उनको लेना व्यर्थ होगा।

जैसे की मैंने प्रथम प्रयास के प्रारंभ में कहा था, यह न तो न्यायदर्शन सीखाने का प्रयास था न ही जो मैंने सिखा है उसे बताने का। मेरा उसे सीखने के प्रथम प्रयास को अंकित करना मात्र था।

एक वस्तु जो इस प्रथम iteration में होनी चाहिए थी पर नहीं हो पाई वह है अधिक स्थानों में वर्तमान व्यवहार जगत से उदाहरण। आशा है की यह अपूर्णता द्वितीय iteration में पूरी हो पाएगी।

मेरे अध्ययन की अनियमितता ने posts के समय की नियमितता और उनकी लंबाई दोनों को कभी कभी प्रभावित किया। इस अध्ययन यात्रा में एक ऐसे handle से जुडने के लिए जो न तो प्रसिद्ध है न तो किसी प्रसिद्ध handle ने recommend किया हुआ, आप single digit सहपाठियों का में धन्यवाद करती हूँ।

So, what next? Second iteration of Nyay which is spaced more regularly, has better sized posts plus has attempted enrichment in content? Yes, but not just that.

Lets start first iteration of Yogdarshan as well in parallel. Okay, not right away. Give me two three weeks.

क्या आप इस शास्त्राध्ययन में अपने उन मित्रों को जिनकी इसमें रुचि हो सकती है उन्हें भी जुडने के लिए आमंत्रित करेंगे?

बुधवार, 23 नवंबर 2022

प्रमाण विभाग परीक्षा। (२.२.१-२)

सूत्र १.१. में सूत्रकार ने प्रमाण के चार विभाग बताए थे।

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३ 

प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है।
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.3.html

इस पर पूर्वपक्षी का आक्षेप है की इन के उपरांत अन्य प्रमाण भी है जो विभाग में होने चाहिए थे।

न चतुष्ट्वमैतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात्। २.२.१

ऐतिह्य अर्थापत्ति संभव और अभाव भी प्रमाण होने से प्रमाण चार ही नहीं है।

ऐतिह्य : "ऐसा कहा जाता है" करके जो बातें प्रचलन में है पर जिनके बारे में यह नहीं पता की किसने कहा है, ऐसी बातें, जिसे हम जनमानस का ज्ञान कह सकते है उसे ऐतिह्य कहा जाता है।

अर्थापत्ति : एक कही हुई बात से उससे संलग्न न कही बात को जान लेना अर्थापत्ति है।

संभव : एक वस्तु के प्रमाणित होने पर दूसरी वस्तु का होना जब सिद्ध हो जाता है उसे संभव कहते है।

अभाव : किसी कार्य के न होने पर (उसके अभाव से) कोई अन्य बाधक कारण की सत्ता को जानने को अभाव प्रमाण कहते है।

उत्तर :-

शब्द ऐतिह्यानर्थान्तरभावादनुमानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावानर्थान्तरभावाच्चाप्रतिषेधः। २.२.२

शब्द में ऐतिह्य का अर्थ और अनुमान में अर्थापत्ति संभव और अभाव के अर्थ आ जाने से प्रतिषेध नहीं बनता।

ऐतिह्य यदि किसी आप्त ने कहा सत्य है (भले ही हमें अब बताने वाले का नाम न पता हो) तब वह शब्द प्रमाण है और यदि असत्य है तो प्रमाण नहीं है। अर्थापत्ति संभव और अभाव अनुमान से भिन्न नहीं है। इसलिए प्रमाणों की संख्या चार जो बताई गई है वह ठीक है।

इस के बाद दूसरे अध्याय के द्वितीय आह्निक में शब्द और पद के ऊपर चर्चा है जिसे छोड कर हम आगे चलेंगे।

बुधवार, 16 नवंबर 2022

शब्द प्रमाण परीक्षा (२.१.४७-५५)

शब्द प्रमाण का लक्षण हमने देखा था,

आप्तोपदेशः शब्दः। १.१.७ 
आप्त पुरुष का कथन शब्द प्रमाण कहलाता है।
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/05/1.1.6-7.html

अब परीक्षा सूत्र देखते है।

संक्षेप में,

पूर्वपक्षी का कहना है की शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है। क्योंकि,
१. जब हम शब्द प्रमाण से कुछ जानते है तब अर्थ का प्रत्यक्ष तो करते नहीं वह तो उनुपलब्ध ही रहता है जैसे अनुमान में।
२. दोनों में ज्ञान की प्रवृत्ति एक सी ही होती है।
३. जैसे अनुमान में अग्नि को धूम के साथ के संबंध से जानते है ऐसे अर्थ के शब्द के साथ के संबंध से शब्द प्रमाण में ज्ञान होता है।

उत्तर :-
१. शब्द प्रमाण में आप्त पुरुष के सामर्थ्य से शब्द के अर्थ का ज्ञान होता है। अनुमान में जैसे लिंग को जानकर व्याप्ति ज्ञान से लिंगी का ज्ञान होता है ऐसा यहाँ नहीं है।
२. अनुमान में लिंग के और व्याप्ति के प्रमाण होते है जिसके आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान होता है शब्द में ऐसे कोई प्रमाणों की उपलब्धि से नहीं अपितु आप्त के सामर्थ्य से ही अर्थ का ज्ञान होता है। (वैसे आप्त के शब्द भी आप्त के प्रत्यक्ष/अन्य प्रमाण से यथार्थ ज्ञान पर आधारित होते है पर जिसे शब्द प्रमाण से ज्ञान हो रहा है उसके पास अन्य प्रमाणों की उपलब्धि नहीं है।)
३. न ही जैसे आप (पूर्वपक्षी) कह रहे हो ऐसे अर्थ से संबंध। यदि शब्द का अर्थ से व्याप्ति संबंध होता तो पूरण जलन कहते ही मुख भर जाता, जल जाता।

पूर्वपक्षी :-  
शब्द और अर्थ जुडे हुए तो है आप उनके संबंध का निषेध नहीं कर सकते।

उत्तर :- 
उनका संबंध संकेत अर्थात् वाच्यवाचकभाव का है व्याप्ति का नहीं। 

उनके संबंध का अलग अलग जाती और देश में अलग अलग होने से भी देखा जाता है की कोई एक शब्द का कोई एक अर्थ के साथ नियमपूर्वक संबंध हो ऐसा नहीं है। (भिन्न भिन्न भाषाओं में एक ही शब्द भिन्न भिन्न अर्थों के लिए प्रयोग किए जाते है और एक अर्थ को कहने के लिए सब के भिन्न भिन्न शब्द भी होते है।)
  

सूत्र सहित 

पूर्वपक्षी :-

शब्दोऽनुमानमर्थस्यानुपलब्धेरनुमेयत्वात्। २.१.४७

शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण ही है। अर्थ की अनुपलब्धि होने से, अर्थ अनुमेय होने से।

जब हम शब्द प्रमाण से कुछ जानते है तब अर्थ का प्रत्यक्ष तो करते नहीं वह तो उनुपलब्ध ही रहता है जैसे अनुमान में। इसलिए शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है।


उपलब्धेरद्विप्रवृत्तित्वात्। २.१.४८

ज्ञान की प्रवृत्ति एक सी होने से। (भी शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है।) 

अनुमान प्रमाण से जैसा ज्ञान होता है ऐसा ही ज्ञान शब्द प्रमाण से भी होता है।

सम्बन्धाच्च। २.१.४९

और संबंध होने से भी। (शब्द और अर्थ का संबंध)

जैसे अनुमान में अग्नि को धूम के साथ के संबंध से जानते है ऐसे अर्थ के शब्द के साथ के संबंध से शब्द प्रमाण में ज्ञान होता है इसलिए शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण ही है।

उत्तर :-

आप्तोपदेशसामर्थ्याच्छब्दादर्थसम्प्रत्ययः। २.१.५०

आप्त पुरुष के सामर्थ्य से शब्द के अर्थ का ज्ञान होता है।

लिंग को जानकर व्याप्ति ज्ञान से लिंगी का ज्ञान जैसे अनुमान में होता है ऐसा यहाँ नहीं है।

प्रमाणतोऽनुपलब्धेः। २.१.५०

प्रमाणों से उपलब्धि न होने से।

अनुमान में लिंग के और व्याप्ति के प्रमाण होते है जिसके आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान होता है शब्द में ऐसे कोई प्रमाणों की उपलब्धि से नहीं अपितु आप्त के सामर्थ्य से ही अर्थ का ज्ञान होता है। (वैसे आप्त के शब्द भी आप्त के प्रत्यक्ष/अन्य प्रमाण से यथार्थ ज्ञान पर आधारित होते है पर जिसे शब्द प्रमाण से ज्ञान हो रहा है उसके पास अन्य प्रमाणों की उपलब्धि नहीं है।)

पूरणप्रदाहपाटनानुपलब्धेश्च सम्बन्धाभावः। २.१.५२

पूरण जलन पाटन (फटना) की उपलब्धि न होने से संबंध का अभाव है।

अनुमान की तरह यहाँ भी व्याप्ति है इस के उत्तर में यहाँ कहा है की पूरण जलन पाटन जैसे शब्द बोलते ही हमारा मुख भर नहीं जाता, जल नहीं जाता, फट नहीं जाता, अर्थात् उन शब्दों के साथ अर्थ की व्याप्ति नहीं है। 

और न ही जैसे आप (पूर्वपक्षी) कह रहे हो ऐसे अर्थ से संबंध। यदि शब्द का अर्थ से व्याप्ति संबंध होता तो पूरण जलन कहते ही मुख भर जाता, जल जाता।

पूर्वपक्षी :-  
शब्दार्थव्यवस्थानादप्रतिषेधः। २.१.५३

शब्द और अर्थ की व्यवस्था के कारण संबंध का निषेध नहीं कर सकते।

शब्द और अर्थ जुडे हुए तो है आप उनके संबंध का निषेध नहीं कर सकते।

उत्तर :-
न सामयिकत्वाच्छब्दार्थसम्प्रत्ययस्य। २.१.५४

नहीं (व्याप्ति संबंध नहीं है), संकेत व्यवस्था से शब्द से अर्थ का बोध होता है।

उनका संबंध संकेत अर्थात् वाच्यवाचकभाव का है व्याप्ति का नहीं। 
*संकेत, समय, शक्ति और वाच्यवाचकभाव यह सब न्याय में समानार्थी है।
  
जातिविशेषे चानियमात्। २.१.५५

उनके संबंध का अलग अलग जाती और देश में अलग अलग होने से भी देखा जाता है की कोई एक शब्द का कोई एक अर्थ के साथ नियमपूर्वक संबंध हो ऐसा नहीं है। (भिन्न भिन्न भाषाओं में एक ही शब्द भिन्न भिन्न अर्थों के लिए प्रयोग किए जाते है और एक अर्थ को कहने के लिए सब के भिन्न भिन्न शब्द भी होते है।)  

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

उपमान प्रमाण परीक्षा (२.१.४२-२.१.४६)

उपमान प्रमाण का लक्षण सूत्र था,

प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्। १.१.६
 
प्रसिद्ध वस्तु के जाने हुए समान धर्म से साध्य(जानने योग्य) वस्तु का ज्ञान कराने वाला साधन उपमान प्रमाण कहलाता है।
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/05/1.1.6-7.html

अब उसके परीक्षा सूत्र देखते है।

पूर्वपक्षी :-

अत्यन्तप्रायैकदेशसाधर्म्यादुपमानासिद्धिः। २.१.४२

अत्यन्त प्रायः अथवा एकदेश के साधर्म्य से उपमान प्रमाण की सिद्धि नहीं होती।

साधर्म्य तीन कोटि का हो सकता है।
१। अत्यन्त अर्थात् एकदम समानता। ऐसे में उपमान की सिद्धि नहीं होती जैसे गाय जैसी गाय कहने से क्या लाभ?
२। प्रायः अर्थात् बहु समानता। बहु सामान्य होने पर भी एक से दूसरे को नहीं पहचान जाता। जैसा बैल ऐसा भैंसा ऐसा नहीं कहा जाता। 
३। एकदेश अर्थात् थोडी सी समानता। अल्प समानता से भी उपमान सिद्ध नहीं होता। हाथी और बिल्ली में भी कुछ समानता है पर जैसा हाथी ऐसी बिल्ली कहने से कुछ सिद्ध नहीं होता।

अर्थात् उपमान से कभी कुछ सिद्ध नहीं होता जिससे उपमान प्रमाण की सिद्धि नहीं होती।

उत्तर :-
प्रसिद्धसाधर्म्यादुपमानसिद्धेर्यथोक्तदोषानुपपत्तिः। २.१.४३

लोक में प्रसिद्ध साधर्म्य से उपमान की सिद्धि होने से ऊपर कहा गया दोष नहीं है।

जो साधर्म्य लोक में प्रसिद्ध है उनका उपयोग वस्तुएं जनाने के लिए होता ही है। शहर में रहने वाले को नीलगाय गाय जैसी होती है कहने से उसे नीलगाय प्रथम बार देखने पर वह नीलगाय है यह बोध हो जाता है। कवि भी कमल जैसी आँख, पल्लव जैसे कोमल हाथ ऐसी उपमाओं का प्रयोग करते है। इस लिए उपमान प्रमाण असिद्ध नहीं है। 
 
पूर्वपक्षी :-
प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षसिद्धेः। २.१.४४

प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की सिद्धि होती है इसलिए (उपमान प्रमाण वास्तव में अनुमान प्रमाण ही है।)

जैसे अनुमान में प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की सिद्धि होती है (धुएं से अग्नि की) ऐसे ही यहाँ (गौ से गवय की), इसलिए उपमान अनुमान ही है, अलग प्रमाण नहीं।
  
उत्तर :-
नाप्रत्यक्षे गवये प्रमाणार्थमुपमानस्य पश्यामः। २.१.४५
तथेत्युपसंहारादुपमानसिद्धेर्नाविशेषः। २.१.४६

अप्रत्यक्ष गवय (नीलगाय) में हम उपमान का फल नहीं देख पाते।
"तथा" कहकर उपसंहार होने से उपमान प्रमाण की सिद्धि होने से अविशेष नहीं है। (उपमान अनुमान प्रमाण से भिन्न है।)

उपमान का फल शब्द और प्रत्यक्ष के संबंध को जानना है। जब नीलगाय प्रत्यक्ष हो तब यह जानना की यह नीलगाय है वह उपमान का फल होगा। अप्रत्यक्ष नीलगाय में उपमान का फल नहीं होता। न ही गाय और नीलगाय के बीच धुएं और अग्नि की भांति कोई व्याप्ति संबंध है। अनुमान स्वार्थ और परार्थ दोनों में होता है, उपमान मात्र परार्थ ही होता है। 

उपमान का उपसंहार साध्य साधन की समानता दिखाते होता है। जैसी गौ ऐसी गवय। अनुमान में ऐसा नहीं है। अर्थात् उपमान प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न ही है।

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

अनुमान प्रमाण परीक्षा (२.१.३५-२.१.४१)

पूर्वपक्षी :-

रोधोपघातसादृश्येभ्यो व्यभिचारादनुमानमप्रमाणम्। २.१.३५

रोध उपघात तथा सादृश्य के कारण अनुमान गलत होने से अनुमान प्रमाण नहीं है।  

कभी कोई कारण आ जाने से अनुमानित कार्य जो अन्यथा होता वह बाधित हो जाता है, कभी कोई कारण आ जाने से कोई कार्य जिसके न होने का अनुमान हो वह वह हो जाता है अथवा कारण/कार्य के सादृश्य से कार्य/कारण का अनुमान गलत हो सकता है ऐसे में अनुमान को प्रमाण अर्थात् निश्चित ज्ञान कराने वाला नहीं कह सकते।

जैसे खूब काले बादल उमड आने पर कोई वर्षा होगी ऐसा अनुमान करता है परंतु वायु बादलों को उडा ले जाता है और वर्षा नहीं होती, नदी में खूब पानी आने से कोई ऊपर वर्षा हुई होगी यह अनुमान करता है परंतु पानी ऊपर बांध टूटने से अथवा हिम पिघलने से आया हो सकता है, चींटीयों को अपना घर बदलते देख कुछ दिनों में वर्षा होने का अनुमान करते हो परंतु वह उनके वर्तमान घर पर अन्य कोई आपत्ति के कारण स्थानांतरण कर रही हो यह हो सकता है, मनुष्य द्वारा मोर जैसी ध्वनि करने पर कोई उससे मोर का अनुमान कर सकता है। ऐसे प्रसंगों से पता चलता है की अनुमान निश्चित ज्ञान नहीं है और इसलिए उसे प्रमाण नहीं कहा जा सकता।

उत्तर :-   
नैकदेशत्राससादृश्येभ्योऽर्थान्तरभावात्। २.१.३६

एक देश त्रास तथा सादृश्य के कारण भिन्न अनुमान होने से अनुमान प्रमाण असिद्ध नहीं होता।

गलत अनुमान का कारण कार्य कारण में से कोई एक देश मात्र को देखकर अथवा अन्य कारणों की उपेक्षा अथवा कार्य कारण को यथायोग्य न समझना है। परिस्थिति को समग्रता से देखकर उसके अनुसार व्याप्ति विचार करते हुए किए गये अनुमानमें गलती नहीं होने से वह पूरी परिस्थिति को ठीक से समझे बिना किए गए अनुमान से भिन्न है और अप्रमाण नहीं है।

जैसे ऊपर वर्षा होने पर आई हुई बाढ में पेड पत्ते मिट्टी वगैरह होते है जो बिना वर्षा के आए पानी में नहीं होते, चींटियाँ यदि बिना भूमि की गर्मी और वर्षा अनुकूल वातावरण के अथवा अन्य विपत्ति के दिखते हुए घर बदल रही है तब उन परिस्थितियों की उपेक्षा करके अनुमान करना गलत होगा। ऐसे ही मोर की ध्वनि सुनकर मोर का अनुमान होता है मनुष्य के स्वर को मोर का समझना वह प्रमाण प्रयोग करने वाले की गलती है। मानो कोई धूल के बादल को धुआँ समझकर आग का अनुमान कर ले तो उससे धुएं और आग की व्याप्ति खंडित नहीं होती।

सूत्र २.१.३७-४१ के विस्तार में न जाते हुए आगे चलते है। सूत्र और अर्थ नीचे दिए है।

पूर्वपक्षी :-
वर्तमानाभावः पततः पतितपतितव्यकालोपपत्तेः। २.१.३७
गिरते हुए के संबंध में गिरा अथवा गिरेगा ऐसा भूतकाल अथवा भविष्यकाल का ही बोध होता है इसलिए वर्तमानकाल का अभाव है।

पूर्वपक्षी का कहना है की अनुमान का प्रयोग मात्र भूत और भविष्य के लिए ही हो सकता है जैसे गिरती हुई वस्तु को देखकर वह गिर गई अथवा गिरेगी यही अनुमान हो सकता है अर्थात् वर्तमान का अभाव है।


उत्तर :-

तयोरप्यभावो वर्तमानाभावे तदपेक्षत्वात्। २.१.३८
वर्तमान के अभाव में भूत भविष्य का भी अभाव मानना पडेगा क्योंकि उन दोनों को वर्तमान की अपेक्षा है।

नातीतानागतयोरितरेतरापेक्षासिद्धिः। २.१.३९
भूत भविष्य की एक दूसरे की अपेक्षा से सिद्धि नहीं होती।

वर्तमानाभावे सर्वाग्रहणम्प्रत्यक्षानुपपत्तेः। २.१.४०
वर्तमान के अभाव में प्रत्यक्ष की सिद्धि न हो पाने से कोई भी ज्ञान नहीं हो पाएगा। (क्योंकि बाकी प्रमाण प्रत्यक्ष मूलक होते है।)

कृतताकर्तव्यतोपपत्तेस्तूभयथा ग्रहणम्। २.१.४१
वर्तमानकाल में भूत भविष्य की भी सिद्धि हो पाने से दोनों प्रकार से ग्रहण होता है।

जो क्रिया अभी चल रही है उसके उल्लेख में तीनों कालों का ग्रहण हो जाता है, क्रिया के आरंभ से लेकर वर्तमान तक के भूत, वर्तमान और वर्तमान से क्रिया के अंत तक के भविष्य। वर्तमान का प्रयोग इस तरह से भी होता है।