अगला सूत्र छह जाति बताता है।
साध्यदृष्टान्तयोर्धर्मविकल्पादुभयसाध्यत्वाच्चोत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविकल्पसाध्यसमाः। ५.१.४
साध्य तथा दृष्टान्त दोनों के धर्म विकल्प-विविधता से और दोनों के साध्य होने (की आपत्ति देने) से उत्कर्षसमा अपकर्षसमा वर्ण्यसमा अवर्ण्यसमा विकल्पसमा साध्यसमा जाति कही जाती है।
छह जाति का स्वरूप बताने के लिए दो हेतु सूत्र में दिए गए है। "साध्य तथा दृष्टान्त दोनों के धर्म विकल्प से" इस हेतु से प्रथम पाँच जाति तथा "(साध्य तथा दृष्टान्त) दोनों के साध्य होने से" अंतिम साध्यसमा जाति का वर्णन है।
उत्कर्षसमा : उदाहरण साधन धर्म और साध्य धर्म को लिए हुए होता है। अब यदि प्रतिवादी उदाहरण का कोई अन्य धर्म पकडकर उसे भी साध्य में आरोपित करने लगे तब वह उत्कर्षसमा जाति बनेगी।
जैसे वादी ने कहा शब्द अनित्य है, उत्पत्तिधर्म वाला होने से। जैसे स्थाली। अब यदि प्रतिवादी कहे की स्थाली में तो स्पर्श धर्म भी है। यदि स्थाली की तरह शब्द है तो उसे भी स्पर्श वाला होना चाहिए। यहाँ उदाहरण का स्पर्श धर्म साध्य में आरोपित किया जाना उत्कर्षसमा जाति है।
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P.S. आगे अनुत्पत्तिसम प्रतिषेध में मैंने यह लिखा है।
"जाति प्रयोग तर्क के वह प्रयोग है जो प्रमाण तक नहीं पहुंचाते। तर्क के प्रमाण तक न पहुंचा पाने के पीछे अपूर्ण तर्क, प्रमाणों से विसंगतता, अप्राप्त प्रमाण जैसे कारण रहते है जो जाति प्रयोगों में देखने मिलते है। परंतु जाति प्रयोग का अस्तित्व उस बात का सूचक है की वे सद् उत्तर जैसे लग सकते है। यदि उनके सफल होने की कोई संभावना ही न होती तो वह प्रयोग में ही न आते। क्योंकि जो तर्क कभी भी सद् उत्तर न बन पाए वह सद् उत्तर जैसा कभी लग भी नहीं सकता। इससे हम स्वयं की जाति समझ की एक परीक्षा कर सकते है। क्या हम ऐसे उदाहरण देख सकते है जहां जाति लक्षण (जिस तर्क को जाति का लक्षण बताया गया है) वादी की व्याप्ति का खंडन करता हो। (P.S. जाति प्रकरण के अंत में इसे संशोधित करेंगे। क्योंकि इस तर्क में त्रुटि, अपूर्णता है।)"
उत्कर्षसमा के प्रसंग में एक उदाहरण लेते है। वादी: वो दूर बैठा हुआ पक्षी कौवा है। काला होने से। जैसे यह पास बैठा हुआ कौवा। प्रतिवादी: पर ये कौवा तो का का बोलता है, वह पक्षी तो कू कू बोल रहा है।
अनेक बार कुछ धर्म एक दूसरे से जुडे रहते है ऐसे में प्रतिवादी का प्रश्न स्वाभाविक भी हो सकता है। तो उसे जाति कहने से पहले हमेशा देखे की १) उसकी व्याप्ति गलत है २) उसने खंडन के भाव से बात कही है)
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अपकर्षसमा : यदि प्रतिवादी उदाहरण में कोई धर्म का अभाव पकडकर उसे भी साध्य में से निकालने लगे तब वह अपकर्षसमा जाति बनेगी।
जैसे वादी ने कहा शब्द अनित्य है, उत्पत्तिधर्म वाला होने से। जैसे स्थाली। अब यदि प्रतिवादी कहे की स्थाली सुनाई नहीं देती है (स्थाली के संयोग विभाग से उत्पन्न हुआ शब्द तो सुनाई देगा पर स्थाली नहीं), यदि स्थाली की तरह शब्द है तो उसे भी नहीं सुनाई देना चाहिए। यहाँ उदाहरण में न मिलने वाले धर्म को साध्य में से भी निकाल देना अपकर्षसमा जाति है।
वर्ण्यसमा, अवर्ण्यसमा : साध्य को वर्ण्य (जिसका वर्णन करना है, जो पहले से ही वर्णित अर्थात् सिद्ध नहीं है) और उदाहरण को अवर्ण्य (जो पहले से ही वर्णित अर्थात् सिद्ध है, अब उसका वर्णन करने की आवश्यकता नहीं है।) कहते है। जब प्रतिवादी अवर्ण्य को वर्ण्य अथवा वर्ण्य को अवर्ण्य बताता है तब उसे वर्ण्यसमा अथवा अवर्ण्यसमा जाति कहते है।
जैसे यदि प्रतिवादी कहता है की यदि साध्य और उदाहरण समान है तब उदाहरण को भी साध्य के जैसे असिद्ध मना जाए (स्थाली के अनित्यत्व को भी असिद्ध - वर्ण्य माना जाए) और फिर ऐसा होने से उदाहरण जो स्वयं असिद्ध है वह क्या किसी और को सिद्ध करेगा? तब उसे वर्ण्यसमा जाति कहेंगे।
यदि वह कहता है की दोनों समान होने से शब्द का अनित्यत्व भी सिद्ध कोटि में आ जाएगा इस लिए वादी का उसे सिद्ध करने का प्रयत्न ही अर्थहीन है। (वह शब्द के अनित्यत्व को नहीं मान रहा, मात्र वादी के कार्य को आधारहीन बता रहा है यह कहकर की आपके हिसाब से तो यह सिद्ध ही है तो क्यों फिर इसे सिद्ध करने के पीछे पडे हो? अर्थात् आपकी प्रवृत्ति से तो यह सिद्ध होता है की साध्य उदाहरण के समान नहीं है तभी तो आपको उसे सिद्ध करने के लिए प्रयत्न करना पड रहा है। ) इसे अवर्ण्यसमा जाति कहेंगे।
विकल्पसमा जाति : पक्ष और दृष्टांत में धर्म के वैविध्य का आश्रय ले कर खंडन करना विकल्पसमा जाति है।
जैसे यदि प्रतिवादी कहता है की स्थाली और शब्द दोनों उत्पत्ति धर्मक होने पर भी स्थाली में तो गुरुता है पर शब्द में नहीं है ऐसे ही अन्य विभिन्न धर्मों के नित्य साहचर्य के अभाव को (व्यभिचार को) दिखा कर यह कहे की फिर उत्पत्ति धर्म और अनित्यत्व में भी तो व्यभिचार हो सकता है इसलिए शब्द का अनित्यत्व उसके उत्पत्ति धर्म से कैसे मान ले। यह विकल्पसमा जाति है।
साध्यसमा जाति : यहां प्रतिवादी कहेगा की यदि स्थाली शब्द के समान है तब शब्द के समान ही स्थाली का अनित्यत्व भी साध्य कोटि में आएगा। तो पहले स्थाली के अनित्यत्व को तो सिद्ध करो।
साध्यसमा और वर्ण्यसमा में समानता प्रतीत होती है। पर वहां (वर्ण्यसमा में) दृष्टांत को ही नकारा जा रहा है क्योंकि वह साध्य के समान है और यहां साध्यसमा में यह कहा जा रहा है की दृष्टांत में साध्य धर्म है अथवा नहीं यह पहले सिद्ध करो।
अगले दो सूत्र में भाष्यकार इन जातिओ का उत्तर देते है।
किंचित्साधर्म्यादुपसंहारसिद्धेर्वैधर्म्यादप्रतिषेधः। ५.१.५
व्याप्तियुक्त विशेष धर्म से ही सिद्धि होने के कारण कोई भी व्याप्ति रहित धर्म के कारण प्रतिषेध नहीं हो सकता।
दृष्टांत और साध्य में अंतर होता ही है। दृष्टांत साधन साध्य धर्म के संबंध को समझने के लिए होता है साध्य और दृष्टांत की शत प्रतिशत समानता का सूचक नहीं होता। दृष्टांत के ऐसे कोई धर्म का जिसका साध्य से व्याप्ति संबंध नहीं है उपयोग प्रतिषेध के लिए करना असत् उत्तर अर्थात् जाति प्रयोग होगा।
ऊपर का उत्तर सारी छह जाति के लिए है। उसके उपरांत सूत्रकार वर्ण्यसमा अवर्ण्यसमा तथा साध्यसमा इन तीन जाति के लिए एक और उत्तर देते है।
साध्यातिदेशाच्च दृष्टान्तोपपत्तेः। ५.१.६
दृष्टांत में साध्य धर्म के प्रत्यक्ष गृहीत होने पर अथवा दृष्टांत युक्तियुक्त होने से।
वर्ण्यसमा अवर्ण्यसमा तथा साध्यसमा में दृष्टांत पर, उसे देने पर अथवा दृष्टांत में साध्य धर्म होने पर ही सवाल उठाए जाते है परंतु दृष्टांत वही बनता है जो प्रसिद्ध हो, जिसमें लौकिक तथा परीक्षक का बुद्धिसाम्य हो ऐसे सर्वमान्य दृष्टांत, जो पहले से सिद्ध है उसे साध्य कोटि में खिंचना अयोग्य खंडन होगा। (यहां योग्य दृष्टांत को अयोग्य बताना गलत है यही कहा जा रहा है। यदि दृष्टांत सच में अयोग्य अथवा असिद्ध हो तब तो उसे ऐसा कहना ही होगा)